औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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माना जाता है जो औचित्य के ऊपर अवलंबित रहता है और उसी व्यवहार की
संज्ञा दुर्व्यवहार है जिसके साथ औचित्य का आधार नहीं होता ।
एक तरह से व्यवहारों के समूह का ही नाम लोक है। पिता-पुत्र का, गुरु-
शिष्य का, भ्राता-भगिनी का, पति-पत्नी का, सेव्य-सेवक का, राजा-प्रजा का
एवम् साधारण मानव-मानव का जो एक दूसरे के प्रति आचरण होता है उन्हीं
से तो लोक-व्यवहार की सीमा निश्चित की जाती है। इनमें यदि औचित्य का
आधार न रहे तो यह लोक लुप्त ही हो जाय । अतः लोकव्यवहार में सब से
अधिक ध्यानीय बात यही होती है कि किस व्यक्ति के साथ किस तरह का
आचरण उपयुक्त होगा, किस वस्तु का सन्निवेश कहाँ समुचित होगा । थोड़ी
भी असावधानी हुई, किसी भी आचरण में अनौचित्य का लेशतोऽपि सम्बन्ध
हुआ कि उस आचरण का कर्त्ता विवेचकों की दृष्टि में दोषी सिद्ध हो कर हेय
कोटि में जा पड़ता है ।
पाप-पुण्य की कल्पना भी बहुत-कुछ अनौचित्य और औचित्य से ही संबद्ध
है। जिस अवस्था-विशेष में जिस वस्तु-विशेष के प्रति, जैसा भाव, आचरण
अनुपयुक्त है, वहाँ वही प्रायः पाप कहलाता है और ठीक इसके विपरीत आचरण
ही प्रायः पुण्य संज्ञा का भागी बनता है । दयनीय के प्रति दया का प्रदर्शन
करना उचित है, यदि वह नहीं किया जाय तो उसकी गणना पाप में होगी और
यदि वह किया जाय तो उसका नाम होगा पुण्य ।
इस दृश्य जगत् में सौन्दर्य-भावना का आधार भी यही औचित्यतत्त्व है ।
कोई वस्तु असुन्दर इसलिये मानी जाती है कि उसमें औचित्य का अभाव
है । सांसारिक पदार्थों के अपने-अपने विशिष्ट और निर्दिष्ट स्थान होते हैं जहाँ
से भ्रष्ट होने पर पदार्थ अपने मूल्य और महत्त्व खो देते हैं । मानवों के दन्त,
केश, नख आदि स्थानभ्रष्ट हो जाने पर शोभाहीन हो जाने की बात परम
प्रसिद्ध है—
“स्थानभ्रष्टा न शोभन्ते, दन्ताः केशा नखा नराः ॥’
यहाँ चार पदार्थों का उल्लेख उपलक्षण रूप में ही हुआ है, वस्तुतः संसार
की कोई भी वस्तु अपने समुचित स्थान से पृथक् हो कर—औचित्य का उल्ल-
ङ्घन कर शोभित नहीं होती ऐसा तथ्य ही विज्ञात होता है ।
शरीर को अलंकृत करने के लिए रचे गये कटक-कुण्डल आदि अलंकार
तभी तक अलंकार कहे जा सकते हैं जब तक वे अपने उचित स्थान पर विन्यस्त