औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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'व्यर्थ' नामक दोष भी किसी वस्तु के प्रति अत्यधिक आसक्ति के प्रसङ्ग पर गुण-
कोटि में आ जाता है। १
देश, काल, कला, लोक, न्याय तथा आगम से यदि विरोध हो तो वह
काव्य-दोष माना गया है। परन्तु कवि कौशल के कारण उस तरह का विरोध
भी कहीं-कहीं गुण हो जाता है, ऐसी मान्यता दण्डी की है। २
दण्डी के पूर्वोक्त दोषविषयक विवेचन से यह निष्कर्ष निकलता है कि उन्हें
औचित्य-तत्त्व का पर्याप्त परिचय था। कारण, उनके कथन का सारांश यही
ज्ञात होता है कि अनुचित स्थान पर सन्निवेश के कारण ही दोष की दोषता है
और उचित स्थान पर निवेश के कारण दोषों का दोषत्व-परिहार हो जाता है।
यशोवर्मा
यशोवर्मा कन्नौज के अधिपति थे। वे लक्ष्मीपूजक होने के साथ-साथ
सरस्वती के सहृदय उपासक भी थे। महाकवि भवभूति और प्राकृत महाकाव्य
'गउडवहो' के निर्माता वाक्पतिराज इन्हीं के आश्रय में रहकर अपनी अमरकृति
की रचना करने में समर्थ हुए थे। 'गउडवहो' में इन्हीं यशोवर्मा का वर्णन
किया गया है। यशोवर्मा स्वयं भी कवि थे। इनका 'रामाभ्युदय' नाटक यद्यपि
आज उपलब्ध नहीं होता, परन्तु उस नाटक का उद्धरण साहित्य ग्रन्थों में यत्र-
तत्र उपलब्ध होता है। सम्भवतः इसी नाटक की प्रस्तावना से भोजराज ने
'शृङ्गार-प्रकाश' में निम्न निर्दिष्ट पद्य उद्धृत किया है। ३
औचित्यं वचसां प्रकृत्यनुगतं सर्वत्र पात्रोचिता
पुष्टिः स्वावसरे रसस्य च कथामार्गे न चातिक्रमः ।
१. अस्ति काचिदवस्था सा, साभिषङ्गस्य चेतसः ।
यस्यां भवेदभिमतः विरुद्धार्थाऽपि भारती ॥ (का. आदर्श ४।१०)
२. विरोधः सकलोऽप्येष कदाचित् कविकौशलात् ।
उत्क्रम्य दोषगणनां गुणवीथीं विगाहते ॥ (का. आदर्श ४।५७)
३. 'ध्वन्यालोक-लोचन' से यह पद्य यशोवर्मा-रचित प्रमाणित होता है।
'कथामार्गे न चातिक्रमः' को आनन्दवर्धन ने ध्वन्यालोक के तृतीय उद्योत में
उद्धृत किया है। अभिनवगुप्त ने अपनी टीका (लोचन) में इस पद्य को यशो-
वर्मा के 'रामाभ्युदय' नाटक का माना है।