भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
कीर्ति एवं प्रताप में छपे क्रान्तिकारी लेख (काकोरी के शहीदों पर निबन्ध)
होकर उनकी आज्ञाओं तथा प्रार्थनाओं की उपेक्षा करके झगड़े-फ़साद के लिए जा
रहे हैं। मैं अभी से पुलिस को सब समाचार देकर सतर्क कर देना चाहता हूँ। वह
उनसे निपट ले। मैं अनर्थ का उत्तरदायी नहीं हूँ।'
लुधियाना के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर मि. Cowan अपने 15 जनवरी के
पत्र में अम्बाला-कमिश्नर को इस घटना के बारे में इस प्रकार लिखते हैं –
He (a police reporter) stated to me that Ram Singh, the leader of the
kookas, went to those men, with a turban around his neck, and entreated
them not to create a disturbance; and they would not listen to him; and
that Ram Singh then came to the Deputy Inspector and reported to him
that these men were upto mischief, and that he had no control over them.
परन्तु उस समय सरकार या पुलिस जान-बूझकर चुप रही। चुपचाप उनको
अंग्रेज़ राज्य में से रियासत में घुसने दिया। उसी समय उन सबको गिरफ़्तार क्यों नहीं
कर लिया गया? कुछ दिनों के बाद उनका जोश ठण्डा हो ही जाता। परन्तु नहीं,
सरकार तो स्वयं चाहती थी कि उसे कोई अवसर मिले, जिससे वह आन्दोलन
कुचला जा सके। इस समय मनोवांछित सुअवसर मिल गया। लोगों का तो यहाँ तक
कहना है कि उन लोगों को उत्तेजित करने में भी सरकारी आदमियों का हाथ था।
ख़ैर, उसके सम्बन्ध में कुछ न कह सकने पर भी हम सरकार पर जान-बूझकर
चुप रहने का अपराध लगा सकते हैं। अस्तु, वे 150 कूके वीर पटियाला के सीमान्त
स्थित रब्बू गाँव के बाहर जा ठहरे। रातभर वहीं विश्राम किया। अगले दिन भी वहीं
रहे। शायद और साथियों की प्रतीक्षा कर रहे थे।
14 जनवरी, सन् 1872 ई. को सायंकाल उन्होंने कुछ सिक्ख सरदारों के
मलोध (Malodh) नामक क़िले पर आक्रमण कर दिया। इस क़िले पर आक्रमण
क्यों किया गया? इसके सम्बन्ध में डिस्ट्रिक्ट गजेटियर में लिखा है कि उन्हें आशा
थी कि यह सरदार विद्रोह में उनका नेतृत्व लेंगे। सम्भव है, पहिले विराट आयोजन
में ऐसी ही तैयारी रही हो और उस समय उन्होंने अपरिपक्व विद्रोह उठता देख
सहायता देने अथवा नेतृत्व लेने से इन्कार कर दिया हो। ख़ैर, कूक़ों ने वहाँ आक्रमण
कर दिया और कुछ शस्त्र, कुछ घोड़े तथा एक तोप लेकर चलते बने। वहाँ पर दोनों
ओर के दो-दो व्यक्ति मरे और कुछ घायल हुए।
अगले दिन प्रातःकाल 7 बजे वे मलेर कोटला पहुँच गये। सरकार ने पटियाला
तथा मलेर कोटला दोनों राज्यों को पहले से सतर्क कर दिया था। मलेर कोटला की
रक्षा के लिए विशेष तौर से तैयारी की गयी थी, परन्तु इन दुःसाहसी वीरों ने इस
वेग से आक्रमण किया कि शहर में तो क्या, महल तक में जा घुसे। ख़ज़ाना लूटने
की कोशिश होने लगी। लूट ही तो लिया होता परन्तु दुर्भाग्यवश भूल से एक और
दरवाज़ा तोड़ने में बहुत समय नष्ट हो गया, जहाँ कि कुछ व्यर्थ के काग़ज़ों के
150 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
अतिरिक्त उनके हाथ कुछ न लगा और उधर उन्हें शीघ्र ही वहाँ से भागना पड़ा।
8 को मारकर, 15 को घायल कर और कुछ शस्त्र तथा घोड़े लेकर वे वहाँ से चल
निकले। उनके सात साथी मरे और पाँच पकड़े गये अथवा घायल हो गये। उनके
पीछे कोटला के सशस्त्र सैनिक भी भागे और –
A sort of running fight was kept along, shots fired, and many more
Kookas were wounded, till both parties reached the village of Ruir in the
Patiala state; the Kookas carrying most of the wounded with them.
रड़ गाँव के निकटवर्ती जंगल में वे छिप गये। शिवपुर के नायब नाजिम ने उन
पर फिर आक्रमण किया। फिर लड़ाई छिड़ी, परन्तु कूके थके-माँदे थे, भूखे-प्यासे
थे, और थे घायल बिना मरहम-पट्टी के। वे पकड़े गये। 68 व्यक्ति पकड़े गये
थे जिनमें से 28 घायल हो चुके थे।
यही घटना ‘विद्रोह’ कहलाती है। मि. कावन अपने एक पत्र में लिखता है –
It looks like the commencement of an insurrection...
और एक स्थान पर लिखता है –
I propose to execute at once all who were engaged in attacks on
Malodh and Malarkotla. I am sensible of great responsibility in exercising
an authority which is not vested in me, but the case in an exceptional
one. These men are not ordinary criminals. They are rebels, having for
their immediate object the acquisition of plunder, and ulteriorly the sub-
version of order. It is certain that had their first attempts been crowned
with success, had they succeeded in arming themselves with horses and
treasures, they would have been joined by all the abandoned charities
in the country and their extinction would not be effected without much
trouble.
ये 68 व्यक्ति 17 जनवरी को मलेर कोटला लाये गये। उनमें से दो स्त्रियाँ
भी थीं। वे पटियाला स्टेट की नागरिक थीं। उन्हें तो स्टेट के सुपुर्द कर दिया
गया और शेष 66 में से पचास को वहीं तोप से उड़ा देने का निश्चय हो चुका
था। अपनी-अपनी बारी से सानन्द सत्त श्री अकाल आदि जयघोष करते हुए, तोप
के मुँह से बँध जाते। एक बार धमाके की आवाज़ होती और वह कूका वीर इस
संसार से न जाने किधर चला जाता। उन fanatics को मृत्यु का भय नहीं हुआ,
वे हम ‘समझदार’ लोगों की तरह मृत्यु की कल्पना-मात्र से ही थर-थर काँप
नहीं उठे। ऐसे ही ‘मूर्ख’ और कहाँ कितनी संख्या में मिल सकते हैं? उस समय
स्वार्थ के लिए मरने वाले लोग इसी तरह प्रसन्न रह सकते, इसी तरह हँसते हुए
मृत्यु से आलिंगन कर पाते, यह असम्भव जान पड़ता है। आत्मसम्मान, देशहित
तथा स्वतन्त्रता प्राप्ति आदि न जाने किन-किन उच्च भावों की प्रेरणा से वह
मृत्युंजय बन पाये थे। इसी से हम उनकी इस उत्तेजना तथा जल्दबाज़ी को
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 151
भूलकर प्रणम्य समझने में बाधित (को बाध्य) होते हैं। ख़ैर! एक-एक करके
49 तो तोप से उड़ा दिये गये, परन्तु पचासवें ने, जोकि तेरह वर्षीय बालक था,
वहाँ फ़साद खड़ा कर दिया। मि. कावन एक पत्र में लिखता है –
It was my intention to have had 50 men blown away, and to have
sent the remaining 16 rebels to Malodh to be executed there tomorrow,
but one escaped from the guards and made a furious attack on me, seizing
me by the beard and endeavouring to strangle me; and as he was a very
powerful man, I had considerable difficulty in releasing myself...The of-
ficials whom he attacked drew their sword and cut him down.
इसी घटना के सम्बन्ध में जो बात सुनी जाती है वह यूँ है कि 50वाँ व्यक्ति
एक तेरह वर्षीय बालक था। उसे देखकर मिसेज़ कावन को दया आयी। उसने अपने
पति से उसे छोड़ देने को कहा। पत्नी की प्रेरणा से मि. कावन ने झुककर उस
बालक से कहा, “अरे, पाजी राम सिंह का साथ छोड़ दो और कह दो, मैं उसका
अनुयायी नहीं हूँ, तुम्हें छोड़ दिया जायेगा।” वीर बालक अपने गुरु के प्रति यह
अपमानजनक शब्द सहन न कर सका। क्रुद्ध सिंह की तरह वह झपटा और उसने
कावन को दाढ़ी से पकड़ लिया और तब तक न छोड़ा, जब तक उसके दोनों हाथ
न काट दिये गये और तलवारों से क़त्ल न कर दिया गया। अस्तु, इस तरह उस
दुखान्त नाटक का एक और पर्व समाप्त हो गया।
बिना अभियोग चलाये 50 को तोप से उड़ा देना, summary execution कर
देना एकदम अनुचित दीख पड़ता है। उधर मि. फ़ार्सिथ, अम्बाला-कमिश्नर ने उन्हें
एक पत्र में लिख दिया था कि बिना अभियोग चलाये किसी को मृत्युदण्ड मत
देना, परन्तु मि. कावन ने मनमानी कर डाली और जब मि. कावन पर बाद में
मुक़दमा चला तो उन्होंने कमिश्नर साहिब का अगले दिन का पत्र, जिसमें उनके
इस कार्य की प्रशंसा की गयी थी, पेश किया। परन्तु उसके सम्बन्ध में मि. फ़ार्सिथ
का कहना है कि मैंने परिस्थिति नाजुक जान यह उचित समझा कि लोगों को
किंचित-मात्र भी सन्देह न होने पाये कि अफ़सरों में भी आपस में कुछ खेंचातानी
हो रही है। अतः उसके पिछले कार्य की प्रशंसा कर और summary execution
करने से मना कर दिया था। परन्तु शेष 16 व्यक्तियों को भी तो अगले ही दिन
फाँसी पर लटका दिया गया।
उन वीरों की मृत्यु के प्रति उपेक्षा ने अफ़सरों को भी प्रभावित कर दिया था।
Mr. E. Perkinson, Deputy Superintendent Police अपनी 17 जनवरी की रिपोर्ट
में दो व्यक्तियों के सम्बन्ध में लिखते हैं –
Both Hira Singh and Lehna Singh the leaders taken. They are gen-
erally well dressed and well to do men; but have the appearance of bold
and determined looking fellows.
152 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
इधर तो यह सबकुछ हो रहा था, उधर डिप्टी कमिश्नर ने गुरु राम सिंह को
बुलाया और घर लौटा दिया, क्योंकि वह समझता था कि वे निर्दोष हैं, क्योंकि
उन्होंने उन उन्मत्त तथा उत्तेजित कूक़ों की ख़बर देकर पुलिस को चौकन्ना कर
दिया था। गुरु राम सिंह की निर्दोषता के सम्बध में पंजाब सरकार ने भारत सरकार
को यूँ लिखा –
No direct evidence against Ram Singh in this case is sufficient to put
him on this trial.
परन्तु 17 जनवरी को कमिश्नर की आज्ञा से घुड़सवार तथा दूसरी पुलिस ने
कर्नल बायली (Baille) के नेतृत्व में, अध्यक्षता में भैणी नगर को एकाएक घेर
लिया। सब लोगों को यह देखकर बहुत आश्चर्य हुआ, परन्तु जब उन्हें मालूम हुआ
कि सरकार उन्हें पकड़ना चाहती है तब उन्होंने अपनेआप को शान्तिपूर्वक पुलिस
के हवाले कर दिया। उस समय गुरु राम सिंह के साथ चार व्यक्ति, चार विभिन्न
स्थानों के सूबे श्री साहिब सिंह, श्री जवाहर सिंह, श्री गुरुदत्त सिंह तथा श्री तन्नू
सिंह भी थे। उन्हें भी गिरफ़्तार कर लिया गया। उन्हें पहिले तो इलाहाबाद भेजा गया
और बाद में रंगून भेज दिया गया। यह गिरफ़्तारी रेगूलेशन 1818 के अनुसार हुई थी।
यहीं पर गुरु राम सिंह जी की वह चाल उलटी पड़ी। यदि उस समय वे बचे रहते
तो फिर शीघ्र ही सब स्थिति सँभल जाती।
इधर ज्यों-ज्यों प्रान्तभर में विद्रोह का समाचार फैलने लगा, त्यों-त्यों ये लोग
भैणी की ओर जाने लगे। सब लोगों का विचार था कि जिस दिन की प्रतीक्षा थी,
वह आ गया। इधर पुलिस भी चौकन्नी हो गयी थी। जहाँ कोई कूके मिल जाते
वहीं पर उन्हें गिरफ़्तार कर लिया जाता। इसी तरह 172 कूक़ों के एक गुट से कर्नल
बायली की भेंट हो गयी। उनमें से चार तो विभिन्न स्थानों के सूबे – श्री ब्रह्मा सिंह,
श्री काहन सिंह, श्री पहाड़ा सिंह तथा श्री हुकुम सिंह तो तुरन्त पहिले लुधियाना
और फिर गुरु जी के पास इलाहाबाद भेज दिये गये और 120 घरों को लौटा दिये
गये और शेष पचास –
Having no homes and ostensible means of living, being in fact, a
dangerous clan of this sort who having sold all they possessed, hold
themselves in readiness to perform any act that their leaders may order.
– को जेल में बन्द कर दिया गया। इस तरह कुछ ही दिनों में सब मामला
शान्त हो गया।
उसके बाद –
सबकुछ हो चुका। नाटक की मुख्य घटना हो चुकी। अब तो कथा समाप्त
करने को परिशिष्ट-मात्र शेष है। मि. कावन और मि. फार्सिथ पर summary
execution करने का अभियोग चला। उन्होंने पंजाब की भीषण स्थिति का
रोमांचकारी चित्रण करने में कोई कसर उठा न रखी और पुरस्कार पाने की
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 153
आशा प्रकट की। मि. कावन को तो पदच्युत कर इंग्लैण्ड भेज दिया गया और मि.
फार्सिथ को पंजाब से अवध उसी पद पर तब्दील कर दिया। पचास को तोप से
उड़ाने और 16 को फाँसी दे डालने – और वह भी बिना अभियोग चलाये, बिना
उन लोगों को सफ़ाई देने का अवसर दिये – के अपराध की यह सज़ा दी गयी।
Sir Henry Cotton के शब्दों में तो यह दण्ड एकदम अपर्याप्त अथवा नाकाफ़ी था
परन्तु ऐंग्लो इण्डियन समाचारपत्रों ने इतना भी दण्ड देने के विरुद्ध बहुत बवेला
मचाया था।
इधर शेष कूका समाज पर बहुत अत्याचार होने लगे। गुरु राम सिंह के बाद
श्री हरि सिंह गुरु बने। उन्हें भैणी में नज़रबन्द कर दिया गया। गुरुद्वारे के बाहर
पुलिस की चौकी बिठा दी गयी। छह वर्ष तक तो भैणी की ऐसी दशा रही मानो
शत्रु घेरा डाले पड़ा हो। न कोई बाहर से भीतर आ सकता, न कोई भीतर से बाहर
जा पाता। फिर धीरे-धीरे कुछ-कुछ लोगों का आना-जाना खुला। उस समय भी
हरि सिंह बाहर नहीं आ सकते थे – इसके बावजूद कि आने-जाने की आज्ञा हो
गयी थी। आने वाले यात्रियों को बहुत तंग किया जाता था। बुरी तरह अपमानित
किया जाता, मुश्कें कसकर धूप में डाल दिया जाता, जहाँ बेचारों को घण्टों झुलसना
पड़ता। चारपाई के नीचे हाथ दबाकर कई आदमी चारपाई पर बैठ जाते। उन पर
हुक्के का गन्दा बदबूदार पानी डाल दिया जाता। यह सब अत्याचार करने वाले इसी
देश के निवासी होते थे और इन यातनाओं को चुपचाप सहन करने वाले भी इसी
देश के अभागे निवासी। और अब तो यह निरा धार्मिक सम्प्रदाय रह गया था। परन्तु
पंजाब प्रान्त का इतिहास बड़ा रोमांचकारी है। समाज का समाज Outlaws घोषित
हुआ तो पंजाब में, किसी सम्प्रदाय के सभी के सभी लोग भीषण अत्याचारों का
शिकार हुए तो पंजाब में और फिर हज़ारों का सारे का सारा आन्दोलन unlawful
क़रार दिया गया तो पंजाब में। इस बार भी ऐसा ही हुआ। प्रत्येक कूका अपने-अपने
घर में नज़रबन्द था। बिना पुलिस की आज्ञा के कहीं बाहर न जा सकता। आज्ञा
लेने जाने के मानी होते, पुलिस के अकथनीय अत्याचार, तथा अपमान सहन करना
और (कई) दिनों तक भूखे-प्यासे तड़पते रहकर बाहर जाने की आज्ञा पाये बिना
चुपचाप घर आकर बैठ जाना। यह दशा बहुत दिनों तक चली और बन्दिशें तो अब
1920 में आकर असहयोग के दिनों में हटायी गयीं। अस्तु!
गुरु राम सिंह जी बर्मा में ही नज़रबन्द रहे। डि. गजेटियर में लिखा है –
"Finally he died in Burma in 1885". परन्तु 1920 में डस्का निवासी श्री आलम
सिंह इंजीनियर ने एक लेख द्वारा उपरोक्त बात का खण्डन किया था। उन्होंने लिखा
था कि वे दो और साथियों सहित Lower Burma की किसी पोर्ट से लास्ट द्वीप
जा रहे थे। उस पोर्ट का नाम भोलमीन था। वहाँ पर एक दिन एक बड़े तेजस्वी
व्यक्ति को पुलिस की निगरानी में सैर करते देखकर उनके सम्बन्ध में कुछ पूछताछ
154 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
करने पर मालूम हुआ कि ये पंजाब के राजा हैं। वह समझे शायद महाराजा दिलीप
सिंह हों, परन्तु बाद को मालूम हुआ कि वह कूका गुरु राम सिंह जी हैं। उस समय
उनके साथ उनका एक सूबा लक्खा सिंह भी था। उनसे मिलने पर खूब बातचीत
हुई और मालूम हुआ कि उन्हें पाँच मील तक बाहर सैर करने की आज्ञा थी। खैर!
सरकार ने इस लेख का कभी प्रतिवाद भी नहीं किया। जो भी हो, मालूम ऐसा ही
होता है कि गुरु जी अब इस संसार में नहीं हैं, परन्तु कूका लोगों का विश्वास है
कि वे अभी जीवित हैं। खैर!
आज भी पंजाब में कूका सम्प्रदाय विद्यमान है। उनमें ईश्वर-भक्ति का अभी
तक प्राधान्य है। बहुत सवेरे उठकर केशी स्नान कर घण्टों तक भगवद्भजन में लीन
रहना, उनका नित्य नियम है। मांस, मदिरा, आदि वस्तुओं के प्रयोग के कट्टर
विरोधी हैं। एक सीधी पगड़ी, एक लम्बा कुर्ता और एक कच्छा – यही उनका
पहनावा है। एक कम्बल और एक डोलका-सा बना हुआ बड़ा-सा लोटा और एक
टकुआ जिसे वे सफाजंग बोलते हैं – यही उनका सामान है। गले में सूत की बनी
हुई एक सुन्दर माला रहती है। उनमें भी एक विशेष मस्ताना दल होता है। वे
शब्द-कीर्तन करते हुए एकदम सुध-बुध भूल जाते हैं। इन लोगों के संकीर्तन से
प्रत्येक व्यक्ति प्रफुल्लित तथा रोमांचित-सा हो जाता है। खून खौलने लगता है,
आँखों में प्रेम तथा भक्ति के आँसू भर आते हैं।
ग्यारहवें और बारहवें गुरु में विश्वास रखने के कारण तथा मांस, मदिरा के
कट्टर विरोधी होने के कारण वे शेष सिक्ख समाज से जुदा हैं। उनमें समानता का
भाव प्रबल होता है। होली आदि के अवसर पर उनके विशेष उत्सव होते हैं, जहाँ
तक कि खूब होम यज्ञ होता है। शेष सिक्ख इसके विरोधी हैं। कूके अपने को हिन्दू
मानते हैं, शेष सिक्ख नहीं। विगत अकाली आन्दोलन के दिनों में उन्होंने अकालियों
का कुछ विरोध किया था जिससे उनकी स्थिति कुछ ख़राब हो गयी। तथापि वे
अपने ढंग के निराले लोग हैं। उन्हें देख एक उस अधखिले फूल की याद आती
है जो खिलते ही मसल डाला गया हो। गुरु राम सिंह जी की हसरतें दिल-की-दिल
ही में रह गयी थीं। उनके शेष सभी अनुयायियों का आत्मबलिदान भी विस्मृत हो
गया। उन अज्ञात लोगों के बलिदानों का क्या परिणाम हुआ, सो वही सर्वज्ञ भगवान
जाने। परन्तु हम तो उनकी सफलता-विफलता का विचार छोड़ उनके निष्काम
बलिदान की याद में एक बार नमस्कार करते हैं।
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 155
कूका विद्रोह : दो
अक्टूबर, 1928 में 'किरती' मासिक पत्रिका में भगतसिंह ने 'युग पलटने का
अग्निकुण्ड' शीर्षक से पंजाब के तख़्तापलट आन्दोलनों के इतिहास के रूप में लेख
लिखे। यह लेख उन्होंने 'विद्रोही' के नाम से लिखा था। – स.
आज हम पंजाब के तख़्ता पलटने के आन्दोलन और पोलिटिकल जागृति का
इतिहास पाठकों के सामने रख रहे हैं। पंजाब में सबसे पहली पोलिटिकल हलचल
कूका आन्दोलन से शुरू होती है। वैसे तो वह आन्दोलन साम्प्रदायिक-सा नज़र आता
है, लेकिन ज़रा ग़ौर से देखें तो वह बड़ा भारी पोलिटिकल आन्दोलन था, जिसमें
धर्म भी मिला हुआ था, जिस तरह कि सिक्ख आन्दोलन में पहले धर्म और
राजनीति मिली-जुली थी। ख़ैर, हम देखते हैं कि हमारी आपस की साम्प्रदायिकता
और तंगदिली का यही परिणाम निकलता है कि हम अपने बड़े-बड़े महापुरुषों को
इस तरह भूल जाते हैं जैसेकि वे हुए ही न हों। यही स्थिति हम अपने बड़े भारी
महापुरुष 'गुरु' राम सिंह के सम्बन्ध में देखते हैं। हम 'गुरु' नहीं कह सकते और
वे गुरु कहते हैं, इसीलिए हमारा उनसे कोई सम्बन्ध नहीं – आदि बातें कहकर
हमने उन्हें दूर फेंक रखा है। यही पंजाब का सबसे बड़ा घाटा है। बंगाल के जितने
भी बड़े-बड़े आदमी हुए हैं, उनकी हर साल बरसिंयाँ मनायी जाती हैं, सभी
अख़बारों में उन पर लेख दिये जाते हैं, यह समझा जाता है कि मौक़ा मिला तो
इस पर फिर विचार करेंगे और जो मसाला मिला, वह पाठकों के सामने पेश करेंगे।
पंजाब को सोये थोड़े ही दिन हुए थे, लेकिन नींद बड़ी गहरी आयी। हालाँकि
अब फिर होश आने लगा है। बड़ा भारी आन्दोलन उठा। उसे दबाने की कोशिश
की गयी। कुछ ईश्वर ने स्थिति भी ऐसी ही पैदा कर दी – वह आन्दोलन भी
कुचल दिया गया। उस आन्दोलन का नाम था 'कूका आन्दोलन'। कुछ धार्मिक,
कुछ सामाजिक रंग-रूप रखते हुए भी वह आन्दोलन एक तख़्ता पलटने का नहीं,
युग पलटने का था।
चूँकि अब इन सभी आन्दोलनों का इतिहास यह बताता है कि आज़ादी के लिए
लड़ने वाले लोगों का एक अलग ही वर्ग बन जाता है, जिनमें न दुनिया का मोह
होता है और न पाखण्डी साधुओं जैसा दुनिया का त्याग ही। जो सिपाही तो होते
156 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
थे लेकिन भाड़े के लिए लड़ने वाले नहीं, बल्कि सिर्फ अपने फ़र्ज़ के लिए या
किसी काम के लिए कहें; वे निष्काम भाव से लड़ते और मरते थे। सिक्ख इतिहास
यही कुछ था, मराठों का आन्दोलन भी यही कुछ बताता है। राणा प्रताप के साथी
राजपूत भी इसी तरह के योद्धा थे। बुन्देलखण्ड के वीर छत्रसाल के साथी भी ऐसे
थे।
ऐसे ही लोगों का एक वर्ग पैदा करने वाले बाबा राम सिंह ने प्रचार और संगठन
शुरू किया। बाबा राम सिंह का जन्म 1824 में लुधियाना ज़िले के भैणी गाँव में
हुआ। आपका जन्म बढ़ई घराने में हुआ। जवानी में महाराजा रणजीत सिंह की सेना
में नौकरी की। ईश्वर-भक्ति अधिक होने से नौकरी-चाकरी छोड़कर गाँव जा रहे।
नाम का प्रचार शुरू कर दिया।
1857 के ग़दर में जो-जो ज़ुल्म हुए, वे सब देखकर और पंजाब की ग़द्दारी
देखकर कुछ असर ज़रूर हुआ होगा। क़िस्सा यह कि बाबा राम सिंह जी ने उपदेश
शुरू करवा दिया। साथ-साथ बताते गये कि 'फिरंगियों' से पंजाब की मुक्ति बहुत
ज़रूरी है। उन्होंने तब उस असहयोग का प्रचार किया, जैसे वर्षों बाद 1920 में
महात्मा गाँधी ने किया। उनके कार्यक्रम में अंग्रेज़ी राज की शिक्षा, नौकरी, अदालतों
आदि का और विदेशी चीज़ों का बहिष्कार तो था ही, साथ में रेल और तार का
भी बहिष्कार किया गया था।
पहले-पहले सिर्फ नाम का ही उपदेश होता था। हाँ, यह ज़रूर कहा जाता था
कि शराब-मांस का प्रयोग बिल्कुल बन्द कर दिया जाये। लड़कियाँ आदि बेचने
जैसी सामाजिक कुरीतियों के ख़िलाफ़ भी प्रचार होता था, लेकिन बाद में उनका
प्रचार पोलिटिकल रंग में रँगा गया।
पंजाब सरकार के पुराने काग़ज़ों में एक स्वामी रामदास का ज़िक्र आता है,
जिसे कि अंग्रेज़ी सरकार एक पोलिटिकल आदमी समझती थी और जिस पर
निगाह रखी जाती थी। 1857 के बाद जल्द ही उसके रूस की ओर जाने का
पता चलता है। बाद में कोई ख़बर नहीं मिलती। उसी आदमी के सम्बन्ध में कहा
जाता है कि उसने एक दिन बाबा राम सिंह से कहा कि अब पंजाब में राजनीतिक
कार्यक्रम और प्रचार की ज़रूरत है। इस समय देश को आज़ाद करवाना बहुत
ज़रूरी है। तब से आपने स्पष्ट रूप से अपने उपदेश में इस असहयोग को शामिल
कर लिया।
1863 में पंजाब सरकार के मुख्य सचिव रहे टी.डी. फार्सिथ ने अपनी
आत्मकथा में लिखा है कि 1863 में ही मैं समझ गया था कि यह धार्मिक-सा
आन्दोलन किसी दिन बड़ा ग़दर मचा देगा। इसीलिए मैंने भैणी के उस गुरुद्वारे में
ज़्यादा आदमियों का आना-जाना और इकट्ठा होना बन्द कर दिया। इस पर बाबा
जी ने भी अपना काम का ढंग बदल लिया। पंजाब प्रान्त को 22 ज़िलों में बाँट
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 157
लिया। प्रत्येक ज़िले में एक-एक व्यक्ति प्रमुख नियत किया गया, जिसे 'सूबा'
कहा जाता था। अब उन्होंने 'सूबों' में प्रचार और संगठन का काम शुरू कर दिया।
गुप्त तरीक़ों से आज़ादी का भी प्रचार जारी रखा। संगठन बढ़ता गया, प्रत्येक
नामधारी सिख अपनी आय का दसवाँ हिस्सा अपने धर्म के लिए देने लगा। बाहर
का हंगामा बन्द हो जाने से सरकार का शक दूर हो गया और 1869 में सभी बन्दिशें
हटा ली गयीं। बन्दिशें हटते ही ख़ूब जोश बढ़ा।
एक दिन कुछ कूके अमृतसर में से जा रहे थे। पता चला कि कुछ कसाई
हिन्दुओं को तंग करने के लिए उनकी आँखों के सामने गोहत्या करते हैं। गाय के
तो वे बड़े भक्त थे। रातों-रात सभी कसाइयों को मार डाला और भैणी का रास्ता
पकड़ा। बहुत-से हिन्दू पकड़े गये। गुरु जी ने पूरी कहानी सुनी। सबको लौटा दिया
कि निर्दोष व्यक्तियों को छुड़ायें और अपना अपराध मान लें। यही हुआ और वे लोग
फाँसी चढ़ गये। ऐसी ही कोई घटना फ़िरोज़पुर ज़िले में भी हो गयी। फाँसियों से
जोश और बढ़ गया। उस समय उन लोगों के सामने आदर्श था पंजाब में सिख-राज
स्थापित करना और गोरक्षा को वे अपना सबसे बड़ा धर्म मानते थे। इसी आदर्श की
पूर्ति के लिए वे प्रयत्न करते रहे।
13 जनवरी, 1872 को भैणी में माघी का मेला लगने वाला था। दूर-दूर से
लोग आ रहे थे। एक कूका मलेर कोटला से गुज़र रहा था। एक मुसलमान से झगड़ा
हो जाने से वे उसे पकड़कर कोतवाली में ले गये और उसे बहुत मारा-पीटा व एक
बैल की हत्या उसके सामने की गयी। वह बेचारा दुखी हुआ, भैणी पहुँचा। वहाँ
जाकर उसने अपनी व्यथा सुनायी। लोगों को बहुत जोश आ गया। बदला लेने का
विचार ज़ोर पकड़ गया। जिस विद्रोह का भीतर ही भीतर प्रचार किया गया था, उसे
कर देने का विचार ज़ोर पकड़ने लगा, लेकिन अभी मनचाही तैयारी भी नहीं हुई
थी। बाबा राम सिंह ऐसी स्थिति में क्या करते? यदि उन्हें मना करते हैं तो वे मानते
नहीं और यदि उनका साथ देते हैं तो सारा किया-धरा तबाह होता है। क्या करें?
आख़िर जब 150 आदमी चल ही पड़े तो आपने पुलिस को ख़बर भेज दी कि ये
व्यक्ति हंगामा कर रहे हैं और शायद कुछ ख़राबी करें, मैं ज़िम्मेदार नहीं हूँ। ख़याल
था कि हज़ारों आदमियों के संगठन में से सौ-डेढ़ सौ आदमी मारे गये (जायें) और
बाक़ी संगठन बचा रहा तो यह कमी तो फिर पूरी हो जायेगी और जल्द ही फिर
पूरी तैयारी होने से विद्रोह हो सकेगा। लेकिन हम यह देखते हैं कि दुनिया में 'end
Justifies the means' (परिणाम से ही तय होता है कि तरीक़े जायज़ थे या
नाजायज़) का सिद्धान्त राजनीति के मैदान में प्रायः लागू होता है। अर्थात यदि
सफलता मिल जाये तब तो चालें नेकनियती से भरी और सोच-समझकर चली गयी
कहलाती हैं और यदि कभी मिले असफलता तो बस फिर कुछ भी नहीं। नेताओं
को बेवकूफ़, बदनीयत आदि ख़िताब मिलते हैं। यही बात हम देखते हैं। जो चाल
158 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
बाबा राम सिंह ने अपने आन्दोलन से बचने के लिए चली, वह क्योंकि सफल नहीं
हुई, इसीलिए अब कोई उन्हें कायर और बुज़दिल कहता है और कोई बदनीयत व
कमज़ोर बताता है। ख़ैर।
हम तो समझते हैं कि वह राजनीति की एक चाल थी। उन्होंने पुलिस को
ख़बर कर दी ताकि वे कोई ऐसा इलाज कर लें जिससे कोई बड़ी ख़राबी पैदा न
हो, लेकिन सरकार उनके इस बड़े भारी आन्दोलन से बहुत डरती थी और उसे
पीस देने का अवसर खोज रही थी। उसने कोई ख़ास कार्यवाही न की और उन्हें
मर्ज़ी अनुसार जाने दिया।
लेकिन 11 जनवरी के पत्र में डिप्टी कमिश्नर लुधियाना मि. कावन ने यह
बात कमिश्नर को लिख भेजी कि राम सिंह ने उन लोगों से अपने सम्बन्ध न होने
की बात ज़ाहिर की है और उनके सम्बन्ध में हमें सावधान भी कर दिया है। ख़ैर!
वे 150 नामधारी सिंह बड़े जोश-ख़रोश में चल पड़े।
जब वे 150 व्यक्ति वहाँ से बदला लेने के विचार से चल पड़े, तो पुलिस
को पहले से बताया जा चुका था, लेकिन सरकार ने कोई इन्तज़ाम नहीं किया।
क्यों? क्योंकि वे चाहते थे कि कोई छोटी-मोटी गड़बड़ हो जाये और बहाना मिल
जाये, जिससे कि वे उस आन्दोलन को पीस दें। सो वह अब मिल गया।
वे कूके वीर उस दिन तो पटियाला राज्य की सीमा पर एक गाँव रब्बों में
पड़े रहे। अगले दिन भी वे वहीं टिके रहे। 14 जनवरी, 1872 की शाम को
उन्होंने मलोध के क़िले पर धावा बोल दिया। यह क़िला कुछ सिख सरदारों का
था, लेकिन इन्होंने इस पर हमला क्यों किया? इस सम्बन्ध में डिस्ट्रिक्ट गजेटियर
में लिखा है कि उन्हें उम्मीद थी कि मलोध सरकार उनके विद्रोह की नेता
बनेगी, लेकिन उन्होंने मना कर दिया और इन्होंने हमला कर दिया। बहुत सम्भव
है कि बाबा राम सिंह की बड़ी भारी तैयारी में मलोध सरकार ने मदद देने का
वायदा किया हो, लेकिन जब उन्होंने देखा कि विद्रोह तो पहले ही हो गया है
और बाबा राम सिंह भी साथ नहीं हैं और पूरी संगत भी नहीं बुलायी गयी है
तो उन्होंने मना कर दिया होगा। ख़ैर! जो भी हो, वहाँ लड़ाई हुई। कुछ घोड़े,
हथियार और तोपें ले वे वहाँ से चले गये। दोनों ओर के दो-दो आदमी मारे गये
और कुछ घायल हुए।
अगले दिन सवेरे 7 बजे वे मलेर कोटला पहुँच गये। अंग्रेज़ी सरकार ने मलेर
कोटला सरकार को पहले ही सूचित कर रखा था। उधर बड़ी तैयारियाँ की गयी
थीं। सेना हथियार लिये खड़ी थी, लेकिन इन लोगों ने इतनी बहादुरी से हमला
किया कि सेना और पुलिस के कुछ वश में न रहा। हमला कर वे शहर में घुस
गये और जाकर महल पर हमला कर दिया। वहाँ भी सेना उन्हें रोक न सकी। वे
जाकर ख़ज़ाना लूटने की कोशिश करने लगे। लूट ही लिया जाता, लेकिन दुर्भाग्य
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 159
से वे एक और दरवाज़ा तोड़ते रहे, जिससे कि उनका बहुत-सा समय नष्ट हो गया
और भीतर से कुछ भी न मिला।
उधर से सेना ने बड़े ज़ोर से धावा बोला। आख़िर लड़ते-लड़ते वहाँ से लौटना
पड़ा। उस लड़ाई में उन्होंने 8 सिपाही मारे और 15 को घायल किया। उनके सात
आदमी मारे गये। वहाँ से भी कुछ हथियार और घोड़े लेकर भाग निकले। आगे-आगे
वे और पीछे-पीछे मलेर कोटला की सेना और –
"A sort of running fight was kept along. Shots fired and many more
Kookas were wounded till both the parties reached the village of Rur in
the Patiala State, the Kookas carrying most of the wounded with them."
यानी भागते जा रहे थे। और लड़ते जा रहे थे। उनके और कई आदमी घायल
हो गये और वे उन्हें भी साथ ही उठा ले जाते थे। आख़िर पटियाला राज्य के रूड़
गाँव में ये पहुँचे और जंगल में छिप गये। कुछ घण्टों के बाद शिवपुर के नाज़िम
ने फिर हमला बोल दिया। लड़ाई छिड़ गयी पर बेचारे कूके थके-हारे थे। आख़िर
68 व्यक्ति पकड़ लिये गये। उनमें से दो औरतें थीं, वे पटियाला राज को दे दी
गयीं।
इसी बात को विद्रोह कहा जाता है। डिप्टी कमिश्नर लुधियाना मि. कावन ने
एक पत्र में कहा था –
"It looks like the commencement of an insurrection..."
यानी यह एक विद्रोह की तरह नज़र आता है।
अगले दिन मलेर कोटला लाकर तोप गाड़ दी गयी और एक-एक कर 50
कूके वीर तोप के आगे बाँध-बाँधकर उड़ा दिये गये। हरेक बहादुरी से
अपनी-अपनी बारी पर तोप के आगे झुक जाता और सत्त श्री अकाल कहता हुआ
तोप से उड़ जाता। फिर कुछ पता नहीं चलता कि वह किस संसार में चला गया।
इस तरह 49 व्यक्ति उड़ा दिये गये। पचासवाँ एक तेरह वर्ष का लड़का था। उसके
पास झुककर डिप्टी कमिश्नर ने कहा कि बेवकूफ़ राम सिंह का साथ छोड़ दे,
तुम्हें माफ़ कर दिया जायेगा। लेकिन वह बालक यह बात सहन नहीं कर सका और
उछलकर उसने कावन की दाढ़ी पकड़ ली और तब तक न छोड़ी जब तक उसके
दोनों हाथ न काट दिये गये। बाक़ी 16 आदमी अगले दिन मलोध जाकर फाँसी
पर लटका दिये गये। उधर बाबा राम सिंह को उनके चार सूबों के साथ गिरफ़्तार
करके पहले इलाहाबाद और बाद में रंगून भेज दिया गया। यह गिरफ़्तारी (रेगूलेशन)
1818 के अनुसार हुई थी।
जब यह ख़बर देश में फैली तो और लोग बहुत हैरान हुए कि यह क्या बना।
विद्रोह शुरू करके बाबाजी ने हमें भी क्यों न बुलाया और सैकड़ों लोग घर-बार
छोड़कर भैणी की ओर चल पड़े। एक गिरोह जिसमें कि 172 आदमी थे, कर्नल
160 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
बायली से मिला। वह अधीक्षक था। उसने झट उन्हें गिरफ़्तार करवा लिया। उनमें
से 120 को तो घरों को लौटा दिया, लेकिन 50 ऐसे थे जिनका कोई घरबार नहीं
था। वे सब सम्पत्ति आदि बेच-बाचकर लड़ने-मरने के लिए तैयार होकर निकले
थे। उन्हें जेल में डाल दिया गया। इस तरह वह आन्दोलन दबा दिया गया और बाबा
राम सिंह का पूरा यत्न निष्फल हो गया। बाद में देश में जितने कूके थे, वे सभी
एक तरह से नज़रबन्द कर दिये गये। उनकी हाज़िरी ली जाती थी। भैणी साहिब
में आम लोगों का आना-जाना बन्द कर दिया गया। ये बन्दिशें 1920 में आकर
हटायी गयीं।
यही पंजाब की आज़ादी के लिए दी गयी सबसे पहली कोशिश का संक्षिप्त
इतिहास है।
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 161
सम्पादक 'महारथी' के नाम पत्र
शहनशाही कुटिया
सूत मण्डी, लाहौर
27.2.1928
सम्पादक जी, सादर वन्दे!
आपका 17.2.1928 का कृपा पत्र व 'महारथी' के फ़रवरी अंक की एक प्रति
भी समय से मिल गयी थी। इसके लिए मेरा हृदय से आभार स्वीकार करें। आपने
गुरु राम सिंह जी का तीन रंगों वाले चित्र का फ़ोटो बनवाया या नहीं। मुझे यहाँ
पता लगा कि फ़ोटो तो कम से कम आपने अभी प्रकाशित नहीं किया। मैं समझता
हूँ कि चित्रों के बग़ैर इन लेखों की महानता कम हो जाती है। बाक़ी, लेख जो जल्दी
ही आपकी सेवा में भेजूँगा, सचित्र ही छपने चाहिए। बहुतों के तो ब्लॉक बने हुए
ही मिल सकेंगे। उनका डाक ख़र्च व कुछ माया ही देनी होगी। यदि आप उचित
समझो तो लिखें, मैं प्रबन्ध करवा दूँगा। अभी गुरु राम सिंह जी की एक और फ़ोटो
भेज रहा हूँ। एक सज्जन कह रहे थे कि ब्लॉक उनके पास है। यदि आप चाहो
तो वे भी छपवाकर भेज सकते हैं। कृपा करके यह लिखें कि कितनी फ़ोटोज़ की
ज़रूरत होगी। यह तो 'महारथी' की कुल संख्या पर निर्भर करता है।
लेख पर लेख पड़े हुए हैं किन्तु यहाँ राष्ट्रीय सप्ताह कर शहीदी दिवस मनाने
का प्रबन्ध किया जा रहा है। इसलिए तब तक यदि लेख न भेज सका तो कृपया
क्षमा कर दीजियेगा। हो सका तो पहला लेख एक सप्ताह तक भेज दूँगा। 'महारथी'
का अगला अंक कितने दिनों तक छप जायेगा? लेख और फ़ोटो कब तक पहुँच
जाने चाहिए? लिखें ज़रूर। जवाब जल्द देकर आभारी बनायें।
निवेदक
भगतसिंह
162 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
चित्र-परिचय
मार्च, 1928 के 'महारथी' में कूका आन्दोलन पर एक लेख छपा था। उसी
के साथ दो चित्रों का चित्र-परिचय भगतसिंह ने लिखा था। यह परिचय 'महारथी'
से लिया गया है। – स.
इस बार बहुरंग चित्र गुरु राम सिंह जी का है। उनका परिचय विस्तारपूर्वक गत अंक
और इस अंक में दिया जा चुका है। वही पर्याप्त है। हाँ, विशेष उल्लेखनीय दो रंगीन
चित्र हैं। एक तो इटली के नवयुवकों का – प्रत्येक बालक मुसोलिनी बनने का
प्रयत्न कर रहा है। भारत में भी चार दिन के लिए स्काउट दल, महावीर दल और
स्वयं-सेवक दल बने थे, अखाड़े स्थापित हुए थे परन्तु वह सब दूध का उफान
रहा। नेताओं को चाहिए कि कौंसिलों में स्पीचें झाड़ने की अपेक्षा इन भावी नेताओं
को कुछ बनायें।
दूसरा चित्र हुनर-नगर का है जो एक विशेष (आयोजन के) रूप में बम्बई में
हुआ था। हमें विस्मय होता है, जब हम इस विशाल हुनर-नगर की और गरीब, गँवार
कारीगरों की दशा की तुलना करते हैं। इन हुनर-प्रदर्शनियों पर जितना रुपया उजाड़ा
जाता है उसका शतांश भी तो कारीगरी की वास्तविक उन्नति में नहीं लगाया जाता।
हम पूछते हैं – कितने कारीगरों को धन एवं अधिकार से सहायता देकर समाज
अथवा सरकार अपना काम बढ़ाने का अवसर देती है? कितने मुहल्लों, बाज़ारों,
नगरों अथवा शहरों में हुनर-शालाएँ खोली जा रही हैं? कितने कारीगरों की
प्रतियोगिता करायी जाती है? और कितने नवयुवकों को भिन्न-भिन्न हुनर सीखने
की छात्रवृत्ति देकर हुनर सीखने को प्रोत्साहित किया जाता है? हिन्दू सभाएँ और
कांग्रेस मण्डल खोलने की अपेक्षा हुनर-शालाएँ स्थापित करने में हमें अपनी सब
शक्तियों को लगा देना चाहिए। कारीगरी ही हमको बेकारी, पराधीनता और निर्धनता
से बचा सकती है।
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 163
श्री मदनलाल ढींगरा
शहीद भगतसिंह ने 'किरती' में मार्च, 1928 से अक्टूबर 1928 तक 'आज़ादी
की भेंट शहादत' शीर्षक से एक लेखमाला लिखी। अगस्त, 1928 के 'किरती' में
इस लेखमाला का उद्देश्य इस रूप में बताया गया - "हमारा इरादा है कि उन
जीवनियों को उसी तरह छापते हुए भी उनके आन्दोलनों का क्रमशः हाल लिखें ताकि
हमारे पाठक यह समझ सकें कि पंजाब में जागृति कैसे पैदा हुई और फिर काम कैसे
होता रहा और किन कामों के लिए, किन विचारों के लिए उन शहीदों ने अपने प्राण
तक अर्पित कर दिये।" - स.
अब फिर यह बताने की ज़रूरत नहीं कि भारतवर्ष की आज़ादी के लिए जितनी
कुर्बानी पंजाब प्रान्त ने की है, उतनी किसी और प्रान्त ने नहीं की। बीसवीं सदी
के शुरू होने के साथ ही भारत में एक बार नयी अशान्ति की लहर दौड़ गयी,
जिसका परिणाम स्वदेशी-आन्दोलन की शक्ल में प्रकट हुआ। तब भी पंजाब ही
बंगाल का साथ दे सका था। गुलामी की ज़ंजीरें दिनोदिन जकड़ी देखकर जब दर्द
शुरू हुआ तब बहुत-से नौजवान अपने देशप्रेम में पागल हुए दिलों को केवल
लेक्चरबाज़ी और प्रस्तावबाज़ी-मात्र से सन्तोष न दे सके और कुछ दिल-जले लोगों
ने युग पलट आन्दोलन चलाया। यह आन्दोलन उन देशप्रेमी युवकों को अपनी ओर
खींचने में सफल हो गया और इन परवानों ने स्वतन्त्रता देवी के चरणों में अपने
जीवन तक बलिदान कर दिये और मुर्दा देश को फिर मृत्यु के प्रति निर्भयता
दिखाकर पुराने बुजुर्गों की याद ताज़ा कर दी।
यह युग पलटने वाले या विद्रोही लोग कैसे विचित्र होते हैं, इसका कुछ वर्णन
बंगाल के विद्रोही कवि नज़रुल इस्लाम ने अपनी 'विद्रोही' कविता में किया है।
मौत के हाथ में हाथ डालकर खेल करने वाले, ग़रीबों के सहायक, आज़ादी के
रक्षक, गुलामी के दुश्मन, ज़ालिमों, अत्याचारियों और मनमानी करने वाले शासकों
के शत्रु इन विद्रोही वीरों के दिल का, मन का, स्वभाव का, इच्छा का बड़ा सुन्दर
चित्र उन्होंने अपनी कविता में खींचा है। पहले ही वे कहते हैं -
बोलो बीर -
चिर उन्नत मम शीर
164 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
शिर नेहारि आमारि
नत शिर ओई शिखर हिमाद्रीय!
यानी हे विद्रोही वीर! तुम एकदम यह कहते हो कि मैं कब से सिर उठाये
खड़ा हूँ। मेरा ऊँचा सिर देखकर हिमालय ने भी अपना सिर शर्म के मारे झुका दिया।
आगे जाकर उसकी सख़्ती और नरमी का वर्णन किया है। कहीं वह मौत से
(के साथ) नाच कर रहा है, कहीं वह संसार का एक ही बार सर्वनाश करने पर
तुला हुआ है। वह बिजली की तरह चमकता है। वह संगीत की तरह मीठा है।
विधवा, गुलाम, मज़लूम, ग़रीब, भूखे और पीड़ित लोगों में बैठकर वह लगातार रोता
रहता है। ऐसे विचित्र जीव की विचित्र महिमा का वर्णन करते हुए अन्त में वे
विद्रोही के मुँह से कहलवाते हैं –
महा विद्रोही रणक्लान्त
आमि शेई दिन हँबो शान्त,
जबे उत्पीडि़तेर क्रन्दन-रोल
आकाशे बातासे ध्वनिबे ना
अत्याचारीर खड्ग कृपाण
भीम रणभूमे रणिबे ना
विद्रोही रणक्लान्त
आमि शेई दिन हँबो शान्त!
अर्थात्, मैं विद्रोही अब लड़ाई से थक गया हूँ। और मैं भी उसी दिन शान्त
हो जाऊँगा जिस दिन किसी दुखी की आह या चीत्कार आकाश में जाकर आग
न लगा सकेगा, यानी कोई दुखी न रहेगा, और जब ज़ालिमों, अत्याचारियों की
भयानक तलवार मैदान में चलनी बन्द हो जायेगी, यानी बाक़ी ही न रहेंगी, तब,
और तभी मैं शान्त हो सकूँगा और हो भी जाऊँगा।
ऐसे विचित्र विद्रोही जीव जो पूरे विश्व से टकरा जाते हैं और स्वयं को जलती
आग में झोक देते हैं, अपना ऐशो-आराम सब भूल जाते हैं और दुनिया की सुन्दरता,
श्रृंगार में कुछ वृद्धि कर देते हैं और उनके बलिदानों से ही विश्व में कुछ प्रगति होती
है। ऐसे ही वीर हर देश में हर समय होते हैं। हिन्दुस्तान में भी यही पूजनीय देवते
जन्म लेते रहे हैं, ले रहे हैं और लेते रहेंगे। हिन्दुस्तान में से भी पंजाब ने ऐसे रत्न
अधिक दिये हैं, बीसवीं शती के ऐसे ही सबसे पहले शहीद श्री मदनलाल जी
ढींगरा हैं।
वे कोई लीडर तो थे नहीं कि उनके जीते-जी उनका जीवन-चरित्र छापकर
दो-दो आने में बिक जाता। वे अवतार भी नहीं थे कि ज्योतिष से बताकर शोर मचा
दिया जाता कि हम तो पहले ही समझ गये थे कि वे बहुत ‘बड़े’ आदमी थे। उनकी
किन्हीं ऐसी बातों का भी हमें पता नहीं कि हम लिख सकें कि ‘होनहार बिरवान
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 165
के होत चीकने पात।'
वह ग़रीब और एक बदक़िस्मत विद्रोही था। उसके पिता ने उसे अपना पुत्र
मानने से इन्कार कर दिया था। देशभक्त और खुशामदी सभी अख़बारों में और उस
समय के गर्म नेता बिपिनचन्द्र पाल तक ने उन्हें कोस-कोसकर गालियाँ दीं। तो
फिर बताओ इन हालात में, आज बीस साल बाद उनके बारे में तथ्यों को फिर से
इकट्ठा करने की कोशिश में किसी को कितनी सफलता मिल पायेगी?
इन कठिनाइयों में हम आज उनका जीवन-वृतान्त लिखने बैठ गये हैं।
धीरे-धीरे हम लोग, उनका नाम भी न भूल जायें, यही सोचकर आज उनके बारे
में जैसे भी तथ्य मिल सकते हैं, यह वृतान्त पाठकों के सामने रख रहे हैं।
आप शायद अमृतसर के रहने वाले थे। घर से अच्छे थे। बी.ए. पास कर पढ़ने
के लिए इंग्लैण्ड चले गये। कहा जाता है कि वहाँ आप कुछ अय्याशी में फँस गये।
यह बात यक़ीन से नहीं कही जा सकती, लेकिन यह कोई अनहोनी बात भी नहीं
है। उनका मन बड़ा रसिक व भावुक था, इस बात का प्रमाण भी मिलता है।
इंग्लैण्ड के ख़ुफ़िया विभाग (Scotland Yard) के एक प्रसिद्ध जासूस श्री ई.टी.
वुडहॉल ने (Union Jack) यूनियन जैक नामक साप्ताहिक अख़बार में अपनी डायरी
छापी थी। मार्च, 1925 के अंक में उन्होंने श्री मदनलाल ढींगरा का हाल लिखा
है। यह जासूस उनके पीछे लगाया गया था। वह लिखता है —
"Dhingra was an extraordinary man. Dhingra's passion for flowers
was remarkable."
यानी ढींगरा एक असाधारण व्यक्ति था। ढींगरा का फूलों के प्रति ज़बरदस्त
लगाव था। आगे जाकर उन्होंने लिखा है कि वे बाग़ के किसी सुन्दर कोने में जाकर
बैठ जाते थे और घण्टों तक फूलों को एक कवि की तरह मस्त होकर निहारते रहते
और कभी उनकी आँखों से बड़ी तेज़ चमक कौंध उठती थी। उसी चमक को
देखकर ई.टी. वुडहॉल उस्ताद सिकलाहिन आगे लिखता है —
"There is a man to keep an eye on. He will do something desperate
someday."
यानी उस व्यक्ति पर आँख रखनी चाहिए। किसी न किसी दिन वह कुछ
धमाका करेगा। ख़ैर।
हम बात कर रहे थे कि वे शायद अय्याशी में फँस गये। उस कहानी के आगे
यों कि फिर स्वदेशी आन्दोलन का असर इंग्लैण्ड तक भी पहुँचा और जाते ही
श्री सावरकर ने इण्डियन हाउस नामक सभा खोल दी। मदनलाल भी उसके सदस्य
बने।
इधर हिन्दुस्तान में खुले आन्दोलन को दबाने के कारण युग-पलट लोगों ने
ख़ुफ़िया सोसाइटियाँ स्थापित कर लीं। यहाँ तक कि 1908 में अलीपुर की साज़िश
166 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
का मुक़दमा बन गया। श्री कन्हाई और श्री सतेन्द्रनाथ को फाँसी मिल गयी। धीरेन्द्र
और उल्लासकर दत्त को भी उसी समय फाँसी की सज़ा सुनायी गयी थी। ये ख़बरें
इंग्लैण्ड में भी पहुँचीं और इन गरम नौजवानों में आग लग गयी। वे कहते हैं कि
एक दिन रात को श्री सावरकर और मदनलाल ढींगरा बहुत देर तक मशवरा करते
रहे। अपनी जान तक दे देने की हिम्मत दिखाने की परीक्षा में मदनलाल को ज़मीन
पर हाथ रखने के लिए कहकर सावरकर ने हाथ पर सुआ गाड़ दिया, लेकिन
पंजाबी वीर ने आह तक न भरी। सुआ निकाल लिया गया। दोनों की आँखों में आँसू
भर आये। दोनों एक-दूसरे के गले लग गये। आहा, वह समय कैसा सुन्दर था! वह
अश्रु कितने अमूल्य व अलभ्य थे। वह मिलाप कितना सुन्दर, कितना महिमामय
था! हम दुनियादार क्या जानें, मौत के विचार तक से डरने वाले हम कायर लोग
क्या जानें कि देश की ख़ातिर क़ौम के लिए प्राण दे देने वाले वे लोग कितने ऊँचे,
कितने पवित्र और कितने पूजनीय होते हैं।
अगले दिन से ढींगरा फिर इण्डियन हाउस, सावरकर वाली सभा में नहीं गये
और भारतीय विद्यार्थियों और विशेष खुफ़िया पुलिस का प्रबन्ध करने वाले और
उनकी छोटी-मोटी आज़ादी को कुचलने वाले सर कर्जन बायली, जोकि
Secretary of State for India के एड-डी-कांप Aid-de-Camp थे, द्वारा चलायी
हिन्दुस्तानी विद्यार्थियों की सभा में जा शामिल हुए। यह देखकर इण्डियन हाउस
वाले लड़कों को बड़ा जोश आया और उन्होंने उन्हें देशघातक, देशद्रोही तक कहना
शुरू कर दिया, लेकिन उनका गुस्सा भी तो सावरकर ने यह कहकर शान्त किया
कि आख़िर उन्होंने हमारी सभा को चलाने के लिए भी तो सर तोड़ प्रयत्न किया
था और उनकी मेहनत के फलस्वरूप ही हमारी सभा चल रही है, इसलिए हमें
उनका धन्यवाद करना चाहिए। ख़ैर। कुछ दिन तो चुपचाप गुज़र गये।
1 जुलाई, 1909 को इम्पीरियल इंस्टीच्यूट के जहाँगीर हॉल में एक बैठक
थी। सर कर्जन बायली भी वहाँ गये हुए थे। वे दो और लोगों से बातें कर रहे थे
कि अचानक ढींगरा ने पिस्तौल निकालकर उनके मुँह की ओर तान दीं। कर्जन
साहिब की डर के मारे चीख़ निकल गयी, लेकिन कोई इन्तज़ाम होने से पहले
ही मदनलाल ने दो गोलियाँ उनके सीने में मारकर उन्हें सदा की नींद सुला
दिया। फिर कुछ संघर्ष के बाद वे पकड़े गये। बस फिर क्या था, दुनियाभर में
सनसनी मच गयी। सब लोग उन्हें जी-भरकर गालियाँ देने लगे। उनके पिता ने
पंजाब से तार भेजकर कहा कि ऐसे बाग़ी, विद्रोही और हत्यारे आदमी को मैं
अपना पुत्र मानने से इन्कार करता हूँ। भारतवासियों ने बड़ी बैठकें कीं। बड़े-बड़े
भाषण हुए। बड़े-बड़े प्रस्ताव पास हुए। सब उनकी निन्दा में। पर उस समय भी
एक सावरकर वीर थे, जिन्होंने खुल्लमखुल्ला उनका पक्ष लिया। पहले तो उनके
ख़िलाफ़ प्रस्ताव न पास होने देने के लिए यह बहाना पेश किया कि अभी तक
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 167
उन पर मुक़दमा चल रहा है और हम उन्हें दोषी नहीं कह सकते। आख़िर में जब
इस प्रस्ताव पर वोट लेने लगे तो सभा के अध्यक्ष श्री बिपिनचन्द्र पाल यह कह
ही रहे थे कि क्या यह सभी की सर्वसम्मति से पास समझा जाये, तो सावरकर
साहब उठ खड़े हुए और आपने व्याख्यान शुरू कर दिया। इतने में ही एक अंग्रेज़
ने इनके मुँह पर घूँसा मार दिया और कहा – "Look! how straight the
English fist goes." एक, हिन्दुस्तानी नौजवान ने उस अंग्रेज़ के सिर पर एक
लाठी जड़ दी और कहा – "Look! how straight the Indian club goes!"
यानी, “देखा, यारों का हिन्दुस्तानी डण्डा कैसे ठिकाने पर पड़ता है!” शोर मच
गया। बैठक बीच में ही छूट गयी। प्रस्ताव भी ऐसे ही रह गया। ख़ैर।
मुक़दमा चल रहा था। मदनलाल बड़े खुश थे। बड़े शान्त थे। सामने दर पर
मौत खड़ी देखकर भी वे मुस्कुरा रहे थे। वे निर्भय थे। आहा! वे वीर विद्रोही थे।
आपने अन्त में जो बयान दिया वह आपकी नेक-दिली, आपकी देशभक्ति और
योग्यता का बड़ा भारी सबूत है। हम उनके ही शब्दों में देते हैं। यह 12 अगस्त के
'Daily News' (डेली न्यूज़) में छपा था –
"I admit the other day, I attempted to shed blood as an humble
revenge for the inhuman hangings and deportations of patriotic Indian
youth. In the attempt I have consulted none but my own conscience, I
have conspired with none but my duty."
"I believe that a nation held down by foreign bayonet is in a per-
petual state of war. Since open battle is rendered impossible to disarmed
races, I attacked by surprise, since guns were denied to me I drew forth
my pistol and fired."
"As an Hindu, I fell that wrong to my country is insult to God. Her
cause is the cause of Shri Rama, her service is the service of Shri Krishna.
Poor in wealth and intellect, a son like myself has nothing else to offer
but his own blood, and so I have sacrificed the same on her altar."
"The only lesson required in India at present is to learn how to die,
and the only way to teach it is by dying ourselves. Therefore I die and
I glory in my martyrdom."
"This war will continue, as long as the Hindu and English races last
if this present unnatural relation does not cease."
My only prayer to God is—"May I be reborn of the same mother
and may I redie in the same sacred casue, till the cause is successful,
and she stands free for the good of humanity and to the glory of God,—
Bande Matram."
अर्थात, मैं मानता हूँ कि मैंने उस दिन एक अंग्रेज़ का ख़ून किया और कहता
168 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़
हूँ कि यह उन निर्दयता भरी सज़ाओं का मामूली-सा बदला है जोकि हिन्दुस्तानी
देशभक्त नौजवानों को फाँसी और कालेपानी की दी गयी हैं। मैंने इस काम में अपने
ज़मीर के सिवा किसी और की सलाह नहीं ली। अपने फ़र्ज़ के सिवाय किसी से
साज़िश नहीं की।
मेरा यह विश्वास है कि एक राष्ट्र, जिसे विदेशी लोगों ने बन्दूकों से दबाया
हो, वह हमेशा युद्ध की स्थिति में होता है और चूँकि हथियार छीनकर खुली
लड़ाई असम्भव बना दी जाती है, मैंने छिपकर बिना बताये हमला किया है।
क्योंकि हमें बन्दूकें रखने से मना किया जाता है, इसीलिए मैंने पिस्तौल खींच
लिया और चला दिया।
मैं एक हिन्दू के रूप में समझता हूँ कि मेरे देश के साथ किया गया अन्याय
ईश्वर का अपमान है, क्योंकि देश की पूजा श्री रामचन्द्र जी की पूजा है और देश
की सेवा श्रीकृष्ण जी की सेवा है।
एक ग़रीब और मूर्ख, मेरे जैसे नौजवान के पास अपनी माता की सेवा में भेंट
करने के लिए अपने रक्त के सिवाय और क्या हो सकता है? सो मैंने अपना रक्त
माता के चरणों में चढ़ाया है।
इस समय यदि हिन्दुस्तान को किसी सबक की ज़रूरत है तो यह कि मरना
कैसे चाहिए। और इसे सिखाने का तरीक़ा है कि हम खुद मरकर दिखायें। इसीलिए
मैं मर रहा हूँ। इसीलिए मुबारक हो शहीदाना मौत।
यह लड़ाई तब तक जारी रहेगी जब तक हिन्दुस्तानी और अंग्रेज़ दो राष्ट्र रहेंगे
और इनका यह अस्वाभाविक गठबन्धन बना रहेगा। मेरी ईश्वर के आगे यही प्रार्थना
है कि मैं फिर इसी माँ की गोद से जन्म लूँ और जब तक वह स्वतन्त्र न हो जाये
और मानव-समाज की पूर्ण सेवा और उन्नति योग्य न बन जाये, मैं यहीं जन्मता
रहूँ और मरता रहूँ।
– वन्देमातरम्!
16 अगस्त, 1909 का दिन भी इतिहास में याद रहेगा। उस दिन इंग्लैण्ड में
हिन्दुस्तानी युग-पलट पार्टी की आवाज़ गूँजाने वाला ढींगरा वीर अपनी मतवाली
चाल चलता हुआ तख़्ते पर जा चढ़ा था। श्रीमती एग्निस स्मेडले एक जगह इस
घटना का ज़िक्र करती हुई लिखती हैं –
"He walked to the scaffold with his head high and shook off hands
of those who offered to support him, saying that he was not afraid of
death."
आहा! सहारा देकर ले जाने वाले व्यक्तियों के हाथ पीछे झटककर वह कहने
लगा, 'मैं मौत से नहीं डरता'। आहा! धन्य हैं मृत्युंजय!
"As he stood on the scaffold he was asked if he had a last word
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 169