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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 721, कुल 788 में से

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पृष्ठ 721

ब्रिगेड काउंसिल की बैठक हुई और हमने पूर्वोक्त घोषणा-पत्र प्रकाशित करने का
निश्चय कर ही लिया। फ़रवरी, 1919 के अन्तिम दिनों में वह सभी बड़े-बड़े नगरों
तथा कस्बों में लगा दिया गया। इस समय संवाद-पत्रों ने बड़े व्यंग्यपूर्ण शीर्षकों से
उसे प्रकाशित किया। सचमुच हमारी दशा को देखकर कोई भी यह कह सकता
है कि छोटा मुँह बड़ी बात की कहावत हम पर चरितार्थ होती थी। जो भी बाद
में उसका प्रभाव पड़ा, इसका सभी ने लोहा माना। एक दिन हम भूख से पीड़ित
हुए। बहुत दूर तक चलकर क्रीनीवासी श्री मर्फी के घर पहुँचे। भूख के मारे
अधपका मांस खाकर बेचारे हागन बीमार हो गये। हम डबलिन पहुँचना चाहते थे
परन्तु उनकी बीमारी से बड़ी विपत्ति पड़ी। खैर, श्री ट्रीसी और श्री राबिन्सन को
हमने पहले भेज दिया। वे वहाँ बिल्कुल सुरक्षित तौर से पहुँच गये। नित्य गजट में
हम सभी का हुलिया और पुरस्कार की बड़ी भारी रकम प्रकाशित होती रहती थी।
ऐसी दशा में नगर में जाना और वहाँ पर कार्य करना कितना ख़तरनाक है, इसका
अनुमान आसानी से किया जा सकता है। इधर मैं और हागन भी यहाँ अधिक न
ठहर सकते थे। आख़िर टामीमिक अनरनी मोटर लेकर आ पहुँचे। यह वहाँ से 1916
के विद्रोह में मोटर की टक्कर लगाकर दो अभागों को नदी में डुबो चुके थे और
स्वयं किसी न किसी तरह बच आये थे। खैर हम चल दिये।
लिम्बर्क लिम्मर्क तक तो कोई विशेष घटना नहीं हुई परन्तु वहाँ हमें सैनिक
लारियों की एक बड़ी श्रृंखला का सामना हुआ। सभी लारियों पर सैनिक लदे हुए
थे और प्रत्येक लारी के साथ एक-एक मशीनगन थी। हम समझे थे कि यह किसी
बड़े भारी कार्य पर जा रहे थे। पर बाद में शीघ्र ही पता चला कि वे हमारी ही
ख़ातिर आ रहे थे। उनमें कितने सैनिक घण्टों हमारा हुलिया याद करने का परिश्रम
करते रहे होंगे। किसी का किंचित मात्र भी सन्देह हमारी मृत्यु का कारण हो सकता
था। हम भी बड़े राजभक्तों की तरह मुग्ध-दृष्टि से उनकी ओर देख रहे थे। लारियाँ
धड़ाधड़ गुज़र रही थीं। कोई बीस एक के गुज़र जाने के बाद हमने देखा कि एक
सैनिक महाशय बन्दूक़ उठाये हमारी ओर आ रहे हैं उन्होंने आज्ञा दे ही दी, 'ठहरो!'
अब समझे पहली लारियाँ चुपचाप आगे क्यों बढ़ा दी गईं। ड्राइवर महोदय ने तुरन्त
ब्रेक कस दिये। मैं अपना अन्तिम समय निकट समझ पिस्तौल तानकर सोच ही रहा
था कि कौन-से सिपाही को सबसे पहले सुलाऊँ कि एक अफ़सर आगे बढ़ा और
कहने लगा, “महाशय आपको देरी हो रही होगी, क्षमा कीजियेगा, दो लारियाँ टूट
गयी हैं, और सड़क रुक गयी है।” मैंने तुरन्त पिस्तौल छिपा लिया। उन्होंने फिर
कहा, “यदि आप पैदल उतरकर चले जायें जो बहुत अच्छा हो।” इस समय तक
मेरी उद्विग्नता दूर हो चुकी थी। मैंने दृढ़ता से कहा, “महाशय, हम बड़ी दूर से चले
आ रहे हैं और थके हुए हैं। हमें बहुत ज़रूरी कार्य है और शीघ्र पहुँचना है। हम
पैदल नहीं जा सकते।” उसने तुरन्त सैनिकों को हमारी मोटर ढकेलने की आज्ञा
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 715