भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 724, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंसे चला आया। ओकीफ के घर जाकर विश्राम करने का तय हुआ था। थोड़ी देर
बाद राबिन्सन और ट्रीसी भी आ गये। परन्तु हागन नहीं आये। हमें चिन्ता भी नहीं
हुई। यह हम जानते थे कि अभी उनके अठारह वर्ष पूरे होने में भी दो दिन शेष
हैं, तो भी हमें विश्वास था कि वे किसी सुदृढ़ सैनिक से किसी प्रकार भी कम
नहीं हैं। हमारी आँखों में नींद भरी थी। श्री ट्रीसी के शब्दों में हम उस समय किसी
भी कण्टकाकीर्ण शैय्या तक पर सो सकते थे। अभी शायद श्री ट्रीसी अपनी माला
भी समाप्त न कर पाये थे कि श्री पैट्रिक किन्नेन (Kinnane) हमें जगाने लगे। आँखें
खुलने से साफ़ इन्कार कर रही थीं। कान सुनते तो थे, परन्तु कुछ समझ नहीं पाते
थे। एकाएक आलस्य और निद्रा भाग गये। मैं सिहर उठा, ‘बेचारे हागन पकड़े गये?’
विश्वास नहीं हुआ। हागन गोली से मर गये, यह हम मान सकते थे परन्तु वे बिना
शस्त्र चलाये ही पकड़े गये, यह बात कुछ जँचती नहीं थी। खैर उठे। हम तीनों ने
एक दूसरे की ओर देखा। बोलने की आवश्यकता न थी। सभी एक दूसरे का
मतलब समझ गये। निश्चय हो गया, “हागन को छुड़ायेंगे।” पता लिया, तो मालूम
हुआ कि उन्हें अभी थर्ल्स की कोतवाली में रखा गया है, परन्तु शीघ्र ही कार्क
जेल को भेज दिये जायेंगे। फ़ैसला हुआ, ‘इमली’ स्टेशन पर ट्रेन में से या तो हागन
को लिया जाये, अथवा इसी प्रयत्न में प्राण दे दिये जायें। हमारा सबसे छोटा, सबसे
प्यारा साथी शत्रु के हाथ में हो, यह हमारे लिए असह्य था। हममें से कोई भी स्वयं
जेल में जा उसे छुड़ाने को तैयार हो सकता था। आज तक हमने कभी उसके गुणों
की प्रशंसा नहीं की थी, परन्तु अब तो उसके गुण ही गुण हमारी आँखों के सामने
घूमने लगे।
उधर पुलिस वाले भी समझते थे कि वे भी सोलोहैडबेग के मुख्य पात्रों में
से हैं। हम सभी लोगों की अनुपस्थिति तथा अज्ञातवास के कारण ही पुलिस को
यह विश्वास हो गया था। एक स्वेच्छा सेवक के हाथ हमने टिप्रेरी रेजिमेण्ट के
अध्यक्ष के पास कुछ स्वेच्छा सेवक भेजने का सन्देश भेज दिया। हम स्वयं
साइकिलों पर इमली को चल दिये। सीधे रास्ते पुलिस के हाथ पड़ जाने के भय
से, लम्बा चक्कर काटकर दूसरे मार्ग से गये। साइकिलों पर नींद आ गयी, परन्तु
फिर आँख खुल गयी। धड़ाम का शब्द सुन, मुड़कर क्या देखा कि श्री राबिन्सन
साइकिल से गिर पड़े हैं। उठकर फिर चले। हमारे पास एक बम आ गिरा समझे
शत्रु ने आक्रमण किया है, परन्तु वह राबिन्सन की जेब से ही गिरा था। 12 मई,
1919 के दिन सारा प्रबन्ध कर 11 बजे थर्ल्स से चले थे। अगले दिन जिस
गाड़ी में हागन के आने की आशा थी। वह दोपहर से पहले न आ सकती थी।
निरन्तर प्रतीक्षा करते रहे, परन्तु टिप्रेरी से कोई स्वेच्छा सेवक न पहुँचा। साढ़े
ग्यारह बज चुके थे, बारह बजे गाड़ी आने को थी। गाड़ी को हम बिना प्रयत्न
किये भी न जाने देना चाहते थे। यह भी जानते थे कि बन्दी के साथ कम से
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