भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 165, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंबाबा राम सिंह ने अपने आन्दोलन से बचने के लिए चली, वह क्योंकि सफल नहीं
हुई, इसीलिए अब कोई उन्हें कायर और बुज़दिल कहता है और कोई बदनीयत व
कमज़ोर बताता है। ख़ैर।
हम तो समझते हैं कि वह राजनीति की एक चाल थी। उन्होंने पुलिस को
ख़बर कर दी ताकि वे कोई ऐसा इलाज कर लें जिससे कोई बड़ी ख़राबी पैदा न
हो, लेकिन सरकार उनके इस बड़े भारी आन्दोलन से बहुत डरती थी और उसे
पीस देने का अवसर खोज रही थी। उसने कोई ख़ास कार्यवाही न की और उन्हें
मर्ज़ी अनुसार जाने दिया।
लेकिन 11 जनवरी के पत्र में डिप्टी कमिश्नर लुधियाना मि. कावन ने यह
बात कमिश्नर को लिख भेजी कि राम सिंह ने उन लोगों से अपने सम्बन्ध न होने
की बात ज़ाहिर की है और उनके सम्बन्ध में हमें सावधान भी कर दिया है। ख़ैर!
वे 150 नामधारी सिंह बड़े जोश-ख़रोश में चल पड़े।
जब वे 150 व्यक्ति वहाँ से बदला लेने के विचार से चल पड़े, तो पुलिस
को पहले से बताया जा चुका था, लेकिन सरकार ने कोई इन्तज़ाम नहीं किया।
क्यों? क्योंकि वे चाहते थे कि कोई छोटी-मोटी गड़बड़ हो जाये और बहाना मिल
जाये, जिससे कि वे उस आन्दोलन को पीस दें। सो वह अब मिल गया।
वे कूके वीर उस दिन तो पटियाला राज्य की सीमा पर एक गाँव रब्बों में
पड़े रहे। अगले दिन भी वे वहीं टिके रहे। 14 जनवरी, 1872 की शाम को
उन्होंने मलोध के क़िले पर धावा बोल दिया। यह क़िला कुछ सिख सरदारों का
था, लेकिन इन्होंने इस पर हमला क्यों किया? इस सम्बन्ध में डिस्ट्रिक्ट गजेटियर
में लिखा है कि उन्हें उम्मीद थी कि मलोध सरकार उनके विद्रोह की नेता
बनेगी, लेकिन उन्होंने मना कर दिया और इन्होंने हमला कर दिया। बहुत सम्भव
है कि बाबा राम सिंह की बड़ी भारी तैयारी में मलोध सरकार ने मदद देने का
वायदा किया हो, लेकिन जब उन्होंने देखा कि विद्रोह तो पहले ही हो गया है
और बाबा राम सिंह भी साथ नहीं हैं और पूरी संगत भी नहीं बुलायी गयी है
तो उन्होंने मना कर दिया होगा। ख़ैर! जो भी हो, वहाँ लड़ाई हुई। कुछ घोड़े,
हथियार और तोपें ले वे वहाँ से चले गये। दोनों ओर के दो-दो आदमी मारे गये
और कुछ घायल हुए।
अगले दिन सवेरे 7 बजे वे मलेर कोटला पहुँच गये। अंग्रेज़ी सरकार ने मलेर
कोटला सरकार को पहले ही सूचित कर रखा था। उधर बड़ी तैयारियाँ की गयी
थीं। सेना हथियार लिये खड़ी थी, लेकिन इन लोगों ने इतनी बहादुरी से हमला
किया कि सेना और पुलिस के कुछ वश में न रहा। हमला कर वे शहर में घुस
गये और जाकर महल पर हमला कर दिया। वहाँ भी सेना उन्हें रोक न सकी। वे
जाकर ख़ज़ाना लूटने की कोशिश करने लगे। लूट ही लिया जाता, लेकिन दुर्भाग्य
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 159