भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 172, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंके होत चीकने पात।'
वह ग़रीब और एक बदक़िस्मत विद्रोही था। उसके पिता ने उसे अपना पुत्र
मानने से इन्कार कर दिया था। देशभक्त और खुशामदी सभी अख़बारों में और उस
समय के गर्म नेता बिपिनचन्द्र पाल तक ने उन्हें कोस-कोसकर गालियाँ दीं। तो
फिर बताओ इन हालात में, आज बीस साल बाद उनके बारे में तथ्यों को फिर से
इकट्ठा करने की कोशिश में किसी को कितनी सफलता मिल पायेगी?
इन कठिनाइयों में हम आज उनका जीवन-वृतान्त लिखने बैठ गये हैं।
धीरे-धीरे हम लोग, उनका नाम भी न भूल जायें, यही सोचकर आज उनके बारे
में जैसे भी तथ्य मिल सकते हैं, यह वृतान्त पाठकों के सामने रख रहे हैं।
आप शायद अमृतसर के रहने वाले थे। घर से अच्छे थे। बी.ए. पास कर पढ़ने
के लिए इंग्लैण्ड चले गये। कहा जाता है कि वहाँ आप कुछ अय्याशी में फँस गये।
यह बात यक़ीन से नहीं कही जा सकती, लेकिन यह कोई अनहोनी बात भी नहीं
है। उनका मन बड़ा रसिक व भावुक था, इस बात का प्रमाण भी मिलता है।
इंग्लैण्ड के ख़ुफ़िया विभाग (Scotland Yard) के एक प्रसिद्ध जासूस श्री ई.टी.
वुडहॉल ने (Union Jack) यूनियन जैक नामक साप्ताहिक अख़बार में अपनी डायरी
छापी थी। मार्च, 1925 के अंक में उन्होंने श्री मदनलाल ढींगरा का हाल लिखा
है। यह जासूस उनके पीछे लगाया गया था। वह लिखता है —
"Dhingra was an extraordinary man. Dhingra's passion for flowers
was remarkable."
यानी ढींगरा एक असाधारण व्यक्ति था। ढींगरा का फूलों के प्रति ज़बरदस्त
लगाव था। आगे जाकर उन्होंने लिखा है कि वे बाग़ के किसी सुन्दर कोने में जाकर
बैठ जाते थे और घण्टों तक फूलों को एक कवि की तरह मस्त होकर निहारते रहते
और कभी उनकी आँखों से बड़ी तेज़ चमक कौंध उठती थी। उसी चमक को
देखकर ई.टी. वुडहॉल उस्ताद सिकलाहिन आगे लिखता है —
"There is a man to keep an eye on. He will do something desperate
someday."
यानी उस व्यक्ति पर आँख रखनी चाहिए। किसी न किसी दिन वह कुछ
धमाका करेगा। ख़ैर।
हम बात कर रहे थे कि वे शायद अय्याशी में फँस गये। उस कहानी के आगे
यों कि फिर स्वदेशी आन्दोलन का असर इंग्लैण्ड तक भी पहुँचा और जाते ही
श्री सावरकर ने इण्डियन हाउस नामक सभा खोल दी। मदनलाल भी उसके सदस्य
बने।
इधर हिन्दुस्तान में खुले आन्दोलन को दबाने के कारण युग-पलट लोगों ने
ख़ुफ़िया सोसाइटियाँ स्थापित कर लीं। यहाँ तक कि 1908 में अलीपुर की साज़िश
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