भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 175, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंहूँ कि यह उन निर्दयता भरी सज़ाओं का मामूली-सा बदला है जोकि हिन्दुस्तानी
देशभक्त नौजवानों को फाँसी और कालेपानी की दी गयी हैं। मैंने इस काम में अपने
ज़मीर के सिवा किसी और की सलाह नहीं ली। अपने फ़र्ज़ के सिवाय किसी से
साज़िश नहीं की।
मेरा यह विश्वास है कि एक राष्ट्र, जिसे विदेशी लोगों ने बन्दूकों से दबाया
हो, वह हमेशा युद्ध की स्थिति में होता है और चूँकि हथियार छीनकर खुली
लड़ाई असम्भव बना दी जाती है, मैंने छिपकर बिना बताये हमला किया है।
क्योंकि हमें बन्दूकें रखने से मना किया जाता है, इसीलिए मैंने पिस्तौल खींच
लिया और चला दिया।
मैं एक हिन्दू के रूप में समझता हूँ कि मेरे देश के साथ किया गया अन्याय
ईश्वर का अपमान है, क्योंकि देश की पूजा श्री रामचन्द्र जी की पूजा है और देश
की सेवा श्रीकृष्ण जी की सेवा है।
एक ग़रीब और मूर्ख, मेरे जैसे नौजवान के पास अपनी माता की सेवा में भेंट
करने के लिए अपने रक्त के सिवाय और क्या हो सकता है? सो मैंने अपना रक्त
माता के चरणों में चढ़ाया है।
इस समय यदि हिन्दुस्तान को किसी सबक की ज़रूरत है तो यह कि मरना
कैसे चाहिए। और इसे सिखाने का तरीक़ा है कि हम खुद मरकर दिखायें। इसीलिए
मैं मर रहा हूँ। इसीलिए मुबारक हो शहीदाना मौत।
यह लड़ाई तब तक जारी रहेगी जब तक हिन्दुस्तानी और अंग्रेज़ दो राष्ट्र रहेंगे
और इनका यह अस्वाभाविक गठबन्धन बना रहेगा। मेरी ईश्वर के आगे यही प्रार्थना
है कि मैं फिर इसी माँ की गोद से जन्म लूँ और जब तक वह स्वतन्त्र न हो जाये
और मानव-समाज की पूर्ण सेवा और उन्नति योग्य न बन जाये, मैं यहीं जन्मता
रहूँ और मरता रहूँ।
– वन्देमातरम्!
16 अगस्त, 1909 का दिन भी इतिहास में याद रहेगा। उस दिन इंग्लैण्ड में
हिन्दुस्तानी युग-पलट पार्टी की आवाज़ गूँजाने वाला ढींगरा वीर अपनी मतवाली
चाल चलता हुआ तख़्ते पर जा चढ़ा था। श्रीमती एग्निस स्मेडले एक जगह इस
घटना का ज़िक्र करती हुई लिखती हैं –
"He walked to the scaffold with his head high and shook off hands
of those who offered to support him, saying that he was not afraid of
death."
आहा! सहारा देकर ले जाने वाले व्यक्तियों के हाथ पीछे झटककर वह कहने
लगा, 'मैं मौत से नहीं डरता'। आहा! धन्य हैं मृत्युंजय!
"As he stood on the scaffold he was asked if he had a last word
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 169