भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 717, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंकी गड़गड़ाहट भी सुनायी देने लगी! उस दिन मैं किसी तरह धैर्य न रख सका।
उस समय मेरी नसें तनी जा रही थीं। सफलता और असफलता दोनों का भीषण
परिणाम उस समय मेरी आँखों के सामने दीख रहा था। हमें उन चिर अभ्यस्त
सिपाहियों का सामना करना था जोकि युद्ध विद्या में पूर्ण रूप से निपुण थे। और
हम? हमारे छोटे से दल में से कितनों ने गोली चलाने का अभ्यास किया था?
अभ्यास मात्र के लिए गोली चलाने की फ़िजूलखर्ची करने का तो हम कभी साहस
भी नहीं कर पाये थे। गोलियाँ मिलती ही कहाँ थीं? हम कितनी बार अभ्यास की
इस आवश्यकता पर वादविवाद करते हुए ऐसे अवसर पर अवश्यम्भावी अधीरता
की ओर संकेत कर हँस देते थे! परन्तु अब तो समय आ ही पहुँचा। अभी-अभी
कुछेक क्षण बाद हमारी परीक्षा हो जायेगी। वे सामने आ पहुँचे। ड्राइवर तथा इंचार्ज
घोड़े के ज़रा पीछे-पीछे चल रहे थे और केवल दो सिपाही रायफ़लें लिए गाड़ी
के पीछे-पीछे चले जा रहे थे। यह लो, वे हमारे रिवाल्वरों की ज़द (पहुँच या मार)
में आ गये। अब तो हमें उठना ही चाहिए! Hands up! Hands up!! (हाथ उठा
दो! हाथ उठा दो!!) कहते हुए हमारे साथी अपने-अपने स्थान पर से कूद पड़े।
परन्तु हमारे आदेश का सिपाहियों पर कुछ भी प्रभाव न हुआ। वे लिहाज़ करने वाले
नहीं हैं। बस! एक ही क्षण में 'बैक! बैक!!' का स्वर करती हुई हमारी गोलियाँ
अपने ठिकाने पर जा रहीं। दोनों सिपाही ज़मीन पर लोट गये! परन्तु अब?
घबराहट का समय तो अब आया। यदि बिना गोली चलाये ही सब कार्य हो
गया होता, तो इतनी खतरनाक बात न होती। परन्तु अब तो प्रत्येक घर और बाड़े
से स्त्री और पुरुष सड़क पर निकल आयेंगे और ड्राइवर तथा इंचार्ज महाशय भी
सामने ही त्रस्त हुए खड़े थे। अभी एक घण्टे के अन्दर यहाँ सैकड़ों सिपाही आ
इकट्ठा होंगे और हमें कुछ ही दिनों में लुटेरा डाकू घोषित कर हमारे सिर बड़ा भारी
ईनाम रख दिया जायेगा। खैर! पुलिस वालों की रायफ़लें उठाकर गाड़ी पर चढ़ बैठे!
हागन महोदय कोचवान बने। मैं और ट्रीसी पीछे बैठ गये। कोड़े पर कोड़ा बरसाते
हुए घोड़े को दौड़ाते जा रहे थे। लोग बड़े आश्चर्य से हमारी ओर देखते थे। हम
डनस्केह की ओर जा रहे थे। बहुत देर तक हम चुपचाप बैठे रहे। फिर ट्रीसी
महोदय बोले, “डेन, याद है। उस दिन विस्फोटक सम्बन्धी पुस्तक पढ़ रहे थे न,
कि विस्फोटकों को झटका नहीं लगना चाहिए, नहीं तो बहुत बड़ी हानि हो सकती
है?” वे बड़ी शान्ति के साथ बोले थे। परन्तु बोले गिरा दिया। और किसी के
विस्फोटकों को क्या, मानो एक विपत्ति का पहाड़ और जा भी रहे थे बड़ी तेज़ी
के साथ। इसलिए विस्फोटकों के झटके की तो बात ही क्या कहते? हमने स्थान
पर लूट का माल छिपा दिया और घोड़े को दूसरी ओर ले जाकर एलीने ब्रिज पर
छोड़ दिया और थोड़ा-सा विस्फोटक पदार्थ वहाँ पर रख दिया। यह सब तो हो गया,
परन्तु अब प्रश्न यह था कि हम कहाँ जायें?
आयरिश स्वतन्त्रता-संग्राम / 711