औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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अभिनय चार प्रकार का होता है—आंगिक, सात्त्विक, वाचिक तथा
आहार्य । इन चारों में परस्पर घनिष्ठ संबन्ध है । इन चारों अङ्गों के सामरस्य
के उपर ही अभिनय की कृतार्थता आश्रित है । इस अवसर पर 'लोक का
उल्लंघन कथमपि क्षन्तव्य नहीं होता । लोक का अनुगमन ही कवि के लिए
आवश्यक होता है । वेष के संबन्ध में भरत का स्पष्ट कथन है कि जिस देश के
पात्रों का वर्णन करना अभिमत हो, उस देश का ही वेष दिखलाना चाहिए ।
इसीलिए विभिन्न प्रान्तीय वेष-भूषा की समग्रता के लिए भरत ने चार प्रकार
की 'प्रवृत्ति' मानी है । देश से प्रतिकूल वेष कभी शोभादायक नहीं हो सकता,
जैसे गले में मेखला और हाथ में नूपुर का धारण ।¹ इस अनुशीलन से
यह स्पष्ट होता है कि भरतमुनि के 'औचित्य' पद का उल्लेख न करने पर भी
वे 'औचित्य तत्त्व' के उद्भावक हैं । इस तत्त्व का व्यापक साम्राज्य उन्होंने
नाट्य में दिखलाया है । इन्हीं के सूत्र को पकड़कर परवर्ती आलंकारिकों ने
इस तत्त्व की विस्तृत व्याख्या की है ।
भामह
भरत के बाद अलंकार-शास्त्रियों की परम्परा में सर्वप्रथम नाम आता है
'भामह' का, अतः अब 'औचित्य' के संबन्ध में भामह के दृष्टिकोण का अध्ययन
आवश्यक है ।
आलंकारिकों के आगे एक महती समस्या यह थी कि क्या दोष सर्वदा दोष
ही रहते हैं ? अथवा किसी-किसी अवस्था में दोषत्व से मुक्त होकर वे गुण कोटि
में भी आ जाते हैं ?
आनन्दवर्धन ने ध्वन्यालोक में इस विषय का सुन्दर विवेचन किया है ।
वे कहते हैं कि रस आदि को अपकृष्ट करने के कारण कोई दोष होता है । अतः
यदि कोई दोष किसी खास रस का अपकर्ष न कर उत्कर्ष ही करे तो उस
स्थिति में वह वहाँ दोष नहीं, गुण है । इसीलिए ऐसे दोषों को वे अनित्य दोष
मानते हैं । इस तरह के दोषों से भिन्न कतिपय दोष ऐसे भी हैं जो नियमतः
सभी रसों को अपकृष्ट करते ही हैं, अतः वैसे दोषों को वे नित्य दोष की संज्ञा
देते हैं ।
गतिप्रचारानुगतं च पाठ्यं
पाठ्यानुरूपोऽभिनयश्च कार्यः ॥ (ना. शा. १४।६८)
१. अदेशजो हि वेषस्तु न शोभां जनयिष्यति ।
मेखलोरसि बन्धे च हास्यायैवोपजायते ॥