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भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)

Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates

शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा

DevanagariHindipublished788 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 788 में से

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पृष्ठ 164

लिया। प्रत्येक ज़िले में एक-एक व्यक्ति प्रमुख नियत किया गया, जिसे 'सूबा'
कहा जाता था। अब उन्होंने 'सूबों' में प्रचार और संगठन का काम शुरू कर दिया।
गुप्त तरीक़ों से आज़ादी का भी प्रचार जारी रखा। संगठन बढ़ता गया, प्रत्येक
नामधारी सिख अपनी आय का दसवाँ हिस्सा अपने धर्म के लिए देने लगा। बाहर
का हंगामा बन्द हो जाने से सरकार का शक दूर हो गया और 1869 में सभी बन्दिशें
हटा ली गयीं। बन्दिशें हटते ही ख़ूब जोश बढ़ा।
एक दिन कुछ कूके अमृतसर में से जा रहे थे। पता चला कि कुछ कसाई
हिन्दुओं को तंग करने के लिए उनकी आँखों के सामने गोहत्या करते हैं। गाय के
तो वे बड़े भक्त थे। रातों-रात सभी कसाइयों को मार डाला और भैणी का रास्ता
पकड़ा। बहुत-से हिन्दू पकड़े गये। गुरु जी ने पूरी कहानी सुनी। सबको लौटा दिया
कि निर्दोष व्यक्तियों को छुड़ायें और अपना अपराध मान लें। यही हुआ और वे लोग
फाँसी चढ़ गये। ऐसी ही कोई घटना फ़िरोज़पुर ज़िले में भी हो गयी। फाँसियों से
जोश और बढ़ गया। उस समय उन लोगों के सामने आदर्श था पंजाब में सिख-राज
स्थापित करना और गोरक्षा को वे अपना सबसे बड़ा धर्म मानते थे। इसी आदर्श की
पूर्ति के लिए वे प्रयत्न करते रहे।
13 जनवरी, 1872 को भैणी में माघी का मेला लगने वाला था। दूर-दूर से
लोग आ रहे थे। एक कूका मलेर कोटला से गुज़र रहा था। एक मुसलमान से झगड़ा
हो जाने से वे उसे पकड़कर कोतवाली में ले गये और उसे बहुत मारा-पीटा व एक
बैल की हत्या उसके सामने की गयी। वह बेचारा दुखी हुआ, भैणी पहुँचा। वहाँ
जाकर उसने अपनी व्यथा सुनायी। लोगों को बहुत जोश आ गया। बदला लेने का
विचार ज़ोर पकड़ गया। जिस विद्रोह का भीतर ही भीतर प्रचार किया गया था, उसे
कर देने का विचार ज़ोर पकड़ने लगा, लेकिन अभी मनचाही तैयारी भी नहीं हुई
थी। बाबा राम सिंह ऐसी स्थिति में क्या करते? यदि उन्हें मना करते हैं तो वे मानते
नहीं और यदि उनका साथ देते हैं तो सारा किया-धरा तबाह होता है। क्या करें?
आख़िर जब 150 आदमी चल ही पड़े तो आपने पुलिस को ख़बर भेज दी कि ये
व्यक्ति हंगामा कर रहे हैं और शायद कुछ ख़राबी करें, मैं ज़िम्मेदार नहीं हूँ। ख़याल
था कि हज़ारों आदमियों के संगठन में से सौ-डेढ़ सौ आदमी मारे गये (जायें) और
बाक़ी संगठन बचा रहा तो यह कमी तो फिर पूरी हो जायेगी और जल्द ही फिर
पूरी तैयारी होने से विद्रोह हो सकेगा। लेकिन हम यह देखते हैं कि दुनिया में 'end
Justifies the means' (परिणाम से ही तय होता है कि तरीक़े जायज़ थे या
नाजायज़) का सिद्धान्त राजनीति के मैदान में प्रायः लागू होता है। अर्थात यदि
सफलता मिल जाये तब तो चालें नेकनियती से भरी और सोच-समझकर चली गयी
कहलाती हैं और यदि कभी मिले असफलता तो बस फिर कुछ भी नहीं। नेताओं
को बेवकूफ़, बदनीयत आदि ख़िताब मिलते हैं। यही बात हम देखते हैं। जो चाल
158 / भगतसिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़