औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
पृष्ठ 13, कुल 256 में से
संदर्भ में पढ़ेंअवतारणा
कृतारिवञ्चने दृष्टिर्येनाञ्जन-मलीमसा ।
अच्युताय नमस्तस्मै परमौचित्यकारिणे ॥ ( क्षेमेन्द्र )
आचार्य क्षेमेन्द्र ने प्रकृत पुस्तक—औचित्यविचारचर्चा—का आरम्भ इसी
मङ्गल पद्य से किया है और मैं भी अपनी इस 'अवतारणा' की अवतारणा इसी
पद्य से कर रहा हूँ । ऐसा इसलिये करना पड़ रहा है कि औचित्य-तत्त्व के
विश्लेषण में प्रवृत्त होने पर सर्वप्रथम ध्यान उस जगन्नियन्ता परब्रह्म परमेश्वर
की ओर बरबस चला जाता है जिसने अपनी लीला द्वारा संसार में औचित्य की
प्रतिष्ठा की ।
वस्तुतः भारतीय वाङ्मय में 'अवतारों' की कल्पना औचित्य के ही आधार
पर की गई है । परमात्मा ने अपने विविध अवतारों के द्वारा, औचित्य के
स्वरूप को परिस्फुट किया है, औचित्य की सर्वतोभावेन रक्षणीयता का मङ्गलमय
उपदेश सांसारिक मानवों को दिया है ।
मत्स्य से लेकर कल्की पर्यन्त अवतार-परम्परा औचित्य की ओर ही इङ्गित
करती है । जब जैसा उपयुक्त था तब वैसा अवतार हुआ । जब दुर्दान्त दानव
हिरण्यकशिपु का विनाश करना था तब तदुचित-तदुपयुक्त भीषण नरसिंह रूप
में परमात्मा ने अवतार लिया और जब अमृत-पान के अवसर पर दानवों को
छलने का प्रसंग उपस्थित हुआ तब छल के लिए परमोपयुक्त मोहिनीरूप
धारण कर अपने नयनों को कज्जल-मलिन बनाने में भी संकोच नहीं किया ।
औचित्य से कदापि च्युत नहीं होने के कारण भगवान् का 'अच्युत' नाम
सर्वथा सार्थक तथा उपयुक्त है । इस तरह यह स्वतः सिद्ध हो जाता है कि
औचित्य एक ईश्वरीय तत्त्व है—भागवत गुण है ।
परमात्मा ने अपने नानाविध अवतारों के द्वारा जिस औचित्य का उपदेश
किया, मानव-जगत् उसका पालन-पोषण व्यवहाररूप में सर्वथा न भी कर सका
हो, पर सिद्धान्तरूप में उसने उसको सर्वात्मना स्वीकार किया इसमें सन्देह नहीं
है । कारण यह कि अनादिकाल से लोक में उसी व्यवहार को सद्व्यवहार
२ औ० भू०