भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 170, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्री मदनलाल ढींगरा
शहीद भगतसिंह ने 'किरती' में मार्च, 1928 से अक्टूबर 1928 तक 'आज़ादी
की भेंट शहादत' शीर्षक से एक लेखमाला लिखी। अगस्त, 1928 के 'किरती' में
इस लेखमाला का उद्देश्य इस रूप में बताया गया - "हमारा इरादा है कि उन
जीवनियों को उसी तरह छापते हुए भी उनके आन्दोलनों का क्रमशः हाल लिखें ताकि
हमारे पाठक यह समझ सकें कि पंजाब में जागृति कैसे पैदा हुई और फिर काम कैसे
होता रहा और किन कामों के लिए, किन विचारों के लिए उन शहीदों ने अपने प्राण
तक अर्पित कर दिये।" - स.
अब फिर यह बताने की ज़रूरत नहीं कि भारतवर्ष की आज़ादी के लिए जितनी
कुर्बानी पंजाब प्रान्त ने की है, उतनी किसी और प्रान्त ने नहीं की। बीसवीं सदी
के शुरू होने के साथ ही भारत में एक बार नयी अशान्ति की लहर दौड़ गयी,
जिसका परिणाम स्वदेशी-आन्दोलन की शक्ल में प्रकट हुआ। तब भी पंजाब ही
बंगाल का साथ दे सका था। गुलामी की ज़ंजीरें दिनोदिन जकड़ी देखकर जब दर्द
शुरू हुआ तब बहुत-से नौजवान अपने देशप्रेम में पागल हुए दिलों को केवल
लेक्चरबाज़ी और प्रस्तावबाज़ी-मात्र से सन्तोष न दे सके और कुछ दिल-जले लोगों
ने युग पलट आन्दोलन चलाया। यह आन्दोलन उन देशप्रेमी युवकों को अपनी ओर
खींचने में सफल हो गया और इन परवानों ने स्वतन्त्रता देवी के चरणों में अपने
जीवन तक बलिदान कर दिये और मुर्दा देश को फिर मृत्यु के प्रति निर्भयता
दिखाकर पुराने बुजुर्गों की याद ताज़ा कर दी।
यह युग पलटने वाले या विद्रोही लोग कैसे विचित्र होते हैं, इसका कुछ वर्णन
बंगाल के विद्रोही कवि नज़रुल इस्लाम ने अपनी 'विद्रोही' कविता में किया है।
मौत के हाथ में हाथ डालकर खेल करने वाले, ग़रीबों के सहायक, आज़ादी के
रक्षक, गुलामी के दुश्मन, ज़ालिमों, अत्याचारियों और मनमानी करने वाले शासकों
के शत्रु इन विद्रोही वीरों के दिल का, मन का, स्वभाव का, इच्छा का बड़ा सुन्दर
चित्र उन्होंने अपनी कविता में खींचा है। पहले ही वे कहते हैं -
बोलो बीर -
चिर उन्नत मम शीर
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