भगत सिंह और उनके साथियों के संपूर्ण उपलब्ध दस्तावेज (प्रो. चमनलाल - प्रामाणिक ऐतिहासिक संकलन)
Complete Available Documents of Bhagat Singh & Associates
शहीद-ए-आजम भगत सिंह (सम्पादक: प्रो. चमनलाल) द्वारा
पृष्ठ 160, कुल 788 में से
संदर्भ में पढ़ेंआशा प्रकट की। मि. कावन को तो पदच्युत कर इंग्लैण्ड भेज दिया गया और मि.
फार्सिथ को पंजाब से अवध उसी पद पर तब्दील कर दिया। पचास को तोप से
उड़ाने और 16 को फाँसी दे डालने – और वह भी बिना अभियोग चलाये, बिना
उन लोगों को सफ़ाई देने का अवसर दिये – के अपराध की यह सज़ा दी गयी।
Sir Henry Cotton के शब्दों में तो यह दण्ड एकदम अपर्याप्त अथवा नाकाफ़ी था
परन्तु ऐंग्लो इण्डियन समाचारपत्रों ने इतना भी दण्ड देने के विरुद्ध बहुत बवेला
मचाया था।
इधर शेष कूका समाज पर बहुत अत्याचार होने लगे। गुरु राम सिंह के बाद
श्री हरि सिंह गुरु बने। उन्हें भैणी में नज़रबन्द कर दिया गया। गुरुद्वारे के बाहर
पुलिस की चौकी बिठा दी गयी। छह वर्ष तक तो भैणी की ऐसी दशा रही मानो
शत्रु घेरा डाले पड़ा हो। न कोई बाहर से भीतर आ सकता, न कोई भीतर से बाहर
जा पाता। फिर धीरे-धीरे कुछ-कुछ लोगों का आना-जाना खुला। उस समय भी
हरि सिंह बाहर नहीं आ सकते थे – इसके बावजूद कि आने-जाने की आज्ञा हो
गयी थी। आने वाले यात्रियों को बहुत तंग किया जाता था। बुरी तरह अपमानित
किया जाता, मुश्कें कसकर धूप में डाल दिया जाता, जहाँ बेचारों को घण्टों झुलसना
पड़ता। चारपाई के नीचे हाथ दबाकर कई आदमी चारपाई पर बैठ जाते। उन पर
हुक्के का गन्दा बदबूदार पानी डाल दिया जाता। यह सब अत्याचार करने वाले इसी
देश के निवासी होते थे और इन यातनाओं को चुपचाप सहन करने वाले भी इसी
देश के अभागे निवासी। और अब तो यह निरा धार्मिक सम्प्रदाय रह गया था। परन्तु
पंजाब प्रान्त का इतिहास बड़ा रोमांचकारी है। समाज का समाज Outlaws घोषित
हुआ तो पंजाब में, किसी सम्प्रदाय के सभी के सभी लोग भीषण अत्याचारों का
शिकार हुए तो पंजाब में और फिर हज़ारों का सारे का सारा आन्दोलन unlawful
क़रार दिया गया तो पंजाब में। इस बार भी ऐसा ही हुआ। प्रत्येक कूका अपने-अपने
घर में नज़रबन्द था। बिना पुलिस की आज्ञा के कहीं बाहर न जा सकता। आज्ञा
लेने जाने के मानी होते, पुलिस के अकथनीय अत्याचार, तथा अपमान सहन करना
और (कई) दिनों तक भूखे-प्यासे तड़पते रहकर बाहर जाने की आज्ञा पाये बिना
चुपचाप घर आकर बैठ जाना। यह दशा बहुत दिनों तक चली और बन्दिशें तो अब
1920 में आकर असहयोग के दिनों में हटायी गयीं। अस्तु!
गुरु राम सिंह जी बर्मा में ही नज़रबन्द रहे। डि. गजेटियर में लिखा है –
"Finally he died in Burma in 1885". परन्तु 1920 में डस्का निवासी श्री आलम
सिंह इंजीनियर ने एक लेख द्वारा उपरोक्त बात का खण्डन किया था। उन्होंने लिखा
था कि वे दो और साथियों सहित Lower Burma की किसी पोर्ट से लास्ट द्वीप
जा रहे थे। उस पोर्ट का नाम भोलमीन था। वहाँ पर एक दिन एक बड़े तेजस्वी
व्यक्ति को पुलिस की निगरानी में सैर करते देखकर उनके सम्बन्ध में कुछ पूछताछ
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