सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

© CHOWKHAMBA VIDYABHAWAN
(Oriental Booksellers & Publishers)
CHOWK (Behind The Benares State Bank Building)
Post Box No. 69
VARANASI 221001
Third Edition
1982
Price Rs. 15-00
Also can be had of
CHAUKHAMBA SURBHARATI PRAKASHAN
(Oriental Booksellers & Publishers)
K 37/117 Gopal Mandir Lane
Post Box No. 129
VARANASI 221001

समर्पण
मज्जीवननिर्मातॄणां सदा सहजवात्सल्यरसवर्षिणां ‘भागलपुरस्थ’-
राजकीयसंस्कृतमहाविद्यालये व्याकरणविभागाध्यक्षाणां गुरु-
कल्पानां स्वाग्रजानां न्याय-व्याकरण-साहित्याचार्याणां
परमविदुषां श्री पं० मदनमोहनझाशर्म-
महानुभवानां पावनकरकमलयोः

प्रस्तुत पृष्ठ पर कोई प्रत्यक्ष या स्पष्ट मुद्रित पाठ नहीं है। यह एक रिक्त पृष्ठ (flyleaf/blank page) प्रतीत होता है, जिस पर केवल पिछले पृष्ठ की छपाई का धुंधला प्रतिछाया (bleed-through/show-through) दिखाई दे रहा है।

अत्यधिक धुंधला और अस्पष्ट होने के कारण इसे प्रामाणिक रूप से पढ़ना और लिप्यंतरित करना संभव नहीं है (शीर्षक संभवतः समर्पणम् या निवेदनम् जैसा प्रतीत होता है, किन्तु नीचे की पंक्तियाँ पूर्णतः अपठनीय हैं)।

कृपया इस पृष्ठ के विपरीत (दूसरे) पक्ष का स्पष्ट चित्र प्रदान करें ताकि उसका सही और शुद्ध लिप्यंतरण किया जा सके।

साम्प्रतिकप्रसिद्धचप्रसिद्धी मूलतः कारणे कस्याप्यु-
त्कर्षापकर्षयोरिति । एतत्तु महामहिम्नो भगवतः कालस्यैव माहात्म्यं येन कदा-
चित्कोऽप्युपचीयतेऽपचीयते वा ।
तस्माद्ये केऽपि कृतविद्याः सुरभारत्याः श्रीवर्धने मनागप्यायासमकुर्वंस्ते
सर्वेऽपि नः परमादरपात्रम् । अस्तु तस्यैव महामहिमशालिनः कालस्य प्रभावा-
दस्यां शताब्द्यां पुनरौचित्यवादो विदुषां ध्यानमाकर्षत् । येन यत्र तत्र तच्चर्चा
प्रारब्धा, पत्र-पत्रिकादिषु विवेचना स्थानमलभत, विद्वत्समाजे विचारविनिमय-
कोटिमाश्रयच्च ।
इत्थमयं वादो ममाप्यन्तःस्थलं स्प्रष्टुं प्राभवत् । हठादहं परिणाममननुसंधायैव
तद्वादव्यापिकाया 'औचित्यविचारचर्चाया' व्याख्यां विधातुं प्रत्यज्ञासिषम् ।

Everything is ready to output.आत्मोद्गारः
अये विद्या

( ८ )

गुरु-चरण-संस्मरण-सञ्जातावबोधोऽहमस्याः संस्कृत-हिन्दी-समन्वितां प्रभा-
भिधां व्याख्यां सकलान्यकार्यसंपादनेन सहैव षण्मासाभ्यन्तरे पूर्णतामनयम् ।
व्याख्येयं कीदृशी सम्पन्नैत्यत्र सहृदया विद्वांस एव प्रमाणभूताः । अस्या व्याख्यायाः
प्रभेतिनामकरणे प्रभानाम्नी स्तनन्धया मदङ्गजा प्रेरिका ।
तदानीमहं वैद्यनाथधामस्थगुरुकुलमहाविद्यालयेऽध्यापनं कुर्वाण आसम् ।
गुरुकुलञ्चावासीयः ( Residential ) विद्यालयो भवति । आवासीयविद्यालया-
ध्यापकस्य च जीवनं रात्रिन्दिवं व्यस्तकार्यक्रमसंचालन एव व्यत्येति । अस्यां
स्थितौ यद्यपि एकान्ताध्यवसाय-साध्यं व्याख्याकार्यं मम कृते दुष्करप्रायमासीत्,
तथापि तत्रत्यानां प्राचार्याणामुदार-शासन-प्रणाल्या, पुस्तकालयाध्यक्षाणां सह-
योगात्मकप्रवृत्त्या, मित्रवराणां समुत्साहकप्रकृत्या च नितरामुत्साहितोऽहं कथंकथ-
मपि कृतकृत्योऽभवम् ।
एतदर्थमहं वैद्यनाथधामस्थ-गुरुकुलमहाविद्यालयस्य प्राचार्येभ्यः श्री पं० महा-
देवशरणमहाभागेभ्यः तदानींतन-तत्रत्य-पुस्तकालयाध्यक्षेभ्यः श्री पं० उमाकान्त-
शास्त्रिमहानुभावेभ्यः, प्रियसहृच्छ्रीजगन्नाथपाठकमहोदयेभ्यस्तथाऽन्येभ्योऽपि सह-
कर्मिभ्यः कृत विविध-सहायेभ्यः हार्दिकाननेकान् धन्यवादानर्पयामि ।
सहैव स्वसतीर्थ्यस्य स्वान्तेवासिनश्च व्याकरणसाहित्याचार्यस्य श्री पं० विद्यानाथ
मिश्र एम. ए. महोदयस्यापि प्रयासो न मे विस्मरणीयः, यस्मान्ममैतत्पुस्तक-
प्राप्तिरभूत्, अतः सोऽपि धन्यवादार्हः ।
सर्वतो धन्यवादार्हास्तु श्रेष्ठि-श्रीजयकृष्णदासहरिदासगुप्तमहानुभावाः, येञ्चै-
तत्प्रकाशनमङ्गीकृत्य मत्प्रयासः सफलीकृतः ।
अन्ते च सकल-सहायक-विदुषामाभारमावहन्नहं वक्तव्यमिदं संवृणोमि ।
यद्यनया व्याख्ययाऽध्येतृध्यापकानां भविष्यति मनागप्युपकारस्तदैवाहं कृत-
कृत्यो भविष्यामि प्रयासं वा सफलं मंस्ये । अलमतिविस्तरेण । शमिति !
सप्रणयावनतस्य
व्रजमोहनस्य

अवतारणा
कृतारिवञ्चने दृष्टिर्येनाञ्जन-मलीमसा ।
अच्युताय नमस्तस्मै परमौचित्यकारिणे ॥ ( क्षेमेन्द्र )
आचार्य क्षेमेन्द्र ने प्रकृत पुस्तक—औचित्यविचारचर्चा—का आरम्भ इसी
मङ्गल पद्य से किया है और मैं भी अपनी इस 'अवतारणा' की अवतारणा इसी
पद्य से कर रहा हूँ । ऐसा इसलिये करना पड़ रहा है कि औचित्य-तत्त्व के
विश्लेषण में प्रवृत्त होने पर सर्वप्रथम ध्यान उस जगन्नियन्ता परब्रह्म परमेश्वर
की ओर बरबस चला जाता है जिसने अपनी लीला द्वारा संसार में औचित्य की
प्रतिष्ठा की ।
वस्तुतः भारतीय वाङ्मय में 'अवतारों' की कल्पना औचित्य के ही आधार
पर की गई है । परमात्मा ने अपने विविध अवतारों के द्वारा, औचित्य के
स्वरूप को परिस्फुट किया है, औचित्य की सर्वतोभावेन रक्षणीयता का मङ्गलमय
उपदेश सांसारिक मानवों को दिया है ।
मत्स्य से लेकर कल्की पर्यन्त अवतार-परम्परा औचित्य की ओर ही इङ्गित
करती है । जब जैसा उपयुक्त था तब वैसा अवतार हुआ । जब दुर्दान्त दानव
हिरण्यकशिपु का विनाश करना था तब तदुचित-तदुपयुक्त भीषण नरसिंह रूप
में परमात्मा ने अवतार लिया और जब अमृत-पान के अवसर पर दानवों को
छलने का प्रसंग उपस्थित हुआ तब छल के लिए परमोपयुक्त मोहिनीरूप
धारण कर अपने नयनों को कज्जल-मलिन बनाने में भी संकोच नहीं किया ।
औचित्य से कदापि च्युत नहीं होने के कारण भगवान् का 'अच्युत' नाम
सर्वथा सार्थक तथा उपयुक्त है । इस तरह यह स्वतः सिद्ध हो जाता है कि
औचित्य एक ईश्वरीय तत्त्व है—भागवत गुण है ।
परमात्मा ने अपने नानाविध अवतारों के द्वारा जिस औचित्य का उपदेश
किया, मानव-जगत् उसका पालन-पोषण व्यवहाररूप में सर्वथा न भी कर सका
हो, पर सिद्धान्तरूप में उसने उसको सर्वात्मना स्वीकार किया इसमें सन्देह नहीं
है । कारण यह कि अनादिकाल से लोक में उसी व्यवहार को सद्व्यवहार
२ औ० भू०

[Page-Header: ( १० )]

माना जाता है जो औचित्य के ऊपर अवलंबित रहता है और उसी व्यवहार की
संज्ञा दुर्व्यवहार है जिसके साथ औचित्य का आधार नहीं होता ।
एक तरह से व्यवहारों के समूह का ही नाम लोक है। पिता-पुत्र का, गुरु-
शिष्य का, भ्राता-भगिनी का, पति-पत्नी का, सेव्य-सेवक का, राजा-प्रजा का
एवम् साधारण मानव-मानव का जो एक दूसरे के प्रति आचरण होता है उन्हीं
से तो लोक-व्यवहार की सीमा निश्चित की जाती है। इनमें यदि औचित्य का
आधार न रहे तो यह लोक लुप्त ही हो जाय । अतः लोकव्यवहार में सब से
अधिक ध्यानीय बात यही होती है कि किस व्यक्ति के साथ किस तरह का
आचरण उपयुक्त होगा, किस वस्तु का सन्निवेश कहाँ समुचित होगा । थोड़ी
भी असावधानी हुई, किसी भी आचरण में अनौचित्य का लेशतोऽपि सम्बन्ध
हुआ कि उस आचरण का कर्त्ता विवेचकों की दृष्टि में दोषी सिद्ध हो कर हेय
कोटि में जा पड़ता है ।
पाप-पुण्य की कल्पना भी बहुत-कुछ अनौचित्य और औचित्य से ही संबद्ध
है। जिस अवस्था-विशेष में जिस वस्तु-विशेष के प्रति, जैसा भाव, आचरण
अनुपयुक्त है, वहाँ वही प्रायः पाप कहलाता है और ठीक इसके विपरीत आचरण
ही प्रायः पुण्य संज्ञा का भागी बनता है । दयनीय के प्रति दया का प्रदर्शन
करना उचित है, यदि वह नहीं किया जाय तो उसकी गणना पाप में होगी और
यदि वह किया जाय तो उसका नाम होगा पुण्य ।
इस दृश्य जगत् में सौन्दर्य-भावना का आधार भी यही औचित्यतत्त्व है ।
कोई वस्तु असुन्दर इसलिये मानी जाती है कि उसमें औचित्य का अभाव
है । सांसारिक पदार्थों के अपने-अपने विशिष्ट और निर्दिष्ट स्थान होते हैं जहाँ
से भ्रष्ट होने पर पदार्थ अपने मूल्य और महत्त्व खो देते हैं । मानवों के दन्त,
केश, नख आदि स्थानभ्रष्ट हो जाने पर शोभाहीन हो जाने की बात परम
प्रसिद्ध है—
“स्थानभ्रष्टा न शोभन्ते, दन्ताः केशा नखा नराः ॥’
यहाँ चार पदार्थों का उल्लेख उपलक्षण रूप में ही हुआ है, वस्तुतः संसार
की कोई भी वस्तु अपने समुचित स्थान से पृथक् हो कर—औचित्य का उल्ल-
ङ्घन कर शोभित नहीं होती ऐसा तथ्य ही विज्ञात होता है ।
शरीर को अलंकृत करने के लिए रचे गये कटक-कुण्डल आदि अलंकार
तभी तक अलंकार कहे जा सकते हैं जब तक वे अपने उचित स्थान पर विन्यस्त

( ११ )
रहेगें। अनुचित स्थान में धारण किया गया अलंकार स्वयं को ही असुन्दर नही
बनाता अपितु धारण करने वाले व्यक्ति को भी मूर्ख सिद्ध कर देता है, उपहासा-
स्पद बना देता है ।
बिहारी का कथन ठीक है कि जिस मुकुट को मस्तक पर धारण कर राजे-
महाराजे महिमान्वित होते हैं उसी को जड़ जन चरण में पहन कर अपनी जड़ता
को प्रकट करते हैं—
जो सिर धरि महिमा मही, लहियत राजा-राव ।
प्रगटत जड़ता आपनी, मुकुट पहिरियत पाव ॥
गुणों की भी स्थिति ठीक इसी तरह की है—अर्थात् गुण भी औचित्य की
सीमा के अन्दर रहकर ही गुण होते हैं, औचित्य-सीमा से बाहर होने पर गुण,
गुण नहीं, दोष हो जाते हैं। अहिंसा तथा दया दोनों निःसन्देह दैवी गुण हैं।
इनका प्रयोग करना मानव-धर्म माना गया है। किन्तु आततायी के ऊपर दया
दिखलाना अनुपयुक्त होने के कारण पाप है, तभी तो शास्त्रकारों ने भी कह
दिया—
“आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन् ।”
ग्राम में आकर उपद्रव मचाने वाले नरभक्षी व्याघ्र के प्रति अहिंसा का
पालन करना क्या कभी पुण्य माना जा सकता है ? फलतः यही मानना पड़ता
है कि दया, अहिंसा आदि दैवी गुण भी औचित्य का पल्ला पकड़ कर ही गुणता
को प्राप्त करते हैं ।
इस प्रकार हम देखते हैं कि ईश्वरीय व्यापारों से लेकर मानवीय व्यवहारों
तक—सर्वत्र—औचित्य का ही अखण्ड साम्राज्य विराजमान है ।
ऐसी स्थिति में, जब कि देवलोक से लेकर मानवलोक तक के व्यापार-
कलापों में औचित्यतत्त्व की महनीय महत्ता दृष्टिगोचर होती है, यदि काव्य-
कला-जगत् में भी औचित्य का समधिक आदर हो तो यह कोई आश्चर्य की
बात नहीं, क्योंकि काव्य तथा कला आखिर लोकवृत्त के प्रतिबिम्ब ही तो हैं ।
यद्यपि ललित कलाओं में आदर्श के साथ यथार्थ का सामञ्जस्य रहता है
अथवा नहीं; रहना चाहिए किंवा नहीं; इस विषय में समालोचकों के मत
समान नहीं हैं तथापि कोई भी कला सर्वथा लोक का परित्याग नहीं कर सकती
यह बात अकामेनापि सब को माननी पड़ेगी। आदर्शबाद की रक्षा के लिए

( १२ )
कटिबद्ध होकर प्रवृत्त होने वाले कलाकारों की कलाओं के भी अन्तराल से
लौकिक अनुभूति अपनी सूक्ष्म झांकी दिखाती ही रहती है, यह कथा मतवाद से
बहुत ऊपर की है।
अतः लोकवृत्त के समान ललित कला भी औचित्यपूर्ण होने पर ही सहृद-
यानुरञ्जक हो सकती है, अन्यथा नहीं। वस्तुतः औचित्यतत्त्व के आधार पर
प्रतिष्ठित कला ही पद से अभिहित हो सकती है। अनौचित्य को प्रश्रय देने
वाली कला कथमपि 'कला' जैसी महत्त्वमय संज्ञा की अधिकारिणी नहीं बन
सकती।
ललित कलाओं में सर्वाधिक रुचिकर होने के कारण पहले चित्रकला पर
ही ध्यान दीजिए। चित्रकला में भी चमत्कार का कारण औचित्य ही लक्षित
होगा। चित्र-निर्माण में देश-काल की अनुरूपता, वेश-भूषा की अनुरूपता, रङ्ग-
रेखा की अनुरूपता किस सीमा तक अपेक्षित है यह कला-परीक्षकों से अगोचर
नहीं।
क्या देवों के चित्र दानवोचित शैली में और राज-परिवार के चित्र दरिद्र-
जनोपयुक्त रीति में निर्मित होने पर दर्शकों के मानस में आह्लाद उत्पन्न करने
में समर्थ हो सकेंगे ? यदि नहीं तो यह मानना पड़ेगा कि औचित्य से विहीन
होने के कारण वैसे चित्र आह्लाद के बदले एक प्रकार का वैरस्य ही उत्पन्न
करते हैं।
अब यदि काव्य भी एक कला है तो उसके क्षेत्र में भी औचित्य की महत्ता
माननी ही पड़ेगी । भारतीय परम्परा के अनुसार क्या दृश्य, क्या श्रव्य, सभ-
काव्यों का दर्शक तथा श्रोताओं के हृदय में रस का उन्मीलन करना ही ए-
मुख्य लक्ष्य रहा है। और इस लक्ष्य की सिद्धि में औचित्य की नितान्त आवश्यक-
ता है ! अनुचित वेश-भूषा, अनुचित कथोपकथन, अनुचित मञ्च-रचना जि-
तरह दृश्य-काव्यों के अभिनय देखने वालों के हृदय में रसोन्मीलन नहीं कर पा-
उसी तरह अनुचित पद-प्रयोग आदि श्रव्य-काव्य के श्रोताओं के मानस
आनन्दोद्बोधक नहीं होते। अतएव भरत से लेकर पण्डितराज जगन्नाथ तक
भारतीय आलंकारिक परम्परा अपने-अपने दृष्टिकोण से काव्य-क्षेत्र में औचि-
की आवश्यकता मानती-बतलाती आ रही है।
यह बात दूसरी है कि पहले औचित्य शब्द की चर्चा नहीं मिलती, के-

( १३ )
औचित्य-पदार्थ का ही विश्लेषण मिलता है और पश्चात् औचित्य पद का प्रयोग
भी प्राप्त होता है ।
औचित्य का ऐतिहासिक विकास
भरत
उपलब्ध निबन्धों में सबसे प्राचीन होने के कारण, किसी भी साहित्यिक
तत्त्व के विकास-क्रम का अध्ययन करते समय हमें भरत कृत नाट्यशास्त्र की
ओर सर्वप्रथम ध्यान देना पड़ता है, अतः औचित्य के विकास का अध्ययन भी
भरत से ही आरब्ध किया जाता है ।
भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र की रचना कर सामान्यतः कलामात्र के सर्वमान्य
सिद्धान्तों का समीक्षण किया है । यद्यपि उनका मुख्य लक्ष्य नाटक के स्वरूप,
अभिनय आदि का वर्णन करना है, परन्तु इसके साथ अङ्गभूत सभी कमनीय
कलाओं का विवरण प्रायः उन्होंने दिया है । नाट्य के स्वरूप के सम्बन्ध में
भरत का कथन है कि “सांसारिक व्यक्तियों का चरित्र एक समान नहीं होता है
और न उनकी अवस्थाएँ ही एकाकार होती हैं । कोई धार्मिक होता है तो कोई
पापी, कोई सदाचारी होता है तो कोई कदाचारी, कोई परोपकारी तो कोई
स्वार्थी, कोई सुख के मधुर अनुभव में जीवन-यापन करता रहता है तो कोई
दुःख के आँसू बहाता हुआ समय काटता रहता है । इन्हीं नानाभावों से सम्पन्न
नाना अवस्थाओं के चित्रण से संयुक्त, लोकवृत्त का अनुकरण नाट्य¹ है । नाट्य में
कितनी वस्तुएँ ग्राह्य हैं और कितनी त्याज्य हैं ? किनका अभिनय अभिनन्दनीय
है और किनका निन्दनीय ? इस प्रश्न का उत्तर 'लोक' से ही प्राप्त होता है,
अतः नाट्य का 'प्रमाण' लोक ही है । नाट्यसम्बन्धी सभी नियमों का उल्लेख किसी
भी निबन्धकार से संभव नहीं, अतः भरत ने विस्तृत और व्यापक नियमों की
जानकारी के लिए लोक की ओर अङ्गुलि-निर्देश कर दिया है ।²
१. नानाभावोपसम्पन्नं नानावस्थान्तरात्मकम् ।
लोकवृत्तानुकरणं नाट्यमेतन्मया कृतम् ॥ ( नाट्यशास्त्र १।१०९ )
२. ( क ) लोकसिद्धं भवेत् सिद्धं नाट्यं लोकस्वभावजम् ।
तस्मान्नाट्यप्रयोगे तु प्रमाणं लोक इष्यते ॥
( नाट्यशास्त्र २६ अ. ११३ श्लो. )

( १४ )
इस 'लोक-प्रामाण्य' के तत्त्व का पालन भरत ने बड़े विवेक से किया है, भरत
ने नाट्य-प्रयोग में दो प्रकार के धर्मी माने हैं—लोक-धर्मी तथा 'नाट्य-धर्मी।'
'लोकधर्मी' से लोकसिद्ध धर्मों का ग्रहण अभीष्ट है और 'नाट्यधर्मी' से नाट्य
में प्रयुक्त होनेवाली परम्परागत वस्तुओं का बोध होता है। लोकधर्मी का
सिद्धान्त नाट्य में यथार्थवाद का बोधक होता है, तो नाट्यधर्मी का तथ्य नाट्य
में आदर्शवाद तथा मान्य रूढ़ियों का प्रतिपादक है। ग्राहक दोनों हैं। इसी तथ्य
की दृष्टि से भरत ने 'प्रकृति' का विचार किया है। उत्तम, मध्यम तथा अधम
भेद से त्रिविध प्रकृति के गमन, स्थान तथा आसन का विधान किया गया है।
आहार्य अभिनय के अवसर पर नाटकीय पात्रों के वेष, भूषा, सज्जा आदि की
रचना का विवेचन मार्मिक ढङ्ग से किया गया है। भिन्न-भिन्न पात्रों के लिये
विभिन्न पाठ्यों का निर्देश किया गया है। प्रकृति के अनुरूप भाषा का विधान
हुआ है। पुरुष-पात्र संस्कृत का तथा स्त्री-पात्र प्राकृत का प्रयोग करते हैं।
नाटक की रचना को लक्ष्य कर रस और भाव के अनुरूप माधुर्य, ओज आदि
गुणों का तथा उपमा, रूपक, दीपक और अनुप्रास इस अलंकार-चतुष्टय का
निवेश करने का आदेश उन्होंने कवियों को दिया है।
अभिनय, प्रकृति, पाठ्य, छन्द, अलंकार, स्वर, संगीत—नाट्य की इस
विशाल सामग्री का अवसान दर्शकों के हृदय में अनुकूल रस-भाव के उन्मीलन में
ही होता है। रस के आधार पर ही भरत ने गुण-दोष की व्यवस्था की है।
रसोद्बोध में सहायक 'गुण' हैं और रसोद्बोध में बाधक हैं 'दोष'। समग्र
नाट्य-विधान का यही मूलमन्त्र है।
भरत ने अभिनय के सिद्धान्त का रहस्य प्रकट करते हुए कहा है—“सर्वप्रथम
अवस्था के अनुरूप वेष होना चाहिए। वेष के अनुरूप गति तथा क्रिया होनी
चाहिए। गति-प्रचार के अनुरूप पाठ्य होता है और पाठ्य के अनुरूप अभिनय
करना चाहिए।”१
नानाशीलाः प्रकृतयः शीले नाट्यं प्रतिष्ठितम् ।
तस्माल्लोकप्रमाणं हि कर्तव्यं नाट्ययोक्तृभिः ॥
( ख ) नोक्तानि च मया यानि लोकग्राह्याणि तान्यपि ॥
( ना. शा. २४।२१...
१. वयोऽनुरूपः प्रथमस्तु वेषो
वेषानुरूपश्च गतिप्रचारः ।

( १५ )
अभिनय चार प्रकार का होता है—आंगिक, सात्त्विक, वाचिक तथा
आहार्य । इन चारों में परस्पर घनिष्ठ संबन्ध है । इन चारों अङ्गों के सामरस्य
के उपर ही अभिनय की कृतार्थता आश्रित है । इस अवसर पर 'लोक का
उल्लंघन कथमपि क्षन्तव्य नहीं होता । लोक का अनुगमन ही कवि के लिए
आवश्यक होता है । वेष के संबन्ध में भरत का स्पष्ट कथन है कि जिस देश के
पात्रों का वर्णन करना अभिमत हो, उस देश का ही वेष दिखलाना चाहिए ।
इसीलिए विभिन्न प्रान्तीय वेष-भूषा की समग्रता के लिए भरत ने चार प्रकार
की 'प्रवृत्ति' मानी है । देश से प्रतिकूल वेष कभी शोभादायक नहीं हो सकता,
जैसे गले में मेखला और हाथ में नूपुर का धारण ।¹ इस अनुशीलन से
यह स्पष्ट होता है कि भरतमुनि के 'औचित्य' पद का उल्लेख न करने पर भी
वे 'औचित्य तत्त्व' के उद्भावक हैं । इस तत्त्व का व्यापक साम्राज्य उन्होंने
नाट्य में दिखलाया है । इन्हीं के सूत्र को पकड़कर परवर्ती आलंकारिकों ने
इस तत्त्व की विस्तृत व्याख्या की है ।
भामह
भरत के बाद अलंकार-शास्त्रियों की परम्परा में सर्वप्रथम नाम आता है
'भामह' का, अतः अब 'औचित्य' के संबन्ध में भामह के दृष्टिकोण का अध्ययन
आवश्यक है ।
आलंकारिकों के आगे एक महती समस्या यह थी कि क्या दोष सर्वदा दोष
ही रहते हैं ? अथवा किसी-किसी अवस्था में दोषत्व से मुक्त होकर वे गुण कोटि
में भी आ जाते हैं ?
आनन्दवर्धन ने ध्वन्यालोक में इस विषय का सुन्दर विवेचन किया है ।
वे कहते हैं कि रस आदि को अपकृष्ट करने के कारण कोई दोष होता है । अतः
यदि कोई दोष किसी खास रस का अपकर्ष न कर उत्कर्ष ही करे तो उस
स्थिति में वह वहाँ दोष नहीं, गुण है । इसीलिए ऐसे दोषों को वे अनित्य दोष
मानते हैं । इस तरह के दोषों से भिन्न कतिपय दोष ऐसे भी हैं जो नियमतः
सभी रसों को अपकृष्ट करते ही हैं, अतः वैसे दोषों को वे नित्य दोष की संज्ञा
देते हैं ।


गतिप्रचारानुगतं च पाठ्यं
पाठ्यानुरूपोऽभिनयश्च कार्यः ॥ (ना. शा. १४।६८)
१. अदेशजो हि वेषस्तु न शोभां जनयिष्यति ।
मेखलोरसि बन्धे च हास्यायैवोपजायते ॥

( १६ )

इस सूक्ष्म विवेचन का सूत्रपात भामह ने ही किया था। भामह ने अपने
काव्यालंकार नामक निबन्ध के प्रथम परिच्छेद में कई दोषों के विषय में
विशिष्ट सन्निवेश के कारण दोषत्व से मुक्त होने की बात लिखी है।
सन्निवेश-विशेष के कारण दुष्ट उक्ति भी उसी प्रकार शोभामय हो उठती
है जिस तरह माला के मध्य में गुम्फित नील पलाश ।१ 'असाधु वस्तु भी आश्रय
के सौन्दर्य से अत्यन्त सुन्दर हो जाती है' यह भी भामह कहते हैं। जिस प्रकार
स्वभावतः काला ( कुरूप ) कज्जल भी कमिनी-नयन-विन्यस्त होने पर शोभा-
वर्धक हो जाता है।२
आगे चलकर उनका एक और स्पष्ट कथन है कि 'पुनरुक्ति' दोष अवश्य
है परन्तु भय, शोक, असूया, हर्ष तथा विस्मय आदि भावों से चित्त के आक्षिप्त
होने पर पुनरुक्ति दोष नहीं है।३
ऊपर के विश्लेषण से स्पष्ट ज्ञात होता है कि औचित्य होने के कारण ही
भयादि के अवसर पर 'पुनरुक्ति' का दोषत्व समाप्त हो जाता है। इस प्रकार
भामह ने भी औचित्य-तत्त्व की ओर संकेत किया है।
दण्डी
आचार्य दण्डी के विचारानुसार प्रत्येक दोष किसी विशिष्ट स्थिति में ही
दोष कहा जा सकता है। जैसे अपार्थ दोष पागल के वकवाद, बालक के आलाप
तथा अस्वस्थ चित्त वाले व्यक्ति के प्रलाप को पुष्ट करने के कारण, उनके
वर्णन में गुण हो जाते हैं।४
इसी तरह सामान्यतः दोषरूप में स्वीकृत परस्पर-विरुद्धार्थक वाक्यस्थलीय


१. सन्निवेशविशेषात्तु दुरुक्तमपि शोभते ।
नीलं पलाशमाबद्धमन्तराले स्रजामिव । ( का. अ. १।५४ )
२. किञ्चिदाश्रयसौन्दर्याद् धत्ते शोभामसाध्वपि ।
कान्ता-विलोचनन्यस्तं मलीमसमिवाञ्जनम् ॥ ( का. अ. १.५५ )
३. भयशोकाभ्यसूयासु, हर्षविस्मययोरपि ।
यथाह गच्छ-गच्छेति, पुनरुक्तं न तद्विदुः ॥ ( का. अ. ४।१४ )
४. समुदायार्थशून्यं यत् तदपार्थमितीष्यते ।
उन्मत्त-मत्त-बालानामुक्तेरन्यत्र दुष्यति ॥ ( का. आदर्श ४।५ )

१. कारिका १-१०: औचित्य की परिभाषा (उचितं प्राहुराचार्याः) एवं काव्य-जीवितत्व

( १७ )
'व्यर्थ' नामक दोष भी किसी वस्तु के प्रति अत्यधिक आसक्ति के प्रसङ्ग पर गुण-
कोटि में आ जाता है। १
देश, काल, कला, लोक, न्याय तथा आगम से यदि विरोध हो तो वह
काव्य-दोष माना गया है। परन्तु कवि कौशल के कारण उस तरह का विरोध
भी कहीं-कहीं गुण हो जाता है, ऐसी मान्यता दण्डी की है। २
दण्डी के पूर्वोक्त दोषविषयक विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि उन्हें
औचित्य-तत्त्व का पर्याप्त परिचय था। कारण, उनके कथन का सारांश यही
ज्ञात होता है कि अनुचित स्थान पर सन्निवेश के कारण ही दोष की दोषता है
और उचित स्थान पर निवेश के कारण दोषों का दोषत्व-परिहार हो जाता है।
यशोवर्मा
यशोवर्मा कन्नौज के अधिपति थे। वे लक्ष्मीपूजक होने के साथ-साथ
सरस्वती के सहृदय उपासक भी थे। महाकवि भवभूति और प्राकृत महाकाव्य
'गउडवहो' के निर्माता वाक्पतिराज इन्हीं के आश्रय में रहकर अपनी अमरकृति
की रचना करने में समर्थ हुए थे। 'गउडवहो' में इन्हीं यशोवर्मा का वर्णन
किया गया है। यशोवर्मा स्वयं भी कवि थे। इनका 'रामाभ्युदय' नाटक यद्यपि
आज उपलब्ध नहीं होता, परन्तु उस नाटक का उद्धरण साहित्य ग्रन्थों में यत्र-
तत्र उपलब्ध होता है। सम्भवतः इसी नाटक की प्रस्तावना से भोजराज ने
'शृङ्गार-प्रकाश' में निम्न निर्दिष्ट पद्य उद्धृत किया है। ३
औचित्यं वचसां प्रकृत्यनुगतं सर्वत्र पात्रोचिता
पुष्टिः स्वावसरे रसस्य च कथामार्गे न चातिक्रमः ।
१. अस्ति काचिदवस्था सा, साभिषङ्गस्य चेतसः ।
यस्यां भवेदभिमतः विरुद्धार्थाऽपि भारती ॥ (का. आदर्श ४।१०)
२. विरोधः सकलोऽप्येष कदाचित् कविकौशलात् ।
उत्क्रम्य दोषगणनां गुणवीथीं विगाहते ॥ (का. आदर्श ४।५७)
३. 'ध्वन्यालोक-लोचन' से यह पद्य यशोवर्मा-रचित प्रमाणित होता है।
'कथामार्गे न चातिक्रमः' को आनन्दवर्धन ने ध्वन्यालोक के तृतीय उद्योत में
उद्धृत किया है। अभिनवगुप्त ने अपनी टीका (लोचन) में इस पद्य को यशो-
वर्मा के 'रामाभ्युदय' नाटक का माना है।

( १८ )
शुद्धिश्च प्रस्तुतसंविधानकविधौ प्रौढिश्च शब्दार्थयो-
र्विद्वद्भिः परिभाव्यतामविहितैरेतावदेवास्तु नः ॥”
—शृङ्गारप्रकाश भाग २
यशोवर्मा ने इस श्लोक में नाटक के आवश्यक गुणों का उल्लेख करते हुए
जिस वस्तु की प्रथम चर्चा की है, वह है वचनोचित्य, अर्थात् नाटक के पात्रों
का कथन उन पात्रों की प्रकृति के अनुरूप होना चाहिए। साहित्य में 'औचित्य'
पद का यह प्रथम प्रयोग है। इससे पूर्व इस पद का प्रयोग इस अर्थ में प्राप्त
नहीं होता।
भट्ट लोल्लट
नाट्यशास्त्र के मान्य टीकाकार तथा रस के सम्बन्ध में स्वतन्त्र मत के
संस्थापक भट्ट लोल्लट के तीन पद्यों को राजशेखर, हेमचंद्र एवम् नमिसाधु ने
उद्धृत किया है जिनमें औचित्य-सिद्धान्त पर प्रकाश पड़ता है। भट्ट लोल्लट
कहते हैं कि—“अर्थ-समूह अनन्त है, परन्तु काव्य में रसमय अर्थ का ही वर्णन
उचित है, नीरस का नहीं। काव्य में मज्जन, पुष्पावचय, सन्ध्या, चन्द्रोदय आदि
का वर्णन सरस होने पर भी प्रकृतरसानुकूल ओर अनतिविस्तृत ही करना
चाहिए। नदी, पहाड़, समुद्र, गज, तुरग, नगर आदि के वर्णन करने में जो
महान् यत्न भिन्न-भिन्न कवियों के द्वारा किया जाता है उससे उन कवियों की
शक्तिशालिता भले ही प्रथित होती हो, पर उससे प्रबन्ध-काव्य में किसी प्रकार
की रुचिरता नहीं आती। इसी प्रकार यमक आदि का महाकाव्य में निबन्ध
कवि के अभिमानमात्र का सूचक होता है, काव्यगत प्रमुख रस का उससे पोषण
नहीं होता।”१ सारांश यह कि लोल्लट की दृष्टि में महाकाव्य के मुख्य रस
और उसके विभिन्न अङ्गों में पूर्ण समरसता अवश्य होनी चाहिए। यह रसो-
चित्य का एक प्रकार ही तो है।
रुद्रट
औचित्य का इतिहास लिखते समय आचार्य रुद्रट भुलाये नहीं जा सकते
१. (क) “अस्तु नाम निस्सीमा अर्थसार्थः। किन्तु रसवत एव निबन्धो युक्तो
न तु नीरसस्य” इति आपराजितिः, यदाह—
मज्जन-पुष्पावचयन-सन्ध्या-चन्द्रोदयादिवाक्यमिह ।
सरसमपि नातिबहुलं प्रकृतरसेनान्वितं रचयेत् ॥

( १९ )
यद्यपि अलंकार-युग के ही अन्तिम आचार्य रुद्रट हैं, अतः उन्होंने अपने ग्रन्थ
का नाम 'काव्यालंकार' रखा और उसमें प्रधानतया अलंकारों का ही विवेचन
किया तथापि वे इस सिद्धान्त से पूर्ण परिचित प्रतीत होते हैं। रस के साथ अलं-
कारों का सम्बन्ध कैसा होना चाहिए इसका विवेचन भी रुद्रट ने अतिसूक्ष्म
पद्धति से किया है। आनन्दवर्धन ने ध्वन्यालोक में जिस सिद्धान्त का पल्लवन
किया है उसका उल्लेख—सूत्ररूप में ही सही पर—काव्यालंकार में है अवश्य।
काव्य में वे ही अलंकार ग्राह्य हैं जो प्रकृत रस का पोषण करते हों। इस तथ्य
का उन्मीलन रुद्रट ने अपने ग्रन्थ में किया है जिससे औचित्यविषयक उनकी
धारणा उच्चतर ज्ञात होती है। काव्यालंकार के द्वितीय अध्याय में अनुप्रास
अलंकार की पाँच जातियों का विवरण देने के अनन्तर काव्य में उनके प्रयोग
का वर्णन रुद्रट ने किया है। इस प्रसङ्ग पर उन्होंने औचित्य को ही प्रधान
कसौटी मानी है।
काव्य में औचित्य के आधार पर ही अनुप्रास का प्रयोग होना चाहिए।
रुद्रट ने ठीक ही कहा है—
एताः प्रयत्नदधिगम्य सम्यगौचित्यमालोच्य तथार्थसंस्थाम् ।
मिश्राः कवीन्द्रै रचनाल्पदीर्घाः कार्या मुहुश्चैव गृहीतमुक्ताः ॥
काव्यालंकार २।३२
यही है रसौचित्य का सिद्धान्त। रुद्रट के इस पद्य के 'गृहीतमुक्ताः' अंश के
आधार पर ही आनन्दवर्धन ने अपने ग्रन्थ में आवश्यकता के अनुसार अलंकार
के ग्रहण तथा त्याग की व्यवस्था 'काले च ग्रहणत्यागौ' लिख कर की है।
( ख ) यस्तु सरिद्रिसागर-पुरतुरगरथादिवर्णने यत्नः ।
कविशक्तिख्यातिफलो विततधियां नो मतः स इह ॥
( ग ) यमकानुलोमतदितरचक्रादिभिदोऽतिरसविरोधिन्धः ।
अभिमानमात्रमेतद् गड्डरिकादिप्रवाहो वा ॥
इन तीनों पद्यों में से प्रथम दो पद्यों को राजशेखर ने काव्यमीमांसा के
नवम अध्याय में 'आपराजिति' नामक आचार्य के नाम से उद्धृत किया है।
हेमचन्द्र ने काव्यानुशासन में अन्तिम दो पद्यों को भट्ट लोल्लट के नाम से
उद्धृत किया है। इससे यह सिद्ध होता है कि भट्ट लोल्लट का ही दूसरा नाम
आपराजिति है। सम्भवतः लोल्लट के पिता का नाम अपराजित था।

( २० )

यमकालंकार का विस्तृत विवरण रुद्रट के ग्रन्थ में मिलता है। परन्तु काव्य
में यमक के निवेश को वे कवि-कौशल का कार्य नहीं समझते प्रत्युत कविहृदय
की अभिव्यक्ति मानते हैं। औचित्यतत्त्व का पारखी महाकवि ही काव्य में रस-
पोषक यमक का निवेश कर सकता है। अनुचित स्थान में सन्निविष्ट होने पर
यमक शोभावर्धक नहीं, अपितु गलगण्ड के समान काव्य के वैरूप्य का ही
संपादन करता है। इस प्रसङ्ग पर नमिसाधु की टीका दर्शनीय है।१ भामह
आदि के समान रुद्रट ने भी दोषों की गुणवत्त्वापत्ति की चर्चा की है। 'ग्राम्य'
दोष अवश्य है किन्तु विशिष्ट अवस्थाओं में इस दोष का ग्राम्यत्व सर्वथा अपहृत
हो जाता है और यह गुण कोटि में समाविष्ट हो जाता है।२
पुनरुक्ति दोष भी औचित्यवशात् स्थलविशेष में गुण हो जाता है ऐसी
मान्यता रुद्रट की है।३ दोष-प्रकरण का उपसंहार करते हुए रुद्रट ने लिखा है
कि सभी दोषों का दोषत्व तब परिहृत हो जाता है जब उसका काव्य अथवा
नाटक में केवल अनुकरण किया जाता है। यह सिद्धान्त नितान्त मार्मिक है अत-
एव परवर्ती आलंकारिक मम्मट, विश्वनाथ आदि ने भी अपने-अपने ग्रन्थों में
'अनुकरणे च सर्वेषाम्' लिखकर रुद्रट का अनुगमन किया है। यदि नाटक में
किसी मूर्ख का चित्रण करना हो तो उसके असंबद्ध प्रलाप, असमर्थ वाक्य तथा
अवाचक पदों का प्रयोग करना ही होगा। अनुकरण के अतिरिक्त इस पात्र के
चित्रण का उपाय ही कौन सा है ? अतः अनुकरण की दशा में दोषत्व-परिहार


१. इति यमकविशेषं सम्यगालोचयद्भिः सुकविभिरभियुक्तैर्वस्तु चौचित्यवद्भिः ।
सुविहितपदभङ्गं सुप्रसिद्धाभिधानं, तदनु विरचनीयं सर्गबन्धेषु भूम्ना ॥
“तथा च वस्तुविषयविभागमालोचयद्भिः यथा कस्मिन् रसे कर्तव्यम्' क्व
वा न कर्तव्यम् । यमकश्लेषचित्राणि हि सरसे काव्ये क्रियमाणानि रसखण्डनों
कुर्युः । विशेषतस्तु शृङ्गारकरुणयोः । कवेः किलैतानि शक्तिमात्रं पोषयन्ति न
रसवत्ताम् । यदुक्तम् 'यमकानुलोम-गड्डरिकाप्रवाहो वा ।।'
( नमिसाधु की टीका )
२. अर्थविशेषवशाद्वा सभ्येऽपि तथा क्वचिद् विभक्तेर्वा ।
अनुचितभावं मुञ्चति तथाविधं तत्पदं सदपि ।। (क.व्यालंकार ६.२३)
३. वक्ता हर्षभयादिभिराक्षिप्तमनास्तथा स्तुवन् निन्दन् ।
यत्पदमसकृद् ब्रूयात् तत्पुनरुक्तं न दोषाय ॥ (का. अ. ६।२९)

( २१ )
समीचीन है। ग्राम्य-दोष का स्वरूप ही रुद्रट के मत से देश, कुल, जाति, विद्या
आदि के विषय में व्यवहार, आकार, वेष और वचन का अनौचित्य है।१
रुद्रट के मत की उक्त समीक्षा से हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि काव्य
में सब से अधिक व्यापक तत्त्व औचित्य ही है। इसके अपकर्षक होने पर ही
दोषों का दोषत्व सम्पन्न होता है और अवस्था-विशेष में रस की अनुकूलता होने
पर वे ही हेय दोष उपादेय गुण के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं। अनुकरण
दोषों के दोषत्व को दूर करने वाला पदार्थ है और वह औचित्य के ऊपर ही
निर्भर है।
आनन्दवर्धन
रुद्रट के बाद औचित्य-सिद्धान्त के विकास में प्रमुख स्थान है आचार्य
आनन्दवर्धन का। आनन्दवर्धन ने अपने ध्वन्यालोक में औचित्यतत्त्व का व्यापक
समीक्षण किया है। ध्वन्यालोक में कहीं औचित्य शब्द के प्रयोग द्वारा व्यापक
रूप में और कही संकेत रूप में इस तत्त्व की विशद अभिव्यक्ति हुई है। आनन्द-
वर्धन से प्राचीन आलंकारिकों ने अलंकार-शास्त्र के कतिपय प्रकीर्ण अङ्गों के
विषय में ही औचित्यतत्त्व का विवेचन किया था पर आनन्दवर्धन ने अलंकार-
शास्त्रीय सभी अङ्गों के साथ घनिष्ठ संबन्ध दिखला कर औचित्य को काव्य के
व्यापक अथ च महनीय तत्त्व के रूप में प्रतिष्ठित कर दिया।
क्षेमेन्द्र ने आनन्दवर्धन के ही विचारों से स्फूर्ति ग्रहण कर अपने विख्यात
ग्रन्थ औचित्यविचारचर्चा में इस तत्त्व का पल्लवन किया है। औचित्यविचार-
चर्चा के मूल स्रोत को जानने के लिए ध्वन्यालोक का अध्ययन नितान्त
अपेक्षित है।
आनन्दवर्धन रस को ही काव्य का सारभूत पदार्थ मानते हैं। उनकी
सम्मति में यह रस कथमपि वाच्य नहीं हो सकता। ध्वनि के द्वारा ही इसकी
अभिव्यक्ति हो सकती है। इस रस में सबसे आवश्यक वस्तु है औचित्य। वस्तु
अलंकार आदि रस के बाह्य परिधान मात्र हैं।
आनन्दवर्धन ने अपने युगान्तरकारी ग्रन्थ ध्वन्यालोक में अलंकारौचित्य,
गुणौचित्य, संघटनौचित्य, प्रबन्धौचित्य और रसौचित्य का विशद निरूपण
किया है।
१. ग्राम्यत्वमनौचित्यं, व्यवहाराकारवेषवचनानाम् ।
देश-कुल-जाति-विद्या-वित्त-वयःस्थान-पात्रेषु ॥ (का. अ. ११।९)

( २२ )
अलंकार्य के बिना अलंकार का स्वतः कोई मूल्य नहीं होता—और काव्य में
रस आदि अलंकार्य वस्तु है । अतः रस आदि को पुष्ट करने के लिए अलं-
कारों का प्रयोग किया जाता है तो अलंकार का अलंकारत्व सिद्ध होता है ।¹
इन अलंकारों के औचित्य-सम्पादन के लिए आनन्दवर्धन ने सुन्दर नियमों
का उल्लेख किया है ।² शब्दालंकारों की रसानुरूपता प्रदर्शित करते समय
उन्होंने विप्रलम्भ आदि कोमल रसों के लिए यमकालंकार को सर्वथा त्याज्य
माना है । इस सिद्धान्त का मौलिक रहस्य यह है कि कवि के द्वारा काव्य में
निबद्ध वस्तु को रस का उद्बोधक अवश्य होना चाहिए ।
काव्य में किसी भी वस्तु की उपादेयता तथा अनुपादेयता, संबद्धता और
असंबद्धता, सुरूपता और कुरूपता, रस के पोषण तथा शोषण पर ही निर्भर है ।
रस-पोषक वस्तु ग्राह्य है, परन्तु रस शोषक सर्वथा वर्ज्य है । अलंकारौचित्य के
संबन्ध में उनका कथन अत्यन्त स्पष्ट और हृदयग्राही है । वे कहते हैं कि अलं
कारों को इतना स्वाभाविक होना चाहिए कि रसाकृष्ट कवि के किसी विशिष्ट
आयास के बिना ही वे स्वतः आविर्भूत हों । वे बाह्य न होकर आभ्यन्तर हों,
उनकी रचना के लिए न तो कवि को किसी प्रकार का यत्न करना पड़े और न
उनका इतना चाकचिक्य हो कि पाठक प्रकृत रस के सौन्दर्य से हट कर उन्हीं के
प्रभाव से आकृष्ट हो जाय ।³
आनन्दवर्धन गुणों का साक्षात् संबन्ध रस-भावादि से मानते हैं । गुण
धर्म है और रस आदि धर्मी ! श्रृङ्गार, विप्रलम्भ और करुणरस के साथ माधुर्य
गुण का प्रधान संबन्ध है । रौद्र, वीर और भयानक रस के साथ ओजगुण का
घनिष्ठ संपर्क है । ऐसी दशा में शब्द-योजना ऐसी होनी चाहिए कि प्रकृत गुण
और रस के साथ उसका सर्वथा सामञ्जस्य हो जाय । वर्णों का अपना एक
विशिष्ट प्रभाव होता है । कुछ वर्ण स्वभावतः कोमलता के द्योतक होते हैं तो
अन्य वर्ण स्वतः कठोरता को प्रकट करते हैं । वर्णों की इस प्रकृति को ध्यान में
रख कर काव्य में उनका प्रयोग सर्वथा श्लाघनीय होता है ।
१. रसभावादितात्पर्यमाश्रित्य विनिवेशनम् ।
अलंकृतीनां सर्वासामलंकारत्वसाधनम् ॥ ( ध्वन्यालोक ३।६ )
२. ध्वन्यालोक २।१५-२० ।
३. रसाक्षिप्ततया यस्य बन्धः शक्यक्रियो भवेत् ।
अपृथग् यत्ननिर्वर्त्यः सोऽलंकारो ध्वनौ मतः ॥ ( ध्वन्यालोक २।१७ )

( २३ )
शृङ्गार रस में रेफ के साथ संयुक्त सकार और शकार तथा ढकार का
अत्यधिक प्रयोग प्रकृत रस के विरोधी होने के कारण नहीं करना चाहिए क्योंकि
ये वर्ण रस की हानि करने वाले होते हैं । परन्तु ये ही वर्ण बीभत्स आदि रस में
आवश्यक दीप्ति के प्रकट करने के कारण यदि रखे जाँय तो वे रस के उत्पादक
होते हैं ।
प्रथम स्थिति में यदि वर्ण 'रसच्युतः' ( रस को च्युत करने वाले ) होते
हैं—तो द्वितीय स्थिति में ये ही वर्ण 'रसश्च्युतः' ( रस के टपकाने वाले )
होते हैं । १
पदों की विशिष्ट योजना का नाम संघटना है । संघटना प्रायः तीन प्रकार
की होती है । १—असमासा, २—मध्यम-समासा और ३—दीर्घ-समासा । २
गुणों का संघटना के साथ घनिष्ठ संबन्ध है । आनन्दवर्धन ने संघटना को गुणों
के आधार पर रहने वाली तथा रसों को अभिव्यक्त करने वाली कहा है । ३
संघटना के प्रसङ्ग में चार वस्तुओं के औचित्य का विचार करना आनन्द-
वर्धन ने आवश्यक बतलाया है । मुख्य तो रस का औचित्य ही है परन्तु उसके
साथ वक्ता वाक्य और विषय इन तीन गौण पदार्थों के औचित्य पर भी दृष्टि
रखनी चाहिए ।
वक्ता का अभिप्राय है काव्य अथवा नाटक के पात्र । वाच्य का अर्थ है
प्रतिपाद्य वस्तु तथा विषय का तात्पर्य है नाटक, महाकाव्य, गद्य, पद्य और
चम्पू आदि काव्य-प्रकार । संघटना के चुनाव में इन चारों विषयों के औचित्य
का पूर्ण ध्यान रखना चाहिए ।
१. शषौ सरेफसंयोगौ ढकारश्चापि भूयसा ।
विरोधिनः स्युः शृङ्गारे तेन वर्णा रसच्युतः ॥
त एव तु निवेश्यन्ते बीभत्सादी रसे यदा ।
तदा तं दीपयन्त्येव तेन वर्णा रसश्च्युतः ॥ ( ध्वन्यालोक ३।३४ )
२. असमासा समासेन मध्यमेन च भूषिता ।
तथा दीर्घसमासेति त्रिधा संघटनोदिता ॥ ( ध्वन्यालोक ३।५ )
३. गुणानाश्रित्य तिष्ठन्ती माधुर्यादीन् व्यनक्ति सा ।
रसास्तन्नियमे हेतुरौचित्यं वक्तृवाच्ययोः ॥
( ध्वन्यालोक ३।६ )