भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 727, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंकर दिया – परन्तु एकदम क्या देखा कि सैनिकों ने आ पकड़ा। रिवाल्वर छिन
गया। मोटर में बिठाकर थर्ल्स की चौकी में ले जाये गये। पहले लोभ दिया गया,
फिर बुरी तरह पीटा गया। परन्तु उस वीर ने एक शब्द भी मुँह से न निकाला। अपना
नाम तक नहीं बताया। फिर एक सिपाही ने सहानुभूति प्रदर्शित करते हुए कह दिया,
“तुम्हें डेनब्रीन और ट्रीसी ने तो धोखा दिया। वे लन्दन ले जाये जा रहे हैं, जहाँ
पर कि वे पुरस्कार पायेंगे। तुम भी गुप्त बातें बताकर मौत से बच जाओ।” परन्तु
वहाँ तो मौत के अतिरिक्त और कुछ था ही नहीं। गाड़ी में बैठाये जाने के बाद
वालीस उसे बार-बार चिढ़ाते हुए कहता, “क्यों जी, तुम्हारे ट्रीसी और ब्रीन कहाँ
गये?” ऐसा ही प्रश्न अभी यह पूछ ही रहा था कि हम जा धमके थे।
एक स्वेच्छा-सेवक ने पता दिया कि पुलिस हमारे पीछे आ रही है। झट
सांग्रामिक सभा की गयी। आख़िर मोटर लाकर मुझे उसमें बैठा दिया गया। पुलिस
बैरकों के बीच में से गुज़रकर हम लोग वेस्ट लिम्मर्क में श्री सीन फीन के घर
जा पहुँचे। नाकलांग के साथियों में से जे.जे. ओब्रीन तथा लियमलिंच, जोकि घण्टों
में वापिस जाकर अपने कार्य में लग गये, के अतिरिक्त सभी को हमारी तरफ़ भागना
पड़ा।
श्री सीन फीन दया की साक्षात प्रतिमा थे। आप लोगों ने हमें पूरे आराम से
रखा। परन्तु पुलिस के आ पहुँचने के कारण फिर और पश्चिम की ओर जाना पड़ा।
मैं स्वस्थ हो गया। फिर तो मुझे डॉक्टरों आदि की भविष्यवाणियों को तोड़ डालने
का अभ्यास ही हो गया। मैं तब भी बच जाता, जबकि वैधिक नियमों के अनुसार
मुझे ज़रूर ही मर जाना चाहिए था।
घोर विपत्ति के समय, निराशा के निविड़ अन्धकार में भी श्री ट्रीसी की
रसिकता तथा हँसी का स्वभाव बड़ी सान्त्वना का कारण होता। नाकलांग युद्ध में
मेरे पेट में गोली लगी थी और ट्रीसी के मुँह में। इसलिए हम दोनों कुछ भी खा
नहीं सकते थे। एक दिन वे भूख से तंग आकर बोले, “अरे ब्रीन ज़रा अपना
बड़ा-सा सिर कुछ मिनट के लिए उधार दे दो, एक बार भोजन तो कर लूँ। तुम
तो खा सकने पर भी नहीं खाते।” एक बार रात्रि के समय कलन से टिपेरी जा
रहे थे। पुलिस से भेंट होने का भय था। सोलोहैडबेग औरनाकलांग वहाँ से बहुत
निकट थे। परिचित लोगों से मिलने का भी डर था, हम बड़ी तेज़ी के साथ जा
रहे थे कि एकाएक, ‘ठहरो। ठहरो।।' चिल्लाते हुए ट्रीसी ने सभी को रोक लिया,
और एक-एक से पूछने लगे, “क्या जी आपके पास पिन होगा? वर्षा और शीत में
कोट के बटन कौन खोले। हर एक ने इन्कार कर दिया। मैंने पूछा, “आख़िर, तुम्हें
इस समय एकाएक पिन की क्या ज़रूरत आ पड़ी?” अत्यन्त सहज भाव से आपने
कहा – “मुझे आशंका है कि शायद मेरी टाई सीधी नहीं लटक रही है।” हम लोग
बहुत झुँझलाये और उन्हें कोसने लगे। परन्तु आलोचना शुरू होने से शेष यात्रा
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 721