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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 788 में से

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पृष्ठ 163

थे लेकिन भाड़े के लिए लड़ने वाले नहीं, बल्कि सिर्फ अपने फ़र्ज़ के लिए या
किसी काम के लिए कहें; वे निष्काम भाव से लड़ते और मरते थे। सिक्ख इतिहास
यही कुछ था, मराठों का आन्दोलन भी यही कुछ बताता है। राणा प्रताप के साथी
राजपूत भी इसी तरह के योद्धा थे। बुन्देलखण्ड के वीर छत्रसाल के साथी भी ऐसे
थे।
ऐसे ही लोगों का एक वर्ग पैदा करने वाले बाबा राम सिंह ने प्रचार और संगठन
शुरू किया। बाबा राम सिंह का जन्म 1824 में लुधियाना ज़िले के भैणी गाँव में
हुआ। आपका जन्म बढ़ई घराने में हुआ। जवानी में महाराजा रणजीत सिंह की सेना
में नौकरी की। ईश्वर-भक्ति अधिक होने से नौकरी-चाकरी छोड़कर गाँव जा रहे।
नाम का प्रचार शुरू कर दिया।
1857 के ग़दर में जो-जो ज़ुल्म हुए, वे सब देखकर और पंजाब की ग़द्दारी
देखकर कुछ असर ज़रूर हुआ होगा। क़िस्सा यह कि बाबा राम सिंह जी ने उपदेश
शुरू करवा दिया। साथ-साथ बताते गये कि 'फिरंगियों' से पंजाब की मुक्ति बहुत
ज़रूरी है। उन्होंने तब उस असहयोग का प्रचार किया, जैसे वर्षों बाद 1920 में
महात्मा गाँधी ने किया। उनके कार्यक्रम में अंग्रेज़ी राज की शिक्षा, नौकरी, अदालतों
आदि का और विदेशी चीज़ों का बहिष्कार तो था ही, साथ में रेल और तार का
भी बहिष्कार किया गया था।
पहले-पहले सिर्फ नाम का ही उपदेश होता था। हाँ, यह ज़रूर कहा जाता था
कि शराब-मांस का प्रयोग बिल्कुल बन्द कर दिया जाये। लड़कियाँ आदि बेचने
जैसी सामाजिक कुरीतियों के ख़िलाफ़ भी प्रचार होता था, लेकिन बाद में उनका
प्रचार पोलिटिकल रंग में रँगा गया।
पंजाब सरकार के पुराने काग़ज़ों में एक स्वामी रामदास का ज़िक्र आता है,
जिसे कि अंग्रेज़ी सरकार एक पोलिटिकल आदमी समझती थी और जिस पर
निगाह रखी जाती थी। 1857 के बाद जल्द ही उसके रूस की ओर जाने का
पता चलता है। बाद में कोई ख़बर नहीं मिलती। उसी आदमी के सम्बन्ध में कहा
जाता है कि उसने एक दिन बाबा राम सिंह से कहा कि अब पंजाब में राजनीतिक
कार्यक्रम और प्रचार की ज़रूरत है। इस समय देश को आज़ाद करवाना बहुत
ज़रूरी है। तब से आपने स्पष्ट रूप से अपने उपदेश में इस असहयोग को शामिल
कर लिया।
1863 में पंजाब सरकार के मुख्य सचिव रहे टी.डी. फार्सिथ ने अपनी
आत्मकथा में लिखा है कि 1863 में ही मैं समझ गया था कि यह धार्मिक-सा
आन्दोलन किसी दिन बड़ा ग़दर मचा देगा। इसीलिए मैंने भैणी के उस गुरुद्वारे में
ज़्यादा आदमियों का आना-जाना और इकट्ठा होना बन्द कर दिया। इस पर बाबा
जी ने भी अपना काम का ढंग बदल लिया। पंजाब प्रान्त को 22 ज़िलों में बाँट
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 157