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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

है। क्षणभर सोचकर उन्होंने हमें चले जाने की आज्ञा दे दी।
हम मोटर की तलाशी लेने की आज्ञा न दे सकते थे, क्योंकि उसमें तो बहुत
कुछ रायफ़लें, रिवाल्वर आदि भरे पड़े थे। पर यदि उनमें से किसी ने तलाशी लेने
का प्रयत्न भी किया होता जो यही प्रयत्न उनका अन्तिम प्रयत्न होता। जो भी हो
उन दिनों में सिवाय हमारी मोटर के कोई भी मोटर ऐसी न जा पायी जिनकी उन
लोगों ने तलाशी न ली हो! सौभाग्य!
आठवाँ परिच्छेद
जनरल लूकसा को क़ैद,
पुलिस बैरकों पर आक्रमण
पुलिस वालों ने बैरकों से निकलना बन्द कर दिया। छोटे-छोटे बैरकों के नित्य प्रति
जलाये जाने के समाचार आ रहे थे। सरकार ने भी अब बड़ी चौकियाँ बनवानी शुरू
कर दीं। उनके मकान बड़े सुदृढ़ तथा सुरक्षित होते और पुलिस वाले अधिकतर
उन्हीं में छिपे पड़े रहते। हमने सोचा, यदि पर्वत हजरत मुहम्मद के पास नहीं जाते,
जो हजरत मुहम्मद को ही उनके पास जाना होगा। अगर पुलिस वाले बाहर नहीं आते
तो हमें ही वहाँ जाना होगा। उस समय उनके अत्याचारों के कारण जनसाधारण में
भी उनके विरुद्ध बहुत घृणा बढ़ चुकी थी। दूसरी ओर सरकार बदमाशों को
उत्साहित कर, अपराधों के लिए उत्तेजित करने लगी। यहाँ तक कि हत्या के
अपराधी भी निर्दोष कहकर मुक्त कर दिये जाते। इसी अवसर पर आयरिश स्वेच्छा
सेवक लोगों की रक्षा का कार्य करने लगे, जिससे प्रजा की उनके प्रति सहानुभूति
और भी बढ़ गयी।
इन्हीं दिनों में निश्चय किया गया कि अब पुलिस चौकियों पर आक्रमण करना
चाहिए। सबसे पहला आक्रमण आईरागलैन में हुआ। इस आक्रमण का नेतृत्व श्री
लियमलिंच के हाथ में था। आप आयरिश रिपब्लिकन (प्रजातन्त्र) सेना के प्रमुख
कार्यकर्ता थे। उनसे मेरा परिचय 1919 की शरद ऋतु में हुआ था। उस समय वे
भी मेरी तरह दौरे पर ही थे। उन्होंने फर्माये के गिरजे में जाते हुए 12 सिपाहियों
की रायफ़लें छीन ली थीं। लड़ाई में एक सिपाही मारा गया था और लियम महाशय
घायल हो गये थे। उसके प्रतिकार में उस समय पुलिस वालों ने बहुत-सी दुकानें
लूट ली थीं। उन्हीं लियमलिंच के नेतृत्व में आईरागलैन का यह सफल आक्रमण
हुआ था। इसके बाद ऐसी ही दूसरी घटना क्लेयर में श्री माईकेल ब्रेनन के नेतृत्व
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 731

में हुई। उन्होंने वहाँ के सारे शस्त्र तथा बारूद आदि छीन लिए। तीसरा आक्रमण
लैण्डर्स की चौकी पर हुआ। यहाँ पर तीन सिपाही घायल हो गये और चौकी जला
दी गयी। एक बार सीनमैलोन नायक थे।
इधर हमने टिप्रेरी पहुँचकर यही कार्य शुरू कर दिया। एक बार तो रातभर
लड़ाई होती रही। हम सड़कों पर बड़े-बड़े वृक्ष काट कर डाल देते, ताकि सैनिक
लारियाँ धड़ाधड़ न चल पायें। टेलीफ़ोन आदि के तार काट डालते, मकान के
आमने-सामने जहाँ कहीं स्थान मिलता, बैठकर छोटी मोटी खान में बारूद भर कर
उसे एकाएक उड़ा देते और फिर उन लोगों को आत्मसमर्पण करने का आदेश देते।
उपरोक्त घटना के समय पुलिस वाले भी डट गये। उन्होंने आज्ञा का पालन नहीं
किया। खूब लड़ाई हुई। आख़िर उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया। उन्हें 'मार्च' की
आज्ञा दे बाहर निकाला। उनके शस्त्रादि छीन लिए और उन्हें छोड़ दिया। उस समय
प्रातःकाल हो चुका था।
यह 4 जून 1920 की घटना है। ठीक उसी दिन कैपव्हाइट पर भी आक्रमण
हुआ था। इन सब आक्रमणों में हमारे 30-40 व्यक्ति हुआ करते थे। हमारे तीनों
आक्रमणों में किसी भी व्यक्ति को कोई घाव नहीं लगा था। इन्हीं दिनों, 27 जून
1920 के दिन सीन मैलोन महाशय ने किलमैलौक पुलिस स्टेशन पर जोकि नगर
के ठीक मध्य में स्थापित था, आक्रमण कर दिया, खूब लड़ाई हुई, मकान में आग
लगा दी गयी। परन्तु आक्रमणकारियों में से श्री स्कल्ली मारे गये। अतः युद्ध रोक
देना पड़ा। विपक्षी दल के 2 मरे, 6 घायल हुए और जो 2 आत्मसमर्पण की मन्त्रणा
देने के अपराध में एक कमरे में बन्द किये गये थे, वे वहीं जल मरे।
आयरिश-स्वेच्छा-सेवक संघ के एक प्रमुख कार्यकर्ता बॉब बार्टन राजद्रोह के
अपराध में दस वर्ष के लिए कारागार में बन्द कर दिये गये। सरकार का एकदम
ऐसा अनुचित व्यवहार देखकर निश्चय किया गया कि ब्रिगेड जनरल लूकस को
पकड़ लिया जाये। वे उन दिनों फर्माय में मछलियों का शिकार खेलने गये हुए थे।
उन्हें तथा उनके दो साथियों को लिंच महोदय कैद कर लाये। वे लोग मोटर में
बैठे-बैठे अरबी भाषा में बातचीत करने लगे। इसका सारांश तो कुछ मिनट बाद
स्वतः ही स्पष्ट हो गया, जब उन्होंने एकदम आक्रमण कर दिया। उनमें से एक
व्यक्ति घायल हो गया। लूकस को तो लिंच महोदय साथ ले आये, परन्तु शेष दोनों
को उन्होंने फर्माय की पुलिस चौकी में पहुँचा दिया। परिणामस्वरूप सरकार ने
फर्माय नगर को जला डाला। जो भी हो, लूकस महाशय को क़ैद रखा गया। वे
एक वीर सैनिक थे। उनके साथ बहुत सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार किया जाता रहा। इस
बात को बाद में उन्होंने भी स्वीकार किया। उन्हें पूर्व लिम्मर्क के एक मकान में
कैद किया गया। वहीं से वे 29 जुलाई को भाग निकले।
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उधर नित्य प्रति डाक लुट जाने के कारण सरकार ने लिम्मर्क नगर से लिम्मर्क
जंक्शन तक सैनिक लारियाँ भेजने का प्रबन्ध कर दिया था। हमने इस पार्टी पर
आक्रमण करने के लिए 30 जुलाई का दिन निश्चित किया। उधर लूकस महाशय
कहीं दौड़ते-भागते इन मोटरवालों से जा मिले। उन्होंने आपको मोटर में बिठा लिया।
इसी लारी पर हमने आक्रमण किया। लड़ाई में सिपाहियों के दो साथी मारे गये।
दूसरे दिन संवाद-पत्रों में ‘जनरल लूकस को पुनः गिरफ़्तार करने का निष्फल
उद्योग’ शीर्षक देखकर ही हमें मालूम हुआ कि लूकस महाशय भाग निकले थे।
जो भी हो, इस प्रकार की घटनाओं की संख्या नित्य प्रति अधिक होती जा
रही थी और उधर पुलिस के अत्याचार भी बढ़ते चले जा रहे थे।
नवाँ परिच्छेद
उड़ाऊ जत्था
मैंने अपने दल के सामने एक नया प्रस्ताव रखा। यदि प्रत्येक काउण्टी में एक-एक
उड़ाऊ जत्था स्थापित किया जाये तो बहुत सुविधा हो। अर्थात अब तक तो हमारे
सारे आक्रमण उन लोगों पर निर्भर रहे, जो रातभर हमारे साथ रहते और प्रातः होते
ही अपने घरों को लौट जाते। उनकी पारिवारिक परिस्थितियाँ कई बार उनके कार्य
में विघ्नकारी सिद्ध होती थीं। अतः मेरा तो यही अनुभव था कि युद्ध में भरोसा उन्हीं
लोगों पर किया जा सकता है जोकि हर समय साथ रहें। ट्रिप्रेरी के स्वेच्छा-सेवकों
की सहायता पाने की आशा से नाकलांग वाली घटना के समय हमें बड़ी असुविधा
हुई थी! फिर वे लोग रातभर तो लड़ते, दिन को उन्हें घर लौट आना आवश्यक
हो जाता। और यदि 20-30 मील की दूरी पर युद्ध करने की ठनती तो और भी
कठिनाई का सामना होता। अब सहस्रों युवक हमारे इर्द-गिर्द एकत्र होने लगे। उन्हें
भी संगठित तथा शिक्षित करने के लिए बहुत से कार्यकर्ताओं की आवश्यकता थी।
उन जत्थों को सुप्तप्रायः देशों में भेजकर वहाँ भी उथल-पुथल मचायी जा सकती
थी। अन्त में मेरा प्रस्ताव स्वीकार हो गया।
अंग्रेज़ लोग भी बड़ा उग्र रूप धारण कर रहे थे। उन्होंने पुलिस वालों को
असीम अधिकार दे डाले! वे लोग कभी भी किसी भी व्यक्ति को बाज़ार में घेर
कर उसकी तलाशी ले डालते। जब, जहाँ जी में आता, जिसे बन पड़ता, क़िले में
ले जाते, तथा उन्हें हमारे सम्बन्ध में सूचनाएँ देने के लिए उत्पीड़ित किया करते।
वे लोग इच्छानुसार किसी नगर में किसी भी भाग को घेर लेते और कई कई दिनों
तक छोटे छोटे कमरों से लेकर अट्टालिकाओं तक हमारी तलाश किया करते।
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 733

सबसे मुख्य बात तो थी ‘हत्यारे दल’ की स्थापना। उसमें भूतपूर्व सैनिक तथा
साधारण अपराधों के कैदी आदि ही थे। उन लोगों को भारी वेतन दिये जाते और
यह विश्वास दिलाया जाता कि उनके किसी भी कार्य का उत्तरदायित्व उन पर न
डाला जायेगा। उनका कर्त्तव्य था कि वे क्रान्तिकारियों को जहाँ कहीं पावें,
निस्संकोच मार डालें। उसके लिए भी उन्हें विशेष प्रमाणों की आवश्यकता न होती।
जिस किसी पर उन्हें किंचित मात्र भी सन्देह हो उसे ही वे मार डालते थे। ऐसी
दशा में हमें अनेक असुविधाओं का सामना करना पड़ा। ऐसी भयंकर दशा में भी
उक्त जत्थे का अस्तित्व साधारण सिपाहियों तथा सैनिकों से गुप्त रखा गया था।
परन्तु हम लोगों को तो उन लोगों के बारे में बहुत कुछ ज्ञात हो चुका था। किस
व्यक्ति ने किस हत्या में भाग लिया है, यह भी हमसे छिपा न था। कौन किस
ड्यूटी पर लगाया गया है, हम खूब जान गये थे। उनके प्रमुख कार्यकर्ताओं के चित्र
भी हमारे पास विद्यमान थे, जोकि हमने अपने सभी मित्रों में बाँट दिये थे।
एक दिन मैं भी इन लोगों के फन्दे में फँस गया। रात के ग्यारह बज चुके थे।
12 बजे के बाद घरों से बाहर रह, निर्दयी अंग्रेज़ सैनिकों की गोलियों की निरन्तर
बौछार से मरना सभी को नापसन्द था और हमें तो वह विशेष तौर से! शीघ्र ही
‘केरोलेन’ के घर पहुँचने के विचार से एक कार पर चढ़ गया। मैं उस समय नैलसन
पिल्लर के पास था। मेरे साथ ही पाँच व्यक्ति और चढ़े। मैंने उन्हें पहचान लिया।
वे सभी उसी ‘हत्यारा दल’ के सदस्य थे। उनमें दो तो मेरे साथ ही एक बैंच पर
मेरे दायें बायें बैठ गये। करूँ तो क्या? शान्ति के अतिरिक्त कोई उपाय न था।
सिगरेट निकालकर सुलगा लिया। कुछ देर तक वे भी बिल्कुल शान्त होकर बैठे
रहे। सोचा, शायद किसी अन्य कार्य के लिए किसी ओर जा रहे होंगे। मेरा तो उन्हें
ध्यान भी नहीं होगा। ऐसी बात सोचकर हृदय की उद्विग्नता को शान्त करने की
चेष्टा कर ही रहा था कि एकाएक उन दोनों व्यक्तियों को जोकि मेरे दाहिने बायें
बैठे थे, हाथ एकाएक जेबों में घुसे, और वे कुछ निकालने लगे। मुझे यह सब समझ
जाने में कुछ देरी नहीं लगी। मैंने तुरन्त अपना रिवाल्वर निकाल लिया। मेरी इस
तेज़ी से वे घबरा उठे। मैंने अपना रिवाल्वर उनके सामने तान दिया। वे तीनों नीचे
उतर गये और मैं भी। परन्तु अब क्या होगा? गोली चलेगी तो अभी बहुत से सैनिक
आ एकत्र होंगे। थोड़ी देर बाद रात्रि का घण्टा बज उठेगा। सभी लोग घरों में घुस
जायेंगे और शिकारी सैनिक गोलियों की वर्षा शुरू कर देंगे। वहाँ पर क्षणभर ठहर
कर मैं सेण्ट जोसेफ टेरिस की ओर भाग निकला। तीन ही चार क़दम जाकर वहीं
खड़ा थपथप करता रहा। वे समझे बहुत तेज़ी से भाग रहा हूँ। वे गिरजे के पास
वाली सड़क से मुझे मेरे रास्ते में आगे से रोकने के विचार से दौड़े, पर मैं आगे
न बढ़ लौट आया। इतने में अन्तिम ट्राम-कार आयी और मैं झट से कूदकर उसी
में चढ़ बैठा। मैं यह न समझ पाया कि उनके शेष दो साथी क्यों शान्त भाव से
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वहीं बैठे रहे। विपत्ति के समय अपने सहकारियों का साथ देना शायद उनके कर्त्तव्यों
में से न था। अस्तु, उस दिन मैं ड्रम कोण्ड्रा के फ़्लेमिंग के परिवार में जा ठहरा।
परन्तु उस दिन से दृढ़ निश्चय कर लिया कि अब कभी भी अकेले बाहर नहीं
जाऊँगा।
दसवाँ परिच्छेद
स्थान-स्थान पर युद्ध
इस बार हमें बहुत दिनों तक डबलिन में ही ठहरे रहना पड़ा। कारण यह था अब
तक तो हमारे मुख्य केन्द्र वाले सदैव हमारा विरोध ही करते रहे थे। किन्तु अब
हमारी सफलता से प्रभावित होकर वे लोग हमारी ओर झुकने लगे। उन्होंने कुछ
उत्साह बढ़ाया और कुछ कार्यक्रम भी निश्चित करने की बात सोचने लगे। इन दिनों
निकम्मे रहना पड़ता। समय बिताने के विचार से अधिकतर गैलिक मल्लशाला में
चले जाया करते। पर वहाँ भी उस दिन एक भारी विपत्ति आ पड़ी! कैसे? यह सोच
लेना कल्पना शक्ति से बाहर है। हम ग़रीब तो थे ही। कहीं कुछ धनादि देख पाते
तो मुँह में पानी भर आता। उस दिन ताश के साथ कुछ जुआ भी हुआ और
सौभाग्यवश कुछ जीत भी लिया। परन्तु अब एक बड़ी भारी चिन्ता ने आ घेरा।
जितनी जल्दी हो सके, उसे खर्च कर देना चाहिए। क्योंकि क्या जाने कब लड़ाई
में मारे जायें और फिर किसी साहसी सिपाही को हमारी जेब में से निकालने का
मौक़ा मिल जाये और वह हमारा जामे-सेहत ही पीता फिरे। वहाँ से हम घुड़दौड़
में अपने भाग्य की आज़माइश करने गये, वहाँ भी बहुत कुछ जीत लिया। जो भी
जीता उस सभी पर केवल मेरा ही नहीं, बल्कि सभी लोगों का समान अधिकार
था। हमारे छोटे से दल से अधिक व्यावहारिक साम्यवादी और कहाँ मिलते?
हम सिनेमा देखने गये। दशा यह थी कि पुलिस आदि भी पूरी शक्ति के साथ
हम लोगों को शीघ्रातिशीघ्र अनन्त निद्रा में सुला देने की चेष्टा कर रही थी। एक
दिन टालवेट स्ट्रीट में हत्यारे दल से भेंट हो गयी। दोनों ओर से रिवाल्वर निकाल
लिए गये। किसी ने भी उन्हें दाग क्यों नहीं दिया, यह नहीं कहा जा सकता। इसी
प्रकार एक दिन श्री सीमसकर्मान के घर विश्राम करने के विचार से गये थे कि
वहाँ घुसने पर एक अपरिचित व्यक्ति अन्दर प्रविष्ट हुआ। और सीमस महोदय को
सूचित कर गया कि इन नवागन्तुकों के पीछे एक खुफ़िया भी था। सुनते ही हम
बाहर निकल पड़े। हमें लौटते देख वह खुफ़िया भी सिर पर पैर रखकर नौ दो ग्यारह
हो गया। इस प्रकार जासूस बराबर हमाने पीछे बहुत ही बुरी तरह से लगे रहते थे।
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 735

उस दिन सिनेमा देखने गया, तो वहाँ फ़्लेमिंग परिवार की दो लड़कियों तथा श्रीमती
ओब्रीन से भेंट हुई। श्रीयुत ओब्रीन नाकलांग के युद्ध में हमारे साथ थे। इस समय
स्वास्थ्य बिगड़ जाने के कारण अमेरिका गये हुए थे। वे सभी मुझे सिनेमा में देखकर
एकदम स्तम्भित रह गईं। एक व्यक्ति जिसको देखते ही गोली से मार देने की आज्ञा
पुलिस वालों को दी जा चुकी हो, वही सिनेमा आदि सार्वजनिक स्थानों में
निस्संकोच भाव से आनन्द विहार में निमग्न फिर रहा हो। अब तक मैं भी नित्य
विपत्ति सहन करने में अभ्यस्त हो गया था। इसी से इतना लापरवाह रहता था।
सिनेमा देखकर मैं बाहर निकला, तो देखता क्या हूँ कि उसी रात्रि की घटना वाले
उन्हीं तीन हत्यारों में से एक खड़ा है। परन्तु मेरे लिए उसका मनोभाव ताड़ लेना
कुछ भी कठिन न था। जी में तो आया, ज़रा रिवाल्वर की भूख को शान्त करने
के लिए, इसे भी एक गोली का ग्रास बनाऊँ, परन्तु अपने दायें-बायें चली जाने
वाली कोमलांगी बालिकाओं को एकाएक चकित कर देना मुझे वांछनीय न जँचा
इसलिए चुपचाप चला गया। हमारे थोड़ी दूर जाने पर एक लड़की ने कहा, 'एक
मित्र पीछे चले आ रहे हैं।' सभी को ट्राम कार पर चढ़ा, मैं स्वयं भी चढ़ा। ट्राम
चल दी। वह जासूस भी ट्राम पर चढ़ने के विचार से आगे बढ़ा, परन्तु मैंने द्वार में
बाजू फैला, खड़ा होकर उसकी तरफ़ ज़रा घूरकर देखा। मेरा मनोभाव ताड़कर वह
चुपचाप वहीं रह गया।
फ़्लेमिंग के परिवार के घर में इस सब बात पर वादविवाद हुआ और अन्त में
यही निश्चय हुआ कि हमें उस दिन वहाँ नहीं ठहरना चाहिए, ग्यारह बजे घर के
पिछले द्वार से मैं और श्री ट्रीसी निकल पड़े। कहाँ जायें – इस बात पर कुछ क्षण
तक विचार हुआ। अन्त में यह निश्चय कर कि बेल्टफास्ट रोड स्थित प्रोफ़ेसर
केरोलेन के 'फर्न साइड' नामक घर में – जिसकी कि एक चाबी हमें इन्हीं
अवसरों के लिए दी गयी थी – ही जाना चाहिए। हम चल दिये। वहाँ के सभी
व्यक्ति सो रहे थे : चुपचाप अपने निर्दिष्ट चले गये और वहाँ जाकर लेट गये। नींद
नहीं आयी। हृदय में जाने कैसी अव्यक्त वेदना, उत्सुकता और भयमिश्रित भाव
उठने लगे। ऐसी ही कुछ दशा श्री ट्रीसी की भी थी, मैं उन पर यही भाव व्यक्त
करने के लिए वाक्य बनाने की चिन्ता ही में था, कि वे बोल उठे, “भैया, डेन!
क्या तुम सो रहे हो? मुझे नींद नहीं आती, हृदय में न जाने क्या हो रहा है? क्यों?”
मैंने भी अपनी वही दशा बताई। फिर हँसी में कहा, “कोई आश्चर्य नहीं कोई
जासूस हमारे पीछे यहाँ तक आ पहुँचा हो, और अभी पुलिस वालों के साथ यहाँ
आ धमके।” सीनट्रीसी महोदय ने सहज भाव से इतना ही कहा, “अब तो कोई
चिन्ता की बात नहीं। अगर हमारी मृत्यु भी हो जाये, तो भी यह युद्ध जारी रहेगा
ही। परन्तु अब क्या हम दोनों को इकट्ठा ही मरना होगा।”
एक ऊँघ आ गयी फिर एकाएक उठकर बैठ गये। सीढ़ियों पर से किसी के
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आने की पदध्वनि सुनायी दी। कुछ फुसफुसाहट का शब्द सुनायी दिया। फिर
सीढ़ियों पर जल्दी जल्दी चढ़ने वालों की आवाज़ सुनायी दी। हम दोनों एकाएक
आकर अपने रिवाल्वर सँभालने लगे। द्वार खुल गया। सीनट्रीसी महोदय ने मुझे इतना
ही कहा, "डेन भैया, विदा! अब आकाश में ही पुनर्मिलन होगा।"
बेंग-बेंग करती हुई गोलियाँ अन्दर आने लगीं। क्रेक-क्रेक करते हुए, मेरे जर्मन
माउज़र पिस्तौल ने प्रत्युत्तर में गोलियों की वर्षा कर दी। एक अंग्रेज़ अध्यक्ष उस
समय पुकार पुकार कर कह रहा था, "रीयन कहाँ है? रीयन कहाँ है?" मेरे दाहिने
हाथ पर एक गोली आ लगी। परन्तु मैं इसकी कोई परवाह न कर निरन्तर गोलियों
की वर्षा करता रहा। इस बीच धड़ाम का शब्द हुआ और सभी सिपाही लौट पड़े।
परन्तु उन्हें कार्यक्षेत्र में डटे रहने को बाध्य करने के लिए पीछे से रायफ़लें चलने
लगीं, मैंने सीढ़ियों की ओर लपककर देखा कि एक दर्जन सैनिक फिर अनिच्छुक
भाव से ऊपर चढ़े आ रहे हैं। परन्तु मेरी पिस्तौल की कृपा से वे फिर लौटने को
बाध्य हो गये। मैं उनका पीछा करने लगा। वे भाग खड़े हुए। परन्तु फिर भी पीछे
से कोई न कोई रायफ़ल की गोली चलती और किसी का आर्तनाद तथा धड़ाम
से गिरने का स्वर सुनायी देता। मैं निचली छत पर आ गया था। उस छत में छेद
कर गर्डर से लटककर नीचे खड़े हुए सिपाहियों पर गोलियाँ चलाने की बात सोच
ही रहा था कि वे लोग वहाँ से भी भाग गये। अब मुझे बेचारे ट्रीसी की चिन्ता होने
लगी। मैंने वहीं लेटकर धीमे स्वर में पुकारना शुरू किया, "सीन कहाँ हो? सीन!
सीन!" परन्तु कोई उत्तर न मिला। चिन्ता और भय से मैं कुछ व्याकुल-सा होने
लगा। इधर मेरे घावों से रक्त की धारा बह रही थी और मैं प्रति क्षण दुर्बल हुआ
जा रहा था। खैर यह सोचकर कि श्री ट्रीसी येनकेन प्रकारेण बच ही निकले होंगे,
मैं भी उठा। एकाएक नीचे से कई बम फटने के धमाके से सारा घर प्रतिध्वनित
हो उठा। जब मैं पहले पहले इस घर में आया था तब मुझे इस घर की छोटी-सी
दीवार ऐसे ही अवसरों के लिए ख़ास तौर से दिखायी गयी थी। मैं वाटिका में से
लपककर उस दीवार की ओर बढ़ा। सामने दीवार पर से एक सिपाही ने सिर
उठाकर गोली छोड़ते हुए मुझे ठहरने को कहा। उसे मौक़ा न दे, मैंने उस पर गोली
छोड़ी तो वह कराहता हुआ धड़ाम से ज़मीन पर जा गिरा। इतने में सिपाहियों के
एक गुट ने मुझ पर गोली चलानी शुरू कर दी। मैं भी गोली चलाता हुआ निर्दिष्ट
स्थान की ओर चलता गया। फिर कैसे क्या हुआ, कब दीवार फाँदकर बाहर निकल
आया, आदि मैं कुछ नहीं जानता। बाद में मैंने अपनेआप को ड्रमकोण्ड्रा पुल तथा
उस गृह के बीच में सड़क पर खड़ा पाया। वहाँ पर अधिक देर तक ठहरना बड़ी
मूर्खता होती। एक सशस्त्र लारी से मैं टकराया। और तो कुछ न सूझ पड़ा पर गोली
चलाकर उनमें से एक व्यक्ति को मार डाला। उधर से भी गोलियों की वर्षा होने
लगी। मैं नगर की ओर भाग खड़ा हुआ। दायें हाथ ट्रेनिंग कॉलेज की 18 फुट ऊँची
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 737

दीवार थी। यदि उस पर से कूद जाऊँ तो बस बिल्कुल सुरक्षित हो जाऊँ। घायल
रहने की हालत में ऐसी 18 फुट दीवार पर चढ़ना कोई आसान कार्य नहीं। परन्तु
प्राणों की बाज़ी लगाते ही मनुष्य में असीम शक्ति का संचार हो उठता है यही मेरा
अनुभव है। इस बार भी निश्चय किया और दीवार पर चढ़ गया! कैसे? सो नहीं
कह सकता। बाद में स्वयं भी बड़े आश्चर्य से उसकी ओर देखा करता!
अब के कुछ चेतना हुई तो अपने को नदी तट पर खड़ा पाया। किधर जाऊँ,
कुछ समझ में न आया। नदी पार करनी होगी, परन्तु पुल पर से नहीं। फिर नदी
ही में घुस गया। सौभाग्यवश पानी अधिक गहरा नहीं था। परन्तु मेरे शरीर के अनेक
घावों में वह एकदम ठण्डा जल प्रवेश कर एक विचित्र झनझनाहट-सी पैदा करने
लगा। तिस पर भी मुझे कोई विशेष तकलीफ़ तथा ठण्ड अनुभव नहीं हुई। मैं
समझता हूँ, किन्हीं विशेष अवसरों पर परिस्थितियाँ मनुष्य में प्रकृति के विरुद्ध
ऐसी-ऐसी कठिनाइयों को अनुभव तक न करने की शक्ति प्रस्फुटित कर देती हैं।
नदी के उस पार कुछ घर देखे। अधिक परिश्रम करना अब मेरे लिए असम्भव
था, अतः उन्हीं घरों में विश्राम करने का निश्चय कर उधर बढ़ा। न जाने कौन-सी
अज्ञात शक्ति मुझे उनमें एक घर विशेष की ओर धकेले जा रही थी। उसी घर का
द्वार क्यों खटखटाऊँगा, वहीं आश्रय पाने की आशा से जाऊँगा, कुछ नहीं समझ
सका। परन्तु वही द्वार खटखटाने पर एक वृद्ध को सामने खड़ा पाया। रक्तरंजित
शरीर को देखकर सहज में ही मेरी स्थिति समझ गया। उसने बिना कोई प्रश्न पूछे
इतना कहा, “आइये, यथाशक्ति आपकी सहायता तथा सेवा करेंगे।” भीतर ले
जाकर एक चारपाई पर लिटा दिया और श्रीमती लांग नामक नर्स को बुलाकर मेरी
मरहम-पट्टी की। बाद में पता चला कि मेरे मेहरबान श्री फेड मोम्स थे जिनकी
पूर्ण सहानुभूति विपक्ष में थी, तथापि उन्होंने मेरी सुश्रूषा तथा देखभाल ठीक उसी
प्रकार से की जैसेकि कोई पुत्र अपने पिता से आशा कर सकता हो। प्रातः समय
मैंने उन्हें अपना परिचय दिया। प्रातः होते ही 20 अक्तूबर, 1920 श्रीमती मोम्स के
द्वारा फिल्सानहन के घर पत्र भेजा कि मुझे शीघ्र कहीं सुरक्षित स्थान पर ले जाने
का प्रबन्ध किया जाये। यह पत्र भेजने के बाद मालूम हुआ कि इस घर के दोनों
ओर के घरों में पुलिस रहती है। अनजाने में इसी द्वार विशेष को खटखटाने मात्र
से ही मैं कितना बाल-बाल बच गया था!
मोटर आने पर हम मेटर अस्पताल की ओर चल दिये। रास्ते में एक पुलिस
मैन द्वारा रोक दिये जाने पर कुछ अधीर हुए। परन्तु उसने केवल यही कहा
“महाशय! मोटर ज़रा मन्द गति से चलाइए, उधर से सैनिक लारियाँ जा रही हैं।”
अस्पताल के द्वार पर श्री डिकमैकली को खड़ा पाया। उन्हें गिरफ़्तार करवाने वालों
के लिए भी भारी पुरस्कार घोषित किया जा चुका था। उन्हें वहाँ देख बहुत आश्चर्य
हुआ, परन्तु उन्होंने हमें अस्पताल से आगे गुज़र जाने का संकेत किया। हम माउण्ट
738 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

जाम स्क्वायर में चले गये। वहाँ पर एक अस्तबल में घुसे। मेरी पीड़ा उस समय
बहुत असह्य हो उठी थी। पर श्री ट्रीसी को सामने देख मेरी प्रसन्नता की हद न
रही। उनको ज़रा भी चोट नहीं आयी थी। उस दिन उन्होंने भी भाग्य पर विश्वास
करके कोई एक द्वार खटखटाया था जहाँ से कि उनके चचेरे भाई श्री फिलरिपन
बाहर निकले। यह घर उन्हीं का था।
सबसे अधिक वेदनाजनक समाचार था हमारे मित्र प्रो. केरोलेन के घायल किये
जाने का। हमारे वहाँ से बच निकलने पर उन्हें दीवार की ओर मुँह कर खड़ा होने
को विवश किया गया और गोली मार दी गयी क्योंकि वे हमारे सम्बन्ध में कुछ
भी सूचना देने को तैयार न थे। उनकी मेटर अस्पताल में ही कुछ रोज़ बाद मृत्यु
हो गयी। उस वीर ने हमारी ख़ातिर प्राण तक न्योछावर कर दिये। निश्चय ही वे
सच्चे वीर थे! आदर्श देशभक्त थे!!
अस्पताल में आये तीन दिन ही हुए थे : बाज़ार में गोलियाँ चलने की आवाज़
सुनी। सोचने लगा, अब यह युद्ध बन्द न होगा। इसी विचार से मुझे असीम आनन्द
भी अनुभव होता। कुछ देर बाद एक नर्स हड़बड़ाती हुई मेरे कमरे में दाख़िल हुई।
कुछ अशुभ समाचार है, यह समझ लेने में मुझे देर न लगी। उसने कहा, 'सैनिकों
ने अस्पताल को घेर लिया है। तलाशी हो रही है कि हम वहीं हैं।' उचककर
खिड़की में से देखा, सैनिक अस्पताल को घेरे खड़े थे। यह सोचकर कि अब बचना
असम्भव है, मैं मुस्कुराने लगा। परन्तु सौभाग्य देखिये। कुछ ही घण्टे पहले बम से
घायल हुआ एक स्वेच्छा-सेवक जिसकी शक्ल मुझसे बिल्कुल मिलती-जुलती थी
वहाँ लाया गया था। पुलिस वालों के तलाशी लेते न लेते उसके प्राण पखेरू उड़
गये। पुलिस वाले यह समझकर कि डेन ब्रीन मर गया, बहुत प्रसन्न हुए और वहाँ
से लौट गये। प्रातःकाल जो गोलियाँ सुनी थीं, उनका ब्यौरा यह है कि कुछ
स्वेच्छा-सेवकों ने एक सशस्त्र लारी छीनने के विचार से उस पर आक्रमण कर
दिया था। परन्तु थोड़ी देर युद्ध करने के बाद उन्हें असफल लौटना पड़ा।


ग्यारहवाँ परिच्छेद
श्री ट्रीसी आदि को वीरगति
अस्पताल में लाने से पहले अस्तबल में जो कुछ क्षण ठहरना पड़ा था, वही मेरा
और श्री ट्रीसी का अन्तिम मिलन था। जिस समय मुझे स्ट्रेचर पर डाल कर वे लोग
ले जाने के लिए उठाने लगे थे, उस समय ही श्री ट्रीसी से मैंने अन्तिम बार हाथ
मिलाया था। उस समय तो यह सोचने का शायद साहस भी न होता था कि यह
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 739

हमारा अन्तिम मिलन है। उस दिन तो मेरे हृदय के भीतर यह भाव बिल्कुल नहीं
उठा था कि वह मेरा सहोदर से भी अधिक प्रिय ट्रीसी मुझसे फिर कभी नहीं मिल
पायेगा। ट्रीसी! प्यारे ट्रीसी!! जीवन का एक बड़ा भाग हमने एक साथ विपत्तियाँ
सहन करने में बिता दिया था। घोर अन्धकार में भी हमने एक दूसरे को उत्साहित
कर किसी की आशा डिगने न दी थी। आह! आज तुम मुझे छोड़-छाड़कर यों ही
चले गये! तुम्हारी यह आमोद भरी मंजुल मूर्ति आँखों के सामने उसी तरह नाच रही
है।
अस्पताल में जाने के तीसरे दिन – 14 अक्टूबर 1920 को जब पुलिस वहाँ
आ पहुँची तब श्री ट्रीसी विह्वल हो उठे थे। उन्होंने तुरन्त हेडक्वार्टर में जाकर प्रस्ताव
किया कि पकड़े जाने की दशा में मुझे पुलिस से छुड़ा ले जाने के लिए एक दल
अश्वयमेव भेजा जाये उनकी बात मान ली गयी। वे अपने साथ कुछ स्वेच्छा-सेवकों
को लेकर चल दिये। वे निर्भीक देशभक्त तथा साहसी सैनिक! तुम्हें एक साथी
की विपत्ति ने इतना विह्वल कर दिया कि तुम अपनी स्थिति बिल्कुल भूल ही गये।
जासूस ने उन्हें पहचान लिया और पीछा किया।
सारा प्रबन्ध कर चुकने के बाद ट्रीसी महोदय टालबोट स्ट्रीट के रिपब्लिकन
आउट फिटर्ज नामक दुकान में अन्तिम स्कीम का निश्चय करने के लिए गये थे!
प्रजातन्त्रवादी सैनिक अधिकतर हम वहीं पर मिला-जुला करते थे। कुछ ही क्षण
बाद सैनिक लारियों ने दुकान घेर ली। श्री ट्रीसी सबसे आगे खड़े थे, पुलिस वालों
का हाथ उन्हीं पर पड़ता परन्तु एक व्यक्ति एक तरफ़ भागा। सिपाही उधर लपके
इसी क्षण में सुअवसर पाकर, साइकिल ले चुपचाप श्री ट्रीसी खिसकने ही लगे थे
कि एक साधारण वेशधारी व्यक्ति मोटर में से उन पर झपट पड़ा और बोला, “जिसे
हम गिरफ़्तार करना चाहते हैं वह तो यह व्यक्ति है।” श्री ट्रीसी ने अन्तिम समय
निकट देखकर रिवाल्वर निकाल लिया उधर से मशीनगन धाँय-धाँय कर चलने
लगी। आख़िर में ट्रीसी वहाँ पर घायल और धराशाई होकर वीरगति को प्राप्त हुए।
अन्तिम श्वास तक उनके बदन पर प्रसन्नता की झलक विद्यमान थी। उस वीर ने
अपनी जननी जन्मभूमि के चरणों पर अपना प्राणोत्सर्ग कर दिया।
राजनीतिक संसार ने यह निस्संकोच भाव से माना कि आयरिश गनीमी युद्ध
का नेतृत्व बड़े-बड़े युद्ध विद्या-विशारदों तथा बुद्धिमान व्यक्तियों के हाथ में था।
अतः उनकी सांग्रामिक चालें बड़ी महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुईं। आज मैं दावे से कहता हूँ
कि मेरे ट्रीसी उन युद्ध विद्या विशारदों के सर्वोपरि नेता थे। उस वीर के दिमाग़ ने
जो बताया उस निर्भीक योद्धा की अलौकिक बुद्धि ने जो सुझाव दिया, वही
स्वेच्छा-सेवकों ने निभाया और विजय लाभ किया। आज मैं दावे से कह सकता
हूँ कि श्री ट्रीसी हमारे युग के कट्टर, निर्भीक तथा साहसी देशभक्त ही न थे,
बल्कि वे चोटी के योग्य सेनापतियों में से भी थे। 28 वर्ष की आयु में ही स्वर्गलोक
740 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

सिधारने वाले एक युवक के प्रति यह वाक्य कहना विस्मयजनक मालूम हुए बिना
न रहे, पर एक बात दरअसल ऐसी ही थी। यदि उन्हें अन्य प्रसिद्ध योद्धाओं की
तरह पूर्ण रूप से शिक्षण का अवसर मिला होता, यदि उन्हें भी अनुकूल स्थितियों
में रखकर पूर्ण रूप से शिक्षा दी जाती तो निश्चय ही वे संसार के किसी भी योद्धा
तथा सेनापति से कम न रहते।
मुझे बहुत दिनों तक उनकी मृत्यु का समाचार बताया न गया। मैं अन्धविश्वासी
नहीं हूँ। मैं अलौकिक बातों में विश्वास नहीं रखता। परन्तु सच कहता हूँ, मुझे उसी
दिन पता चल गया था कि मेरे प्यारे ट्रीसी अब इस संसार में नहीं रहे। वे मुझे अपने
पैताने खड़े मुस्कुराते हुए दिखायी दिये थे। उसी दिन सायंकाल मिक कोलिन्स मेरी
ख़बर लेने को आये। उत्सुकतावश मैंने पहला प्रश्न यही पूछा – ट्रीसी कहाँ हैं?
सजल नेत्रों को दूसरी ओर फेरकर छिपाने का प्रयत्न करते हुए रुँधे गले से वे इतना
ही कह पाये, कि ‘वे कहीं बहुत दूर गये हैं।’ दस दिन बाद मुझे ठीक समाचार
मिला। शिपस्ट्रीट बेरेक से श्री ट्रीसी का शव ट्रिप्रेरी ले जाया गया। वहाँ उनका जो
सत्कार हुआ, वह शायद किसी नरेश को भी नसीब न हुआ होगा। सोलोहैडबेग चर्च
से – जहाँ कि वे बाल्यावस्था में प्रार्थनाएँ किया करते थे-चलकर उनका शव
किल फीकल नगर से गुज़रा। शोकग्रस्त लोगों का यह जुलूस मीलों लम्बा था।
ट्रिप्रेरी का ऐसा कौन-सा व्यक्ति था जिसके हृदय में उस दिन देशभक्ति के भाव
हिण्डौले न ले रहे हों और जो उस दिन उस जुलूस के साथ शुष्क नेत्रों से गया
हो? वह समाचार उस समय प्रदेश के लिए बड़ा शोकजनक समाचार था। उनकी
क़ब्र आज तीर्थ बन गयी है।
अगले शुक्र के दिन मैं मेटर अस्पताल में ले जाया गया। यहाँ पर खूब
ख़ातिरदारी होने से शीघ्र ही आरोग्य लाभ करने लगा। एक दिन एकाएक क्या देखता
हूँ कि मकान घिर गया है। सैनिक लोग तलाशी लेने की तैयारी कर रहे हैं। एकदम
ऊपर वाली छत पर जाने के विचार से उधर जो लपका, तो ख़ाकी वर्दी वालों को
खड़ा पाया। मृत्यु निश्चय समझ लौटकर वहीं आ बैठा। दर्शकों के जमघट में जो
दृष्टि गयी तो मिक कोलिंज को खड़ा पाया। पता चला कि मेरे गिरफ़्तार होने पर
मुझे छुड़ाने के विचार से ही वे अपने दल सहित आये थे। पर सब स्थानों की
तलाशी लेकर, केवल मेरा ही कमरा छोड़कर पुलिस वाले क्यों लौट गये, मैं कभी
भी नहीं समझ पाया। वहाँ से डन लेघायर के घर पर ले जाया गया। वहाँ भी पुलिस
ने तलाशी ली, परन्तु मेरे कमरे की नहीं। इस रहस्य का भी कुछ पता न चला।
मैं हैरान रह गया।
21 नवम्बर 1920 का ख़ूनी रविवार मैं कभी न भूल सकूँगा। उस दिन प्रातः
ही नगरभर में सनसनी फैल गयी। नगरभर में 14 जासूस अपने अपने घरों में ही
मार डाले गये थे। हमारे और तो सभी व्यक्ति बच गये, परन्तु फ्रैंकटीलिंग पकड़े
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 741

गये। उन्हें फाँसी का दण्ड सुना दिया गया। परन्तु आप वहीं से रफूचक्कर हो गये।
बाद में पेड़ीमोर को पकड़कर फाँसी पर लटका दिया गया। हालाँकि वे उस दिन
वहाँ थे ही नहीं। वे एक बड़े वीर सैनिक थे।
उस दिन सरकार ने प्रतिहिंसा के भाव से प्रेरित होकर दो बड़े भीषण और क्रूर
कार्य कर डाले। सायंकाल के समय पुलिस ने ‘कार्क पार्क’ को घेर लिया। उस
समय वहाँ 10,000 व्यक्ति फुटबाल का मैच देख रहे थे। उन पर पुलिस ने गोलियों
की वर्षा कर अपनी बर्बरता, क्षुद्रता तथा नृशंसता का परिचय देने में कुछ कसर
उठा न रखी। 17 व्यक्ति परलोक सिधार गये, 50 बुरी तरह घायल हुए।
दूसरा अत्यन्त वेदनाजनक समाचार था श्री पीडरक्लैंसी तथा डिक मैक की
हत्या का। उन्हें पकड़कर और यह दोष बताकर कि उन्होंने फ्रेंच पार्क के पहरेदारों
पर आक्रमण किया था, तड़पा-तड़पाकर मार डाला गया। इस अभियोग के प्रत्युत्तर
में केवल इतना कहना ही पर्याप्त होगा कि उन स्वेच्छा-सेवकों के बारे में –
जिन्होंने कि अपने रणचातुर्य से अंग्रेजों को नाकों चने चबवाये थे, बिना अन्य
साथियों को लिए फ्रेंच पार्क के प्रहरियों पर आक्रमण करने की बात कहना सर्वदा
हास्यास्पद है। जो भी हो, पुलिस उन वीरों से जली बैठी थी। अवसर पाते ही उसने
अपनी प्रतिहिंसा की भभकती हुई आग को शान्त करने के लिए उन पर मनमाने
अत्याचार कर उन्हें मार डाला।
बेचारे पीडर और डिक! दोनों कैसे साहसी वीर, कितने मृदुल, कितने कट्टर
देशभक्त और कैसे सुचतुर सेनापति थे! उन्हें श्री ट्रीसी की तरह दो-दो हाथ दिखाने
तक का सुअवसर न मिल सका! अफ़सोस!!
बारहवाँ परिच्छेद
ज़िला इंस्पेक्टर की हत्या और मेरा विवाह
मैं खूब स्वस्थ होकर टिप्रेरी लौट आया। इस समय युद्ध ने खूब ज़ोर पकड़ लिया
था। रणचण्डी का ताण्डव नृत्य हो रहा था। देशभर में खूब चहल-पहल थी।
आयरिश लोग बड़े हर्ष और चाव से अपने आदर्श के लिए, अपने देश के लिए,
अपनी मातृभूमि के लिए प्राणोत्सर्ग कर रहे थे। मानो आयरिश जाति स्वतन्त्रता देवी
के मन्दिर में निज रक्त मांस की भेंट से उस देवी को प्रसन्न करने का दृढ़ निश्चय
कर वहीं डट गयी थी।
अंग्रेज़ी न्यायालय एकदम ख़ाली हो गये थे। ‘मृत्युदण्ड’ घोषित किये रहने पर
भी प्रजातान्त्रिक न्यायालय खचाखच भरे रहते थे। देशवासियों का झुकाव प्रजातन्त्र
742 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

की ओर था। अब परिस्थिति भी बहुत बदल चुकी थी। हमारे सैनिक रायफ़लें लेकर
खुल्लम-खुल्ला घूमने लगे। जहाँ-तहाँ लोग उनका ख़ूब स्वागत करते।
मैं काहिर और रोज़ग्रीन प्रदेश में चला गया। फिर मैंने अधिकतर युद्ध उसी देश
में किये। अप्रैल 1921 में समाचार मिला कि ब्रिटिश सेना का एक छोटा-सा दल
कुछ रक्षित वस्तुएँ लेकर, प्रति बुधवार प्रातःकाल क्लोधिन और काहिर के बीच
में से गुज़रता है, उन्हीं से युद्ध करने की ठानी। 22 अप्रैल का दिन नियत हुआ।
प्रातः 5 बजे से एक बजे तक प्रतीक्षा की, पर वे नहीं आये। मैं और कौनमौलोनी
वहाँ से लौट आये। परन्तु हमें लौटे कुछ अधिक देर नहीं हुई थी कि वे आ गये।
हमारे सैनिकों ने धावा बोल दिया। आत्मसमर्पण करने को कहा गया, परन्तु प्रत्युत्तर
में गोलियों की वर्षा की गयी। युद्ध हुआ। एक सिपाही मरा, दो घायल हुए और
तब उन्होंने आत्मसमर्पण किया। उनके शस्त्र छीन लिए गये। ‘रक्षित वस्तु’ विनष्ट
कर दी गयी और फिर उन्हें छोड़ दिया गया।
घटनास्थल से पुलिस की कई बड़ी भारी-भारी चौकियाँ इतनी निकट थीं कि
उन्होंने गोलियों का शब्द ज़रूर सुना होगा। इसी कारण सभी सैनिकों ने वहाँ से तुरन्त
लौट जाना ही उचित समझा। वे सैनिकों की तरह मार्चिंग करते हुए चले आ रहे
थे। एक मोड़ पर मुड़ने के समय एक मोटर पीछे से आयी और अन्तिम लाइन के
स्वेच्छा-सेवकों से टकरा गयी। मोटर वाले का नाम-धाम पूछने पर उत्तर मिला —
‘डिस्ट्रिक्ट इंस्पेक्टर पौटर! रायल आयरिश कान्स्टेबुलरी काहिर!!’ उसे क़ैद कर
लिया गया। कुछ दूर जाने पर हमारे सैनिकों पर फिर पुलिस ने आक्रमण कर दिया।
अब की शत्रुदल उनसे तिगुना था। तथापि यह वीर वीरतापूर्वक लड़ते हुए साफ़ बच
निकले। साथ ही वे अपने बन्दी को भी साथ ही ले गये। इस युद्ध की सफलता
का श्रेय श्री डिन्नी लेसी तथा श्री सिनेहाराम को ही दिया जा सकता है।
इन दिनों एक आयरिश स्वेच्छा-सेवक श्री ट्रेयनोर के. डबलिन जेल में बन्द
थे, उन्हें मृत्युदण्ड सुनाया जा चुका था। अंग्रेज़ों का प्रतिहिंसा का भाव उत्तरोत्तर
अत्यन्त निन्दनीय और भयंकर रूप पकड़ता जाता था। वे जिस किसी को पाते, मार
डालते। दूसरी तरफ़ हम सदैव उनके सिपाहियों आदि को साफ़ छोड़ देते। हममें
प्रतिहिंसा का भाव ज़रा भी नहीं था। परन्तु ट्रेयनोर के. निराश्रित, तरुण परिवार का
उनके अतिरिक्त और कोई भरण-पोषण करने वाला न था। उधर उन्हें फाँसी पर
लटकाने की तारीख़ 25 अप्रैल निश्चित हो चुकी थी।
हमने ट्रेयनोर को पौटर के बदले में माँगा और कहा कि ऐसा नहीं हुआ तो हम
लोग पौटर को मार डालेंगे। पुलिस के हैडक्वार्टर्स से सूचना भेज दी गयी। उन लोगों
ने इस बात पर कुछ ध्यान न दिया और यथाशक्ति इसे छिपाने का ही प्रयत्न किया।
अन्त में श्री ट्रेयनोर फाँसी पर लटका ही दिये गये। हमारे सामने एक बड़ी समस्या
आ उपस्थित हुई। किंकर्त्तव्यविमूढ़ हुए खड़े रहे। करें तो क्या? छोड़ दें तो अच्छा
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 743

नहीं। न छोड़ें तो अकारण ही उस बेचारे के प्राण जायें। इस बात पर बहुत वादविवाद
हुआ और अन्त में यही निश्चय हुआ कि हमें अपने कथन को पूरा करना ही होगा।
फलस्वरूप उन्हें मृत्युदण्ड दे दिया गया। पौटर एक वीर सैनिक थे। उन्होंने खूब
उच्च शिक्षा पायी थी। वे बड़े दयालु, मृदुल स्वभाव तथा चतुर अफ़सर थे। उन्हें
अपने परिवार से पत्र व्यवहार करने का अवसर भी दिया गया था। अन्तिम समय
उन्होंने अपनी डायरी, एक अँगूठी और एक सोने की घड़ी अपनी पत्नी को दे देने
की प्रार्थना की। उनकी अन्तिम अभिलाषा पूरी की गयी। तदोपरान्त प्रतिहिंसा के
भाव से उत्तेजित होकर सरकार ने भी यों ही बहुत से घर तथा बाड़े जला दिये।
अब ज़रा हमारे विवाह की बात सुन लीजिये। 12 जून, 1921 के दिन जबकि
युद्ध ज़ोरों पर था, और जिससे एक मास बाद अंग्रेज़ सन्धि करने को बाध्य हुए
थे, बड़ी विचित्र तथा आश्चर्यजनक औपन्यासिक स्थिति में मेरा विवाह हो गया।
पाठक मेरे तथा ब्रिघिड मैलोन के प्रेम की बात भूले नहीं होंगे। सितम्बर, 1919
में ही हमारी पहली भेंट हुई थी। प्रथम मिलन में ही हम प्रेमपाश में बँध गये थे।
मेरे घायल होने पर उन्होंने कितनी तत्परता से मेरी सुश्रूषा की थी, वह मैं भूल
सकता हूँ? ड्रम-कोण्ड्रा युद्ध के बाद वे मेरी ख़बर लेने आईं। तभी एक बार मैंने
उनसे स्वस्थ होने पर विवाह करने की बात कह दी। मेरे साथ विवाह करने से
क्या-क्या विपत्तियाँ आ पड़ेंगी, कहाँ तक सुख और ऐश्वर्य से युक्त या रहित रहना
पड़ेगा, यह सब वे समझती थीं। तथापि मेरे इस प्रस्ताव को उन्होंने बड़े हर्ष और
चाव से स्वीकार कर लिया। सब तैयारी हो गयी, परन्तु गिरजा कहाँ मिले? श्री
माइकेल पार्सल को ही घर के लिए उपयुक्त स्थान समझा गया। वे बड़े देशभक्त
थे। वे तथा उनकी स्त्री दोनों जेल यात्रा भी कर चुके थे।
यह स्थान चारों ओर से छावनियों आदि से घिरा हुआ था। कहीं चार मील पर
अंग्रेज़ी पुलिस की सुदृढ़ बैरकें थीं, तो कहीं छह मील की दूरी पर। साथ ही हर
समय हमारी खोज में सैकड़ों सैनिक इधर-उधर ठोकरें खाते फिरते थे। तथापि हमारे
टिप्रेरी के सभी सैनिक वहाँ आ एकत्रित हुए। उन्होंने चारों ओर खूब अच्छी तरह
से मोर्चाबन्दी कर ली। यदि अंग्रेज़ी सेना उन दिनों उधर आ भटकती, तो उसका
वह स्वागत होता, जिसे वह कभी न भूल पाती। चारों ओर सड़कों पर वृक्ष काटकर
डाल दिये गये। सशस्त्र स्वेच्छा-सेवक पहरे पर खड़े हो गये। उस दिन सभी सैनिकों
में कितनी तत्परता तथा निर्भीकता, कितना हर्ष तथा चाव, कितना जोश और उत्तेजना
थी, यह आज नहीं कहा जा सकता!
विवाह से पहली रात को बड़ी असुविधा का सामना करना पड़ा। एक कैम्प
में श्री हागन तथा श्री डिन्नी लेसी आदि मुख्य-मुख्य सैनिक अध्यक्षों के साथ सोना
पड़ा था। सोने तो उन्होंने दिया नहीं, अविवाहित होने पर भी मुझे विवाह सम्बन्धी
शिक्षा देना उन्होंने अपना कर्त्तव्य मान लिया था। उपदेश देने में कोई भी किसी के
744 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

पीछे नहीं रहना चाहता था। खैर! विवाह हुआ, खूब आनन्दोत्सव रहा, दावतें उड़ीं।
लड़के-लड़कियों ने नाच किये। गाना हुआ और फिर ‘हनीमून’ (सुहागरात) के
लिए मैं डोनोहिल चला गया। प्रत्येक मित्र के यहाँ खूब स्वागत हुआ। वह
विवाह-वह ‘हनीमून’ रह-रह कर याद आता है! ओह! कितना आनन्द था! क्या
वह फिर कभी नहीं होगा। वह समय कितना सुन्दर, कितना आनन्दमय और कितना
महिमामय जान पड़ता है।
तेरहवाँ परिच्छेद
सिविल वार और मेरा सीनियर
रिपब्लिकन डिप्टी का चुनाव
जून 1921 के आरम्भ में एकाएक यह समाचार सुनकर कि अंग्रेजों से सन्धि की
जाने वाली है, हमें बड़ा आश्चर्य हुआ। जुलाई से उसके अनुसार कार्य भी शुरू हो
जायेगा, यह सुनकर तो हम एकदम चकित हो उठे। जो लोग हमें सदैव कोसते रहते
थे, जिन्होंने कभी भी हमारा उत्तरदायित्व अपने ऊपर नहीं लिया था; वे आज हमारे
प्रतिनिधि बनकर सन्धि की बातचीत करेंगे – कितने आश्चर्य की बात है? हम
खुश भी हुए क्योंकि हमारा गोला बारूद ख़त्म हो चुका था और कुछ व्यक्ति विदेशों
में इसका प्रबन्ध करने के लिए भेजे जा चुके थे।
सन्धि के अनुसार कार्य शुरू हो गया। युद्ध रुक गया। हम लोग नगरों में घुसे;
परन्तु अब की ज़रा शान के साथ! खूब स्वागत हुआ। बड़े हर्ष और चाव से हमारी
अभ्यर्थना की गयी। दो वर्ष पहले जो हमारी निन्दा करते थे, हमें घृणित समझते थे,
वे ही आज सबसे बढ़-चढ़कर हर्षोल्लास कर रहे थे। खैर, इसके बाद कुछ दिन
तक तो घुड़दौड़ादि में भाग्य निरीक्षण कर गुज़ारा करते रहे, क्योंकि अभी तक
अवैतनिक रूप से ही कार्य करते थे। फिर उत्तर की ओर जाना पड़ा। विचार था
कि युद्ध फिर शीघ्र ही शुरू होगा। परन्तु अब की ऐसा विचार हुआ कि दक्षिण का
भार कुछ हलका करने के लिए उत्तर में युवकों को शिक्षित किया जाये। इसीलिए
परेड, रिवाल्वर, बम आदि की शिक्षा देने की गरज से उधर जा निकला। सितम्बर
में वापिस डबलिन पहुँचा। यहाँ खूब स्वागत हुआ।
अभी सन्धि की अन्तिम बातचीत चल ही रही थी, अतः हमने ज़रूरी समझा
कि हमारे सैनिकों को अपने कार्य के लिए सदा तत्पर रहना चाहिए। उनकी तत्परता,
उत्सुकता तथा अधीरता देखकर आयरिश पार्लियामेण्ट के ये सदस्य स्वेच्छा सेवकों
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 745

का साथ छोड़ने का साहस नहीं कर पायेंगे। 7 सितम्बर को सन्धि की शर्तें घोषित
कर दी गईं। मैं उसी दिन लौटकर डबलिन पहुँचा था। श्री सीनहागन, श्री
लियमलिंच आदि मुख्य योद्धाओं से मिला और गृहयुद्ध से बचने का एकमात्र उपाय,
शत्रु से फिर से भिड़ जाना ही उन्हें बताया। सभी ने सुना, परन्तु किसी ने इस पर
ध्यान न दिया। सभी लोगों का यह उपेक्षापूर्ण व्यवहार देखकर तथा सन्धि की शर्तों
को एकदम घृणित और असम्मानसूचक समझकर मैं आयरलैण्ड से कहीं दूर –
बहुत दूर जाने के लिए लालायित हो उठा। निश्चय किया, भारतवर्ष में जाऊँ। वह
देश भी हमारी तरह स्वतन्त्रता युद्ध में निमग्न है। शायद वहाँ दो हाथ दिखाने का
मौक़ा मिल जाये। परन्तु लन्दन स्थित भारतीय नेताओं ने हमें एकदम निराश कर
दिया। उन्होंने कहा, तुम लोगों ने अपने देश का सर्वनाश कर दिया। वे पराये लोग
तुम पर क्यों विश्वास करेंगे? फिर तो हम अमेरिका जाने की तैयारी करने लगे।
दिसम्बर के मध्य में श्री सीमस रोबिन्सन का विवाह हुआ। उसी के बाद
लन्दन की ओर चल दिया। चलते समय हृदय एकदम विदीर्ण हो उठा। आज हमारे
ही लोगों ने हमें संसार की नज़रों में गिरा दिया! वह क्या कहते होंगे? यही न कि
हमारी स्वतन्त्रता, हमारी आशा, जिसके लिए हमने इतना घोर रक्तपात किया था,
केवल आयरिश देश को विभिन्न भागों में विभाजित करा देना और एक विदेशी
सम्राट के प्रति भक्ति दिखाना था? छिः-छिः यह कैसी घृणित बात थी। इन्हीं
विचारों से विक्षिप्त होकर हम वहाँ से भाग जाना चाहते थे – वहाँ, जहाँ कि कोई
पहचान भी न पाये और हमारे मस्तिष्क की कालिमा लोगों के सामने प्रकट न हो
उठे। डबलिन छोड़ने के पूर्व मैंने अनेक प्रजातन्त्रवादी सैनिकों से, शत्रु से युद्ध छोड़ने
को कहा, उन्होंने मेरी यह बात न मानी। अगर उन्होंने मेरी सलाह मान ली होती
तो मैंने आयरलैण्ड कदापि नहीं छोड़ा होता। अन्त में मैंने यह भी कह दिया था कि
12 महीनों के दरम्यान अपने को गृहयुद्ध में निरत पायेंगे।
19 दिसम्बर को मैंने सीनमैक क्योन को एक खुली चिट्ठी लिखी थी। उसके
निम्नलिखित उद्धरण मेरे विचार को और भी स्पष्ट कर देंगे –
“महोदय! मैं आपको बता देना चाहता हूँ कि आनडायल में तथा इससे पहले
भी किसी स्थान पर आपने कहा था कि इस सन्धि के अनुसार आपकी
‘चिरवांछित’ स्वतन्त्रता आपको मिल गयी है तथा इसी के लिए आप आज तक
लड़ते रहे थे।
“परन्तु – मैं भी युद्ध में आपसे पीछे नहीं रहा हूँ। इसलिए यह कह देना चाहता
हूँ कि यदि हमें मालूम होता कि स्वतन्त्रता का यही आदर्श है तो सच कहता हूँ,
मैंने तथा मेरे साथियों ने बन्दूकों को छुआ तक न होता, न मैंने कभी किसी मृत
अथवा जीवित साथी को इसके लिए अग्रसर किया होता।
“आप स्मरण रखिये कि आज श्री मार्टिन सैबेज की बरसी का दिन है। क्या
746 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

आप यह कल्पना करने का साहस करते हैं कि उस वीर ने एक ब्रिटिश गवर्नर
जनरल को मारने का प्रयत्न करते हुए केवल इसीलिए प्राण दे दिये कि उस गवर्नर
के स्थान पर कोई नया ब्रिटिश गवर्नर आ जाये।
“मैं अपने उन वीर सैनिकों की ओर संकेत करते हुए आपसे अनुरोध करूँगा
कि आप हमारे उसी 'अलेहदगी' तथा पूर्ण स्वतन्त्रता को ही अपना आदर्श
बनाये रहें।”
मैं और श्री हागन जिस किसी तरह बन पड़ा, पासपोर्ट लेकर अमेरिका चले
गये। वहाँ बहुत से परिचित अथवा अपरिचित मित्रों से भेंट हुई। शिकागो में अपने
भाई-बहन से भी मिला। खूब सैर की। सभी मित्रों ने खूब स्वागत किया। पर
सभी सुखी रहने पर भी आयरलैण्ड की चिन्ताजनक स्थिति से हर समय घबराये
रहते। नित्य नये झगड़ों के समाचार आते। मेरी 'गृहयुद्ध' सम्बन्धी भविष्यवाणी
ठीक होने लगी।
मार्च के शुरू में समाचार मिला, लिम्मर्क में मोर्चेबन्दी हो गयी। सन्धि के
समर्थक तथा विरोधी दो विभिन्न दलों में विभाजित हो गये हैं। मैं समझ गया कि
अब युद्ध किसी भी क्षण छिड़ सकता है। शीघ्र ही मुझे तार द्वारा बुलाया गया। मेरे
और हागन के सामने फिर वही धनाभाव तथा पासपोर्ट की असुविधा आ उपस्थित
हुई। कुछ मित्रों की सहायता से एक जहाज़ पर हम भरती हो गये। हमें कोयले
झोंकने का काम दिया गया। कुछ घण्टे कठिन परिश्रम भी किया, पर जहाज़ के
चलने में केवल एक घण्टा ही शेष था कि जहाज़ के किसी अधिकारी को सहसा
हागन पर सन्देह हो गया और गरीब पर नाम धाम, जाति, देश तथा इस काम का
पहले के अनुभव सम्बन्धी प्रश्नों की बौछार होने लगी। परिणामस्वरूप वह नीचे
उतार दिये गये। अब मैं क्या करूँ? इतने घण्टे का परिश्रम भी व्यर्थ गया और इस
समय उतरना भी असम्भव! श्री हागन को भी मैं ऐसी दशा में न छोड़ सकता था।
न जेब में पैसा, न किसी मित्र की आशा। अन्त में यही निश्चय किया कि उन्हें
छोड़कर मुझे नहीं जाना चाहिए। अब प्रश्न यह था कि जहाज़ से उतरूँ तो कैसे?
द्वार की ओर भागा! वहाँ एक अधिकारी महोदय खड़े थे – मिन्नत की कि किनारे
पर एक ज़रूरी कार्य है। अभी पाँच मिनट में आता हूँ। गरीब मज़दूर समझ वे दयार्द्र
हो उठे, मुझे उतर जाने दिया। इस प्रकार जहाज़ से उतर तो गया पर हमारी सारी
पूँजी वहीं रह गयी। हमने अपना सारा धन व्यय करके जो बन्दूकें खरीदी थीं, जहाज़
में ही रह गईं। पर मजबूरी थी। उसका तो कोई उपाय भी न था।
इसके बाद भी जहाज़ पाने के प्रयत्न में हमें कई बार निराश होना पड़ा। पर
अन्त में एक जहाज़ मिला और अप्रैल के आरम्भ में हम आयरलैण्ड पहुँचे। बन्दरगाह
में पहुँचते ही समाचार मिला कि मेरी श्रीमती अकेले ही नहीं बल्कि एक सुपुत्र
सहित घर में मेरी बड़ी प्रतीक्षा कर रही हैं।
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 747

परिस्थिति बहुत ख़राब हो चुकी थी। प्रजातन्त्रवादी सेना दो विरोधी दलों में
विभाजित हो गयी। एक दल था, आयरिश प्रजातन्त्रवादी सेना का जो पूर्ण स्वतन्त्रता
के पक्ष में न था और दूसरा आयरिश फ़्री स्टेट दल था, जो सन्धि की स्वतन्त्रता
से ही सन्तुष्ट था। मोर्चेबन्दी हो गयी थी। मैंने इस गृहयुद्ध को रोकने का भरसक
प्रयत्न किया। सभी दलों के पास मारा-मारा फिरा। दोनों दलों में समझौता करने के
लिए कोशिशें की गईं। पर सब व्यर्थ हुईं। अन्त में चुनाव के सम्बन्ध में यह तय
हुआ कि यह दोनों दल एक-दूसरे का विरोध न कर, एक हों, सिनफिन दल के
नाम से चुनाव में भाग लें और चुनाव के बाद फिर से मन्त्रिमण्डल क़ायम करें।
यह समझौता दोनों दलों के प्रतिनिधि श्री एमन डी. वेलेरा तथा माईकेल कालिन्स
में हुआ था। माईकेल फ़्रीस्टेट के प्रतिनिधि थे। उनका व्यवहार बड़ा विचित्र था।
वे शीघ्रातिशीघ्र गृहयुद्ध प्रारम्भ करना चाहते थे और इन्हीं कारणों से यह समझौता
कुछ सफल न हुआ।
एक दिन एकाएक समाचार मिला कि फ़्रीस्टेट वालों ने अंग्रेज़ों की सहायता
से रिपब्लिकन (प्रजातन्त्रवादी) सेना कोर्ट से निकाल देने के लिए तोपें ला चढ़ायी
हैं। गृहयुद्ध का श्रीगणेश हो गया। मुझे भी रिपब्लिकन सेना का साथ देना पड़ा।
गृहयुद्ध का वेदनाजनक विवरण लिखने की इच्छा नहीं। इससे आयरलैण्ड को इतनी
अधिक हानि हुई, जितनी शायद अंग्रेज़ों के विरुद्ध वर्षों लड़ते रहने पर भी न हुई
थी। इस युद्ध में श्री लियमलिंच, श्री डिन्नी लेसी, श्री जैटी केली, श्री स्पर्की ग्रीन
आदि कितने ही वीरों के प्राण गये। इसी गृहयुद्ध में श्री रीयन, श्री पेड्डी, श्री
मेकडोनोह आदि कितने सुन्दर वीर रणचण्डी की सहचारियों डाकिनी पिशाचिनी
आदि को निज रक्त मांस से तृप्त करते हुए उसी युद्ध में संसार मंच से उठ गये।
वे आयरलैण्ड के वीर त्यागी, सच्चे और निस्स्वार्थ योद्धा थे। उन पर हमारा देश
जितना गर्व कर सके, थोड़ा है।
1923 के बसन्त में श्री लियमलिंच की मृत्यु हो जाने पर शार्टरफ़ोर्ड काउण्टी
में होने वाली सन्धि कॉन्फ्रेंस में सम्मिलित होने के विचार से हम अपने कई मित्रों
के साथ चल दिये। हम मैलेरी पहुँचे। वहाँ पर जब हम खेतों से निकलकर एक
सड़क पार कर रहे थे, तीनों ओर से गोलियों की वर्षा होने लगी। भागते-भागते
पहाड़ी पर चढ़ जाना पड़ा। दो दिनों तक पहाड़ियों पर ही रहना पड़ा क्योंकि फ़्रीस्टेट
की सेना उस ज़िले को नष्ट-भ्रष्ट करने के लिए वहाँ एक बड़ी तादाद में पड़ी
थी। बाद में किसी प्रकार अरहलो की घाटी में मेरे छिपने लायक एक स्थान मिल
गया। यद्यपि भूख और नींद बहुत सता रही थी, फिर भी उसमें छिपकर सो गया।
उठ कर सेनाओं के चलने का शब्द सुनकर खन्दक में से सिर निकालकर देखा
तो फ़्रीस्टेट के सैनिक बन्दूकें तानकर घेरे खड़े थे। कोई चारा न था। आत्मसमर्पण
कर दिया।
748 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़

मैं भीरू नहीं, कायर नहीं, निर्जीव नहीं, तथापि उस दिन न जाने क्यों
रह-रहकर रो उठने को जी चाहने लगता था। जी में आता था बिलख-बिलखकर
ख़ूब रो लूँ, सिसक-सिसक उठूँ, शायद हृदय का भार कुछ हलका हो जाये।
कितनी बार बड़ी मुश्किल से ही झरते हुए आँसुओं को रोक पाया था। उस दिन
मेरी विचित्र हालत थी। पाँच वर्ष तक मैं इंग्लैण्ड की सेनाओं को नष्ट-भ्रष्ट करता
रहा। अपने देश तथा देशवासियों के लिए अपनी खुशी से अनेक तकलीफ़ें सहीं,
पर वही मैं, आज अपने ही देश में अपने ही देशवासियों के द्वारा क़ैदकर लिया
गया था।
गैल वाली में मेरा अभियोग चला और सज़ा पाकर लिमरिक जेल में रखा गया।
वहाँ से माउण्ड ज्वाय जेल में भेज दिया गया। वहाँ के दुर्व्यवहार के कारण मैंने
अनशन कर दिया और 12 दिनों के अनशन के बाद छोड़ दिया गया।
मेरे इस जेल जीवन के दिनों में ही टिप्रेरी निवासी लोगों ने मुझे अपना सीनियर
रिपब्लिकन डिप्टी चुन लिया था।

ISBN 978-81-87728-95-5
ISBN 818772895-7
9788187 728955
राहुल
फ़ाउण्डेशन
मूल्य रु. 350