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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 157, कुल 788 में से

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अतिरिक्त उनके हाथ कुछ न लगा और उधर उन्हें शीघ्र ही वहाँ से भागना पड़ा।
8 को मारकर, 15 को घायल कर और कुछ शस्त्र तथा घोड़े लेकर वे वहाँ से चल
निकले। उनके सात साथी मरे और पाँच पकड़े गये अथवा घायल हो गये। उनके
पीछे कोटला के सशस्त्र सैनिक भी भागे और –
A sort of running fight was kept along, shots fired, and many more
Kookas were wounded, till both parties reached the village of Ruir in the
Patiala state; the Kookas carrying most of the wounded with them.
रड़ गाँव के निकटवर्ती जंगल में वे छिप गये। शिवपुर के नायब नाजिम ने उन
पर फिर आक्रमण किया। फिर लड़ाई छिड़ी, परन्तु कूके थके-माँदे थे, भूखे-प्यासे
थे, और थे घायल बिना मरहम-पट्टी के। वे पकड़े गये। 68 व्यक्ति पकड़े गये
थे जिनमें से 28 घायल हो चुके थे।
यही घटना ‘विद्रोह’ कहलाती है। मि. कावन अपने एक पत्र में लिखता है –
It looks like the commencement of an insurrection...
और एक स्थान पर लिखता है –
I propose to execute at once all who were engaged in attacks on
Malodh and Malarkotla. I am sensible of great responsibility in exercising
an authority which is not vested in me, but the case in an exceptional
one. These men are not ordinary criminals. They are rebels, having for
their immediate object the acquisition of plunder, and ulteriorly the sub-
version of order. It is certain that had their first attempts been crowned
with success, had they succeeded in arming themselves with horses and
treasures, they would have been joined by all the abandoned charities
in the country and their extinction would not be effected without much
trouble.
ये 68 व्यक्ति 17 जनवरी को मलेर कोटला लाये गये। उनमें से दो स्त्रियाँ
भी थीं। वे पटियाला स्टेट की नागरिक थीं। उन्हें तो स्टेट के सुपुर्द कर दिया
गया और शेष 66 में से पचास को वहीं तोप से उड़ा देने का निश्चय हो चुका
था। अपनी-अपनी बारी से सानन्द सत्त श्री अकाल आदि जयघोष करते हुए, तोप
के मुँह से बँध जाते। एक बार धमाके की आवाज़ होती और वह कूका वीर इस
संसार से न जाने किधर चला जाता। उन fanatics को मृत्यु का भय नहीं हुआ,
वे हम ‘समझदार’ लोगों की तरह मृत्यु की कल्पना-मात्र से ही थर-थर काँप
नहीं उठे। ऐसे ही ‘मूर्ख’ और कहाँ कितनी संख्या में मिल सकते हैं? उस समय
स्वार्थ के लिए मरने वाले लोग इसी तरह प्रसन्न रह सकते, इसी तरह हँसते हुए
मृत्यु से आलिंगन कर पाते, यह असम्भव जान पड़ता है। आत्मसम्मान, देशहित
तथा स्वतन्त्रता प्राप्ति आदि न जाने किन-किन उच्च भावों की प्रेरणा से वह
मृत्युंजय बन पाये थे। इसी से हम उनकी इस उत्तेजना तथा जल्दबाज़ी को
विरासत से साक्षात्कार : भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन / 151