भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 728, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंसुगमता से तय हो गयी। कैर्टी में कुछ दिन ठहरकर मैं पूर्णतया स्वस्थ ही हुआ था।
हम नित्य संवाद-पत्रों में घोर निन्दा पढ़ा करते। हमारा अपने छोटे वीर साथी को
छुड़ाने का सफल प्रयत्न सभी लोगों की दृष्टि में घृणित समझा गया।
ग्रीष्म ऋतु में जासूस विभाग का पुनर्संगठन किया गया। अब का संगठन बड़े
ज़ोरों से किया गया था। हमें भी जासूस बहुत सताने लगे। हमने भी जहाँ कहीं देखा,
जासूसों को ठीक ठिकाने लगाना शुरू कर दिया। लोग प्रातःकाल जब गलियों में
कई मृत शव देखते जिन पर ये शब्द लिखे रहते, 'अंग्रेज़ी जासूसो ख़बरदार।
आयरिश प्रजातन्त्र सेना।।' तो बहुत विस्मित होते। एक दिन नदी किनारे हम
धूप-सेवन कर रहे थे। नदी में पुलिस से भरी हुई नावें गुज़रीं। पता चला कि वे
हमारी ही तलाश कर रहे थे। उस समय उन्होंने शायद समझा होगा, कि हम लोग
कहीं पर्वतों की कन्दराओं में छिपे हुए पड़े होंगे। ठीक इसी तरह और भी कई
अवसरों पर हम सामने बैठे तमाशा देखा किये। खिड़की में बैठे, अपनी तलाश में
जाने वाली सिपाहियों से भरी मोटर भागती फिरती देखी। कभी पुलिस स्टेशन के
साथ वाले घरों में बैठे, केवल एक ईंट के अन्तर से अपनी तलाश सम्बन्धी उनकी
स्कीमें सुनते रहे।
श्री हागन और राबिन्सन को टिपेरी छोड़कर मैं और ट्रीसी डबलिन को चल
दिये। वहाँ स्वेच्छा-सेवकों के अध्यक्षों से मिले और बहुत वादविवाद के बाद
उन्हें युद्ध के पक्ष में कर पाये। उन्होंने हमारे रहने का प्रबन्ध कर देने का वचन
दिया। तब मैं साइकिल ले श्री हागन और राबिन्सन को लाने टिपेरी की ओर चल
दिया। जाते जाते पिछले ट्यूब में बड़ा पंचर हो गया। उस समय मैं पादरी के वेष
में था। एक साइकिल वाले की दुकान पर गया। उसे तुरन्त मरम्मत के लिए
कहा, परन्तु उसने साफ़ इन्कार कर दिया। मैंने क्रोध से उसे बहुत भला बुरा
कहा। वह बड़े आश्चर्य से पादरी के मुख से वे शब्द सुनता रहा। मुझे तो भूल ही
गया था कि मैं इस तरह शान्ति का अवतार पादरी बना बैठा था। ख़ैर, वहाँ से
सीधा पुलिस चौकी में घुस गया। प्रहरी ने 'पितावन्दे!' कहकर अभिवादन किया।
यथोचित उत्तर दे अन्दर घुसा। मेरी असुविधा जान सभी बेचारे झट मेरी सहायता
के लिए तैयार हो गये। कुछ ही मिनटों में मेरी साइकिल तैयार हो गयी। उधर मैं
नोटिस बोर्ड पर अपने हुलिए तथा पुरस्कार का विज्ञापन पढ़ता रहा। साइकिल ले
उन लोगों को धन्यवाद दे विदा हुआ। कुछ दूर जाकर ख़याल आया, 'पुलिस
वालों को अपना विजिटिंग कार्ड न देने में मैंने निश्चय ही कुछ कृतघ्नता का
परिचय दिया। ख़ैर!'
डबलिन में जाकर हमने देखा कि गनीमी (गुरीला) युद्ध के लिए क्षेत्र तैयार
हो रहा है। परिस्थितियाँ ही देश को स्वातन्त्र्य संग्राम की ओर हाँके ले जा रही थीं।
हमने भी परिस्थितियों की सहायता करने में कोई कसर उठा न रखी। स्काटलैण्ड
722 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़