सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 722, कुल 788 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 722

दे दी, जो 200 गज तक उसे ढकेलते चले गये। उस समय निश्चय ही वे समझे
थे, कि मोटर में बैठने वाला आयरिश व्यक्ति पार्लियामेण्ट तक में प्रश्न छेड़ सकता
है। खैर! मैं और हागन बड़ी मुश्किल से हँसी रोक पाये और सैनिकों के कष्ट के
लिए उन्हें बार-बार धन्यवाद देते हुए विदा हुए। कोई आधा घण्टा बाद तक मोटर
को पूरी रफ़्तार पर चलाते रहे। इसी प्रकार उन सैनिकों ने जो हमारी ही तलाशी में
जा रहे थे, हमारी ही सहायता की! बहुत स्थानों पर होते हुए, विभिन्न मित्रों के घरों
में ठहरते हुए, हम लोग डबलिन की ओर चले जा रहे थे। हमारे परिचित हमारी
ओर देखकर बड़े चकित होते और हमें नमस्कार आदि कहने से पहले चारों ओर
बड़ी सावधानी से ताक लेते तथा बाद में भी बड़े धीमे स्वर से बात करते। उनका
यह व्यवहार देख हमें बड़ी हँसी आती। डबलिन में हम चारों फिर मिल गये। हम
जब भी मिलते तब हमें बिल्कुल ख़याल न रहता कि हमारे पीछे पुलिस मारी-मारी
फिरती है। हम ठीक छुट्टी पर आये हुए विद्यार्थियों की तरह हँसते-खेलते रहते
थे। हमने उन दोनों को चिढ़ाने के विचार से उपरोक्त सिपाहियों की सहायता पाने
की बात कही तो उन्होंने भी झट अपनी मोटर ठीक जेल के द्वार के सामने रुक
जाने तथा सिपाहियों के उसे धकेलने की बात सुनायी।
हमने मिलकर परामर्श किया तो बहुत पछताये कि विगत तीन मास हमने व्यर्थ
खो दिये। सोलोहैडबेग की घटना से तो माना देशभर में जीवन संचारित हो उठा था,
परन्तु अब तो वह स्मृति मात्र रह गयी थी। देशभर में सुविस्तृत सैनिक संगठन
विद्यमान था। शस्त्र भी पर्याप्त थे। लोग भी अब वैसे भीरू और कायर नहीं थे। वे
ड्रिल करने तथा शस्त्र रखने के अपराध में प्रसन्नतापूर्वक जेलों में जा रहे थे। परन्तु
आवश्यकता थी उन्हें शस्त्रों का प्रयोग करने का परामर्श देने की। इस तरह बहुत
देर तक सोच विचार करते रहने के बाद हमने चार साइकिलों का प्रबन्ध कर लिया
और डोनोहिल को वापिस चले गये। हम अपने मित्र होरेन परिवार के पास गये तो
उन्हें यह विश्वास दिलाने के लिए कि हम वास्तव में मनुष्य ही हैं – प्रेतात्मा नहीं,
बड़ी चेष्टा करनी पड़ी। मैं अपनी माँ से भी जा मिला। बेचारी मुझे देख बहुत
विस्मित तथा प्रसन्न हुईं। उन्होंने मेरे कारण बहुत कष्ट सहन किये। मेरे बाद तो दिन
में दो-दो तीन-तीन बार उनकी तलाशी हो जाती। घर का सब सामान पुलिस ले
गयी थी। मुर्गी और उसके बच्चे मारकर वे बदला निकालते थे। तो भी वे हतोत्साह
नहीं हुईं। जब कभी पुलिसमैन पूछता, “क्यों जी, तुम्हारा पुत्र डेनब्रीन कहाँ है?”
तो तुरन्त व्यंग्यपूर्ण उत्तर देतीं, “क्यों? क्या उसके साथ एक छत के नीचे बैठने का
साहस है?” इसी तरह एक बार पूछने पर उन्होंने कह दिया, “हाँ। डेनब्रीन ऊपर
बैठा है, और तुम्हें ऊपर चले आने का निमन्त्रण देता है। क्यों, साहस है?” बस
पुलिसमैन भाग गया और बड़ी भारी सेना ने घर घेरकर तलाशी लेनी शुरू कर दी।
जो भी हो, माँ ने एक भीषण अपराध किया था। उसी के फलस्वरूप वह सब कष्ट
716 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़