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बन्दी जीवन (शचीन्द्रनाथ सान्याल - भारतीय क्रान्तिकारियों की गीता, ब्रिटिश सरकार द्वारा प्रतिबन्धित)

Bandi Jeevan by Sachindra Nath Sanyal

शचीन्द्रनाथ सान्याल द्वारा

DevanagariHindipublished408 पृष्ठ

180 / बन्दी जीवन

का आश्रय लिया और अनेकों ने तिल-तिल करके पूर्ण रूप से अपने परिवारवालों
और राज्याधिकारियों द्वारा अनेक कष्ट भोगते हुए जीवन के भोग-विलास को
तुच्छ समझकर विपत्ति के बीच ही जीवन बिता दिया। जो भी हो, विप्लवियों
ने वर्तमान काल में छात्र आदर्श को ही श्रेष्ठ आसन दिया था। इसी से इस
छात्र आदर्श का ही वे भारत के जनसाधारण में प्रचार करने का प्रयास करते
रहे।
इस प्रकार से विप्लवी लोग भारत के गरीब-से-गरीब जनसाधारण तक को
ही समझते थे, किन्तु किस प्रकार ये गरीब-से-गरीब जनसाधारण तक अपनी
अभिलाषाएँ व्यक्त करेंगे और किस प्रकार सचमुच ही इन जनसाधारण की
अभिलाषाएँ अक्षुण्ण रह सकेंगी, देश के समाज में धनी और निर्धनों के बीच,
जमींदारों और उनकी रैयत के बीच, धनी व्यवसायपतियों और कुली-मज़दूरों के
बीच, देशी और विदेशी व्यवसायपतियों के बीच परस्पर जो अनेक स्वार्थों के
द्वंद्व उपस्थित हो गए हैं, और इन विरुद्ध स्वार्थों के संघर्ष के कारण जगत् में जो
अनेक प्रकार की अशान्ति, अनेक प्रकार के वैषम्य, अनेक अत्याचारों, यन्त्रणाओं
और अनेक भीषण रक्तपातों की सृष्टि हो रही है, इन सब द्वंद्वों को कैसे सुलझाना
होगा, और यथार्थ विप्लवी होने पर राष्ट्र के समान समाज को भी चूर-चूर कर
नये सिरे से गढ़ना होगा, ये सब बातें भारत के विप्लवी लोग भली भाँति हृदयंगम
नहीं कर पाए, और इन सब समस्याओं की ओर ध्यान देते हुए भारत के भावी
राष्ट्र को सच ही किसी विशेष रूप में गढ़ना होगा, यह बात भी उन्होंने गम्भीर
चिन्तन के साथ नहीं सोची थी। वे सोचते थे कि ये सब बातें स्वाधीनता पाने
के बाद देखी जाएँगी। तो भी अधिकांश विप्लवियों का यही मत था कि भारत
की राष्ट्र-शासन-पद्धति की नींव गणतन्त्र के आदर्श पर ही स्थापित होगी। इस
व्यापार में अधिकांश विप्लवी राजा के लिए कोई स्थान नहीं रखते थे। अधिकांश
इसलिए कहता हूँ कि इनमें ऐसे भी कुछ व्यक्ति थे जो सोचते थे कि यदि भारत
के कोई स्वाधीन कहलानेवाले राजा भारत के इस स्वाधीनता समर में प्राण और
मन से योग दें तो उन्हें भारत का राज्यासन दिया जा सकता है, और उस दशा
में भारत का राष्ट्र संगठन इंग्लैंड की पार्लियामेंट के अनुसार गठित होगा।
महाराष्ट्र में 'अभिनव भारत' नामक गुप्त समिति की ओर से, 'Choose oh
Indian Princes," (अर्थात् भारत के राजाओ, अपना रास्ता चुन लो) शीर्षक
की एक छोटी-सी पुस्तिका का गुप्त रूप से प्रचार किया गया था, उसमें बड़ौदा
के राजा गायकवाड़ का स्पष्ट रूप से उल्लेख करके ही उपर्युक्त भाव का प्रचार
किया गया था। पंजाब के सिखों में से अनेकों की इच्छा थी कि भारत में फिर
खालसा राज्य स्थापित किया जाय। फिर विप्लवियों में से अधिकांश हिन्दू ही
थे, इसलिए उनके बीच किसी-किसी के दिल में यह इच्छा गुप्त रूप से थी कि
भारत के स्वाधीन होने के माने हिन्दू राज्य की पुनः स्थापना के होंगे। किन्तु
क्रमशः यह भाव बिलकुल लुप्त हो जाता है, और अन्त में यद्यपि वे मुख्यतः

विप्लव का प्रयास व्यर्थ क्यों हुआ ? / 181
हिन्दुओं के स्वावलम्बन के ऊपर ही भरोसा करके अपने कार्य में आगे बढ़ते थे,
तो भी स्वाधीन भारत की कल्पना में भारत की किसी भी जाति को उन्होंने
दूसरी जाति के अधीन कर रखने का संकल्प नहीं रखा, अर्थात् भारत की
स्वाधीनता के लिए भले ही हिन्दू मुख्यतः परिश्रम करें तो भी स्वाधीन भारत
में प्रत्येक जाति का समान अधिकार रहेगा अर्थात् प्रत्येक जाति का स्वार्थ
अक्षुण्ण रहेगा, यही था भारतीय विप्लवियों का राजनैतिक आदर्श ।
हमारे देश के प्रायः सभी लोग एक सुर मे कहते रहे हैं कि भारत का
विप्लव-प्रयास बिलकुल ही व्यर्थ हुआ है, और इस प्रकार उसका व्यर्थ होना ही
अवश्यम्भावी था । वे कहते हैं, वर्तमान युग में नवीन वैज्ञानिक उन्नति के कारण
किसी भी राजशक्ति के विरुद्ध कोई प्रजा सामरिक शक्ति की सहायता से विप्लव
नहीं कर सकती, और वे सोचते हैं, कि अंग्रेजों के समान शत्रु को सामरिक
शक्ति की सहायता से हराकर स्वाधीनता पाने की कल्पना करना भी निरा
पागलपन है, इसी से वे भारत के विप्लवियों को पागल और अविवेकी अथवा
निर्बोध समझते थे और समझते हैं।—अवश्य ही, इन सब समालोचकों की बाते
यदि सत्य हैं तो भारत को चिरकाल तक पराधीन ही रहना है, कारण कि पूर्ण
स्वाधीनता पाने का और कोई रास्ता भी ये समालोचक लोग दिखा नहीं सके,
और इस आधुनिक युग में भी रूस और जर्मनी के विप्लव दलों ने प्रबल राज-
शक्ति को हरा दिया है, यह बात न मानने का भी तो कोई चारा नहीं है; इसी
से यह कहना, जान पड़ता है, युक्तिसंगत न होगा कि वर्तमान युग में कोई भी
प्रजा शक्ति सुप्रतिष्ठित राज शक्ति को विप्लव के रास्ते से सामरिक शक्ति की
सहायता से हरा नहीं सकेगी, और भारत के विप्लव दल के साथ रूस और
जर्मन के विप्लव दलों की तुलना करने से एक बात विशेष रूप से हमारे ध्यान
में आती है कि जर्मन और रूसी विप्लवियों को अपने ही लोगों के विरुद्ध अस्त्र
धारण करने पड़े थे, परन्तु किसी विदेशी राज शक्ति के साथ लड़ाई हो तो सारे
स्वदेशवासियों की सहानुभूति और सहायता पाने की यथेष्ठ संभावना रहती है।
इसी से विदेशी राज शक्ति के विरुद्ध विप्लव करना सिविल वार (गृह युद्ध)
करने की अपेक्षा अनेक अंशों में सहज है । तो भी यह बात तो सच है कि भारत
का विप्लव प्रयास व्यर्थ हुआ और रूसियों और जर्मनों के विप्लव प्रयास सफल
हुए हैं। यह बात सच भले ही है, किन्तु इस व्यर्थता के कारण के विषय में ही तो
अनेकों के साथ मेरा मतभेद है, और यहाँ मैं इस कारण का ही अनुसंधान कर
रहा हूँ। भारतीयों को सचमुच विप्लव के पथ में जाना चाहिए कि नहीं, इसकी
मैं कोई आलोचना नहीं कर रहा हूँ, यहाँ पर तो केवल अपने विरुद्ध पक्षवालो
की प्रधान युक्ति का ही विश्लेषण कर दिखाने की तनिक-सी चेष्टा की है। एक
बात पाठक मन में रखें कि मैं अतीत की बातों की आलोचना कर रहा हूँ और
अतीत की आलोचना करना ही इतिहास लिखते समय ठीक है, इसी से भविष्य
में क्या होगा अथवा क्या होना उचित है यह मेरा आलोच्य विषय नहीं है। अस्तु,

182 / बन्दी जीवन
जो भी हो, जो हम कह रहे थे उसी पर फिर आ जाएँ, हम कह रहे थे कि भार-
तोयों का विप्लव प्रयास व्यर्थ क्यों हुआ ?
अनेक लोग कहते हैं कि उपयुक्त समय नही आया था इसी कारण भारतीयों
का विप्लव प्रयास व्यर्थ हुआ, अर्थात् विप्लव प्रयास को सफल करने के लिए जो
परिस्थिति अपेक्षित है वह परिस्थिति भारत में अब भी नही है, भारत के जन-
साधारण सचमुच विप्लव करना नही चाहते, इसीलिए विप्लव का प्रयास व्यर्थ
हुआ । भारतवासी सचमुच स्वाधीनता नही चाहते, पराधीनता की ज्वाला को
सच ही अनुभव नही करते, इसी से वे विप्लव पथ में अग्रसर नही होते; बहुतों के
मत मे विप्लवियों के असफल होने का यही सर्व-प्रधान कारण है ।
किन्तु भारतवासी सच ही स्वाधीनता नही चाहते, पराधीनता की ज्वाला
का अनुभव नही करते, यह तो मैं नही मानता, किन्तु उस स्वाधीनता को पाने
के लिए जिस त्याग, जिस वीरता की आवश्यकता होती है, भारतवासियों में उन
सब गुणो का एकदम अभाव है, यह बात न मानने का भी तो कोई चारा नही
है । किन्तु जो लोग यह कहते है कि देश के अशिक्षित जन साधारण (Mass) ने
इस विप्लवान्दोलन मे योग नही दिया इसी कारण विप्लव का प्रयास व्यर्थ हुआ
उनकी बात भी मुझे ठीक नही मालूम होती—कारण कि विप्लवियों ने कभी
किसी भी दिन प्रकट या गुप्त रूप से देश के किसानो अथवा कुली-मजदूरों को
इस विप्लवान्दोलन मे भाग लेने के लिए पुकारा ही नही, देश के शिक्षित लोगो ने
जब जिस रूप मे जन-साधारण (Mass) को पुकारा है, जन-साधारण ने अनेक
त्याग करके भी बहुधा इस पुकार का उत्तर दिया है । देश के शिक्षित लोग अपने
कर्तव्य को समझ लेने पर भी जो काम नही कर सकते, देश के अशिक्षित जन-
साधारण अनेक बार अपनी सहज बुद्धि से वह काम अनायास ही कर डालते है ।
अवश्य अशिक्षित जनता कर्तव्य की खातिर बहुत दिन तक त्याग अथवा कष्ट
स्वीकार नही कर सकती, इसी से अशिक्षित जनता के खयाल पर निर्भर करके
कोई भी बडा या स्थायी कार्य करना सम्भव नही ।
ओर जो लोग यह कहते है कि देश के अधिकांश लोग अशिक्षित हैं, इसीलिए
भी विप्लव का प्रयास सार्थक नही होता, और जब तक देश के अधिकांश लोग
शिक्षित नही होते, तब तक विप्लव का प्रयास व्यर्थ होगा ही, इनसे मै रूस का
दृष्टान्त दिखाकर कह सकता हूँ कि विप्लव प्रयास की सार्थकता अथवा व्यर्थता
देश के लोगो के लिखना-पढ़ना जानने न जानने पर निर्भर नही करती ।
तो फिर भारत का विप्लव प्रयास व्यर्थ क्यों हुआ ? किन्तु सच ही क्या
भारतीय विप्लवियों का इतना त्याग, इतना अद्भुत साहस सब एकदम व्यर्थ ही
हुआ है ? इन्होंने कितने ही कष्ट सहे, कितनी ही विषम विपत्तियों के बीच ऐसी
निष्ठा के साथ अविचलित रहे, कितनी ही दुर्घटनाओं के तीव्र आघात, कितने ही
विश्वासघातकों के निर्दय व्यवहार और कितनी ही पराजयों की मर्मपीड़ा सहकर
ऐसी दुर्दमनीय दृढ़ता के साथ वे बार-बार अपने संकल्प की साधना में अग्रसर

विप्लव का प्रयास व्यर्थ क्यों हुआ ? / 183
रहे, यह सब क्या सच ही एकदम व्यर्थ हो गया ! क्षात्र शक्ति के आदर्श ने क्या
देश में कुछ भी प्रतिष्ठा नहीं पाई ? मरने का डर क्या भारतवासियों के मन से
कुछ भी दूर नही हुआ ? देश के अन्यान्य प्रकाश्य आन्दोलनों पर विप्लव आन्दोलन
क्या किसी तरह का भी प्रभाव नही डाल पाया ? वर्ल्ड पॉलिटिक्स (विश्व की
राजनीति) पर, संसार के सभ्य देशों में क्या भारत का यह विप्लवान्दोलन कुछ
भी छाया नही डाल सका ? अथवा इस विप्लवान्दोलन के कारण भारत का
गौरव जगत् की सभा में कुछ भी नही बढ़ा ? इस सम्बन्ध में हार्वर्ड विश्वविद्यालय
के प्रोफेसर ऐसर लिखित 'पैन-जर्मनिजम', बर्न हार्डी कृत 'जर्मनी एण्ड दि नेक्स्ट
वार' इत्यादि ग्रन्थों की ओर ध्यान देने का पाठकों से अनुरोध करता हूँ—इससे
वे मेरी बात का तात्पर्य बहुत-कुछ हृदयंगम कर सकेंगे ।
बहुत लोग कहते हैं कि विप्लवियों के कार्यों के कारण मंगल की अपेक्षा
अमंगल ही अधिक हुआ, अंग्रेज सरकार को इन विप्लवियों के कारण ही प्रजा-
पीड़न का अधिक सुयोग मिल गया है, इसी से नित्य नये-नये कठोर-से-कठोर
क़ानूनों के सहारे भारत के वैध खुले आन्दोलनो मे भी अंग्रेज सरकार अनेक
प्रकार से बाधाएँ डाल पाई है। पर सच बात कहें तो वैध प्रकाश्य आन्दोलन का
दमन होने के बाद से ही विप्लव का कार्य-कलाप प्रकाशित होने लगा है, और
रोलट कमेटी की सिडीशन रिपोर्ट मे अग्रेजो ने कदाचित् अनजान मे ही इस
प्रकार सब विषयों की आलोचना की है जिससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि विप्लवियों
के प्रत्येक उद्योग के कारण ही बारी-बारी अंग्रेज़ों ने भारत को राजनैतिक
अधिकार दिए हैं।
यह बात भी अवश्य ही बहुत लोग स्वीकार करते हैं कि भारत को जो कुछ
सामान्य राजनैतिक अधिकार मिले है वे मुख्यतः भारत के इन दृढ़चित्त विप्लवियों
के प्रयास से ही मिले हैं।
खैर, जो भी हो, विप्लवियो ने जो चाहा था वह तो नही हो पाया ; विप्लवी
देश को स्वाधीन करना चाहते थे, सो वे कर नही सके, विप्लवियों की मुख्य चेष्टा
व्यर्थ हुई ।
मैं समझता हूँ, चिन्तनशील प्रतिभावान् उपयुक्त नेता का अभाव ही इस
व्यर्थता का सबसे बड़ा कारण था। रूस या जर्मनी के विप्लव दल के बीच ऐसे
बहुत व्यक्ति हैं या थे, जो संसार के श्रेष्ठ चिन्तनशील व्यक्तियों मे आसन पाने
योग्य थे, किन्तु भारतीय विप्लव दल में ऐसे कोई भी चिन्तनशील शक्तिमान्
व्यक्ति न थे जिन्हें ठीक थिंकर (विचारक) कहा जा सके, इसी से भारतीय
विप्लव दल अपना प्रचार-कार्य, कहना चाहिए, कुछ भी नही कर पाया और
इसीलिए इस विप्लव दल का प्रभाव वैसा नही दिखाई दिया जैसा होना चाहिए
था। यह भले ही सच है कि भारत के इस विप्लववाद के अन्दर विवेकानन्द का
ज्वलन्त आदर्श वर्तमान था और भारतीय विप्लवियों में से अधिकांश इसी महा-
पुरुष की प्रेरणा से अनुप्राणित थे किन्तु विवेकानन्द के समान कोई भी प्रतिभा-

184 / बन्दी जीवन
सम्पन्न व्यक्ति साक्षात् रूप से इस विप्लव दल में न थे। श्री अरविन्द घोष और
लाला हरदयाल यदि अन्त तक इस दल में रहते तो जान पड़ता है, कि विप्लव
दल का यह दैन्य बहुत कुछ दूर हो जाता, किन्तु वे भी अन्त में इस दल को छोड़
गए। इन्हीं अरविन्द के प्रसंग में मेरे एक परिचित व्यक्ति मुझसे एक प्रसिद्ध
कविता के कुछ एक पद कहा करते थे, यहाँ उन्हें उद्धृत करने का लोभ नही रोक
सकता हूँ—
He is gone to the mountain
And he is lost to the forest;
The spring is dried in the fountian.
When the need was the sosest.
इस प्रकार के चिन्तनशील प्रतिभावान् पुरुषों की बात छोड़ भी दें, तो इस
विप्लव दल में किसी बड़े साहित्यिक, किसी बड़े समाचार पत्रों के लेखक अथवा
किसी बड़े कवि ने भी योग नही दिया। एक तरह से कह सकते हैं, कि इस विप्लव
दल में इण्टलैकचुअल्स (intellectuals) नहीं थे और इस प्रकार के लोगों का
विशेष अभाव था, इसी कारण यह विप्लव दल प्रचार कार्य की ओर प्रायः
उदासीन ही रहा। जो कुछ गुप्त पत्रिकाएँ आदि बीच-बीच में प्रचारित होती
थीं, वे केवल सामयिक उत्तेजनापूर्ण प्रतिहिंसा के उच्छ्वास से भरी होती थी, इन
सब लेखों में विचारशीलता का कोई भी परिचय नहीं पाया जाता, जीवन का
कोई नया आदर्श इनसे प्रकट नही होता। भारत के साहित्य में इनका कोई स्थान
नहीं रहेगा, इसमें कोई सन्देह नहीं। भारतीय विप्लवी किसी स्थायी साहित्य की
सृष्टि नहीं करसके। इस प्रकार विप्लव दल का प्रयास व्यर्थ होना ही था। — तो
भी विप्लवान्दोलन के इस प्रथम युग में वारीन्द्र और उपेन्द्र द्वारा परिचालित
'युगान्तर' पत्रिका ने इस तरफ बहुत काम किया था। इस युगान्तर पत्रिका का
अद्भुत प्रभाव आज भी हम देखते हैं। इसी से वारीन्द्र एक दिन गर्व के साथ
अण्डमन में कहते थे, "जो पथ मैं एक बार दिखा आया हूँ, बंगाल आज भी उसी
एक पथ का अनुसरण किए चलता है, कोई भी नया पथ निकालने की और
किसी ने क्षमता न दिखाई; छिः!"
इसके सिवाय यह विप्लव दल प्रकाश्य रूप से अपनी कोई भी कार्यधारा नहीं
चला सका। इस विप्लव दल में ऐसे कोई भी नेता न थे जो प्रकाश्य आन्दोलन
में भाग लेकर तिलक अथवा गांधी के समान मर्यादा के अधिकारी हो सकते।
इसी से यह विप्लवान्दोलन जन-साधारण से क्रमशः अलग होकर एक संकीर्ण
दायरे की सीमा में बन्द हो जाता है। इस प्रकार प्रकाश्य आन्दोलन के नेता न
हो सकने पर देश की अशिक्षित जनता को अपने आदर्श की ओर नहीं लाया जा
सकता, यह बात भी विप्लव दल के नेता लोग शायद भली भाँति नहीं समझ
सके, या शायद उनके बीच ऐसे उपयुक्त आदमियों का अभाव था इसी कारण
वे बाध्य होकर इस विषय में उदासीन रहे। विप्लव दल में उपयुक्त नेता का

विप्लव का प्रयास व्यर्थ क्यों हुआ ? / 185

अभाव होने से ही भारत के दूसरे राजनैतिक दलों के नेता अनेक बार इस
विप्लव दल को अनेक प्रकार से एक्सप्लायट करते (ठगते) रहे हैं। जो हो,
उससे देश की कोई विशेष क्षति तो भले ही नही हुई, किन्तु विप्लव दल की
दीनता उससे विशेष रूप से प्रकट होती है।
इसके अलावा और जिन सब कारणों से यह विप्लव का प्रयास व्यर्थ
हुआ उनका, 'बन्दी जीवन' मे अनेक जगह प्रसंगानुसार उल्लेख कर आए हैं, यहाँ
उन सब बातों को दुहराने की आवश्यकता नहीं।
किन्तु इस विप्लवान्दोलन के विफल होने के बाद भारत के अनेक विप्लवियो
ने अच्छे कृतित्व का परिचय दिया है। जिन सब गुमनाम युवकों को यहाँ कोई
पूछता भी न था, यहाँ तक कि विप्लव दल में भी जो नेतृत्व नहीं पा सके; देश के
लोग जिन्हें अर्धशिक्षित या साधारण रूप से [शिक्षित कहते थे, विदेश के कार्यक्षेत्र
में उन्हीं युवकों की अनेक प्रकार से अपनी शक्ति का पारचय देने की कहानियाँ
सुनी जाती हैं। सभ्य जगत् मे आज उनका स्थान हमारे देश के विख्यात
नेताओं की अपेक्षा अधिक भले ही न हो, कम नहीं है। लाजपत के समान
नेताओं की अपेक्षा भी इस विप्लव दल के नेताओं ने विदेश में अधिक सम्मान
पाया है, यह बात भी सुनने मे आई है। ऐसा होने का कारण है, इन युवकों ने
संसार के श्रेष्ठ नेताओं के संस्पर्श में आने पर अथवा विदेश की स्वाधीन आबहवा
के संस्पर्श में आने पर देखा है कि उनका वही पुराना गुप्त संकीर्ण पथ ही एक
मात्र पथ नहीं है, और उन्होंने जब नये मार्गों में कदम रखा, तब वह अन्दर की
प्रसुप्त शक्ति अवसर और सुयोग पाकर पूर्ण रूप से विकास पा उठी।
इन सब विदेश-प्रवासी विप्लवियों के जीवन से यह भी जाना जाता है कि
विप्लव दल मे सच ही ऐसे अनेक गुमनाम युवक थे जिनके विषय में हमारे देश-
वासी शायद अब भी कुछ विशेष नहीं जानते –और जो अवकाश और सुयोग
पाने पर शायद एक दिन संसार के श्रेष्ठ विचारकों के साथ एक आसन पर बैठने
लायक हो सकते हैं। पुस्तक पढ़ने या परीक्षाएँ पास करने से ही तो विचारशील
नही हुआ जाता, पुस्तक पढ़ना एक बात है और विचारक (Thinker) होना
दूसरी बात। जगत् के एक श्रेष्ठ विचारक मनीषी हर्बर्ट स्पेन्सर तो मातृभाषा
और फ्रामीसी भाषा के सिवाय और कोई भी भाषा न जानते थे, और ऐसे अनेक
पण्डित हैं जो बहुत भाषाओं के सचमुच पण्डित हैं, किन्तु वे तो हर्बर्ट स्पेन्सर के
समान नहीं हैं। हमारे देश में अनेक लोग थे जो विवेकानन्द की अपेक्षा अधिक
पण्डित थे, किन्तु विवेकानन्द के समान विचारक और कितने हुए हैं? जगत् के
अनेक विचारशील कवियों और दार्शनिकों की जीवन-कथा देखने से यह बात
समझी जा सकती है कि पाण्डित्य और विचारशीलता एक वस्तु नहीं।
'पेड़ जैसे नहीं जानता कि कब उसके फूल फूट निकलेंगे, पक्षी, जैसे नही
जानता कि ठीक कब उसे गाना गाने की चाह होगी। प्राणों की समूची शक्ति में
से उनका उद्यम जागता है, इसलिए उन्हें जैसे सोच-विचार कर इरादा नहीं

186 / बन्दी जीवन
बनाना पड़ता।' उसी प्रकार जो विचारशील हैं, भावुक हैं, जो सचमुच ही
प्रतिभावान् थिंकर्स (विचारक) हैं वे पण्डित हुए बिना भी पोथी पढ़ने या परीक्षाएँ
पास करने में वैसी योग्यता दिखाए बिना भी संसार के अनेक अद्भुत विस्मय-
जनक रहस्यों की घोषणा कर सकते हैं।
विप्लवियों के कार्यकलाप को बहुत लोग पागलपन कहते हैं। वे कहते हैं,
दिमाग़ में कुछ खराबी हुए बिना कोई विप्लव दल में योग नहीं दे सकता।—
विप्लवियों के अन्दर सुनते हैं, सुबुद्धि का—अक्लमन्दी का विशेष अभाव है—
किन्तु रविबाबू ने कहा है,—'सुबुद्धि नाम का पदार्थ मर्त्यलोक में पाया जाता है,
किन्तु ऊँचे दर्जे का जो खालिस पागलपन है वह देवलोक की वस्तु है। इसी से
जान पड़ता है कि सुबुद्धि की गढ़ी हुई चीजें टूट-फूट पड़ती हैं। और पागलपन
जिन चीजों को उड़ाकर लाता है वे बीज की तरह जंगलों के जंगल उगा डालती
हैं।'

तृतीय खंड
सन् 1920 के बाद उत्तर भारत में विप्लववादी आन्दोलन

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1
रिहाई की सूचना
वह दिन आज भी मुझे खूब याद है। जाड़े का मौसम था, और था सन्
1920 का फरवरी महीना। मैं सेल्यूलर जेल के अस्पताल मेंबीमार पड़ा था। एक
क़ैदी-अफ़सर ने आकर मुझे इत्तिला दी कि जेलर साहब आपको दफ्तर में बुला
रहे हैं। सुनते ही सिर से पैर तक आग लग गई। फिर वही बात, फिर वही
दृश्य, फिर वही झगडे की नौबत दिखाई देने लगी। क्योंकि पोर्ट ब्लेयर की सेल्यूलर
जेल में प्रायः ऐसा हुआ करता था कि जेल के अधिकारीगण, क़ैदी-अफ़सर
से लेकर जेलर और सुपरिटेण्डेण्ट तक, वहाँ के राजनैतिक बन्दियों को मौका-
बेमौका, जायज-नाजायज तरीकों से तंग करना चाहते थे। और ऐसे अवसरों
पर जेल के अधिकारीगणों के साथ राजबन्दियों का खूब झगड़ा हो जाता था।
कभी-कभी इन झगड़ो के परिणाम में राजबन्दियों की मृत्यु तक हो गई है। ये
सब बातें अण्डमन के जेल-जीवन के अन्तर्गत आती हैं। लेकिन ये सब बातें किसी
दूसरे स्थान पर लिखने की इच्छा है। यहाँ इतना ही कह देना पर्याप्त है कि मेरे
समय में, और मेरे अण्डमन जाने के पहले भी, उच्च पदस्थ राजकर्मचारियों की
प्रेरणा से ही अण्डमन के जेल अधिकारी राजबन्दियों से इस प्रकार कठोर व्यव-
हार करते थे। इसलिए जब उस क़ैदी अफ़सर ने आकर मुझे जेलर साहब का
हुक्म सुनाया और यह कहा कि जेलर साहब आपको दफ्तर में बुला रहे हैं तो मेरे
मन में स्वतः ही एक विरोध की भावना पैदा हो गई कि मैं तो अस्पताल की
चारपाई पर बीमार पड़ा हूँ फिर भी, इस हालत में भी, जेलर साहब मुझे दफ्तर
में बुला रहे है। फ़ौरन ही मुझे यह ख्याल हुआ कि मुझे अपमानित और तंग
करने के लिए ही जेलर ने ऐसा हुक्म दिया है। यदि मैं नहीं जाता हूँ तो जेलर से
झगडा होता है, और यदि जाता हूँ तो मेरा अपमान होता है; और यदि झगड़े
को बचाने के लिए मैं इस अपमान को भी सह लेता हूँ तो मैं अपने मित्रों की दृष्टि
में गिर जाता हूँ। क्षण-भर के लिए इन सब भावनाओं ने मेरे मन में एक कठिन
समस्या पैदा कर दी। लेकिन उसी क्षण मैंने इन समस्याओं की मीमांसा भी कर
ली। मैंने उस क़ैदी अफ़सर से कहा कि मैं बहुत कमजोर हूँ दफ्तर नहीं जा

190 / बन्दी जीवन
सकता । वह क़ैदी चला गया, लेकिन थोड़ी ही देर में फिर वापस आया और कहा
कि बहुत जरूरी काम है, जेलर साहब आपको दफ्तर में ही बुला रहे हैं। यह सुन-
कर मुझे बड़ी चिन्ता हुई । तरह-तरह के खयाल दौड़ने लगे; कहीं ऐसा तो नहीं
हुआ कि कोई मेरी लिखी हुई गुप्त चिट्ठी पकड़ा गई हो या कोई नया झगड़ा तो
नहीं खड़ा हो गया । बात क्या है कि मैं अस्पताल में बीमार पड़ा हूँ फिर भी
दफ्तर में ही बुलाने पर इस क़दर ज़ोर है। लेकिन मुझे ज्यादा सोचने का मौका
न था । उस दिन मुझे बुखार न था, और न मैं इतना कमजोर ही था कि दफ्तर
तक जा न सकता। ऐसे अवसरों पर घर में तो यह सवाल ही नहीं पैदा होता कि
आवश्यकता पड़ने पर बिस्तर से उठकर किसी से मिलने जाएँ या न जाएँ। यहाँ
तो आत्म-सम्मान का सवाल था। असली बात तो यह थी कि एक राजबन्दी को
बीमार अवस्था में कैसे कोई जेलर दफ्तर बुला सकता है।' अब तो झगड़े की
नौबत साफ नज़र आई, परन्तु मैंने सोचकर निश्चित किया कि झगड़ा नही करना
चाहिए। क्योंकि अभी थोड़े ही दिन पहले काफ़ी झगड़ा हो चुका था। अतः मैं
जितना दुर्बल था उससे कही अधिक दुर्बल बनकर धीरे-धीरे जेलर के दफ्तर
की ओर चल पड़ा । जब जेलर के सामने पहुँचा तो उसने बड़ी प्रसन्नतापूर्वक
दोस्ताने के तौर पर आदर के साथ अपनी कुर्सी के पास एक बेंच पर बैठने को कहा !
मैं तो एक तूफान का इन्तज़ार कर रहा था। यह दृश्य देखकर कुछ चकित्-सा
रह गया । और अभी बैठा भी न था कि जेलर एकाएक कहने लगा, “Cheer up
man, you are released”—‘‘क्या सुस्त हो यार मौज करो, अब तो तुम छूट
गए।” मुझे इस अवसर पर यह संवाद सुनने की आशा न थी यद्यपि मुझे यह
दृढ़ विश्वास था कि थोड़े ही दिनों के अन्दर छूट अवश्य जाऊँगा । 18 अगस्त
सन् 1916 को मैं कालेपानी पहुँचा था। उस दिन से ही मैं सदा यह कहा करता
था कि अपने अट्ठाइसवें साल की अवस्था में मैं अवश्य छूट जाऊँगा । ऐसी
कोई शक्ति नही है जो उस निश्चित समय के बाद भी मुझे जेल में रख सके ।
उस समय कालेपानी में कोई ऐसा राजबन्दी न था जो इस बात को न जानता
हो और जिसने इस बात को लेकर मेरी हँसी न उड़ाई हो । मेरे इस दृढ़
विश्वास के मूल में भृगुसंहिता की एक भविष्यवाणी थी जिसके बारे में अन्य स्थान
पर कुछ लिखूँगा। महायुद्ध शान्त हो जाने के बाद जब मामूली क़ैदियों को तो
बहुत-कुछ माफ़ी दे दी गई थी और राजबन्दियों में से कुछ से यह कहा गया था
कि साल पीछे एक महीने की माफ़ी तुम लोगों की क़ैद में की गई, तब तो अवश्य
मेरे मन में कुछ नाउम्मीदी-सी आ गई थी। इस अवस्था में जेलर ने मुझे मुक्ति
का संवाद सुनाया। लेकिन यह संवाद सुनकर मेरे मन में कुछ विशेष उल्लास
नहीं पैदा हुआ क्योंकि मुझे कुछ ऐसा प्रतीत हुआ कि छूटना तो मुझे था ही, जो
अवश्य होना था वही तो हुआ मानो यह कोई असाधारण बात न थी। इसलिए
मैंने बहुत शान्तिपूर्वक अपनी मुक्ति का संवाद सुना। मेरे इस अस्वाभाविक
शान्त भाव को देखकर जेलर ने कहा, “What is the matter with you

रिहाई की सूचना / 191
young man ? It seems you do not want to go home. Cheer-up
man you are released"—"अरे ! तुम्हें हो क्या गया है ? मालूम पड़ता
हैं कि तुम घर नहीं जाना चाहते । बात क्या है ? तुम खुश क्यों नहीं हो रहे हो ?
मौज करो, अब तो तुम छूट गए।" मैं मुस्कराने लगा । मैं अपने स्थान पर वापस
चला आया । धीरे-धीरे मुक्ति पाने का उल्लास मेरे मन में बढ़ता गया । अस्प-
ताल में जिस जगह मैं रहता था उसके नीचे ही एक नम्बर की बैरक का आँगन
था । इस आँगन में वीरेन्द्र, उपेन्द्र, हेमचन्द्र इत्यादि प्रसिद्ध पुराने क्रान्तिकारी
स्वयं अपना भोजन बनाया करते थे । भारतवर्ष में जो सर्वप्रथम क्रान्तिकारी
षड्यन्त्र का मुकदमा चला था उसी मानिकतल्ला बम केस में इन सबने
आजीवन कालेपानी की सजा पाई थी । कुछ दिन अण्डमन में रहने के बाद मुसी-
बत उठाते-उठाते ये लोग दुर्बल चित्त हो गए थे । मेरे सामने कालेपानी मे राज-
बन्दियों के माथ जेल-अधिकारियों के जितने संघर्ष हुए और उसके परिणामतः
जितनी भूख-हड़तालें एवं काम बन्द रखने की हड़तालें हुईं उनमें से किसी में भी
इन लोगों ने किसी प्रकार का भाग नहीं लिया था, बल्कि मेरी नज़रों मे ये
लोग जेल-अधिकारियों के विश्वासपात्र बन गये थे । इनकी धारणा थी कि
इन सब हड़तालो में भाग न लेने से एवं जेल-अधिकारियों के पक्ष मे रहने से
सम्भव है, छूटने में बहुत-कुछ सहायता मिले । इसलिए इन लोगों ने अन्य
राजबन्दियों के विरुद्ध जाकर हमेशा जेल-अधिकारियों का ही पक्ष लिया था ।
इन सब बानो से राजत्रन्दियों की श्रद्धा इनकी तरफ से हट गई थी । इधर
ये लोग भी यह ममझते थे कि जेल-अधिकारियों से हमेशा संघर्ष करने का
परिणाम क्या होता है । यह इन दूमरे राजबन्दियों को तभी मालूम पडेगा ऐन
वक़्त पर, जब उनकी रिहाई के प्रश्न पर विचार करने का अवसर आएगा ।
परन्तु मैने तो जिस दिन मे कालेपानी मे कदम रखा था, उमी दिन से लेकर
मुक्ति पाने के दिन तक हमेशा जेल-अधिकारियों के खिलाफ़ राजबन्दियों का
पक्ष ही अपनी सामर्थ्य के अनुसार ग्रहण किया था। इसलिए जब मुक्ति का
आनन्दप्रद समाचार मुझे मिला तो मेरे दिल में सर्वप्रथम यही इच्छा हुई कि इन
दूरदेश सावधान राजबन्दियों को जाकर अपनी मुक्ति की बात सुनाऊँ और यह
समझा दूँ कि राजनीति के मार्ग में दूरदेश और सावधान रहने से ही हमेशा लाभ
नहीं होता है । मन में यही भाव भरे हुए, जेलर के पास से लौटकर मैं सीधा
बरामदे में आकर खड़ा हो गया और उपेन्द्रनाथ को बुलाकर अपनी मुक्ति की
बात सुनाई । उपेन्द्रनाथ आए, मेरी बात सुनी, मुझे बधाई दी या न दी, मुस्कुरा-
राहट की रेखा चेहरे पर आई भी न थी कि उन्होंने सिर नीचा कर लिया और
मुँह लटकाकर वापम लौट गए । मैं अपनी चारपाई पर लौट आया । आज साढ़े
अठारह वर्ष के बाद मुझे यह याद नहीं है कि चारपाई पर आकर मैंने क्या सोचा
और उस समय मेरे दिल पर क्या गुजरी । इतना अवश्य याद है कि मैं मुक्ति
का संवाद पाकर चंचल नहीं हुआ था । केवल एक भावना सर्वोपरि मुझे विकल

192 / बन्दी जीवन
कर रही थी। मैं यही सोचकर परेशान हो रहा था कि कैसे मैं अपने साथियों के
सामने आकर खडा हूँगा। जिस क्षण मैंने यह सुना कि मैं मुक्त हो गया हूँ बस
जेल मे रहते हुए भी उसी क्षण से मैं यह एकाएक अनुभव करने लगा कि मैं अब
इस जगह का रहनेवाला नही हूँ मानो मैं यहाँ अतिथि हूँ, दो घडी ठहर कर बाद
को चला जाऊँगा। मेरे और सब साथियो के चेहरे जब मुझे याद आए और
उनके आजन्म द्वीपान्तर वास का दंड उनके चेहरो पर लिखा देख रहा था तो
मेरे लिए यह दृश्य असहनीय हो गया। इस दृश्य को देखते हुए मै अपनी मुक्ति
के आनन्द से कुछ भी हर्षोत्फुल्ल नही हो पाया। मुझे इस समय याद नही कि उस
दिन मेरे साथ अस्पताल मे ओर भी कोई राजबन्दी थे या नही।
जेलर ने हमे बतलाया था कि अभी हमे करीब बीस दिन अण्डमन जेल मे ही
रहना पडेगा। कैदियो को ले जानेवाला जहाज अभी अन्यत्र गया हुआ है। यह
जहाज वापस आएगा तभी मुझे उस पर सवार कराया जाएगा, इन बीस दिनो
तक मुझे जेल के अन्दर ही रहना पडेगा। जेल का ही भोजन नसीब होगा और
दूसरे कैदियो की तरह रात को कोठरी मे ही सोना पडेगा। मैन एक बार यह
आग्रह किया था कि कम-से-कम एक दफा तो मुझे जेल के बाहर अण्डमन टापू
का दृश्य देखने का मौका दिया जाए। आजन्म कालेपानी की सजा लेकर आए,
चार साल तक जेल के अन्दर ही रहे, अब जन्मभूमि की तरफ लौटने के पहले
तो एक स्वाधीन व्यक्ति की तरह अण्डमन टापू को देखने का मौका मिले। लेकिन
मेरी प्रार्थना स्वीकार नही की गई। यह अजीब परिस्थिति थी कि मै रिहा भी
कर दिया गया था, लेकिन बीस दिन तक जेल के बाहर भी नहीं जा सकता था।
खाना, पीना, रहना जेल के अन्दर ही दूसरे कैदियो की तरह ही होना रहा।
आजन्म कालेपानी की सजा पाकर साल के प्रति दिन, प्रति घडी जिस सुअवसर
की बाट जोह रहा था वह दिन आ गया। लेकिन जब वह दिन आया तो वह
कल्पनातीत हर्ष मैने क्यो नही अनुभव किया ? इसका उत्तर आज भी मैं ठीक
तरह से नही दे सकता। दूसरे बहुत-से कैदियो को मैंने छूटते हुए देखा। उन
कैदियो के हर्षोद्वेग की सीमा नही रहती थी। वे आपे से बाहर हो जाते थे, स्वप्ना-
विष्टो की तरह विह्वल होकर वे इधर-उधर घूमा करते थे। मुझे ठीक मालूम
है कि मै विह्वल नही हुआ। सम्भव है कि अपने दूसरे साथियो की अवस्था को
सोचकर अनजाने ही मैं अपने हृदयावेग को सहज तरीके से सहन कर पाया।
ऐसी परिस्थिति मे अस्पताल को छोडकर अपनी बैरक मे मैं अपने साथियो के
बीच वापस आया।
अस्पताल से अपनी बैरेक मे लौटने तक जेल-भर मे यह समाचार फैल गया
कि भारत के सर्वप्रथम षड्यन्त्र केस के कैदी वारीन्द्र, उपेन्द्र एव हेमचन्द्र भी
छूट गये हैं। और वे भी मेरे साथ एक ही जहाज मे स्वदेश लौटेगे। उन्हे भी मेरी
तरह अभी बीस दिन तक और जेल मे ही रहना पडेगा।
बैरक मे पहुँचते ही मेरे सब साथी मेरे पास आ खडे हुए, चारो तरफ से मुझे

रिहाई की सूचना / 193
घेर लिया और सब बातें पूछने लगे । अपने कल्पना-नेत्रों से जो चित्र मैंने देखा
था वही दृश्य मेरे सामने आया । अभी दो-एक दिन ही पहले जिन साथियों के
साथ हम अपने बन्धन के दिन बिता रहे थे, आज उन्हीं साथियों के बीच होते हुए
भी कैसे उन्हें गैर समझने लगे मानो मैं और मेरे वे साथी दो अलग-अलग दुनिया
के निवासी हैं । यह बात कहने की न थी, हमसे प्रत्येक ने अपने मर्म स्थान में
इस बात का अनुभव किया । एक तरफ मुझमें आनन्द की दबी हुई आशा थी,
दूसरी तरफ वेदना की स्फुट व्यंजना। यह अजीब परिस्थिति थी अपने अनजान
में ही मैं यह अनुभव कर रहा था । अपने स्वाभाविक अभूतपूर्व कल्पनातीत
आनन्द को व्यक्त करना इस अवस्था में तो नितान्त अपराध ही हो गया । इस
प्रकार से अनजाने ही प्रतिक्षण अपने भावों को छिपाने का व्यर्थ प्रयास करता
रहा ।
सम्भव है, मेरे साथियो के मन मे बन्धन में पड़े रहने की वेदना के साथ
मुक्ति पाने की भी क्षीण आशा की झलक दिखलाई दी हो; सम्भव है कि
भविष्य में मुक्ति न पाने की आशंका से वे अत्यन्त वेदना का अनुभव कर रहे
हो ।
उनमे से जो सबसे कम उम्र का युवक था उसने मुझसे एक पुस्तक स्मृति-
चिह्न-स्वरूप मांगी। मैं उस समय सब-कुछ दे सकता था, मैंने सहर्ष अपनी पुस्तकों
में से एक पुस्तक उसे दे दी । इस प्रकार मैंने अपनी सब पुस्तकें सेल्यूलर जेल-
निवासी बहुत से राजबन्दियों को स्मृतिचिह्न-स्वरूप दे दीं । मेरे लिए पुस्तकों से
अधिक और कोई प्रिय वस्तु नहीं है । मैं कोई धनी व्यक्ति नहीं था । चौदह-
पन्द्रह वर्ष की अवस्था में ही मेरे पिता का देहान्त हो गया था । पिताजी इंश्यो-
रेंस इत्यादि मे कुछ छोड़ गए थे, उसी से हम चार भाइयों तथा मेरी विधवा माता
का निर्वाह हो रहा था। मुक्ति के बाद भी, इन पुस्तकों में से कुछ तो आजकल
अप्राप्य ही हैं, तथापि उनके लिए जो जीते-जी कब्र मे रह गए, उसी कब्र से
मुक्ति पाने के दिन मैं क्या न दे सकता था । केवल एक पुस्तक मैंने अपने पास
रख ली । वह पुस्तक थी, ईसाइयों की धर्म-पुस्तक — होली बाइबिल और इसमें
मेरे पिताजी के हस्ताक्षर थे । मैंने अपने साथियों को जो पुस्तकें दे दी थीं उनमें
से जिनके नाम मुझे याद हैं, वे हैं—

  1. Liberation of Italy by Countess Matrinengo ceseresco.
  2. Life of Voltaire by Morley.
  3. Life of Rousseau by Morley.
  4. Life of Gladstone by Morley.
  5. बुद्ध जीवनी—डॉ० रामदास सेन ।
    6 दो-तीन वर्ष के भारतवर्ष और प्रवासी मासिक पत्रों की फाइलें ।
    अन्य लगभग आठ-दस पुस्तकें भी थी, जिनका नाम मुझे इस समय याद नहीं
    है। इनमें पहली पुस्तक आजकल लाइब्रेरियों में छोड़कर अन्यत्र नहीं मिल रही

194 / बन्दी जीवन
है। और बुद्ध-जीवनी दुष्प्राप्य है। वारीन्द्र और हेमचन्द्र के पास सौ-दो-सौ से
भी अधिक अति उत्कृष्ट पुस्तकें थीं। ये सब पुस्तकें वे अपने साथ वापस ले आए
थे। जहाज आने मे अभी कुछ दिन बाकी थे कि इतने में खबर आई कि सन्
1919 के पंजाब के मार्शल-ला मे सजा पाए कें दियो मे से अठारह कैदी रिहा किये
गए, ये भी सब मेरे ही साथ एक ही जहाज मे भारत वापस भेजे जाएँगे।
बैरक मे लौटने के बाद यह भी पता चला कि जिस दिनसुबह जेलर ने मुक्ति का
संवाद सुनाया था, उमी दिन करीब दम-ग्यारह बजे जेल के सुपरिटेण्डेण्ट ने
वारीन्द्र, हेमचन्द्र और उपेन्द्र को भी उनके मुक्त होने का संवाद सुनाया
था। वारीन्द्र और हेमचन्द्र हमेशा दफ्तर आया-जाया करते थे। जेल के अन्दर
एक छोटा-सा छापाखाना था। इसका सब काम वागीन्द्र के सुपुर्द किया गया
था। जेल मे जिल्दसाजी का काम भी होता था। यह काम हेमचन्द्र के सुपुर्द था।
अपने काम के सिलसिले मे ये हमेशा दफ्तर आते

रिहाई की सूचना / 195
तब मेरी शादी अवश्य होनी ही है। मुझे अभी भी भारतीय फलित-ज्योतिष में
विश्वास है। मैं इसे कुसंस्कार नहीं समझता। और यदि यह कुसंस्कार हो भी तो
क्या हानि है; मुसीबतों के दिनों में तो मुझे इस संस्कार ने सहारा ही दिया।
गिरफ़्तार होने के पहले मेरी मां ने मुझे बतलाया था कि मेरी जन्मपत्री
बनारस के प्रसिद्ध भृगुसंहितावालों को दिखलाई गई थी। उन्होंने मेरे जीवन के
अतीत, वर्तमान एवं भविष्य के बारे में जो कुछ बतलाया वह अक्षरशः सबका
सब सही निकला। मेरी गिरफ़्तारी का समय, शत्रु-परिवेष्ठित रहने का काल,
मुक्ति पाने एवं विवाह का समय, पुनः गिरफ़्तारी होने का काल, ये सबकी सब
बातें मैंने बिलकुल सही पाईं। फ़रार हालत में अदूर भविष्य में विवाह होने की
सम्भावना से अपने दिल को मैंने इस तरह तसल्ली दी कि आख़िर यह सब झंझट
और मुसीबत के दिन शीघ्र ही व्यतीत हो जाएँगे, नहीं तो शादी कैसे सम्भव हो
सकती है। जिस दिन मां के मुंह से मैंने यह सब भविष्यवाणी की बातें सुनी थीं
उसी दिन से मैं मन-ही-मन शादी के लिए तैयार हो गया था। इसके पहले हज़ारों
कोशिशें होने पर भी एवं हज़ारों प्रलोभन दिलाने पर भी मैं शादी के लिए तैयार
नहीं हुआ था। लेकिन भविष्यवाणी के कारण फ़रार हालत में विवाह की
भावना सुखकर भी थी और यह सब प्रकार के फ़सादों से निष्कृति पाने का
इंगित भी था। मन में सोचा, चलो अब क्या है, विवाह कर ही लेंगे। अनिर्दिष्ट
काल के लिए फ़रार रहना और सुनिर्दिष्ट काल के अन्दर विवाह होना भला यह
भी कोई समस्या है जिसकी मीमांसा में कोई परेशानी हो सकती है ! इस मनो-
वृत्ति से कालेपानी में मुसीबत के दिन बिताने में मुझे बहुत सहायता मिली।
आजन्म कालेपानी की सज़ा कोई दिल्लगी तो है नहीं। कितने ही राजबन्दी
इस बोझ से दब से गये थे। मानो सर्वांग पर किसी ने रोलर-सा चला दिया हो।
ऐसी अवस्था में विचारे वारीन्द्र और उनके साथी झूठे आश्वासन पर भी भरोसा
करने लगे थे। और अन्य राजबन्दीगण मजबूरी का नाम सब्र, इस कहावत को
अक्षरशः सिद्ध कर रहे थे।
दुर्भाग्यवश जिस सुपरिटेण्डेण्ट ने रिहाई का दिलासा दिलाया था, उसी ने
युद्धावसान का दिन मनाने के अवसर पर वारीन्द्र वग़ैरह को दफ़्तर में बुलाकर
यह हुक्म सुना दिया कि सरकार ने तुम्हारी सज़ा में साल पीछे एक महीना माफ़ी
दे दी है। और हम लोगों को जो अभी तक जेल के अधिकारियों के साथ झगड़ते
आए थे, बुलाकर यह हुक्म सुनाया गया कि यदि हम और साल-भर ठीक चाल-
चलन दिखाएँ तो इसके बाद हम लोगों को भी साल पीछे एक महीने की माफ़ी
दी जायगी।
यह खबर सुनकर वारीन्द्र वग़ैरह को दिन में तारे दिखने लगे थे। और हम
सब खुश हुए थे।
मैं अपनी बात जितनी निश्चयतापूर्वक कह सकता हूँ, दूसरों के मन की बात
उतने निश्चयात्मक रूप से कैसे कह सकता हूँ ! महायुद्ध के अवसान पर अंग्रेज़ों

196 / बन्दी जीवन

ने जो खुशी मनाई उस सिलसिले में बर्मा के तमाम राजबन्दियों को सरकार ने
छोड़ दिया। दूसरे मामूली कैदियों में से भी पुराने कैदियों को छोड़ दिया। यह
सब देखकर भारत के राजबन्दियों के मन में कुछ नाउम्मीदी अवश्य हो गई थी,
तथापि मेरे मन में सांत्वना बनी रही। आशा की छलना से संसार-भर के मनुष्यों
का निर्वाह होता है। मेरी आशा तो सत्य के आधार पर बनी हुई थी तथापि यह
भी सच है की कभी-कभी निराशा के अंकुर ने मुझे भी चंचल किया था। भागते
हुए पक्षियों की छाया की तरह यह दुर्भावना आई और चली गई। मैं अपने पढ़ने में
लगा रहा। उन दिनों मिल की लिखी हुई 'प्रिंसपल्स ऑफ़ पॉलिटिकल एकॉनमी'
पढ़ रहा था। किताब पढ़ चुका था। इतने में एक दिन करीब तीन बजे शाम को
रायटर का तार छपने के लिए आया। तार की अधूरी भाषा से जाहिर हो रहा
था कि बादशाह ने राजबन्दियों की रिहाई के बारे में कुछ ऐलान किया है। बस,
उस दिन से लिखना-पढ़ना चौपट हो गया। सिवा एक चर्चा के कि कब छूटेंगे,
कौन छूटेगा, क्या होगा, क्या न होगा, और कोई बातें ही न रही। खाते-पीते,
लेटते-जागते हर घड़ी वही चर्चा और वही चिंता। बारीन्द्र दौड़-धूप करके दफ्तर
से 'बंगाली' नाम के अखबार की एक प्रति ले आए, जिसमें बादशाह की घोषणा
छपी हुई थी। वह पढ़कर जैसे आशा का संचार हुआ, वैसे ही दूसरी तरफ इस
दुर्दमनीय सन्देह ने भी हम सबको बेचैन कर दिया कि बादशाह की घोषणा में
यह तो अवश्य था कि ज्यादा-से-ज्यादा राजबन्दियों को छोड़ दिया जाय, लेकिन
इसके साथ यह भी एक वाक्य था कि 'भारत के बड़े लाटसाहब जिस किसी को
भी ऐसा समझें कि उसके छोड़ने से अभी उपद्रव की सम्भावना है, तो उसे वे नहीं
भी छोड़ सकते हैं।' अब हम लोगों में धुकधुकी पैदा हुई। जाने लाटसाहब किसे
क्या समझें। दुःस्वप्न की भयानक छाया की तरह यह विभीषिका हम लोगों के मन
में हर घड़ी बनी रही। हम लोगों में से अब किसी को चैन न रहा। लेकिन मेरी
आशा अब और बलवती हो गई। जब मैं पहले-पहल कालेपानी में आया था और
यहाँ के राजबन्दियों के साथ मैंने अपने अदूर भविष्य में छूटने की भविष्यवाणी के
बारे में बात की थी, तो सबों ने मेरी हँसी उड़ाई थी एवं उपेन्द्र वगैरह ने यह
कहा था कि 'अंग्रेजों की हुकूमत रहते हुए तो तुम छूट नही सकते।' इस पर मैंने
कहा था कि 'यदि मेरे छूटने के लिए अंग्रेजी हुकूमत का अन्त होना आवश्यक है,
तो अंग्रेजी हुकूमत का अन्त अवश्य होगा, क्योंकि मुझे छूटना तो अवश्य है ही।'
अवश्य ही ये सब बातें हँसी-मजाक के तौर पर होती थीं। दिल बहलाने का यह
एक तरीका था। इसी सिलसिले में बारीन्द्र और उपेन्द्र ने उल्लासकर की कही
हुई एक बात सुनाई थी कि अब बड़े कठिन आदमियों से पाले पड़े हैं, ये हमारे हाड़
खाएँगे, मांस खाएँगे, चमड़े से डुगडुगी बजाएँगे। बादशाह का ऐलान होने के
बाद मैंने इन लोगों से कहा, 'कहो अब कैसी रही !' फिर कुछ दिन ऐसे ही बीते।
न कोई छूटा, न छाटा। न लिखने-पढ़ने में मन बहले और न काम करने में ही
दिल लगे। इतने में एक दिन बारीन्द्र ने आकर खबर सुनाई कि चीफ कमिश्नर

रिहाई की सूचना / 197
के पास मेरे भाई का एक तार आया है जिसमे पूछा गया है कि क्या राजबन्दी
शचीन्द्रनाथ छूट गए ? फिर आशा और निराशा के झूले मे हम लोग झूलने लगे ।
फिर कही कुछ नही । शायद इस दर्मियान एक सिख राजबन्दी छूट गया । मैं
अस्पताल मे चला गया । गाखिर अम्पताल मे ही मुझे यह बात बहुवाछित शुभ-
सवाद मिला ।

2
कालेपानी से विदाई
जहाज़ की इन्तज़ारी करते-करते वे बीस दिन भी बीत गए। जहाज़ में चढने
के दिन जितने क़रीब आए, उतने ही एक आनन्द के साथ एक उतनी ही काली
छाया भी मन को घेरे रहती थी। हर घड़ी मेरे मन में यही ख्याल बना रहता
था कि कैसे मैं अपने साथियों को इस संकटपूर्ण स्थान में असहाय अवस्था में छोड़-
कर जाऊँ ! सबसे मैंने यह वादा किया कि देश में पहुँचते ही उन लोगों को छुड़ाने
के लिए मैं भरसक प्रयत्न करूँगा। मानो, मेरे पास यही एक बात थी जिससे मैं
अपने साथियों को सांत्वना दे सकता था।
इस समय भाई परमानन्द एकाएक कोठरी में बन्द कर दिये गए थे। यह
वही परमानन्द है, जो आजकल हिन्दू महासभा के महा कट्टर नेता है। सुनने में
आया था कि पंजाब के अखबारों में परमानन्दजी की धर्मपत्नी ने परमानन्दजी
के बारे में कुछ छपवाया था। इसी कारण से उन्हें कालेपानी में दिन-रात कोठरी
मे बन्द कर दिया गया था। अपने साथियों से मैंने यह भी वादा किया कि भाई
परमानन्दजी के बारे में भी देश वापस लौटकर मैं जो कुछ कर सकूँगा, करूँगा।
एक दिन प्रातःकाल जाने की तैयारी होने लगी। मैंने यह अच्छी तरह से देखा
कि पंजाब के मार्शल-लॉ के अठारह बन्दी एवं वारीन्द्र और हेमचन्द्र तथा उपेन्द्र
खुशी से फूले नही समा रहे थे। मुझे तो अपने आंसू पीकर हट जाना पड़ा। मानो
बादल उमड रहे हो, पानी गिरने ही वाला है। जेल से छूटने पर जो कपडे दिए
जाते है, वे हमे दिये गए। वारीन्द्र ने अपने छूटने की आशा में पहले ही कुछ कपड़े
मँगा लिये थे। उसमे से मुझे उन्होंने एक धोती और एक कोट दिया। मेरा ख्याल
है कि उन्होने मुझे तीन रुपये भी दिए थे। बाकी खर्च तो सरकार का ही था।
छूटते समय भी दो-दो करके हम सब छूटनेवालों को कतार में खड़ा कर दिया
गया। छूटने के दिन भी डिसिप्लिन के साथ फाटक की तरफ चले। जिस दिन मैं
कालेपानी आया था, उस दिन भी मुंह पर हंसी थी, जी में रुआंसा था। आज
छूटने के दिन भी मुंह पर हँसी थी, जी में रुआंसा था। मुझे खूब याद है जिस
दिन सर्वप्रथम मैं कालेपानी पहुँचा उस दिन मेरे मन में क्या भावनाएं थी। एक

कालेपानी से विदाई | 199

तो मुझे दृढ़ विश्वास था कि मैं जल्दी छूट जाऊँगा, इसलिए मेरे दिल में वेदना का
असर ज्यादा न था। दूसरी बात यह थी कि मेरे मन में यह आशा थी कि बारीन्द्र,
उपेन्द्र इत्यादि जो बहुत-से राजबन्दी पहले ही से कालेपानी में हैं, वे अवश्य ही
दूसरे आनेवाले राजबन्दियों के लिए रास्ता साफ़ कर रहे होंगे। इसलिए मुसीबत
को सामने देखते हुए भी उस दिन मन ज्यादा चंचल नहीं हुआ था। लेकिन दो-
चार दिन में ही मेरा यह माया-जाल छिन्न-भिन्न हो गया। जितने दिन बीतते
गए, रुआँस भी बढ़ती गई। आज छूटने के दिन रोने की तबीयत हो रही थी
और हर्ष जी में छिपा हुआ था। जैसे-जैसे समय बीतता गया, वैसे ही हर्ष की
मात्रा बढ़ती गई और निरानन्द का भाव लुप्त होता गया। लेकिन छूटने के दिन
सचमुच आँसुओं को रोकना एक मुसीबत हो गई।
फाटक के बाहर आते ही पंजाब के सिख राजबन्दीगण गगनभेदी निनाद से
दस दिशा कम्पित करके 'सत्य श्री अकाल' के नारे लगाने लगे। एक ने कहा—'जो
बोले सो निहाल' और सबों ने प्रत्युत्तर में एक स्वर से कहा—'सत्य श्री अकाल'।
फाटक के अन्दर तक कठिन डिसिप्लिन था। फाटक के बाहर भी एक प्रकार से
जेलखाना ही था। लेकिन जब ये नारे लगने लगे, तो जेलखाने के अधिकारीगण
ताकते ही रह गए। लेकिन जितने जोरों से यह नारे लगने लगे उतने ही तीव्र रूप
से मेरे हृदय को यह आघात लगने लगा कि जेल के अन्दर जितने राजबन्दी इस
घड़ी बन्द हैं और जो कोठरियों में पड़े हुए हैं उनके हृदयों पर इस निनाद का क्या
असर पड़ता होगा ! हर एक नारे के साथ मेरे रोएँ-रोएँ खड़े हो जाते थे। सुबह का
समय था, चारों दिशा मे शान्ति विराज रही थी। दिग्दिगन्त-व्यापी समुद्र फैला
हुआ था और उसके बीच में छोटी-छोटी पहाड़ियाँ हरे पेड़ और पौधे से भरी हुईं
अपूर्व शोभा दे रही थी। सिख लोगों के लगाये हुए नारे चारों दिशाओं में गूँज रहे
थे। लेकिन क़तार अभी बनी हुई थी और वैसे ही पूर्ववत् हम लोग जोड़े-जोड़े से
खड़े हुए थे। जब कई बार नारे लग गए तो हम लोग आगे बढ़े। नारों की जगह
अब पंजाबी भाषा में गाने होने लगे। उसकी एक कड़ी मुझे आज भी याद है—
'चिड़ियों से मैं बाज लड़ाऊँ, तभी गोविन्दसिंह नाम धराऊँ।' पहले की ही तरह
से दो-तीन आदमी इस गाने की एक कड़ी को शुरू करते; बाद को तमाम
आदमी उसे दुहराते। अब तो मेरी आँखों मे आँसू भर आए। अभी तक एक भावना
दिल मे दबी हुई थी, अब वह उमड़ पडी। अण्डमन में रहते हुए प्रत्येक दिन मैने
जी-जान लड़ाकर यह प्रयत्न किया था कि छूटने के बाद फिर से राजनीति मे काम
करने के लिए अपने को सर्व प्रकार से उपयुक्त बनाऊँगा। जिस दिन मुझे मुक्ति
का संवाद मिला, उस दिन एक क्षण के लिए मेरे दिल मे यह खयाल हुआ कि जिसके
लिए मैंने आज तक तैयारी की है वह समय आज आ गया। क्या मैं अब उस दिन
के लिए तैयार हूँ ? सिखों के ये गाने सुनकर कल्पना के नेत्रों से हम मुगल-जमाने
के दृश्य देखने लगे। गुरु गोविन्दसिंह ने चिड़ियों से बाज को परास्त किया था।
आज इस नवीन युग मे एक नवीन गुरु गोविन्दसिंह की आवश्यकता है। मैंने मन-