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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 720, कुल 788 में से

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पृष्ठ 720

उनके पक्ष का ही समर्थन किया था। इसलिए बाद में लोग हमारी भी प्रशंसा करेंगे।
हमारे साथ बीत खूब रही थी। एक दिन एक ज़मींदार के बाड़े में उसके साथ
बैठे आग सेंक रहे थे। रात्रि का समय था। एकाएक किसी ने ज़ोर से द्वार खटखटाना
शुरू कर दिया। ज़मींदार ने बैठे-बैठे ही पूछा, ‘कौन है?’ उत्तर मिला, ‘पुलिस!’
बस! एकदम अपने रिवाल्वर निकालकर हम तैयार होकर बैठ गये। परन्तु द्वार खुलने
पर पड़ोस का एक कृषक अपनी दिल्लगी पर हँसता हुआ प्रविष्ट हुआ। हमने अपने
रिवाल्वर छिपाने का प्रयत्न तो बहुत किया परन्तु वे उस ज़मींदार की नज़र से न
बच पाये। उस कमबख़्त ने एकदम कह ही तो दिया, ‘महाशय, सशस्त्र लोगों को
अपने घर में आश्रय देने को मैं तो हरगिज़ तैयार नहीं।’ बाहर गज़ब की ठण्ड थी,
घोर अन्धकार था, परन्तु विवश हो अग्नि तथा गरम कमरे की ओर सतृष्ण नेत्रों से
देखते हुए बाहर निकलना पड़ा। पशुओं के कमरे में घुसकर रात वहीं बितायी। कपड़े
आदि भी फट गये। मित्र लोग मिलने तक से झेंपते थे। आख़िर हम दोनों नगर में
पहुँचे। यह स्थान सोलोहैडबेग से 7 मील की दूरी पर था। यहीं पर हमारे साथी
श्री राबिन्सन भी हमसे आ मिले। इस पुनर्मिलन से हमें अत्यन्त आनन्द हुआ। हमें
जुदा हुए अभी कुछ सप्ताह ही हुए थे, तथापि ऐसा मालूम होता था मानो हम सहोदर
चिर-आयोग के बाद फिर मिले हों। इसके बाद घूमते-घामते एक वृद्ध व्यापारी के
घर पहुँचे, वहाँ कुछ आराम मिला। पेटभर भोजन किया, और फिर युद्ध की सूझने
लगी। “नहीं, इस तरह निरुद्देश्य यात्रा में समय नष्ट हो रहा है, अतः हमें किसी
न किसी क्रियात्मक कार्य में जुट जाना चाहिए।” युद्ध घोषणा तैयार की गयी। उसमें
अंग्रेज़ों को देश ख़ाली कर देने की आज्ञा दे दी गयी थी और आज्ञोल्लंघन के
अपराध में मृत्यु दण्ड निश्चित किया गया था। हमने वह युद्ध-घोषणा अपने केन्द्र
डबलिन में मंजूरी के लिए भेजी, परन्तु उसकी मंजूरी के स्थान पर हमें आज्ञा मिली
कि तुम्हें अमेरिका जाना होगा, सब तैयारी हो चुकी है। यह हमारे लिए वज्रपात से
कम न था। हम तो आयरलैण्ड में रहकर युद्ध करना चाहते थे। पर उधर जिनसे
सहायता पाने की आशा थी, वे ही हमें निर्वासित करने की गुप्त मन्त्रणा कर रहे
थे। हमने दृढ़ता के साथ स्पष्ट कह दिया, “हम मृत्यु से नहीं डरते और आयरलैण्ड
में रहते हुए उसके लिए लड़ते हुए मर जाने में ही गौरव अनुभव करेंगे।” वे नाराज़
हो गये, परन्तु हमने उन्हें विश्वास दिलाया कि, “हमारे विचार से हमारे लिए पृथ्वी
पर यदि कहीं स्थान है तो आयरलैण्ड में! हम इसी देश में रहते हुए, इसी की
स्वतन्त्रता के लिए इसी के चौराहों, सड़कों, नगरों तथा खेतों में शत्रु से युद्ध करते
हुए प्राण दे देंगे।” हमें बाहर जाकर लेख लिखकर हृदय को शान्त कर लेना पर्याप्त
न जँचता था। ख़ैर, वे मान गये, परन्तु इस शर्त पर कि हम चुपचाप किसी कोने
में बैठे रहें। हमने सोचा हम इस असुविधा को भी जल्दी ही दूर कर लेंगे।
कुछ दिन बाद हम नोर्डस टाऊन निवासी डोन्ल्ली के घर पहुँचे। वहीं पर
714 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़