औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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कटिबद्ध होकर प्रवृत्त होने वाले कलाकारों की कलाओं के भी अन्तराल से
लौकिक अनुभूति अपनी सूक्ष्म झांकी दिखाती ही रहती है, यह कथा मतवाद से
बहुत ऊपर की है।
अतः लोकवृत्त के समान ललित कला भी औचित्यपूर्ण होने पर ही सहृद-
यानुरञ्जक हो सकती है, अन्यथा नहीं। वस्तुतः औचित्यतत्त्व के आधार पर
प्रतिष्ठित कला ही पद से अभिहित हो सकती है। अनौचित्य को प्रश्रय देने
वाली कला कथमपि 'कला' जैसी महत्त्वमय संज्ञा की अधिकारिणी नहीं बन
सकती।
ललित कलाओं में सर्वाधिक रुचिकर होने के कारण पहले चित्रकला पर
ही ध्यान दीजिए। चित्रकला में भी चमत्कार का कारण औचित्य ही लक्षित
होगा। चित्र-निर्माण में देश-काल की अनुरूपता, वेश-भूषा की अनुरूपता, रङ्ग-
रेखा की अनुरूपता किस सीमा तक अपेक्षित है यह कला-परीक्षकों से अगोचर
नहीं।
क्या देवों के चित्र दानवोचित शैली में और राज-परिवार के चित्र दरिद्र-
जनोपयुक्त रीति में निर्मित होने पर दर्शकों के मानस में आह्लाद उत्पन्न करने
में समर्थ हो सकेंगे ? यदि नहीं तो यह मानना पड़ेगा कि औचित्य से विहीन
होने के कारण वैसे चित्र आह्लाद के बदले एक प्रकार का वैरस्य ही उत्पन्न
करते हैं।
अब यदि काव्य भी एक कला है तो उसके क्षेत्र में भी औचित्य की महत्ता
माननी ही पड़ेगी । भारतीय परम्परा के अनुसार क्या दृश्य, क्या श्रव्य, सभ-
काव्यों का दर्शक तथा श्रोताओं के हृदय में रस का उन्मीलन करना ही ए-
मुख्य लक्ष्य रहा है। और इस लक्ष्य की सिद्धि में औचित्य की नितान्त आवश्यक-
ता है ! अनुचित वेश-भूषा, अनुचित कथोपकथन, अनुचित मञ्च-रचना जि-
तरह दृश्य-काव्यों के अभिनय देखने वालों के हृदय में रसोन्मीलन नहीं कर पा-
उसी तरह अनुचित पद-प्रयोग आदि श्रव्य-काव्य के श्रोताओं के मानस
आनन्दोद्बोधक नहीं होते। अतएव भरत से लेकर पण्डितराज जगन्नाथ तक
भारतीय आलंकारिक परम्परा अपने-अपने दृष्टिकोण से काव्य-क्षेत्र में औचि-
की आवश्यकता मानती-बतलाती आ रही है।
यह बात दूसरी है कि पहले औचित्य शब्द की चर्चा नहीं मिलती, के-