भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 732, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंतो क्या? इधर समय व्यर्थ नष्ट हो रहा था। आख़िर लोहे का सींखचा उसके सिर
पर दे मारा। वह वहीं लोट-पोट हो गया।
उधर हमारी असुविधा को देख हमारे एक साथी ने बम भी फेंक दिया था।
परन्तु उसने पिन निकाल दिया था। बम फटा। हमारे घाव तो नहीं आये, परन्तु धमक
से एक बार तो सभी धराशायी हो गये। उठे तो पहली मोटर आ पहुँची थी। उसके
गुज़रते ही हमने छकड़ा ज़रा और आगे धकेलकर उस पर गोली छोड़ दी। पहली
मोटर तो हवा हो गयी और दूसरी वहीं रुक गयी। मोटर पर हमारे साथी बमों की
वर्षा करने लगे। शत्रु की गोली के निशाने के साथ-साथ उनके बिल्कुल पास रहने
के कारण अपने साथियों द्वारा फेंके गये बमों की जद में भी हम थे। और दूसरी
ओर से एक और सैनिक लारी गोलियाँ बरसाती हुई आ धमकी। मेरी बाई टाँग में
गोली लगी। देखभाल करने का तो अवसर नहीं था, परन्तु इतना ज़रूर अनुभव हुआ
कि गोली उस पार निकल गयी है। उस समय सिपाही लोग बहुत घबरा गये थे।
वरना हम लोगों के लिए वहाँ अधिक देर तक ज़िन्दा बचे रहना एकदम असम्भव
था।...परन्तु आह! एक निर्दयी गोली बेचारे मार्टिन सैबेज के आ ही लगी। आह!
बेचारा मेरी गोद में आ रहा। भोला-सा यह सुन्दर बालक, कितने चाव और उत्साह
से अभी एक घण्टा पहले आयरिश स्वतन्त्रता तथा आत्मोत्सर्ग के वीरतापूर्ण गीत
गाता आ रहा था और अब...अब वह उन्हीं को क्रियात्मक रूप दे रहा था। मैंने उसे
पृथ्वी पर लिटा दिया। होंठ हिलते देख, झुका तो उसके मन्द क्षीण स्वर में यह
सुन पाया। 'डेन। मैं जाता हूँ, परन्तु संग्राम जारी रखो।' वह करुणाजनक दृश्य मुझे
कभी नहीं भूलेगा। मानो तरुण आयरलैण्ड अपने रक्त से स्वतन्त्रता की पुस्तक की
भूमिका लिखने की तैयारी में था। आह! वह दृश्य कभी नहीं भूल सकूँगा। मैं उस
ग़रीब का सिर गोद में लिए बैठा उसका अन्तिम सन्देश सुन रहा था, और चारों
ओर से गोलियों की वर्षा हो रही थी। अपने वीर साथी की वीरगति पर, उनकी
शोकजनक मृत्यु पर आँसू बहाने का अवसर कहाँ था? जिस वीर ने 1916 में पहली
बार अपने देश के लिए शस्त्र उठाया था, वही आज, अपने देश के लिए ही लड़ते
हुए स्वर्ग-धाम सिधार गया। वह आयरिश माता की सेवा के लिए जीता रहा और
अन्त में उसी के चरणों में अपना प्राणोत्सर्ग कर गया। बम ख़त्म हो गये, पिस्तौल
ख़ाली हो गयी, एक साथी मारा गया, कुछ देर बाद गोली चलनी भी बन्द हो गयी।
हम उस सराय में जा पहुँचे। वहाँ से गोली चलाने की सोचने लगा तो खाकी वर्दी
वाला कोई भी न दीख पड़ा। सब रफ़ू-चक्कर हो चुके थे। वहाँ पर मोटर का ज़ख़्मी
ड्राइवर, जिससे बाद में एक बार और मेरा वास्ता, बिल्कुल विपरीत अवस्था में
पड़ा, तथा ज़ख़्मी श्री मार्टिन का शव पड़ा था। श्री मार्टिन का शव सराय में छोड़कर
हम लोग साइकिलों पर नगर की ओर चल दिये।
726 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़