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भक्ति सागर ग्रन्थ: सन्त चरनदास (अष्टांग योग, धर्म-संवाद एवं सम्पूर्ण भक्ति रस महाकोश)

Bhakti Sagar Granth of Swami Charandas

सन्त चरनदास जी महाराज द्वारा

DevanagariHindipublished690 पृष्ठ

८८ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
अष्टपदी छन्द
जहँ आतमदेव अभेव सेव्य नहिं सेवैहै ।
स्वामीजी ह्वां नाहिं पूजा नहिं देव है ॥
नौधा¹ नेम न प्रेम ज्ञान नहिं ध्यान है ॥
जड़ चेतन कछु नाहिं सुरति नहिं ज्ञान है ॥
विधि निषेध नहिं भेद अन्वैवितरेकना ।
निश्चय अरु व्यवहार कछू तामें न ह्वा ॥
उत्तम मध्यम भाव न शुभ ना अशुभहै ।
सिंह सर्प डरनाहिं औ शस्तर कोन मै ॥
पावक दग्ध न करै बहावै जल नहीं ।
ह्वां नहिं पहुँचे काल न ज्वालाहै तहीं ॥
ऐसा भवन समाधि भाग्य सों पाइये ।
तजि कै जक्त उपाधि तहां मठ छाइये ॥
यतन करै लख माहिं और सब भेषही ।
कोटिनमें कोइ होय समाधी एकही ॥
ह्वांतक पहुंचै जाय सोई सिध साध है ।
कहै शुकदेव पुकारि जु 'कठिन समाधि है ॥
दो० भक्ति योग अरु ज्ञान की, त्रैविधि कहूँ समाधि ।
गुरू मिलै तौ सुगमहै, नाहीं कठिन अगाधि ॥
अथ भक्तिसमाधि ॥
सब इंद्रिन को रोंकिकै, करि हरि चरणन ध्यान ।
बुद्धि रहै सुरत रहै, तौ समाधि मत मान ॥
ध्याता बिसरै ध्यान में, ध्यान होय लय ध्येह ।
बुद्धि लीन सुरत न रहै, पद समाधि लखिलेह ॥
१ श्रवण कीर्तन स्मरण पादसेवन अर्चन वंदन दास्य सख्य आत्मनिवेदन ॥

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ८६
अथ योगसमाधि ॥
आसन प्राणायाम करि, पवन पंथगहिलेहि ।
षट चक्र को छेद करि, ध्यान शून्य मन देहि ॥
आपा विसरै ध्यान में, रहै सुरति नहिं नाद ।
लीन होय किरिया रहित, लागै योग समाध ॥
अथ ज्ञानसमाधि ॥
जबलग तत्त्व विचारि करि, कहैं एक अरु दोय ।
ब्रह्मव्रत बांधे रहै, ह्वाँलग ध्यानहिं होय ॥
मैं तू यह वह भूलि करि, रहै जू सहज स्वभाव ।
आपा देहि उठाय करि, ज्ञान समाधि लगाय ॥
ज्ञान रहित ज्ञाता रहित, रहित ज्ञेय अरु जान ।
लगी कभी छूटै नहीं, यह समाधि विज्ञान ॥
पूछे आठों अंग तें, योग पंथ की बात ।
शुकदेव कहै तामें चलौ, गुरू कृपा लै साथ ॥
इति समाधिअङ्गसम्पूर्णम् ॥
अथ छहौकर्महठयोग वर्णन ।
शिष्यवचन ॥
दो० अष्टांग योग वर्णन कियो, मोको भई पहिंचान ।
छहौकर्म हठयोग के, बरणौ कृपानिधान ॥

६० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
गुरुवचन ॥
पहिले ये सब साधिये, काया होवै शुद्धि ।
रोग न लागै देह को, उज्ज्वल होवै बुद्धि ॥
अरु साधा षटकर्म बताऊं । तिनके तोंको नाम सुनाऊं ॥
नेती धोती वसती करिये । कुंजर करम रोग सब हरिये ॥
न्योली किये भजै तन बाधा । देखिदेखि जिन गुरु सों साधा ॥
त्राटक कर्म दृष्टि ठहरावै । पलक पलक सों लगन न पावै
अथ नेतीकर्म ॥
कुं० मिही जु सूत मँगाय कै, मोटी बाटै डोर ।
ऊपर मोम रमाय कै, साधै उठकर भोर ॥
साधै उठकर भोर, डेढ़ बालिशत की कीजै ।
ताको सीधी करै, हाथ अपने में लीजै ॥
नासा रंध्र में मेल कर, खींचै अँगुली दोय ।
फेरि विलोवन कीजिये, नेती कहिये सोय ॥
दो० कान नाक अरु दांत को, रोग न व्यापै कोय ।
उज्ज्वल होवै नैनही, नित नेती करि सोय ॥
अथ धोतीकर्म ॥
धोती कर्म यासों कहैं, पट्टी सोलह हाथ ।
कोढ़ अठारह नाभवैं, करै जु नित परभात ॥
कुं० चौड़ी अंगुल चारिकी, मिही वस्त्र की होय ।
जलमें भेय निचोय करि, निगल कंठ सों सोय ॥
निगल कंठ सों सोय, सिरा बाहर रहि जावै ।
फेरि निकालै ताहि, पित्त कफ दोऊ लावै ॥
काया होवै शुद्धही, भजै पित्त कफ रोग ।
शुकदेव कहै धोती करम, साधै योगी लोग ॥

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६१
अथ वर्मस्तीक
तीजे वस्ती कर्महीं, कहौं सुनौ चितलाय ।
क्रिया करै गन्नेसही, कुंजी तहां लगाय ॥
कुंजी तहां लगाय, मूल को धोवन कीजै ।
पसारन संकोच सुरति दै यह करि लीजै ॥
नीर गुदासों खैंच करि, थाँभै उदर मंझार ।
कछू डोल अस बैठकर, फिरि दे ताहि उतार ॥
दो० यही जु वस्ती कर्म है, गुरु बिन पावै नाहिं ।
लिंगगुदा के रोग जो, गर्मी के नशिजाहिं ॥
अथ गजकर्म
गज कर्म याही जानिये, पिये पेट भरि नीर ।
फेरि युक्ति सों काढ़िये, रोग न होय शरीर ॥
अथ न्योलीकर्म
न्योली पदमासन सों करै । दोनों कर घुटनों पर धरै ॥
पेटरु पीठ बराबर होंय । दहने बायें नले बिलोय ॥
मैल पेटमें रहन न पावै । अपान वायु तासों वश आवै ॥
तापतिली अरु गोला शूल । हौन न पावैं नेक न मूल ॥
जो गुरु करिकै ताहि दिखावै । न्यौली कर्म सुगम करि पावै ॥
और उदर के रोग कहावै । सोभी वै रहने नहिं पावै ॥
अथ त्राटककर्म ॥
त्राटक कर्म टकटकों लागै । पलक पलक सों मिलै न ताकै ॥
नन उघारेही नित रहै । होंय दृष्टि थिर शुकदेव कहै ॥
आँख उलटि त्रिकुटीमें आनो । यह भी त्राटक कर्म्म पछानो ॥
जेते ध्यान नैन के होई । चरणदास पूरण हो सोई ॥

६२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० कपाल भांति अरु धौंकनी, बाघी शंख पखाल ।
चारि कर्म ये औरहैं, इनहिं छहों के नाल ॥
इति त्राटककर्म ॥
अथ खेचरीमुद्रा ॥
शिष्यवचन
दो० एक बार फिरभी कहौ, मुद्रा पांच दयाल ।
मोसे रंक अधीनपर, होकर बहुत कृपाल ॥
गुरुवचन ॥
अष्टपदी ॥
आगे मुद्रा तोहिं कही समुझाइया ।
फिरभि कहूँ अब खोलि सुनौ वितलाइया ॥
पहिले मुद्राखेचरी को साधन भनूं ।
जैसे आगे करी सबी ऋषि मुनिजनूं ॥
ताते जलके कुरले करि जुबगाइये ।
तापाछे चौबस्त को चूर्ण लाइये ॥
जिह्वा हाथमें पकरि मर्दन छीलनकरै ।
दोहनताननकरै बहुरि दशनन धरै ॥
फिरि करि छीलन ताहि छेदनहिं कीजिये ।
तोतू ज्यों कटिजाय यत्न सोइ लीजिये ॥
ब्रह्मरंध्र को धोयकै मैल निवारिये ।
बायें अँगूठे ऊपर कागको धारिये ॥
सहज सहज सरकायकै आगे लाइये ।

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६३
यह सब साधन कठिन गुरूसे पाइये ॥
दो अँगुली कूंवीसूं करि मेलना ।
जिह्वा उलटी राख जु नितप्रति खेलना ॥
यह उपाय षट मास करै तजिमानही ।
रसना यों बँधिजाय चढ़ै अस्थानही ॥
दो० चार काज यासूं सरैं, फलदायक बहुभांति ।
योग माहिं बड़ भूपहै,अधिकीजाकीकांति ॥
अष्टपदी ॥
एक जु प्राणायाम जीभसूं कीजिये ।
दूजे बन्ध उड्यान यहीसूं दीजिये ॥
तीजे करि करि ध्यान निरखि जहूँ ज्योतही ।
चौथे अमृत पिवै खुलै तहँ सोतही ॥
खैंचे त्रिकुटी पाट सहज अरु फेरिये ।
द्रवै सुधा१ रसनीर जहां मन घेरिये ॥
अमृतही के स्वादको कौन बखानई ।
जो कोइ अँचवै हंस सोइ पुनि जानई ॥
दिन दिन पलटै देह रक्त दूधाभवै ।
बीसबरस अरु चार माहिं ऐसा हवै ॥
इच्छाचारी होय बरस छत्तीसमैं ।
सब लोकन में जाय अपनी शक्ति ते ॥
दो० जेते विष व्यापै नहिं, रोग न दहै शरीर ।
जो कोइ पीवै युक्तिसूं, कामधेनु को क्षीर ॥
भूख प्यास अरु नींद के, रहै न तीनौ लेव ।
नाद बिन्दु गुटका बँधै, कहै यही शुकदेव ॥
१ अमृत ॥

६४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
तीन महीने चार का, बालक गोदी माय ।
ना वह पीवै नीरहीं, अन्न नही वह खाय ॥
वह तौ जीवै दूधसूं, वाकूं वही जुकाम ।
लगो रहै माताकुचन, निसरै एक न याम ॥
अमृत पीवै योगिया, ऐसे चरणहि दास ।
पहरहु यह छांड़ै नहीं, कामधेनु' को पास ॥
ऐसे धारै तौ बनै, सुधा रसाला संत ।
दिविकायाहोजायजब, धनिकहै कमलाकांत ॥
आठ पहर लागारहै, पीवै कै कै ध्यान ।
मैं कहा जैसाही बनै, परसै पद निरवान ॥
भेद गुरूसे ये लहै, और छिपावै वाहि ।
जोजोफलयाकेअधिक, होय परापति तांहि ॥
योगेश्वर अरु देवता, मुनी 'ऋषीश्वर जान ।
रखवारे वाके घने, करन न देवैं ध्यान ॥
टेक गहै सो जापियै, और करै ह्यां ध्यान ।
यति सती अरु गुरुमुखी, जाकी ऐसीआन ॥
बड़ी जु मुद्रा खेचरी, मुख में याका वास ।
जो कहिमें शुकदेवजी, जानलेहु चरणदास ॥
अथ भूचरी मुद्रा ॥
दूजी मुद्रा भूचरी, नासा जाको वास ।
प्राण अपान जुदी जुदी, एक करै चरणदास ॥
जितकीतितरखप्राणको, वा घरलाय अपान ।
ताहि मिलावै युक्तिसूं, करि करि संयम ध्यान ॥
जब वह जीतै पवनकूं, मन चंचल ठहराय ।
• १ इन्द्रकी गौ ॥

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६५
गगन चढ़न की आश हो, कहैं शुकदेव सुनाय ॥
गुदाद्वार बंध दीजिये, ऐंड़ी पांव लगाय् ।
आसन सिद्धजुकीजिये, मन पवनावश लाय ।
अपान वायु जब वशभवै, ऊरध खैंच चलाय ।
सनई सनई जाचढ़ै, प्राण वायु ह्वैजाय ॥
अथ चाँंचरीमुद्रा ॥
तीजी मुद्रा चाँवरी, जाको नैनन वास ।
नासा आगे दृष्टिकूं, राखै मन धर आस ॥
अंगुल चार नासिका आगे । चित अस्थिरकरि देखन लागे ॥
खुले पांच तत करै जु कोई । मन अरु पवन जहां थिर होई ॥
फिर ढांसू नासा परि आवै । अचल टकटकी तहां लगावै ॥
जहँ बहुतक अचरज दरसावै । विभव स्वर्ग के आगे आवै ॥
जितसू पलट तिरकुटी माहीं । ध्यान करै कहुँ अन्त न जाहीं ॥
दीरघ तारासा परकासै । उदय होय सूरज ज्यों भासै ॥
चित चेतन दोउ मेला करै । लै उपजै अरु दुबिधा हरै ॥
यही चाचरी मुद्रा जानै । चरणदास याकूं पहिंचानै ॥
अथ अगोचरीमुद्रा ॥
कहूँ अगोचरि चौथि मुद्रा । तामें सुख पावै योगींद्रा ॥
यामुद्राका सँरवन बासा । शुकदेव कहैं सुन चरणहि दासा ॥
दो० ज्ञान सुरति दोउ एक है, पलट अगोचर जाय ।
शब्द अनाहद मैरतै, मन इन्द्री थिरपाय ॥
अथ उनमनीमुद्रा ॥
पाँचवीं मुद्रा उनमनी, दशवें द्वारे, वास ।
सिद्धसमाधि मिलै जहां, दग्धहोय सब आस ॥

६६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ
आनंदहि आनंद जहाँ, तहां न काल कलेश।
तीनों गुन नहि पाइये, ह्वांनहिं मायालेश॥
जीवातम परमात्मा, होय जाय वा ठौर।
ध्याता ध्यानन ध्येह जहँ, तहांन किरिया और॥
महावन्धसाधनविधि॥
महाबन्ध तोहिं पहल बताऊं। पाछे मूलवन्ध समझाऊं॥
बायां पाँव सिवन गहि दीजै। मूल द्वार ऐंडी बँध कीजै॥
दहिनी जंघ जंघपर लावै। गउमुख आसन नाम कहावै॥
राखै चिबुक हृदय पर लाय। पवनराह पूरव को जाय॥
ध्यान त्रिकूटी संयम करै। प्राण वायु हिरदे में धरै॥
महाबन्ध ऐसे करि साधै। गुरू प्रताप याहि औराधै॥
बिना पुरुष तिरियाकूं जानौ। बन्ध बिना मुद्रा पहिंचानौ॥
निरफल जायपुरुष बिन नारी। महावन्ध बिनु मुद्राधारी॥
माहिं कण्ठके ध्यान लगावै। सुरत निरत ह्वांईं ठहरावै॥
दो० महाबंध अस्थत करै, सो योगी द्वै जाय।
पवन पंथ मुंदित करै, ध्यान कण्ठ में लाय॥
शशियरकूं सूरज पर लावै। रेचक पूरक पवन फिरावै॥
महावंध करै अभ्यासा। अमृत अचवै बुझै पियासा॥
जरा मृत्यु देही नहिं आवै। महा बंध तीनौ गुन पावै॥
जठर अग्नि परचै बहुभारी। निशिदिन माहिं करै अठवारी॥
पहर पहर भर पवन भरीजै। प्रथम अल्प अभ्यास करीजै॥
तिय सेवन तापन नहिं करै। काम अग्नि काया नहि जरै॥
दो० ऐसी विधि साधै पवन। योग पंथ धरि पाय।
पहर पीङ्गला बनत जन आयुरदा बढ़िजाय॥

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६७
अथ मूलबंध ॥
मूलबंध अब कहतहूं, अपान वायु वश होय ।
ऊपर कूं खैंचन करै, मिलै प्राण मै सोय ॥
कमल कमल सीधे भवै, 'नाभि तले हो राह ।
आगे मारग सुगम हो, पहुँचै योगीनाह ॥
मूलबंध गुण ऐसा होई । वायुअधोगति जाय न कोई ॥
रेता ऊरध यासूं सधै । दिन दिन आयु सवाई बधै २॥
यासूं कारज सब वनिआवै । रोगरक्त को सभी नशावै ॥
योगी पहिले या आराधै । अपान वायु कूं नीके साधै ॥
अब मैं मूलबंध बतलाऊं । ज्योंका त्यों साधन दिखलाऊं ॥
गुदाबास याका तुम जानो । गुदा द्वार बंधनदै ठानो ॥
बायें पांव कि एँड़ीसेती । मूल द्वार रोकै करिहेती ॥
ऊरधही ३ कूं खैंचन कीजै । शुकदेव कहै नीके सुनलीजै ॥
अरु कबहूं मन ऐसीधरै । आसन पदम करन कूं करै ॥
कपड़े की इकगेंद बनावै । गुदा मध्य कसबंध लगावै ॥
योंभी वायु सधै वा भांती । जोपै लगारहै दिनराती ॥
पवन तले की ऊपरजावै । प्राण अपान सहज मिलजावै ॥
नाद बिंद रल मिलजा दोई । एकवर्ण साधै जो कोई ॥
योग माहिं यह भी परधान । बूढ़ी देह पलटहो ज्वान ॥
जठर ४ अगन बाढ़ै अधिकाय । जो चाहै तौ बहुतै खाय ॥
सुन चरणदास कहै शुकदेव । जो गुरु पूरा देवै भेव ॥
अथ जलंधरबंध ॥
दो० मूलबंध तोसूं कहा, गुण कह तब समुझाय ।
बंध जलंधर कहतहूं, सुन सरवन करि चाय ॥
१ तोंदी २ बाढै ३ ऊपर ४ पेट ॥

तीजा बंध जलंधर जानौ। कंठ वास ताका पहिचानौ ॥
ग्रीवा लटक चिबुक हिय लावै। कंठ पवन रोके परचावै ॥
हिरदै प्राण पूर करि रहिये। बंध जलंधर यासूं कहिये ॥
उरध पवन नीचे को जाय। अरध पवन ऊरधकूं लाय ॥
उदर मध्य लै ताहि बिलोय। ब्रह्मरन्ध्र जा पहुँचै सोय ॥
इह विधि ब्रह्मपंथकूं धावै। सहजै सहजै मध्य समावै ॥
जरा मरण जहँ भय नहिं व्यापै। लहै अमरपद होरह आप ॥
चरणदास शुकदेव बतावै। जोपै बंध उड्यान लगावै ॥
अथ उड्यानबंध ॥
दो० बंध उड्यान आगे कहा, जिह्वा उलट लगाय ।
कान आंख मुख नाकके, स्वर सब बंधकराय ॥
इह सुबंध महिमा अधिक, लागै बजर किवाँर ।
सातद्वार की बाटहो, निकसै नाहिं बयार ॥
पांचौ मुद्रा बंध सब, दिखलाया यह देश ।
•शुकदेव कहै रणजीत सुन, और कहूं उपदेश ॥
अष्टपदी छन्द ॥
चौरासीही जानि जुआसन योगके ।
सिद्ध पदम तिनमाहिं बड़ेही थोकके ॥
बहुनारिनके मांहिं जु नौनारीभनी ।
तिन मैं सुषमन जानबड़ी गुरुसूं सुनी ॥
तीनि बंधके माहि मूलकूं जानिये ।
मुद्रौही में बड़ी खेचरी मानिये ॥
वायुनमें परधान प्राणकं देखिये ।
सबकुंभकहूं माहिं केवलबड़ि लेखिये ॥
बानी चारौ मध्य पराही गाइये ।

अष्टाङ्गयोगवर्णन । ६६
चार अवस्थामाहिं तुर्या वड़िपाइये ॥
परम शून्यको ध्यान परेसून्हे परै ।
याकीसम कोइ नाहिं ध्यान तिनको धरै ॥
अजपाहीके जाप बराबर औरना ।
शीलदयासे मीत न कोई देहमा ॥
पूजन मैं बड़ि जान जुआतमकी करै ।
ज्ञानसमान न दान सकल विपता हरै ॥
गुरुसा रक्षक और नहीं कोइ लोकमें ।
योग युक्तिसा स्वाद नहीं कोइ भोकमें ॥
कह शुकदेव सुनौ रणजीतही ।
वड़ी वड़ी जोगांसे खोल तुमकूं जुदी ॥
छन्द ॥
अमरी करतै बजरी रोंकै बजरी करतैं बाई ।
रोंकै छींक साधना करिकै नासालेहु जँभाई ॥
जल संयमसूं नभकूं देखै संयम नादसुं ज्योती ।
संयम पवन होय थिरकाया सो वश राखै मोती ॥
जिया विछावै मृत्यकबौदै बूढ़ी होय न काया ।
संयम नींद विंदनहि जावै यह शुकदेव बताया ॥
दहिने स्वरमें भोजन कीजै बायें स्वरमें पानी ।
दहिने स्वरमें अमरी रेचै देह न होय पुरानी ॥
दहिने स्वरमें जलसूं न्हावै बायें स्वरमें लङ्की ।
शिव आसनसूं सोवन कीजै नारिन कीजै सङ्की ॥
पावकसूं तापन नहिं कीजै जो तापै तौ नैना ।
भोजन गरम न खट्टा खावै फटै झिरै नहिं मैना ॥
॥ ... ॥

१०० श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० गरमीही के रोग में, चन्द चला रवि बन्द ।
शीत रोग सूरज चला, शशि पर राखै बन्द ॥
तीन रोज कै पांच दिन, कै दिन राखै सात ।
रोग देखि जैसी करै, होय निरोगा गात ॥
सूरज रात चलाइये, द्योस चलावै चन्द ।
पवन फिरै ऊषा बधै, श्वास चलै जो मन्द ॥
कान आंख अरु दांतके, सबही रोग भजाहिं ।
श्याम वालनहिं श्वेतहों, करै 'जुनीकी दाहिं ॥
रुई पुरानी बहुतही, दिनकूं दहिने राखि ।
बायें राखै रैनिकूं, खोली साधन भाखि ॥
शीत उष्ण व्यापै नहीं, विष नहिं व्यापक होय ।
बीसबरस साधन किये, रहै विकार न कोय ॥
बासी भ्रष्ट न खाइये, सूक्ष्म करै अहार ।
जल बहुत पीवै नहीं, सपरस करै न नार ॥
तन मन साधै बचन ही, पाप न लगने देह ।
शुकदेवकहैचरणदाससुनि, अधकी साधन येह ॥
सब जीवन सुख दीजिये, सब सों मीठा बोल ।
आतम पूजा कीजिये, पूजा यही अतोल ॥
दया पुष्प चन्दन नंवन, धूप दीप दे मन्न ।
भाँति भाँति नैवेद्य सूं, करै देव परसन्न ॥
जो कोइ आवै राजसी, देहु बड़ाई ताहि ।
जाकूं देखो तामसी, करो नम्रता बाहि ॥
जो कोइ होवै सात्त्विकी, मिलै ताहि तजिमान ।
गुढ़ी खोल चर्चाकरो, लीजै ततमत छान ॥
ओरन कूं परसन करै, आपहु रहौ परसन्न ।

अष्टाङ्गयोगवर्णन । १०६
बासलहो हरि धाम में, ह्यां वा हो धन धन्न ॥
राचस तामस सात्त्विकी, क्षेत्तर तीनहिं भाँति ।
क्षेत्रक आतम देवहै, सबको सहिये क्रांति ॥
सब में देखे आप कूं, सब कूं अपने मांहिं ।
पावै जीवनमुक्ति को, यामें संशय नाहिं ॥
सब में देखे आतमा, आपन मैं करि ध्यान ।
यही ज्ञान ब्रह्मज्ञान है, यही जु है विज्ञान ॥
अहंकार मिटि ब्रह्महो, परमातम निरवान ।
शुकदेवाहो कहतहूं, चरणदास हिय आन ॥
जो तें पूंछा सो कहा, भेद कहा सब खोल ।
अरु तेरे हियमें कछू, सकुच खोल कर बोल ॥
शिष्यवचन ॥
अपना लखि किरपाकरी, समझायो बहुभांति ।
योग औरतैं गुरूजी, हिये में आई शांति ॥
तुम्हरी कह अस्तुति करूं, मोपै कही न जाय ।
इतनी शक्ति न जीभकी, महिमां कहै बनाय ॥
किरपाकरी अनाथ पर, तुमहो दीनानाथ ।
हाथ जोड़ि मांगौं, यही, मम शिर तुम्हरो हाथ ॥
मोसे रंक गरीबकी, तुम गहि पकरी बांह ।
भव बूड़ंत राखा मुझे, चरण कमलकी छाहं ॥
आपहि तुम किरपाकरी, मैं कित लहता तोहिं ।
तुमको पाऊं ढूंढ़िकरि, इतनी शक्ति न मोहिं ॥
व्यास पुत्र शुकदेव तुम, जक्त माहिं विख्यात ।
तुम दर्शन दुर्लभ महा, पुरुषनको न दिखात ॥

१०२ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
बड़े भाग मेरे जगे, पूरुबले परताप ।
किरपा श्रीगोपाल की, आय मिले तुम आप ॥
चरणदास अपनो कियो, दियो परम सन्तोष ।
बैठि करूंगो ध्यानही, अब कुछ रह्यो न शोक ॥
चलत फिरत ह्यां आइया, तुम भरि दीन्ह्यो मोहिं ।
नैन प्राण तन मनसभी, देखत अरपे तोहिं ॥
चाहमिटी सब सुख भये, रहा न दुखका मूल ।
चाहूं तौ चाहूं यही, तुम चरणनकी धूल ॥
गुरुवचन ॥
योग तपस्या कीजियो, सकल कामना त्याग ।
ताको फलमत चाहियो, तजौ दोष अरु राग ॥
अष्ट सिद्धि जो पै मिलै, नेक न कीजै नेह ।
धरि हिरदय परमात्मा, त्यागे रहियो देह ॥
जेंती जगकी वस्तुहै, तामें चित्त न लाय ।
सावधान रहियो सदा, दियो तोहिं समुझाय ॥
बार बार तोसे कहूँ, ह्यां मत दीजो चित्त ।
सिद्ध स्वर्गफलकामना, तजि कीजो हरिमित्त ॥
जो कीजै हरि हेतही, एहो चरणहि दास ।
भक्तियोग अरु शुभकरम, नीकी ठौर निवास ॥
शिष्यवचन
ऐसेही अब करूंगो, तुम चरणन परताप ।
अष्ट सिद्धि समझौ चहौं, वर्णन कीजै आप ॥
समझौं तौ त्यागूं उन्हें, करवाओ पहिंचान ।

अष्टाङ्गयोगवर्णन । १०३
कहा नाम लक्षण कहा, कौन रहे अस्थान ॥
गुरुवचन ॥
कहि शुकदेव वर्णन करूं, अष्ट सिद्धि के नाउ ।
लक्षण गुण सबही सहित, नीके तोहिं समझाउ ॥
अथ अष्टसिद्धि के नाम ॥
प्रथमै अणिमा सिद्धि कहावै । चाहे तो छोटा ह्वै जावै ॥
अणु समान छिपि जावै सोई । ऐसी कला जु पावै कोई ॥
दूजी महिमा लक्षण एता । चाहे बड़ा होय वह जेता ॥
तीजी लघिमा वह कहवावै । पुष्पतुल्य हलका ह्वै जावै ॥
चौथी गरिमा कहूँ बिचारी । चाहे जितना होवै भारी ॥
पाँचवीं प्रापति सिद्धि कहावै । जित चाहे तितही ह्वै आवै ॥
छठवीं पराकाम्य गुण धरै । शक्ति पाय चाहे सो करै ॥
सातवीं सिद्धि ईशिता रानो । सबको आज्ञा माहिं चलानी ॥
दो० वशीकरण सिधि आठवीं, कहैं श्री शुकदेव ।
चाहे जिसको वश करै, अपनाही करि लेव ॥
चरणदास सिद्धैं कही, समझलेहि मनमाहिं ।
जो हैं जनुआं राम के, इनमें उरझैं नाहिं ॥
योग किये आठो सिधि पावै । कै भोगै कै चित न लगावै ॥
योग किये मन जीता जावै । पलटै जीव ब्रह्मगति पावै ॥
योगेश्वर चाहे सो करै । भरी रितावै रीती भरै ॥
योगेश्वर ईश्वर ह्वै जाई । दिन दिन बढ़ै कला सवाई ॥
तजिये भोग योगहीं करिये । तिरगुण परै ध्यानही धरिये ॥
चौथे पद में करै निवासा । काहू विधि का रहै न साँसा ॥
योग करै सोई परबीना । शुकदेव कहैं प्रकट कहि दीना ॥

१०४ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
दो० पोथी माहीं देखि करि, करै जु कोई योग ।
तन छीजै सिधि ना भवै, देहो आवै रोग ॥
देखि देखि गुरु सों करै, लै अज्ञा रहु संग ।
सिद्धि होय, साधन सबै, कछू न आवै भंग ॥
योग तपस्या में बड़ा, पहुँचावै हरि पास ।
जन्म मरण बिपता मिटै, रहै न कोई आस ॥
शिष्यवचन ॥
मैं समझी जानी सभी, सूझभई हिय माहिं ।
किरपाकरि जो जो कहा, ताको बिसरूं नाहिं ॥
व्यासदेव श्री जनक जै, जै जै श्री शुकदेव ।
जै जै यह सुकतारहै, समुझायो करि हेव ॥
हियहुलसो आनँदभयो, रोम रोम भयो चैन ।
भये , पबित्तर कान ये, सुनि सुनि तुम्हरे बैन ॥
छप्पै ॥
गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरू देवनके देवा ।
सर्व सिद्धि फल देन गुरू तुम मुक्ति करेवा ॥
गुरु केवट तुम होय करौ भवसागर पारी ।
जीव ब्रह्म करिदेत हरौ तुम व्याधा सारी ॥
श्रीशुकदेव दयाल गुरु चरणदास के शीश पर ।
किरपाकरि अपनौ कियौ सबही विधिसों हाथधर ॥
इति श्रीगुरुचेलासंवादअष्टाङ्गयोगसम्पूर्णम् ॥

योगसन्देहसागरवर्णन । १०५
अथ श्रीचरणदासकृतयोगसन्देहसागर
प्रारम्भः ॥
दो० अर्थ बताओ पण्डिता, ज्ञानी गुणी महन्त ।
जो तुम पूरे साधुहौ, भक्ता हरिके सन्त ॥
चरणदास पूंछैं 'अरथ, भेदी होय कहौ ।
समझौ तौ चर्चा करौ, नाहीं मौन गहौ ॥
ब्रहमण्डे सों पिण्डे जानौ । ठौर ठोर घट में पहिचानौ ॥
सात समुंदर घट में कहां । कछुवा रहै बताओ जहां ॥
शेषनाग किहं ठौर बिराजै । रूप वराह कौन छवि छाजै ॥
कहा चार काया में खान । चौरासी लख योनि बखान ॥
षट चक्कर को जो तुम जानौ । नाम सहित सब भेद बखानौ ॥
नाभि कुण्डली का परमान । कैसे जागै कहौ बखान ॥
सहज सहज वह कहां समावै । योगि होय सों भेद बतावै ॥
चरणदास का गुरु शुकदेव । सो तौ जानै सबही भेव ॥
दो० कहां जु वासा पवन का, मन कौनी अस्थान ।
कहां हिये कीं आंखिहै, कैसे करै पिछान ॥
प्राण पुरुष अन्तर्गत' कैसे । क्योंकरि भेद बताओ जैसे ॥
इड़ा पिंगला सुषमन नारी । कैसे पलटैं बारी बारी ॥
आठ प्रकार के कुम्भक जानै । सो जुगता मेरे मन मानै ॥
चार अवस्था चार शरीरा । वाणी चारि नाम कहा वीरा ॥
कै प्रकार अजपा का जाप । कै अंगुल श्वासा का नाप ॥
क्यों आवै अरु क्यों वह जय । याका ज्ञानी करौ लखाय ॥
१'भीतरप्राप्त २ बाल किशोर पौगण्ड वृद्धादि चार अवस्था ॥

१०६ श्रीस्वामीचरणदासजीकाग्रन्थ ।
परा पश्यती मध्यमाँ कहा। कहा वैखरी देहु बता ॥
चरणदास का गुरु शुकदेव। सो तौ जानै सबही भेव ॥
॰ दो० पद तीनौ कहूँ विष्णुके, स्वप्ना जाग्रत भेद ।
बामन अक्षर देह में, पुहुप द्वीप कहां स्वेत ॥
ऽ कहाँ इक्कीस काया में लोक। इन्द्र करैं कहाँ नित्त भोग ॥
ब्रह्मादिक शिव कहां त्रिदेवा। काविधि उनको पावै भेवा ॥
षोड़श चन्द कहां परकाशा। बारह सूर्य्यनका कित बाशा ॥
ऽ तारामण्डल कैसे दरशैं। त्रिकुटी संयम कैसे परशैं ॥
त्रैवेणी को कैसे पावै। रंकार कहाँ शब्द जगावै ॥
वर्णों अक्षर ॐकारा। तासे भयो सकल संसारा ॥
ऽ जाका कीजै कैसे ध्याना। कौन दिशा अरु कोअस्थाना ॥
चरणदास का गुरु शुकदेव। सो तौ जानै सबही भेव ॥
दो० निर्गम सुर्गम भेद कहु, श्वास उसास बताव ।
काया में विष कहां है, बिन्दु कुण्ड दर्शाव ॥
जीव ब्रह्म में केता बीच। कौन कौन काया में नीच ॥
ऽ अमृतकुण्ड कौन अस्थान। बंक नालकी कहु पहिंचान ॥
ब्रह्मरन्ध्र का भेद लखाव। कामधेनु का बरण बताव ॥
ऽ मानसरोवर ताल बताय। तामें हंसा कैसे न्हाय ॥
ऽ विना सीप कहाँ उपजै मोती। विनाघीव कहाँजगमग ज्योती ॥
ऽ बिन सूरज कहाँ नितही धूप। भवँर गुफा का कैसा रूप ॥
ऽ शून्य शिखर का कीधर द्वारा। कै खिरकी अरु कहाअकारा ॥
चरणदास का गुरु शुकदेव। सो तौ जानै सबही भेव ॥
दो० कहां दशौ दिगपाल हैं, कहाँ इन्द्रिन के देव ॥
अहार वास पँचतत्त्वको, बरणि बतावो भेव ॥
काशी अरु मथुरा है दोय। कहाँ देहमें कहिये सोय ॥

योगसन्देहसागरवर्णन । १०७

१ अरसठि तीरथ घट में ज्योंकर । सबका गुरु पुष्कर है क्योंकर ॥
कहां बसै बाई उद्यान । कहां बन्ध लागै उड्यान ॥
”कहांकपाट का कुञ्जी ताला । द्वादशकला कौन मतवाला ॥
”कण्ठ कूप उलटाहै कौन । नेजू कहा बतावो जौन ॥
”पनिहारी कहा कैसे भरैं । घड़िया कहाँ कहाँ भरिधरैं ॥
”कै प्रकार अमृतका स्वाद । कौन ठौर सों अनहद नाद ॥
अब्र डोर कैसे करिपावै । मकर तारका भेद बतावै ॥
चरणदासका गुरु शुकदेव । सोतौ जानै सबही भेव ॥
दो० घण्ट ताल का लम्बका, और अम्ब का बोल ।
चारि वस्तु ये कौन हैं, इन्हें बतावो खोल ॥
”कौन कमलपर गुरू विराजै । कै प्रकार अनहद धुनि बाजै ॥
”कै वाणी हैं अनहद तूरा । जानैगा कोइ साधू पूरा ॥
तेजपुञ्ज कै योजन आगे । अमरलोक कब सूझनलागे ॥
तीन शून्यकहाँ चौथा शून्य । जितही भूले पढ़ि अर