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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

की गड़गड़ाहट भी सुनायी देने लगी! उस दिन मैं किसी तरह धैर्य न रख सका।
उस समय मेरी नसें तनी जा रही थीं। सफलता और असफलता दोनों का भीषण
परिणाम उस समय मेरी आँखों के सामने दीख रहा था। हमें उन चिर अभ्यस्त
सिपाहियों का सामना करना था जोकि युद्ध विद्या में पूर्ण रूप से निपुण थे। और
हम? हमारे छोटे से दल में से कितनों ने गोली चलाने का अभ्यास किया था?
अभ्यास मात्र के लिए गोली चलाने की फ़िजूलखर्ची करने का तो हम कभी साहस
भी नहीं कर पाये थे। गोलियाँ मिलती ही कहाँ थीं? हम कितनी बार अभ्यास की
इस आवश्यकता पर वादविवाद करते हुए ऐसे अवसर पर अवश्यम्भावी अधीरता
की ओर संकेत कर हँस देते थे! परन्तु अब तो समय आ ही पहुँचा। अभी-अभी
कुछेक क्षण बाद हमारी परीक्षा हो जायेगी। वे सामने आ पहुँचे। ड्राइवर तथा इंचार्ज
घोड़े के ज़रा पीछे-पीछे चल रहे थे और केवल दो सिपाही रायफ़लें लिए गाड़ी
के पीछे-पीछे चले जा रहे थे। यह लो, वे हमारे रिवाल्वरों की ज़द (पहुँच या मार)
में आ गये। अब तो हमें उठना ही चाहिए! Hands up! Hands up!! (हाथ उठा
दो! हाथ उठा दो!!) कहते हुए हमारे साथी अपने-अपने स्थान पर से कूद पड़े।
परन्तु हमारे आदेश का सिपाहियों पर कुछ भी प्रभाव न हुआ। वे लिहाज़ करने वाले
नहीं हैं। बस! एक ही क्षण में 'बैक! बैक!!' का स्वर करती हुई हमारी गोलियाँ
अपने ठिकाने पर जा रहीं। दोनों सिपाही ज़मीन पर लोट गये! परन्तु अब?
घबराहट का समय तो अब आया। यदि बिना गोली चलाये ही सब कार्य हो
गया होता, तो इतनी खतरनाक बात न होती। परन्तु अब तो प्रत्येक घर और बाड़े
से स्त्री और पुरुष सड़क पर निकल आयेंगे और ड्राइवर तथा इंचार्ज महाशय भी
सामने ही त्रस्त हुए खड़े थे। अभी एक घण्टे के अन्दर यहाँ सैकड़ों सिपाही आ
इकट्ठा होंगे और हमें कुछ ही दिनों में लुटेरा डाकू घोषित कर हमारे सिर बड़ा भारी
ईनाम रख दिया जायेगा। खैर! पुलिस वालों की रायफ़लें उठाकर गाड़ी पर चढ़ बैठे!
हागन महोदय कोचवान बने। मैं और ट्रीसी पीछे बैठ गये। कोड़े पर कोड़ा बरसाते
हुए घोड़े को दौड़ाते जा रहे थे। लोग बड़े आश्चर्य से हमारी ओर देखते थे। हम
डनस्केह की ओर जा रहे थे। बहुत देर तक हम चुपचाप बैठे रहे। फिर ट्रीसी
महोदय बोले, “डेन, याद है। उस दिन विस्फोटक सम्बन्धी पुस्तक पढ़ रहे थे न,
कि विस्फोटकों को झटका नहीं लगना चाहिए, नहीं तो बहुत बड़ी हानि हो सकती
है?” वे बड़ी शान्ति के साथ बोले थे। परन्तु बोले गिरा दिया। और किसी के
विस्फोटकों को क्या, मानो एक विपत्ति का पहाड़ और जा भी रहे थे बड़ी तेज़ी
के साथ। इसलिए विस्फोटकों के झटके की तो बात ही क्या कहते? हमने स्थान
पर लूट का माल छिपा दिया और घोड़े को दूसरी ओर ले जाकर एलीने ब्रिज पर
छोड़ दिया और थोड़ा-सा विस्फोटक पदार्थ वहाँ पर रख दिया। यह सब तो हो गया,
परन्तु अब प्रश्न यह था कि हम कहाँ जायें?
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 711

टिप्रेरी में अब हमारे लिए जगह न थी। ऋतु अनुकूल न थी। कई दिन की
प्रतीक्षा तथा आज के परिश्रम से हम थक भी चुके थे। परन्तु अब तो बहुत दिनों
के लिए सुख आराम बदा ही न था। आख़िर दक्षिण की ओर चल दिये। आगे गालूटी
पहाड़ सीधा दीवार की तरह खड़ा था। हमारे जैसे सभी अभागे इन पर्वतों में आश्रय
पाते थे। उन्हीं लोगों की सहायता को पाने की ही हमें पूर्ण आशा थी। इसी आशा
में हम इन पर्वतों की घाटियों में बहुत दूर तक निकल गये।
घोड़ा छोड़ने की जगह से चार मील की दूरी पर श्रीमती फिज़ ज़र्ल्ड (Fizgerld)
के घर हमने भोजन किया और आगे चल दिये शीत को तो मानो हमसे प्रेम हो गया
था। ऐसा जान पड़ता था कि ठण्डी हवा हमारे शरीर के अन्दर घुस जाने के लिए
लालायित हो उठी है। हमें उस समय दो जीव और मिले, जो बिल्कुल सिकुड़े खड़े
थे। फिर हम न जाने किधर चलते चले गये। किसी घर अथवा बाड़े में जाकर मार्ग
पूछने का तो हमें साहस ही न होता था। उस समय लोग बड़े मुँहफट थे। वे अभी
गम्भीरता और मौन का महत्त्व समझ न पाये थे। चलते-चलते श्री ट्रीसी 20 फुट गहरी
खाई में गिर गये। हमें बहुत चिन्ता हुई। पर निकाला तो देखा कि भले-चंगे सामने खड़े
मुस्कुरा रहे हैं। आप बड़े हँसमुख व्यक्ति थे। हमें भी सदा हँसाते ही रहते थे। हम पहाड़ी
पर चढ़ते ही चले गये। परन्तु यकायक क्या देखते हैं कि मार्ग ख़त्म हो गया। आगे
किसी ओर भी जाने का रास्ता नहीं। उस समय क्लान्ति और शीत के मारे हम बिल्कुल
संज्ञाहीन हो गये थे। निराश होकर लौटना पड़ा। उस समय हागन महाशय बोल उठे,
“ठीक है, घरों में अंगीठी के पास आराम से बैठे हुए कम्बख़्त कवि लोग पर्वतों के
सौन्दर्य की प्रशंसा में इतनी बड़ी कविताएँ लिख डालते हैं। वे कभी हमारी तरह हमारी
अवस्था में इस शीत में इस तरह पत्थरों में ठोकर खायें। फिर देखें कि कैसे पर्वतों
तथा प्रकृति के सौन्दर्य की उपासना करते हैं।”
लौट आने पर काहिट जाने का निश्चय हुआ। रेलवे लाइन के साथ-साथ चले।
पक्की सड़क पर बड़ी रोशनी वाली मोटरगाड़ियों में सिपाही हमारी तलाश में फिर
रहे थे। घोर अन्धकार था। हमने एक मूर्ति देखी। मैंने तुरन्त पिस्तौल तानकर वही
सैनिक आज्ञा (Hands up) (हाथ उठा दो) दे डाली। मूर्ति वहीं खड़ी हो गयी। मैं
अपना रिवाल्वर ताने उसके पास गया, तो अपने को रेल के एक बोर्ड के सामने
खड़ा पाया, जिस पर लिखा था, कि गुज़रने वाला गिरफ़्तार किया जायेगा। हमारी
दशा इतनी चिन्ताजनक, विपत्तिपूर्ण तथा शोचनीय थी, पर फिर भी हम तीनों
खिलखिलाकर हँस पड़े। श्री ट्रीसी से बार-बार काहिट का अन्तर पूछते और ‘बस
सड़क के अगले मोड़ पर ही’ (जोकि क़रीब दो तीन मील पर आता) हर बार
यही उत्तर सुनते। आख़िर हम काहिट आ ही पहुँचे। श्रीमती टोकि के घर गये। वहाँ
बिस्तर मिल गया। उत्तेजना, क्लान्ति, अवसाद और ठण्ड ने हमारे लिए सोना
असम्भव कर दिया। परन्तु लेटे रहने से श्रान्त अंगों को कुछ विश्राम मिल गया। अब
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समाचारपत्र पढ़ने की प्रबल इच्छा हो उठी। हमारी भविष्यवाणी के अनुसार
बड़े-बड़े भयंकर शीर्षकों से संवाद प्रकाशित किया गया। उदाहरणार्थ 'टिपेरी
उपद्रव', 'भीषण हत्याकाण्ड', 'भयंकर अपराध' आदि आदि। हागन के छोटे भाई
और एक बालक जिसकी आयु बारह वर्ष की थी, पकड़े गये, परन्तु शीघ्र ही छोड़
दिये गये। इस देश में और भी अशान्ति मच गयी। दक्षिण टिपेरी में मार्शल ला
(फ़ौजी क़ानून) जारी कर दिया गया। ताजीदी पुलिस की चौकियाँ गाँव-गाँव में
बिठा दी गईं। हमारे लिए ईनाम रख दिया गया जो पहले एक हज़ार पौण्ड था और
बाद में दस हज़ार कर दिया गया। हमारे छोटे से दल की उद्दण्डता के कारण अंग्रेज़ों
को नग्न मुख होकर संसार को दिखा देना पड़ा कि आयरलैण्ड का उनका अधिकार
केवल सैनिक बल पर निर्भर था। इस ज़बरदस्ती और बल प्रयोग के अतिरिक्त
उनके पास और कोई युक्ति न थी। 1916 के ईस्टर विद्रोह के बाद पहली गोली
चलने की घटना का यही अत्युक्तिरहित सच्चा विवरण है। इसी से आयरलैण्ड का
स्वातन्त्र्य-संग्राम प्रारम्भ हुआ।
चौथा परिच्छेद
अंग्रेज़ों के देश निकाले का हुक्म
श्रीमती टरविन के घर दो दिन ठहरने के बाद हम आगे चल दिये और विभिन्न मित्रों
के घरों में विश्राम करते रहे। एक बार कलिड निवासी श्री रीयन (Ryan) के घर
जाने का निश्चय किया। उन्हें कहला भी भेजा, परन्तु जा नहीं सके। यह अच्छा ही
हुआ क्योंकि ठीक उसी समय जबकि हमें वहाँ पहुँचना था, पुलिस ने उनका घर
घेर लिया और उन्हें गिरफ़्तार कर लिया। बालघ के श्री ओब्रीन के घर एक दिन
ठहरे। हम छत पर सो रहे थे। घर में अपरिचित लोगों का शब्द सुनकर उठ बैठे।
देखा, पुलिस वाले घर में घुस आये हैं। युद्ध के लिए तैयार होकर बैठ गये और
उनकी प्रतीक्षा करने लगे। परन्तु वे यों ही लौट गये। पता चला कि कुत्तों का टैक्स
लेने आये थे। अन्त में हम गल्टी के दूसरी ओर मिकेल्स टाउन में जा पहुँचे। हमें
घर छोड़े बहुत दिन हो गये थे। परन्तु अभी तक सोलोहैडबेग से दस मील से अधिक
दूर नहीं जा पाये थे। पुलिस वालों ने हमारी तलाश में रात दिन एक कर रखा था।
सार्वजनिक नेताओं, पादरियों तथा संवाद पत्रों ने हमारी निन्दा करने में कोई कसर
उठा न रखी। प्रार्थनाओं के समय गिरजों में हमें अभिशाप दिये जाते। परन्तु हम जानते
थे कि 98 के विद्रोही वीरों, 67 के वीर फिनीयन्स तथा 1916 के ईस्टर के विद्रोह
के सैनिकों के साथ भी उस समय ऐसा ही बर्ताव हुआ था और बाद में लोगों ने
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 713

उनके पक्ष का ही समर्थन किया था। इसलिए बाद में लोग हमारी भी प्रशंसा करेंगे।
हमारे साथ बीत खूब रही थी। एक दिन एक ज़मींदार के बाड़े में उसके साथ
बैठे आग सेंक रहे थे। रात्रि का समय था। एकाएक किसी ने ज़ोर से द्वार खटखटाना
शुरू कर दिया। ज़मींदार ने बैठे-बैठे ही पूछा, ‘कौन है?’ उत्तर मिला, ‘पुलिस!’
बस! एकदम अपने रिवाल्वर निकालकर हम तैयार होकर बैठ गये। परन्तु द्वार खुलने
पर पड़ोस का एक कृषक अपनी दिल्लगी पर हँसता हुआ प्रविष्ट हुआ। हमने अपने
रिवाल्वर छिपाने का प्रयत्न तो बहुत किया परन्तु वे उस ज़मींदार की नज़र से न
बच पाये। उस कमबख़्त ने एकदम कह ही तो दिया, ‘महाशय, सशस्त्र लोगों को
अपने घर में आश्रय देने को मैं तो हरगिज़ तैयार नहीं।’ बाहर गज़ब की ठण्ड थी,
घोर अन्धकार था, परन्तु विवश हो अग्नि तथा गरम कमरे की ओर सतृष्ण नेत्रों से
देखते हुए बाहर निकलना पड़ा। पशुओं के कमरे में घुसकर रात वहीं बितायी। कपड़े
आदि भी फट गये। मित्र लोग मिलने तक से झेंपते थे। आख़िर हम दोनों नगर में
पहुँचे। यह स्थान सोलोहैडबेग से 7 मील की दूरी पर था। यहीं पर हमारे साथी
श्री राबिन्सन भी हमसे आ मिले। इस पुनर्मिलन से हमें अत्यन्त आनन्द हुआ। हमें
जुदा हुए अभी कुछ सप्ताह ही हुए थे, तथापि ऐसा मालूम होता था मानो हम सहोदर
चिर-आयोग के बाद फिर मिले हों। इसके बाद घूमते-घामते एक वृद्ध व्यापारी के
घर पहुँचे, वहाँ कुछ आराम मिला। पेटभर भोजन किया, और फिर युद्ध की सूझने
लगी। “नहीं, इस तरह निरुद्देश्य यात्रा में समय नष्ट हो रहा है, अतः हमें किसी
न किसी क्रियात्मक कार्य में जुट जाना चाहिए।” युद्ध घोषणा तैयार की गयी। उसमें
अंग्रेज़ों को देश ख़ाली कर देने की आज्ञा दे दी गयी थी और आज्ञोल्लंघन के
अपराध में मृत्यु दण्ड निश्चित किया गया था। हमने वह युद्ध-घोषणा अपने केन्द्र
डबलिन में मंजूरी के लिए भेजी, परन्तु उसकी मंजूरी के स्थान पर हमें आज्ञा मिली
कि तुम्हें अमेरिका जाना होगा, सब तैयारी हो चुकी है। यह हमारे लिए वज्रपात से
कम न था। हम तो आयरलैण्ड में रहकर युद्ध करना चाहते थे। पर उधर जिनसे
सहायता पाने की आशा थी, वे ही हमें निर्वासित करने की गुप्त मन्त्रणा कर रहे
थे। हमने दृढ़ता के साथ स्पष्ट कह दिया, “हम मृत्यु से नहीं डरते और आयरलैण्ड
में रहते हुए उसके लिए लड़ते हुए मर जाने में ही गौरव अनुभव करेंगे।” वे नाराज़
हो गये, परन्तु हमने उन्हें विश्वास दिलाया कि, “हमारे विचार से हमारे लिए पृथ्वी
पर यदि कहीं स्थान है तो आयरलैण्ड में! हम इसी देश में रहते हुए, इसी की
स्वतन्त्रता के लिए इसी के चौराहों, सड़कों, नगरों तथा खेतों में शत्रु से युद्ध करते
हुए प्राण दे देंगे।” हमें बाहर जाकर लेख लिखकर हृदय को शान्त कर लेना पर्याप्त
न जँचता था। ख़ैर, वे मान गये, परन्तु इस शर्त पर कि हम चुपचाप किसी कोने
में बैठे रहें। हमने सोचा हम इस असुविधा को भी जल्दी ही दूर कर लेंगे।
कुछ दिन बाद हम नोर्डस टाऊन निवासी डोन्ल्ली के घर पहुँचे। वहीं पर
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ब्रिगेड काउंसिल की बैठक हुई और हमने पूर्वोक्त घोषणा-पत्र प्रकाशित करने का
निश्चय कर ही लिया। फ़रवरी, 1919 के अन्तिम दिनों में वह सभी बड़े-बड़े नगरों
तथा कस्बों में लगा दिया गया। इस समय संवाद-पत्रों ने बड़े व्यंग्यपूर्ण शीर्षकों से
उसे प्रकाशित किया। सचमुच हमारी दशा को देखकर कोई भी यह कह सकता
है कि छोटा मुँह बड़ी बात की कहावत हम पर चरितार्थ होती थी। जो भी बाद
में उसका प्रभाव पड़ा, इसका सभी ने लोहा माना। एक दिन हम भूख से पीड़ित
हुए। बहुत दूर तक चलकर क्रीनीवासी श्री मर्फी के घर पहुँचे। भूख के मारे
अधपका मांस खाकर बेचारे हागन बीमार हो गये। हम डबलिन पहुँचना चाहते थे
परन्तु उनकी बीमारी से बड़ी विपत्ति पड़ी। खैर, श्री ट्रीसी और श्री राबिन्सन को
हमने पहले भेज दिया। वे वहाँ बिल्कुल सुरक्षित तौर से पहुँच गये। नित्य गजट में
हम सभी का हुलिया और पुरस्कार की बड़ी भारी रकम प्रकाशित होती रहती थी।
ऐसी दशा में नगर में जाना और वहाँ पर कार्य करना कितना ख़तरनाक है, इसका
अनुमान आसानी से किया जा सकता है। इधर मैं और हागन भी यहाँ अधिक न
ठहर सकते थे। आख़िर टामीमिक अनरनी मोटर लेकर आ पहुँचे। यह वहाँ से 1916
के विद्रोह में मोटर की टक्कर लगाकर दो अभागों को नदी में डुबो चुके थे और
स्वयं किसी न किसी तरह बच आये थे। खैर हम चल दिये।
लिम्बर्क लिम्मर्क तक तो कोई विशेष घटना नहीं हुई परन्तु वहाँ हमें सैनिक
लारियों की एक बड़ी श्रृंखला का सामना हुआ। सभी लारियों पर सैनिक लदे हुए
थे और प्रत्येक लारी के साथ एक-एक मशीनगन थी। हम समझे थे कि यह किसी
बड़े भारी कार्य पर जा रहे थे। पर बाद में शीघ्र ही पता चला कि वे हमारी ही
ख़ातिर आ रहे थे। उनमें कितने सैनिक घण्टों हमारा हुलिया याद करने का परिश्रम
करते रहे होंगे। किसी का किंचित मात्र भी सन्देह हमारी मृत्यु का कारण हो सकता
था। हम भी बड़े राजभक्तों की तरह मुग्ध-दृष्टि से उनकी ओर देख रहे थे। लारियाँ
धड़ाधड़ गुज़र रही थीं। कोई बीस एक के गुज़र जाने के बाद हमने देखा कि एक
सैनिक महाशय बन्दूक़ उठाये हमारी ओर आ रहे हैं उन्होंने आज्ञा दे ही दी, 'ठहरो!'
अब समझे पहली लारियाँ चुपचाप आगे क्यों बढ़ा दी गईं। ड्राइवर महोदय ने तुरन्त
ब्रेक कस दिये। मैं अपना अन्तिम समय निकट समझ पिस्तौल तानकर सोच ही रहा
था कि कौन-से सिपाही को सबसे पहले सुलाऊँ कि एक अफ़सर आगे बढ़ा और
कहने लगा, “महाशय आपको देरी हो रही होगी, क्षमा कीजियेगा, दो लारियाँ टूट
गयी हैं, और सड़क रुक गयी है।” मैंने तुरन्त पिस्तौल छिपा लिया। उन्होंने फिर
कहा, “यदि आप पैदल उतरकर चले जायें जो बहुत अच्छा हो।” इस समय तक
मेरी उद्विग्नता दूर हो चुकी थी। मैंने दृढ़ता से कहा, “महाशय, हम बड़ी दूर से चले
आ रहे हैं और थके हुए हैं। हमें बहुत ज़रूरी कार्य है और शीघ्र पहुँचना है। हम
पैदल नहीं जा सकते।” उसने तुरन्त सैनिकों को हमारी मोटर ढकेलने की आज्ञा
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 715

दे दी, जो 200 गज तक उसे ढकेलते चले गये। उस समय निश्चय ही वे समझे
थे, कि मोटर में बैठने वाला आयरिश व्यक्ति पार्लियामेण्ट तक में प्रश्न छेड़ सकता
है। खैर! मैं और हागन बड़ी मुश्किल से हँसी रोक पाये और सैनिकों के कष्ट के
लिए उन्हें बार-बार धन्यवाद देते हुए विदा हुए। कोई आधा घण्टा बाद तक मोटर
को पूरी रफ़्तार पर चलाते रहे। इसी प्रकार उन सैनिकों ने जो हमारी ही तलाशी में
जा रहे थे, हमारी ही सहायता की! बहुत स्थानों पर होते हुए, विभिन्न मित्रों के घरों
में ठहरते हुए, हम लोग डबलिन की ओर चले जा रहे थे। हमारे परिचित हमारी
ओर देखकर बड़े चकित होते और हमें नमस्कार आदि कहने से पहले चारों ओर
बड़ी सावधानी से ताक लेते तथा बाद में भी बड़े धीमे स्वर से बात करते। उनका
यह व्यवहार देख हमें बड़ी हँसी आती। डबलिन में हम चारों फिर मिल गये। हम
जब भी मिलते तब हमें बिल्कुल ख़याल न रहता कि हमारे पीछे पुलिस मारी-मारी
फिरती है। हम ठीक छुट्टी पर आये हुए विद्यार्थियों की तरह हँसते-खेलते रहते
थे। हमने उन दोनों को चिढ़ाने के विचार से उपरोक्त सिपाहियों की सहायता पाने
की बात कही तो उन्होंने भी झट अपनी मोटर ठीक जेल के द्वार के सामने रुक
जाने तथा सिपाहियों के उसे धकेलने की बात सुनायी।
हमने मिलकर परामर्श किया तो बहुत पछताये कि विगत तीन मास हमने व्यर्थ
खो दिये। सोलोहैडबेग की घटना से तो माना देशभर में जीवन संचारित हो उठा था,
परन्तु अब तो वह स्मृति मात्र रह गयी थी। देशभर में सुविस्तृत सैनिक संगठन
विद्यमान था। शस्त्र भी पर्याप्त थे। लोग भी अब वैसे भीरू और कायर नहीं थे। वे
ड्रिल करने तथा शस्त्र रखने के अपराध में प्रसन्नतापूर्वक जेलों में जा रहे थे। परन्तु
आवश्यकता थी उन्हें शस्त्रों का प्रयोग करने का परामर्श देने की। इस तरह बहुत
देर तक सोच विचार करते रहने के बाद हमने चार साइकिलों का प्रबन्ध कर लिया
और डोनोहिल को वापिस चले गये। हम अपने मित्र होरेन परिवार के पास गये तो
उन्हें यह विश्वास दिलाने के लिए कि हम वास्तव में मनुष्य ही हैं – प्रेतात्मा नहीं,
बड़ी चेष्टा करनी पड़ी। मैं अपनी माँ से भी जा मिला। बेचारी मुझे देख बहुत
विस्मित तथा प्रसन्न हुईं। उन्होंने मेरे कारण बहुत कष्ट सहन किये। मेरे बाद तो दिन
में दो-दो तीन-तीन बार उनकी तलाशी हो जाती। घर का सब सामान पुलिस ले
गयी थी। मुर्गी और उसके बच्चे मारकर वे बदला निकालते थे। तो भी वे हतोत्साह
नहीं हुईं। जब कभी पुलिसमैन पूछता, “क्यों जी, तुम्हारा पुत्र डेनब्रीन कहाँ है?”
तो तुरन्त व्यंग्यपूर्ण उत्तर देतीं, “क्यों? क्या उसके साथ एक छत के नीचे बैठने का
साहस है?” इसी तरह एक बार पूछने पर उन्होंने कह दिया, “हाँ। डेनब्रीन ऊपर
बैठा है, और तुम्हें ऊपर चले आने का निमन्त्रण देता है। क्यों, साहस है?” बस
पुलिसमैन भाग गया और बड़ी भारी सेना ने घर घेरकर तलाशी लेनी शुरू कर दी।
जो भी हो, माँ ने एक भीषण अपराध किया था। उसी के फलस्वरूप वह सब कष्ट
716 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

उसे सहन करने पड़े। उसका वह भयंकर अपराध था अपने पुत्र को कर्त्तव्य-पालन
की शिक्षा देना तथा उसके हृदय में स्वदेश प्रेम जागृत करना! इसी अपराध का दण्ड
वह धैर्य से सहन करती रहीं! वह वीर माता थीं।
—o—
पाँचवाँ परिच्छेद
ट्रेन में से बन्दी मित्र को छुड़ाया
हम टिप्रेरी में अपने सभी सैनिकों को युद्ध के लिए तैयार करने लगे। उसके लिए
हमने समुचित प्रयत्न किया। एक दिन प्रातःकाल दो बजे अपनी साइकिल लिए जा
रहा था कि एक दूसरी ओर से आने वाली साइकिल के साथ टक्कर हो गयी।
उसकी साइकिल का हैण्डिल मेरी छाती में धँस गया और मैं वहाँ अचेत होकर गिर
गया। मेरे मुँह से बहुत रक्त बहा। उस समय बहुत घबराया। क्या जीवन का इसी
तरह अन्त होना था? युद्धक्षेत्र में शत्रु के विरुद्ध लड़ते हुए मुझे गोली लग गयी होती,
अहा! मैं कितना प्रसन्न होता। परन्तु आज इस तरह अनजान में व्यर्थ ही जीवन
समाप्त हो जायेगा, यह विचार ही मेरे लिए एक विपत्ति बन बैठा। अर्धचेतनावस्था
में मैंने देखा कि अंग्रेज़ सैनिकों ने मुझे पहचान लिया है। बस यमदूत के साक्षात
दर्शन होने लगे। चेतना हुई, उठा। ज्यों-त्यों घर पहुँचकर चिकित्सा की। स्वस्थ होकर
फिर अपने कार्य में जुट गया। दिन रात एक-सा परिश्रम करता। कभी रात अच्छे
बिस्तर में कट गयी, तो कहीं पृथ्वी पर लेटना पड़ा। कहीं अँगीठी मिल गयी तो
कहीं पशुओं के साथ रात बितायी। अब इस प्रकार की छोटी-छोटी असुविधाएँ
सहन करने का अभ्यास हो गया था।
इधर चार दिन से हम सोये नहीं थे। परिश्रम करते चले आ रहे थे। पता लगा,
कि बालघ (Bailagh) में ईमन ओ' डुभिर (Eamon O' Dubhir) के यहाँ नृत्य होने
वाला है। बस! सब रुकावट दूर हो गयी। हम युवक थे। विपत्तियाँ सहन करते चले
आ रहे थे। चिरकाल से किसी उत्सव में सम्मिलित होने का अवसर न मिला था।
हम सीधे उसी घर की ओर हो लिये। वहाँ पर बहुत से परिचित बालक तथा
बालिकाएँ आनन्द विहार में निमग्न थे। हमारे भी हृदयों का भार हलका हो गया।
कितना सुन्दर संगीत था! रातभर वहाँ नाच किया। ठीक उसी समय पुलिस के कई
दस्ते विभिन्न घरों में हमारी ही खोज में तलाशी ले रहे थे। उन बालक-बालिकाओं
में से कोई भी चुपचाप खिसक जाकर, पुलिस वालों को लेकर हमें पकड़वा सकता
था, परन्तु इसका किसी को स्वप्न में भी विचार न आया होगा। आयरलैण्ड वासियों
में सहस्रों दोष होंगे, परन्तु उनमें देशद्रोही बहुत कम होते हैं। प्रातः समय मैं वहाँ
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 717

से चला आया। ओकीफ के घर जाकर विश्राम करने का तय हुआ था। थोड़ी देर
बाद राबिन्सन और ट्रीसी भी आ गये। परन्तु हागन नहीं आये। हमें चिन्ता भी नहीं
हुई। यह हम जानते थे कि अभी उनके अठारह वर्ष पूरे होने में भी दो दिन शेष
हैं, तो भी हमें विश्वास था कि वे किसी सुदृढ़ सैनिक से किसी प्रकार भी कम
नहीं हैं। हमारी आँखों में नींद भरी थी। श्री ट्रीसी के शब्दों में हम उस समय किसी
भी कण्टकाकीर्ण शैय्या तक पर सो सकते थे। अभी शायद श्री ट्रीसी अपनी माला
भी समाप्त न कर पाये थे कि श्री पैट्रिक किन्नेन (Kinnane) हमें जगाने लगे। आँखें
खुलने से साफ़ इन्कार कर रही थीं। कान सुनते तो थे, परन्तु कुछ समझ नहीं पाते
थे। एकाएक आलस्य और निद्रा भाग गये। मैं सिहर उठा, ‘बेचारे हागन पकड़े गये?’
विश्वास नहीं हुआ। हागन गोली से मर गये, यह हम मान सकते थे परन्तु वे बिना
शस्त्र चलाये ही पकड़े गये, यह बात कुछ जँचती नहीं थी। खैर उठे। हम तीनों ने
एक दूसरे की ओर देखा। बोलने की आवश्यकता न थी। सभी एक दूसरे का
मतलब समझ गये। निश्चय हो गया, “हागन को छुड़ायेंगे।” पता लिया, तो मालूम
हुआ कि उन्हें अभी थर्ल्स की कोतवाली में रखा गया है, परन्तु शीघ्र ही कार्क
जेल को भेज दिये जायेंगे। फ़ैसला हुआ, ‘इमली’ स्टेशन पर ट्रेन में से या तो हागन
को लिया जाये, अथवा इसी प्रयत्न में प्राण दे दिये जायें। हमारा सबसे छोटा, सबसे
प्यारा साथी शत्रु के हाथ में हो, यह हमारे लिए असह्य था। हममें से कोई भी स्वयं
जेल में जा उसे छुड़ाने को तैयार हो सकता था। आज तक हमने कभी उसके गुणों
की प्रशंसा नहीं की थी, परन्तु अब तो उसके गुण ही गुण हमारी आँखों के सामने
घूमने लगे।
उधर पुलिस वाले भी समझते थे कि वे भी सोलोहैडबेग के मुख्य पात्रों में
से हैं। हम सभी लोगों की अनुपस्थिति तथा अज्ञातवास के कारण ही पुलिस को
यह विश्वास हो गया था। एक स्वेच्छा सेवक के हाथ हमने टिप्रेरी रेजिमेण्ट के
अध्यक्ष के पास कुछ स्वेच्छा सेवक भेजने का सन्देश भेज दिया। हम स्वयं
साइकिलों पर इमली को चल दिये। सीधे रास्ते पुलिस के हाथ पड़ जाने के भय
से, लम्बा चक्कर काटकर दूसरे मार्ग से गये। साइकिलों पर नींद आ गयी, परन्तु
फिर आँख खुल गयी। धड़ाम का शब्द सुन, मुड़कर क्या देखा कि श्री राबिन्सन
साइकिल से गिर पड़े हैं। उठकर फिर चले। हमारे पास एक बम आ गिरा समझे
शत्रु ने आक्रमण किया है, परन्तु वह राबिन्सन की जेब से ही गिरा था। 12 मई,
1919 के दिन सारा प्रबन्ध कर 11 बजे थर्ल्स से चले थे। अगले दिन जिस
गाड़ी में हागन के आने की आशा थी। वह दोपहर से पहले न आ सकती थी।
निरन्तर प्रतीक्षा करते रहे, परन्तु टिप्रेरी से कोई स्वेच्छा सेवक न पहुँचा। साढ़े
ग्यारह बज चुके थे, बारह बजे गाड़ी आने को थी। गाड़ी को हम बिना प्रयत्न
किये भी न जाने देना चाहते थे। यह भी जानते थे कि बन्दी के साथ कम से
718 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

कम चार सशस्त्र सैनिक होंगे। परन्तु करते ही क्या? ट्रेन आ गयी। हम प्लेटफार्म
पर घुस ही तो गये। भागते समय एक मोटी-सी वृद्ध स्त्री से टक्कर लग गयी।
मैंने उसके गिर्द बाँहें डाल दीं और दोनों घूमते-घूमते पृथ्वी पर गिर पड़े।
क्षमायाचना का तो अवसर था ही नहीं, उठकर फिर भागे। परन्तु बन्दी इस गाड़ी
में नहीं आया था। दूसरी गाड़ी सायंकाल सात बजे आने वाली थी। हमने गाल्टी
बटालियन के कुछ स्वेच्छा सेवक बुला भेजे। पाँच स्वेच्छा सेवक पाँच बजे आ
पहुँचे। वे बड़े वीर तथा निर्भीक सैनिक थे। हम एक साथी को इमली स्टेशन पर
छोड़कर स्वयं सभी साथी नाकलांग (Knocklong) स्टेशन पर चले गये। इमली
स्टेशन स्थित स्वेच्छा सेवक का कर्तव्य बन्दी वाली गाड़ी के साथ सतर्कता से
चढ़कर हमें उस गाड़ी की ओर संकेत करना था।
मदमत्त इंजन धक-धक करता हुआ प्लेटफार्म पर आ पहुँचा। स्वेच्छा सेवक
के संकेत से हम सीधे बन्दी की गाड़ी में जा पहुँचे। ट्रेन केवल दो मिनट ही
ठहरेगी, यह हमें खूब मालूम था। बन्दी को एक लम्बी गाड़ी के छोटे से खाने में
चार सशस्त्र सिपाही घेरे बैठे थे। सभी डिब्बे एक छोटे संकुचित मार्ग द्वारा एक
दूसरे से मिले हुए थे। आक्रमण का नेतृत्व श्री ट्रीसी को सौंपा गया था। गाड़ी में
घुसते ही ‘हाथ उठा दो’ की सैनिक आज्ञा दे दी गयी...अभी कुछ ही क्षण पहले
सिपाहियों के अध्यक्ष सार्जेण्ट वालीस ने बेचारे हागन को बन्दूक से ठेलते हुए
बड़े व्यंग्यपूर्ण स्वर में पूछा था, “क्यों जी, तुम्हारे डेनब्रीन और ट्रीसी किधर
ठोकरें खा रहे हैं?” इसका उत्तर, क्रियात्मक उत्तर, जिसकी कि उन्होंने कभी भी
आशा न की होगी, उन्हें मिल गया। दोनों रिवाल्वर ताने उसके सामने खड़े थे।
कांस्टेबल स्नराईट तत्क्षण रिवाल्वर तानकर बन्दी पर गोली चलाने ही वाला था
कि हमारी गोली ने उसे ठण्डा कर दिया। उन्हें यह आज्ञा दी गयी थी कि यदि
बन्दी को छुड़ाने का कोई प्रयत्न किया जाये तो उसे तुरन्त गोली से मार दिया
जाये। गोलियाँ चलीं। ठीक उसी समय प्लेटफार्म पर खाकी वर्दी पहने एक अंग्रेज़
सैनिक ने – जिसके हृदय में आयरिश खून दौड़ रहा था – बहुत आनन्द और
चाव से चिल्लाकर, ‘प्रजातन्त्र की जय’ कहा!
स्नराईट मर गया था। दूसरा घायल होकर गाड़ी से कूद गया। शेष सार्जेण्ट
वालीस और कांस्टेबल रेली बचे। दोनों के साथ खूब लड़ाई हुई। वालीस एक वीर
सैनिक थे, शत्रु दल में हमें वैसे साहसी बहुत कम दीख पड़े। हमारे सभी साथियों
के रिवाल्वर भी कहीं गुम हो गये। खैर, लड़ते-झगड़ते बन्दी हागन को, जो बेड़ियों
और हथकड़ियों से जकड़ा हुआ था, लेकर हम बाहर निकल पड़े। मैं बुरी तरह
घायल हो चुका था। कब और कैसे घायल हुआ, इसका कुछ पता नहीं। ट्रीसी,
राबिन्सन और ओब्रीन भी घायल हो चुके थे। रेली अब भी रायफ़ल से गोली चला
रहा था। एक गोली मेरे दाहिने हाथ में आ लगी। मेरा रिवाल्वर गिर गया। यदि रेली
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 719

में सार्जेण्ट वालीस की तरह तत्परता होती तो हममें कोई भी न बच पाता। परन्तु
उसकी सुस्ती से मुझे अपना रिवाल्वर उठाकर बायें हाथ से उसे चलाने का अवसर
मिल ही गया। वह भाग गया। वालीस भी लगभग मर चुका था। रेली ही एक ऐसा
था जोकि घटना का पूरा-पूरा वर्णन कर सकता था। परन्तु जूरी के जजों ने तो उसे
साफ़ कह दिया, “जरा सच सच कह सुनाओ, लीपा पोती मत करो।” उन्होंने यह
भी फ़ैसला दिया कि इस घटना का उत्तरदायित्व पुलिस पर है, क्योंकि माननीय
लोगों को धर पकड़ने का ही यही परिणाम है।
मैं वहाँ से बाहर निकला तो ख़ून बह जाने के कारण अपने को दुर्बल पाया।
बाहर एक मोटर खड़ी थी, शायद किसी की प्रतीक्षा कर रही थी। मैंने झट रिवाल्वर
तानकर ड्राइवर से मोटर छीन ली। परन्तु उसका उपयोग करने की सुधि न रही।
बाहर हागन की बेड़ियाँ काट दी गईं और स्वेच्छा सेवकों ने उसकी रक्षा का भार
ले लिया। हम चारों घायल व्यक्ति अँधेरे में भूलते भटकते, गिरते पड़ते शानहन की
ओर चल दिये। वहाँ पहुँचने पर मुझे बिस्तर पर लिटा दिया गया। डॉक्टर और पादरी
बुला लिए गये। बाहर क्लेमेंसी नामक एक नवयुवक की अध्यक्षता में पहरा खड़ा
कर दिया गया। डॉक्टर ने कह दिया, “बस। सब खेल 24 घण्टे में समाप्त हो
जायेगा।” मैं एकदम अधीर हो उठा। यह मेरे लिए असह्य था। परन्तु हमारे लिए
अन्तिम 24 घण्टों में भी तो शान्ति न बदी थी। चारों ओर पुलिस ही पुलिस दीखने
लगी। क़ब्रिस्तान तक में नई क़ब्रें ढूँढ़ी गईं, क्योंकि पुलिस की रिपोर्ट के अनुसार
दो आक्रमणकारी लगभग मर गये थे।
आगे चलने से पहले यदि दो बातें और कह दूँ तो अनुचित न होगा। जिस
समय स्टेशन पर हम लोग लड़ रहे थे, उसी समय दूसरे प्लेटफार्म पर एक और
गाड़ी खड़ी हुई थी जिसमें बहुत से सैनिक आ रहे थे। उन लोगों ने हस्तक्षेप क्यों
न किया, यह हमारी समझ में न आया। उसी समय दो मील की दूरी पर एल्टेन
के सिपाहियों ने गोली की आवाज़ सुनी। वे भागकर बैरकों में घुस गये तथा
अन्दर से साँकल लगाकर बैठ गये। काउण्टी इंस्पेक्टर मिस्टर ईगन ने तो भी द्वार
न खोला। मोटर से दरवाज़ा तोड़कर वे भीतर घुस गये और “बुज़दिलो! कायरो!
तुम यहाँ छिपे पड़े हो, तुम्हारे चार साथी मारे गये हैं, हत्यारे भाग गये हैं और तुम
अभी तक यहीं पड़े हो, तुम्हें लज्जा नहीं आती,” आदि आदि कहकर उनसे
साँकल खुला पाये।
यहाँ श्री हागन की कथा लिख दें तो अनुचित न होगा। नृत्य के बाद वे आना
फ़ील्ड निवासी मोघर परिवार के मकान पर चले गये। भोजन करते करते मेज़ पर
ही सो गये। फिर बिस्तर पर सुलाये गये। अभी लेटे ही थे कि ‘पुलिस आ गयी,
पुलिस आ गयी’ के शब्दों से उन्हें जगा दिया गया। वे यह समझे कि सैनिक इधर
से आ रहे होंगे, दक्षिण की ओर भागे। कुछ दूर जाकर उन्होंने अपना रिवाल्वर बन्द
720 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

कर दिया – परन्तु एकदम क्या देखा कि सैनिकों ने आ पकड़ा। रिवाल्वर छिन
गया। मोटर में बिठाकर थर्ल्स की चौकी में ले जाये गये। पहले लोभ दिया गया,
फिर बुरी तरह पीटा गया। परन्तु उस वीर ने एक शब्द भी मुँह से न निकाला। अपना
नाम तक नहीं बताया। फिर एक सिपाही ने सहानुभूति प्रदर्शित करते हुए कह दिया,
“तुम्हें डेनब्रीन और ट्रीसी ने तो धोखा दिया। वे लन्दन ले जाये जा रहे हैं, जहाँ
पर कि वे पुरस्कार पायेंगे। तुम भी गुप्त बातें बताकर मौत से बच जाओ।” परन्तु
वहाँ तो मौत के अतिरिक्त और कुछ था ही नहीं। गाड़ी में बैठाये जाने के बाद
वालीस उसे बार-बार चिढ़ाते हुए कहता, “क्यों जी, तुम्हारे ट्रीसी और ब्रीन कहाँ
गये?” ऐसा ही प्रश्न अभी यह पूछ ही रहा था कि हम जा धमके थे।
एक स्वेच्छा-सेवक ने पता दिया कि पुलिस हमारे पीछे आ रही है। झट
सांग्रामिक सभा की गयी। आख़िर मोटर लाकर मुझे उसमें बैठा दिया गया। पुलिस
बैरकों के बीच में से गुज़रकर हम लोग वेस्ट लिम्मर्क में श्री सीन फीन के घर
जा पहुँचे। नाकलांग के साथियों में से जे.जे. ओब्रीन तथा लियमलिंच, जोकि घण्टों
में वापिस जाकर अपने कार्य में लग गये, के अतिरिक्त सभी को हमारी तरफ़ भागना
पड़ा।
श्री सीन फीन दया की साक्षात प्रतिमा थे। आप लोगों ने हमें पूरे आराम से
रखा। परन्तु पुलिस के आ पहुँचने के कारण फिर और पश्चिम की ओर जाना पड़ा।
मैं स्वस्थ हो गया। फिर तो मुझे डॉक्टरों आदि की भविष्यवाणियों को तोड़ डालने
का अभ्यास ही हो गया। मैं तब भी बच जाता, जबकि वैधिक नियमों के अनुसार
मुझे ज़रूर ही मर जाना चाहिए था।
घोर विपत्ति के समय, निराशा के निविड़ अन्धकार में भी श्री ट्रीसी की
रसिकता तथा हँसी का स्वभाव बड़ी सान्त्वना का कारण होता। नाकलांग युद्ध में
मेरे पेट में गोली लगी थी और ट्रीसी के मुँह में। इसलिए हम दोनों कुछ भी खा
नहीं सकते थे। एक दिन वे भूख से तंग आकर बोले, “अरे ब्रीन ज़रा अपना
बड़ा-सा सिर कुछ मिनट के लिए उधार दे दो, एक बार भोजन तो कर लूँ। तुम
तो खा सकने पर भी नहीं खाते।” एक बार रात्रि के समय कलन से टिपेरी जा
रहे थे। पुलिस से भेंट होने का भय था। सोलोहैडबेग औरनाकलांग वहाँ से बहुत
निकट थे। परिचित लोगों से मिलने का भी डर था, हम बड़ी तेज़ी के साथ जा
रहे थे कि एकाएक, ‘ठहरो। ठहरो।।' चिल्लाते हुए ट्रीसी ने सभी को रोक लिया,
और एक-एक से पूछने लगे, “क्या जी आपके पास पिन होगा? वर्षा और शीत में
कोट के बटन कौन खोले। हर एक ने इन्कार कर दिया। मैंने पूछा, “आख़िर, तुम्हें
इस समय एकाएक पिन की क्या ज़रूरत आ पड़ी?” अत्यन्त सहज भाव से आपने
कहा – “मुझे आशंका है कि शायद मेरी टाई सीधी नहीं लटक रही है।” हम लोग
बहुत झुँझलाये और उन्हें कोसने लगे। परन्तु आलोचना शुरू होने से शेष यात्रा
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 721

सुगमता से तय हो गयी। कैर्टी में कुछ दिन ठहरकर मैं पूर्णतया स्वस्थ ही हुआ था।
हम नित्य संवाद-पत्रों में घोर निन्दा पढ़ा करते। हमारा अपने छोटे वीर साथी को
छुड़ाने का सफल प्रयत्न सभी लोगों की दृष्टि में घृणित समझा गया।
ग्रीष्म ऋतु में जासूस विभाग का पुनर्संगठन किया गया। अब का संगठन बड़े
ज़ोरों से किया गया था। हमें भी जासूस बहुत सताने लगे। हमने भी जहाँ कहीं देखा,
जासूसों को ठीक ठिकाने लगाना शुरू कर दिया। लोग प्रातःकाल जब गलियों में
कई मृत शव देखते जिन पर ये शब्द लिखे रहते, 'अंग्रेज़ी जासूसो ख़बरदार।
आयरिश प्रजातन्त्र सेना।।' तो बहुत विस्मित होते। एक दिन नदी किनारे हम
धूप-सेवन कर रहे थे। नदी में पुलिस से भरी हुई नावें गुज़रीं। पता चला कि वे
हमारी ही तलाश कर रहे थे। उस समय उन्होंने शायद समझा होगा, कि हम लोग
कहीं पर्वतों की कन्दराओं में छिपे हुए पड़े होंगे। ठीक इसी तरह और भी कई
अवसरों पर हम सामने बैठे तमाशा देखा किये। खिड़की में बैठे, अपनी तलाश में
जाने वाली सिपाहियों से भरी मोटर भागती फिरती देखी। कभी पुलिस स्टेशन के
साथ वाले घरों में बैठे, केवल एक ईंट के अन्तर से अपनी तलाश सम्बन्धी उनकी
स्कीमें सुनते रहे।
श्री हागन और राबिन्सन को टिपेरी छोड़कर मैं और ट्रीसी डबलिन को चल
दिये। वहाँ स्वेच्छा-सेवकों के अध्यक्षों से मिले और बहुत वादविवाद के बाद
उन्हें युद्ध के पक्ष में कर पाये। उन्होंने हमारे रहने का प्रबन्ध कर देने का वचन
दिया। तब मैं साइकिल ले श्री हागन और राबिन्सन को लाने टिपेरी की ओर चल
दिया। जाते जाते पिछले ट्यूब में बड़ा पंचर हो गया। उस समय मैं पादरी के वेष
में था। एक साइकिल वाले की दुकान पर गया। उसे तुरन्त मरम्मत के लिए
कहा, परन्तु उसने साफ़ इन्कार कर दिया। मैंने क्रोध से उसे बहुत भला बुरा
कहा। वह बड़े आश्चर्य से पादरी के मुख से वे शब्द सुनता रहा। मुझे तो भूल ही
गया था कि मैं इस तरह शान्ति का अवतार पादरी बना बैठा था। ख़ैर, वहाँ से
सीधा पुलिस चौकी में घुस गया। प्रहरी ने 'पितावन्दे!' कहकर अभिवादन किया।
यथोचित उत्तर दे अन्दर घुसा। मेरी असुविधा जान सभी बेचारे झट मेरी सहायता
के लिए तैयार हो गये। कुछ ही मिनटों में मेरी साइकिल तैयार हो गयी। उधर मैं
नोटिस बोर्ड पर अपने हुलिए तथा पुरस्कार का विज्ञापन पढ़ता रहा। साइकिल ले
उन लोगों को धन्यवाद दे विदा हुआ। कुछ दूर जाकर ख़याल आया, 'पुलिस
वालों को अपना विजिटिंग कार्ड न देने में मैंने निश्चय ही कुछ कृतघ्नता का
परिचय दिया। ख़ैर!'
डबलिन में जाकर हमने देखा कि गनीमी (गुरीला) युद्ध के लिए क्षेत्र तैयार
हो रहा है। परिस्थितियाँ ही देश को स्वातन्त्र्य संग्राम की ओर हाँके ले जा रही थीं।
हमने भी परिस्थितियों की सहायता करने में कोई कसर उठा न रखी। स्काटलैण्ड
722 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

यार्ड¹ के जासूस आयरलैण्ड में बहुत संख्या में आ पहुँचे थे। उन लोगों का हौसला
बहुत बढ़ गया था। वे तो सिनफिन लोगों (क्रान्तिकारी) की सभाओं तक में पहुँचते
और तलाशी में अंग्रेजी सेना की सहायता करते। बहुत से निर्दोष व्यक्ति, जिन्होंने
कि शायद शस्त्र कभी छुए भी न होंगे, उनकी कोप-दृष्टि से न बच सके। वे ‘जी’
कहलाते थे। उस वक़्त बहुत से ‘जी’ मारे भी गये और मारने वाले सदा बचते ही
रहे। आख़िर तंग आकर उन लोगों ने घरों से बाहर निकलना ही बन्द कर दिया।
एक-एक दिन जासूसों की हत्या पर ख़ूब वाद-विवाद हुआ। मेरी अनोखी सूझ! मैंने
कहा कि जासूसों की हत्या की बजाय, ब्रिटिश सरकार के प्रमुख प्रतिनिधि
वायसराय महोदय पर हाथ साफ़ करने से बहुत प्रभाव होगा। बात अच्छी थी। सभी
ने इसे स्वीकार कर लिया।
छठा परिच्छेद
लाट साहब पर हमला
निश्चय होते ही हमने सभी मित्रों से परामर्श लिया। सभी सुदृढ़ तथा निर्भीक साथी
हमारा साथ देने के लिए तैयार हो गये। तीन मास तो तैयारी में ही लग गये।
वायसराय महोदय की प्रतीक्षा में कितनी ही बार बड़ी निराशा भी हुई। उनका प्रोग्राम
विशेष तौर से गुप्त रखा जाता। कई स्थानों पर जहाँ कि उनका जाना आवश्यक होता,
वे न जाते। कितनी ही बार कुछेक क्षण के हेर-फेर से बच गये थे। आते आते
एकदम एक मोड़ पर मुड़ जाने से ही, कई बार उनके प्राण बच गये। इन तीन मास
में हम 12 दफे आक्रमण करने की पूरी तैयारी कर वायसराय महोदय की प्रतीक्षा
ही करते रह गये। परन्तु हर बार उनका न आना, या आते-आते मुड़ जाना ही कारण
हुआ। 11 नवम्बर के दिन महायुद्ध की सन्धि होने के उपलक्ष्य में होने वाले उत्सव
में सम्मिलित होने के लिए उन्हें जाना था। ग्रेटीन ब्रिज पर से गुज़रते समय उन पर
बम गिरा दिये जायें, यही हमने सोचा। ठीक समय पर हमारे सभी साथियों ने बम
तैयार कर लिए। पिन खोले, कितनी ही देर तक वे प्रतीक्षा करते रहे। परन्तु
वायसराय महोदय न पधारे। उस दिन बर्फ़ गिर रही थी : तो भी हम पुल पर डटे
रहे। इतने में हमारे एक परिचित मित्र उधर से गुज़रे : उन्होंने समझ लिया, और
व्यंग्य मिश्रित स्वर में इतना ही कहा, ‘क्या खूब। बर्फ़ से बचने के लिए यह स्थान
तो खूब ढूँढ़ा।' हम चौंक पड़े। हमारी ओर देखकर कोई भी व्यक्ति सन्देह कर
सकता था। हम एकाएक वहाँ से चल दिये। कुछ ही क्षण बाद सैनिक लारियों ने

  1. स्कॉटलैण्ड यार्ड इंग्लैण्ड के जासूस विभाग का नाम है।
    आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 723

पुल को घेर लिया और आने जाने वाले की तलाशी ली जाने लगी। हम बाल-बाल
बच गये। बात यह हुई थी कि हमें पहचान कर अथवा सन्देहवश किसी जासूस
ने तुरन्त गवर्नमेण्ट हाउस को टेलीफ़ोन कर दिया था। इसी कारण वायसराय महोदय
नहीं आये।
इससे हम बहुत निराश हो गये। कुछ आत्मग्लानि-सी भी मालूम होने लगी।
सोचने लगे – क्या हम उतना भी नहीं कर पायेंगे? परन्तु यह अवस्था कुछ अधिक
देर नहीं रही। शीघ्र ही हमें पता चल गया कि वायसराय महोदय उत्तर की ओर से
डबलिन आ रहे हैं। संवाद-पत्रों में तो प्रकाशित हो चुका था कि वे विदेश गये हैं।
सम्पादकों को शायद यह विश्वास भी था, परन्तु हमें तो ख़ूब मालूम था कि वे
‘फ़्रेंच पार्क को रास्कामन’ में अपने मित्रों के साथ आनन्द विहार में निमग्न थे। वहाँ
पर वे बिल्कुल आरक्षित थे। बहुत थोड़ी-सी सेना वहाँ रहती थी। ‘लौज’ भी कोई
बड़ी मज़बूत न थी। हम वहाँ पर बड़ी सुगमता से उन पर आक्रमण कर सफल
हो सकते थे, परन्तु हमने जान-बूझकर वैसा नहीं किया। हम उस जगत प्रसिद्ध
व्यक्ति पर, जगत प्रसिद्ध फोनिक्स पार्क आयलैण्ड में अंग्रेज़ी शक्ति का मुख्य केन्द्र
के ठीक द्वार पर आक्रमण करके समस्त संसार का ध्यान अपनी ओर आकर्षित
करना चाहते थे। ज़रा सोचिये तो जिस दिन संवाद-पत्रों में यह समाचार निकलेगा,
“आयरलैण्ड-स्थित अंग्रेज़ों के सर्वोपरि प्रतिनिधि, ब्रिटिश सेना के फ़ील्ड मार्शल,
फोनिक्स पार्क के ठीक सामने, जहाँ पर कि कुछ ही मिनट में बीस हज़ार से
अधिक सब प्रकार के आधुनिक शस्त्रों से सुसज्जित सैनिक आ एकत्र हो सकते
हैं, क्रान्तिकारियों के द्वारा मार दिये गये।” – उस दिन कैसा लुत्फ़ आयेगा? क्या
यह समाचार पढ़कर संसारभर के लोग यह न कहने लगेंगे कि वे वीर क्रान्तिकारी
सच्चे देशभक्त हैं। वे भीरु नहीं, कायर नहीं, बोदे नहीं, स्वार्थी नहीं हैं! उन्हें कुछ
न कुछ शिकायत ज़रूर है। परन्तु वह है क्या? उसे जानने के लिए लोग अधीर न
हो उठेंगे?...हाँ वही तो!
हमें विश्वस्त सूत्र से पता चल गया कि वायसराय महोदय 19 दिसम्बर
1919 के दिन वायसरीगल लौज फोनिक्स पार्क में पहुँचेंगे। बड़े-बड़े अफ़सर –
यहाँ तक कि लौज के प्रबन्धक इस समाचार से अनभिज्ञ रखे गये थे। परन्तु हमें
तो तिथि के साथ समय भी मालूम था। हम तो यह भी जान गये थे कि 11
बजकर 40 मिनट पर उनकी गाड़ी टर्मिनस न जाकर ऐशटाउन स्टेशन पर ही
खड़ी हो जायेगी। कैसे पता चला, यह बताने का अभी समय नहीं आया।
ऐशटाउन डबलिन नगर के केन्द्र से 4 मील की दूरी पर मीथ की ओर जाने
वाली सुन्दर रमणीक सड़क के निकट है। उसे बड़ी सड़क से सम्बन्धित करने
के लिए एक छोटी-सी सड़क जाती है जोकि 200 गज लम्बी है। दोनों सड़कों
के संगम पर एक सराय भी है। आयरिश भाषा में ऐसे ही सार्वजनिक स्थान को
724 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

ऐशटाउन कहते हैं। स्टेशन की सड़क बड़ी सड़क से गुज़रकर सीधी फोनिक्स
पार्क को चली जाती है। फोनिक्स पार्क बड़ी सड़क से 100 गज की दूरी पर है,
उसके निकट और कोई बस्ती नहीं है, परन्तु घुड़दौड़ के घोड़ों को उतारने और
चढ़ाने के लिए ही यह स्टेशन बनाया गया था।
हम आध घण्टा पहले दो-दो की गिनती में साइकिल लेकर वहाँ पहुँचे और
अपरिचित लोगों की भाँति वहाँ जाकर बैठ गये, और कृषि या पशु-पालन सम्बन्धी
विषयों की बातचीत करने लगे, परन्तु हमें उसमें भी बहुत असुविधा हुई। हमारे कई
व्यक्ति तो इन दोनों विषयों से एकदम अनभिज्ञ थे। ज्यों-ज्यों समय निकट आने
लगा, त्यों-त्यों हमारी उत्सुकता भी बढ़ने लगी। हम ग्यारह व्यक्ति थे। चार तो वे
ही, तथा मिक मैक्डानल्ड (Mick Macdonald), टाम क्योह (Tom Keogh), मार्टिन
सैबेज आदि सात व्यक्ति और थे। हममें से केवल सात के पास रिवाल्वर थे। मार्टिन
तो उसी दिन वीरगति को प्राप्त हुए। समय पूरा होते न होते डबलिन मेट्रोपोलिटन
पुलिस के सिपाही आ धमके। वे सड़क पर खड़े हो गये। अन्दर बैठे हुए एक
सिपाही पहरे पर खड़ा नज़र आया। उसकी बाँकी टोपी, अभी-अभी पालिश किये
हुए बूट, चमकती हुई बेल और भड़कीले बदन देखकर मालूम होता था कि वे
महाशय सजधज में कोई कसर छोड़कर नहीं आये थे। उसके पास रिवाल्वर भी
था। बाद में सैनिकों की मोटर लारियाँ भी आ गईं। स्टेशन के पास सड़क में पुलिस
ही पुलिस भर गयी। यह हमें पहले भी मालूम था। हमने सभी लोगों के स्थान भी
पहले से ही निश्चित कर रखे थे।
सीटी सुनायी दी, सभी चौंक पड़े। एक ने दूसरे की ओर देखा परन्तु हिले नहीं।
एक क्षणभर की तेज़ी से बना-बनाया खेल बिगड़ सकता था। फिर हमने स्टेशन
से मोटरों के चलने का स्वर भी सुना। बाहर निकलकर खड़े हुए। कार्य की स्कीम
यह थी कि वायसराय महोदय दूसरी मोटर में आयेंगे। अतः जिस समय पहली मोटर
गुज़र जाये, उस समय मैं, श्री क्योह तथा श्री मार्टिन सैबेज वहाँ खड़े छकड़े को
ढकेलकर दूसरी मोटर के सामने खड़ा कर दें, ताकि वह मोटर वहीं रुक जाये।
हमने छकड़े को खींचना शुरू किया, परन्तु - ओह। यह तो बहुत भारी था। उस
अभिनय का पहले रिहर्सल भी तो न किया था, ख़ैर उस समय उसे ज्यों-त्यों
खींचा। परन्तु क्या देखता हूँ कि वही डबलिन मेट्रोपोलिटन पुलिस का सिपाही मेरे
सामने खड़ा, मुझे आगे जाने से मना कर रहा है। उसने मुझे बड़े यत्न से यह समझाने
की चेष्टा की कि अभी यहाँ से वायसराय गुज़रने वाले हैं, परन्तु मैं भला उसे किन
शब्दों में समझाता कि उन्हीं से तो अभी हमारी विशेष मुलाक़ात होने को है। मैंने
पहले तो चाहा कि उसकी कुछ परवाह ही न करूँ; परन्तु वह मूर्ख तो अपनी ही
हाँके जा रहा था। रिवाल्वर का प्रयोग करना भी अनुचित था। गोली के शब्द से
यदि सारी सैनिक शक्ति चौकन्नी हो गयी, तो भी सारा काम बिगड़ जायेगा। करें
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 725

तो क्या? इधर समय व्यर्थ नष्ट हो रहा था। आख़िर लोहे का सींखचा उसके सिर
पर दे मारा। वह वहीं लोट-पोट हो गया।
उधर हमारी असुविधा को देख हमारे एक साथी ने बम भी फेंक दिया था।
परन्तु उसने पिन निकाल दिया था। बम फटा। हमारे घाव तो नहीं आये, परन्तु धमक
से एक बार तो सभी धराशायी हो गये। उठे तो पहली मोटर आ पहुँची थी। उसके
गुज़रते ही हमने छकड़ा ज़रा और आगे धकेलकर उस पर गोली छोड़ दी। पहली
मोटर तो हवा हो गयी और दूसरी वहीं रुक गयी। मोटर पर हमारे साथी बमों की
वर्षा करने लगे। शत्रु की गोली के निशाने के साथ-साथ उनके बिल्कुल पास रहने
के कारण अपने साथियों द्वारा फेंके गये बमों की जद में भी हम थे। और दूसरी
ओर से एक और सैनिक लारी गोलियाँ बरसाती हुई आ धमकी। मेरी बाई टाँग में
गोली लगी। देखभाल करने का तो अवसर नहीं था, परन्तु इतना ज़रूर अनुभव हुआ
कि गोली उस पार निकल गयी है। उस समय सिपाही लोग बहुत घबरा गये थे।
वरना हम लोगों के लिए वहाँ अधिक देर तक ज़िन्दा बचे रहना एकदम असम्भव
था।...परन्तु आह! एक निर्दयी गोली बेचारे मार्टिन सैबेज के आ ही लगी। आह!
बेचारा मेरी गोद में आ रहा। भोला-सा यह सुन्दर बालक, कितने चाव और उत्साह
से अभी एक घण्टा पहले आयरिश स्वतन्त्रता तथा आत्मोत्सर्ग के वीरतापूर्ण गीत
गाता आ रहा था और अब...अब वह उन्हीं को क्रियात्मक रूप दे रहा था। मैंने उसे
पृथ्वी पर लिटा दिया। होंठ हिलते देख, झुका तो उसके मन्द क्षीण स्वर में यह
सुन पाया। 'डेन। मैं जाता हूँ, परन्तु संग्राम जारी रखो।' वह करुणाजनक दृश्य मुझे
कभी नहीं भूलेगा। मानो तरुण आयरलैण्ड अपने रक्त से स्वतन्त्रता की पुस्तक की
भूमिका लिखने की तैयारी में था। आह! वह दृश्य कभी नहीं भूल सकूँगा। मैं उस
ग़रीब का सिर गोद में लिए बैठा उसका अन्तिम सन्देश सुन रहा था, और चारों
ओर से गोलियों की वर्षा हो रही थी। अपने वीर साथी की वीरगति पर, उनकी
शोकजनक मृत्यु पर आँसू बहाने का अवसर कहाँ था? जिस वीर ने 1916 में पहली
बार अपने देश के लिए शस्त्र उठाया था, वही आज, अपने देश के लिए ही लड़ते
हुए स्वर्ग-धाम सिधार गया। वह आयरिश माता की सेवा के लिए जीता रहा और
अन्त में उसी के चरणों में अपना प्राणोत्सर्ग कर गया। बम ख़त्म हो गये, पिस्तौल
ख़ाली हो गयी, एक साथी मारा गया, कुछ देर बाद गोली चलनी भी बन्द हो गयी।
हम उस सराय में जा पहुँचे। वहाँ से गोली चलाने की सोचने लगा तो खाकी वर्दी
वाला कोई भी न दीख पड़ा। सब रफ़ू-चक्कर हो चुके थे। वहाँ पर मोटर का ज़ख़्मी
ड्राइवर, जिससे बाद में एक बार और मेरा वास्ता, बिल्कुल विपरीत अवस्था में
पड़ा, तथा ज़ख़्मी श्री मार्टिन का शव पड़ा था। श्री मार्टिन का शव सराय में छोड़कर
हम लोग साइकिलों पर नगर की ओर चल दिये।
726 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

सातवाँ परिच्छेद
वायसराय बाल-बाल बच गया
जिस दुकान या सराय पर पहले आकर बैठे थे, वहीं पर श्री सैबेज का सिर रखकर
हम लोगों ने सांग्रामिक मन्त्रणा की। हम बड़े हर्ष और चाव से अपनी सफलता की
आलोचना कर रहे थे, यह सोचकर कि सैनिक लारी वायसराय महोदय का शव
मात्र ही ले जा पायी है, हम फूल उठते। ख़ैर! शेष नौ साथियों को किंचित मात्र
खरोंच तक नहीं आयी। केवल मैं ही बुरी तरह घायल हो गया था। मेरे घाव से रक्त
की धारा बह रही थी। अपने वीर साथी के शव पर अन्तिम प्रार्थना पढ़कर, हम
लोग अपनी-अपनी साइकिलों पर डबलिन नगर की ओर चल दिये। अभी कुछ
अधिक दूर नहीं गये थे कि सीमस राबिन्सन की साइकिल ख़राब हो गयी। वे झट
कूदकर श्री ट्रीसी के पीछे जा खड़े हुए, परन्तु दो को लेकर चलना कितना कठिन
है, और इस स्थिति में कितना हानिकारक, यह कोई भी अनुमान कर सकता है।
परन्तु यह असुविधा अधिक देर तक नहीं रही। सामने से एक महाशय अपनी
साइकिल लिए पैदल चले आ रहे थे। सांग्रामिक नियमों और कर्त्तव्यों तथा शान्ति
परिस्थितियों के नियमों के कर्त्तव्यों में बहुत अन्तर होता है। इसी विश्वास के कारण
झट राबिन्सन महोदय ने अपनी पिस्तौल के बल पर साइकिल माँग ली, जो तुरन्त
मिल गयी। परन्तु उन महाशय से यह भी कह दिया गया कि वे संध्या समय ग्रैशम
होटल के द्वार पर पड़ी हुई अपनी इस साइकिल को ले आवें।
नगर में हम शान्तिपूर्वक पहुँच गये। फिब्स बीरी सड़क पर स्थित श्रीमती
टूमी (Tomei) के घर पर ठहराया गया। मेरे रक्त के छींटों के चिह्न से पुलिस
नगर तक तो आ गयी, परन्तु फिर उसे आगे कुछ पता न चल पाया, यहाँ पर
अच्छे-अच्छे डॉक्टर लोग मेरा इलाज करने लगे। श्रीमती टूमी का व्यवहार बहुत
ही प्रशंसनीय था।
उसी दिन सायंकाल नगरभर में हो-हल्ला मच गया। अख़बार बेचने वालों ने
इतना कोलाहल मचाया कि बस तौबा भली। मैंने सुना, वे चिल्ला रहे थे, 'लॉर्ड
लेफ़्टीनेण्ट पर भीषण आक्रमण! एक्स टाऊन पर भयंकर युद्ध!! एक आक्रमणकारी
की मृत्यु!!!' परन्तु यह क्या? वह तो यह भी कह रहा है – 'लॉर्ड महोदय साफ़
बच निकले?' निश्चय ही हमारा सब प्रयत्न निष्फल हो गया। आज ही पहली बार
लॉर्ड महोदय दूसरी मोटर पर न बैठकर, पहली मोटर में चढ़ बैठे थे। आह। तभी
तो...! जिस गाड़ी को भयभीत कर भगा देने में ही हम सन्तुष्ट हो गये थे, वही हमारे
उद्देश्य की अपूर्णता-उद्योग की निष्फलता का कारण हो गयी। यह समाचार हमारे
लिए वज्रपात से कुछ कम न था। मेरे घावों की पीड़ा बहुत बढ़ गयी। मुझे बहुत
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 727

दुख हुआ। परन्तु हर समय प्रसन्न रहने वाले श्री ट्रीसी ने इस बार हँसी में कह ही
तो दिया, “डेन। हर बार तो तुम्हें नाकलांग नहीं मिल सकते। सफलता का आनन्द
उठाया है, तो ज़रा असफलता का भी मज़ा चखो।” लॉर्ड महोदय पर फिर कभी
आक्रमण करने का अवसर हमें नहीं मिला। अब तो प्रसन्न हैं कि लॉर्ड महोदय उस
दिन बच गये थे। वैयक्तिक रूप से तो उनके प्रति हमें कोई द्वेष नहीं था। हम तो
अपने एकमात्र शत्रु – इंग्लैण्ड के विरुद्ध युद्ध कर रहे थे।
जो भी हो, पादरी लोगों तथा संवाद-पत्रों ने हमें जी भरके कोसा। परन्तु
जनसाधारण की सहानुभूति हमारे ही प्रति थी। वे जानते थे कि हमारा यह युद्ध
स्वतन्त्रता के लिए लड़ा जा रहा है, और यह तब तक जारी रहेगा जब तक कि
या तो इंग्लैण्ड घुटनों के बल न झुक जाये, या फिर हम ही क़ब्ज़ों में न जा रहें।
परन्तु लोगों के धन से चलने वाले ‘आयरिश इण्डिपेण्डेण्ट’ (Irish Independent)
ने एक अग्र-लेख द्वारा हमें जी भरकर कोसा। नीचतापूर्ण मूर्खता, घृणित हत्या
आदि-आदि शब्दों से वह लेख भरा पड़ा था। जिस पत्र ने आयरिश प्रजातन्त्र की
स्थापना के लिए चिल्ल-पों मचाया था, वही आज चैन से न बैठ सका। वही,
सरकारी कमीशन द्वारा की जाने वाली खोज अथवा अनुसन्धान की परीक्षा न कर
हमारे मृत वीर पर घृणित और नीच आक्षेप करने पर तुल पड़ा। यह हम लोगों के
लिए एकदम असह्य हो उठा। मैं तो घायल हो चुका था परन्तु श्री पोडर क्लेंसी
अपने साथ 20-25 युवकों को लेकर उक्त समाचारपत्र के कार्यालय में जा
धमके। सम्पादक महोदय को यह जताकर कि आज आपका कार्यालय व प्रेस
स्वर्गारोहण कर जायेगा, अपने इन शब्दों की सार्थकता का प्रमाण देने लगे। मशीनें
आदि तोड़-फोड़कर सभी कुछ नष्ट-भ्रष्ट कर, वे लोग यह समझकर कि अब
कुछ दिन सम्पादकगण विश्राम कर पायेंगे, लौट आये। परन्तु अगले ही दिन अन्य
मुद्रणालयों की सहायता से पत्र नियमित रूप से प्रकाशित होने लगा। यह भी
अच्छा ही हुआ, क्योंकि हमारे कई आयरिश प्रजातन्त्रवादी सैनिक वहाँ पर काम
करते थे, उन्हें बेकार नहीं होना पड़ा। इस घटना से समाचारपत्रों की लेखन शैली
में महान अन्तर आ गया। सरकार ने क्षतिपूर्ति के लिए उक्त संवाद-पत्र को
16,000 पाउण्ड प्रदान किये थे, परन्तु अब वह संवाद-पत्र अंग्रेज़ों के विरुद्ध
बहुत ज़ोर से लिखने लगा।
श्री मार्टिन सैबेज का शव पुलिस ले गयी और जाँच के बाद शव उनके
सम्बन्धियों को दे दिया गया। डबलिन के पादरियों ने तो उन्हें क़ब्रिस्तान में स्थान
देने से भी साफ़ इन्कार कर दिया। श्री मार्टिन के शव का जुलूस निकला और वह
जुलूस इतना विस्तृत हो गया था कि शायद ही कभी पश्चिम आयरलैण्ड में ऐसा
जुलूस देखने में आया होगा। मीलों तक शोकग्रस्त लोग अश्रुपात करते हुए पीछे-पीछे
चले आ रहे थे। बिशप ने प्रार्थना आदि की परन्तु सैनिक अन्त तक सबको रायफ़लों
728 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

से घेरे खड़े रहे। वह वीर, धीर और निर्भीक सैनिक सर्वथा इस सब सम्मान का
पात्र था।
संवाद-पत्रों में अपने आक्रमण सम्बन्धी विवरण पढ़कर हमें बहुत हँसी आती।
लिखा था, सैनिकों ने लारियों में सवार होकर आक्रमणकारियों का पीछा किया।
परन्तु उसी समय मेरे सामने फोनिक्स पार्क की ओर भाग जाने वाले सैनिकों का
चित्र खिंच गया। अगर सशस्त्र सैनिकों ने मोटरों में बैठकर हमारा पीछा किया होता,
तो हम बच कैसे जाते?
बाद में मुझे डबलिन के दक्षिण भाग में श्रीमती मैलोन के घर भेज दिया गया,
इनसे पहले से भी हमारा परिचय था। उनका एक पुत्र 1916 के विद्रोह में मारा
गया था। वहाँ पर मेरी चिकित्सा ख़ूब अच्छी तरह हुई। इसके कुछ ही दिन पहले
उनकी बड़ी लड़की ब्रिघिड मैलोन से मैंने हँसी में कहा था, कि अगर मैं घायल
हो गया, तो सुश्रूषा का भार आप ही पर पड़ेगा, सो सच ही निकला। उनका सहवास
मेरे लिए अत्यन्त सुखकर था और इससे मेरे घाव भी शीघ्र ही ठीक हो गये। इस
सहवास से ही श्रीमती ब्रिघिड मैलोन से मेरा प्रेम हो गया था और डेढ़ वर्ष बाद
हमारा विवाह भी उनसे ही हुआ। वह घटना किसी प्रकार की औपन्यासिक
रोमांचकारी घटनाओं से कम नहीं। उसका विवरण हम फिर लिखेंगे।
1920 के प्रारम्भ में 1919 की घटनाओं का सिंहावलोकन करने का मुझे ख़ूब
अवसर मिल गया। सोलोहैडबेग की घटना के बाद अपराधों, हत्याओं आदि की
संख्या उत्तरोत्तर बढ़ने लगी। कई स्थानों पर उनके शस्त्र छीन लिए गये थे। सरकारी
रिपोर्ट में यह घटनाएँ ख़ास ज़ोरदार शब्दों में लिखी गयी थीं। परन्तु हमारा तो जी
चाहता था कि आगामी वर्ष में इन 'अपराधों' की संख्या बहुत बढ़ चढ़ जाये।
सरकार ने इनका वर्णन करते हुए अपने अत्याचारों की ओर निर्देश मात्र भी न करने
में बहुत बुद्धिमता का परिचय दिया था। आयरिश प्रजातन्त्र को गैर-क़ानूनी घोषित
कर देना, स्त्रियों तथा बालकों के संघों को ख़िलाफ़-क़ानून क़रार देना,
स्वेच्छा-सेवक संघ को तहस-नहस करने का पूर्ण प्रयत्न करना, उसके लिए
मामूली बातें थीं। श्री आर्थर ग्रिफिथ ने तो लिखा है कि 'समस्त आयरिश जाति'
गैर-क़ानूनी घोषित कर दी गयी थी। अभी (उस समय) तो सरकार ने रात्रि के
घण्टे¹ (Curfew) नहीं लटकाये थे, अभी तो उसने बिस्तरों में सोये हुए निर्दोष
व्यक्तियों को मार डालने का उद्योग भी शुरू नहीं किया था। गाँव के गाँव जला
देना, भागने का प्रयत्न करने के अपराध में कैदियों को गोली से मार देना, पादरियों

  1. इस घण्टे के बजने के बाद अपने घर से निकलने की सख्त मुमानियत रहती है और
    निकलने वाले अमूमन पुलिस की गोलियों के शिकार होते हैं।
    आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 729

तथा बालकों की हत्याएँ, आयरिश महिलाओं की लांछना — यह सब बातें तो अभी
तक नहीं हुई थीं। मैं यह सब क्यों कहता हूँ, केवल इसलिए कि सरकार ने जब
अपने इन आरम्भ के ही अत्याचारों का उल्लेख तक न किया था, तो बाद को ये
सब अत्याचार प्रदोष का घण्टा बजने पर पुलिस की गोलियों की बौछार से नित्य
बीसों स्त्री-पुरुषों को सदा सर्वदा के लिए अनन्त निद्रा में सुला देना आदि...लोगों
के सामने कैसे आ सकता है?
1920 की वसन्त ऋतु में, मैं उस अति सुन्दर तथा रमणीक ग्रेन्थम स्ट्रीट के
घर को छोड़ तारा पर्वत के पास ‘रायलमीथ’ में जा रहा। यह ऐतिहासिक स्थान
है, वहाँ पर रहते हुए आयरलैण्ड के उज्ज्वल भूत तथा भविष्य के न जाने क्या क्या
विचार मेरे दिल में आ-आकर मुझे रोमांचित कर गये। 1099 के विद्रोही वीर भी
इसी स्थान पर धराशायी होकर वीरगति को प्राप्त हुए थे। वहीं पर झुककर न जाने
कितनी बार हमने यह प्रार्थना की “उनकी इच्छा, उत्कटेच्छा — जिसके लिए
उन्होंने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया था आज हमारे ही युग में पूर्ण हो जाये।”
यहाँ पर हमारा बहुत से मित्रों से परिचय हुआ।
कुछ दिन बाद अकर्मण्यता चुभने लगी, उधर कार्क लार्डमेयर श्री टायरमैक
कर्टन घर से सोये हुए परिवार के सामने पुलिस द्वारा मार दिये गये। और भी
बहुत-सी ऐसी ही अत्याचारपूर्ण हत्याएँ हुईं। तुरन्त डबलिन पहुँचा। सभी मित्रों से
मन्त्रणा की ओर फिर मैं तथा श्री ट्रीसी साइकिल ले टिप्रेरी को चल दिये। उस
दिन वहाँ 12 मास के पश्चात प्रवेश किया था। 1920 के ईस्टर सप्ताह में श्री
राबिन्सन तथा मैंने, डबलिन में ईस्टर के उत्सव में सम्मिलित होने का दृढ़ निश्चय
कर लिया। श्री विनसैण्ट के साथ हम भी मोटरों में बैठकर उधर चल दिये। 1916
के विद्रोह के बाद से अंग्रेज़ी सेना इन दिनों में विशेष तैयारी करती, नगर से
कई-कई मील बाहर तक मोर्चेबन्दी की जाती तथा प्रत्येक आने जाने वाली मोटर
की तलाशी ली जाती। परन्तु हमें इस बात का ध्यान ही न था। हाइड हॉल ट्राम्बे
टरमिनस के पास पहुँचने पर एक मोड़ पर मुड़ते ही हमारी एक सैनिक लारी से
भेंट हो गयी। वे हमारी तलाशी लेने के लिए रुक गये। परन्तु हमारी भोली आकृति
से प्रभावित होकर सैनिकों के अध्यक्षों ने हमारी तलाशी लिए बिना ही, सैनिकों को
चलने की आज्ञा दे दी। हम बहुत प्रसन्न हुए। खूब जी खोलकर हँस ही रहे थे कि
‘ठहरो’ का शब्द सुनकर चौंक पड़े। क्या देखा, मोर्चा-सा बना हुआ है और क़रीब
20 सैनिक रायफ़लें लिये वहाँ खड़े हैं। हँसी तो गयी ही, साथ ही अब विपत्ति की
आशंका से कुछ घबराये भी। खैर! सामने से एक अफ़सर हाथ में रिवाल्वर लिए
आगे बढ़ा और उसने कहा कि मुझे आपकी मोटर की तलाशी लेनी है। मैंने अत्यन्त
सहज भाव से कहा, आप निःसंकोच ही तलाशी ले लीजिये परन्तु हमें ज़रा जल्दी
है। कार्य बहुत ज़रूरी है किंचित मात्र की देरी होने से हमारी भारी हानि हो सकती
730 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़