सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 161, कुल 788 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 161

करने पर मालूम हुआ कि ये पंजाब के राजा हैं। वह समझे शायद महाराजा दिलीप
सिंह हों, परन्तु बाद को मालूम हुआ कि वह कूका गुरु राम सिंह जी हैं। उस समय
उनके साथ उनका एक सूबा लक्खा सिंह भी था। उनसे मिलने पर खूब बातचीत
हुई और मालूम हुआ कि उन्हें पाँच मील तक बाहर सैर करने की आज्ञा थी। खैर!
सरकार ने इस लेख का कभी प्रतिवाद भी नहीं किया। जो भी हो, मालूम ऐसा ही
होता है कि गुरु जी अब इस संसार में नहीं हैं, परन्तु कूका लोगों का विश्वास है
कि वे अभी जीवित हैं। खैर!
आज भी पंजाब में कूका सम्प्रदाय विद्यमान है। उनमें ईश्वर-भक्ति का अभी
तक प्राधान्य है। बहुत सवेरे उठकर केशी स्नान कर घण्टों तक भगवद्भजन में लीन
रहना, उनका नित्य नियम है। मांस, मदिरा, आदि वस्तुओं के प्रयोग के कट्टर
विरोधी हैं। एक सीधी पगड़ी, एक लम्बा कुर्ता और एक कच्छा – यही उनका
पहनावा है। एक कम्बल और एक डोलका-सा बना हुआ बड़ा-सा लोटा और एक
टकुआ जिसे वे सफाजंग बोलते हैं – यही उनका सामान है। गले में सूत की बनी
हुई एक सुन्दर माला रहती है। उनमें भी एक विशेष मस्ताना दल होता है। वे
शब्द-कीर्तन करते हुए एकदम सुध-बुध भूल जाते हैं। इन लोगों के संकीर्तन से
प्रत्येक व्यक्ति प्रफुल्लित तथा रोमांचित-सा हो जाता है। खून खौलने लगता है,
आँखों में प्रेम तथा भक्ति के आँसू भर आते हैं।
ग्यारहवें और बारहवें गुरु में विश्वास रखने के कारण तथा मांस, मदिरा के
कट्टर विरोधी होने के कारण वे शेष सिक्ख समाज से जुदा हैं। उनमें समानता का
भाव प्रबल होता है। होली आदि के अवसर पर उनके विशेष उत्सव होते हैं, जहाँ
तक कि खूब होम यज्ञ होता है। शेष सिक्ख इसके विरोधी हैं। कूके अपने को हिन्दू
मानते हैं, शेष सिक्ख नहीं। विगत अकाली आन्दोलन के दिनों में उन्होंने अकालियों
का कुछ विरोध किया था जिससे उनकी स्थिति कुछ ख़राब हो गयी। तथापि वे
अपने ढंग के निराले लोग हैं। उन्हें देख एक उस अधखिले फूल की याद आती
है जो खिलते ही मसल डाला गया हो। गुरु राम सिंह जी की हसरतें दिल-की-दिल
ही में रह गयी थीं। उनके शेष सभी अनुयायियों का आत्मबलिदान भी विस्मृत हो
गया। उन अज्ञात लोगों के बलिदानों का क्या परिणाम हुआ, सो वही सर्वज्ञ भगवान
जाने। परन्तु हम तो उनकी सफलता-विफलता का विचार छोड़ उनके निष्काम
बलिदान की याद में एक बार नमस्कार करते हैं।
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 155