औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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इस 'लोक-प्रामाण्य' के तत्त्व का पालन भरत ने बड़े विवेक से किया है, भरत
ने नाट्य-प्रयोग में दो प्रकार के धर्मी माने हैं—लोक-धर्मी तथा 'नाट्य-धर्मी।'
'लोकधर्मी' से लोकसिद्ध धर्मों का ग्रहण अभीष्ट है और 'नाट्यधर्मी' से नाट्य
में प्रयुक्त होनेवाली परम्परागत वस्तुओं का बोध होता है। लोकधर्मी का
सिद्धान्त नाट्य में यथार्थवाद का बोधक होता है, तो नाट्यधर्मी का तथ्य नाट्य
में आदर्शवाद तथा मान्य रूढ़ियों का प्रतिपादक है। ग्राहक दोनों हैं। इसी तथ्य
की दृष्टि से भरत ने 'प्रकृति' का विचार किया है। उत्तम, मध्यम तथा अधम
भेद से त्रिविध प्रकृति के गमन, स्थान तथा आसन का विधान किया गया है।
आहार्य अभिनय के अवसर पर नाटकीय पात्रों के वेष, भूषा, सज्जा आदि की
रचना का विवेचन मार्मिक ढङ्ग से किया गया है। भिन्न-भिन्न पात्रों के लिये
विभिन्न पाठ्यों का निर्देश किया गया है। प्रकृति के अनुरूप भाषा का विधान
हुआ है। पुरुष-पात्र संस्कृत का तथा स्त्री-पात्र प्राकृत का प्रयोग करते हैं।
नाटक की रचना को लक्ष्य कर रस और भाव के अनुरूप माधुर्य, ओज आदि
गुणों का तथा उपमा, रूपक, दीपक और अनुप्रास इस अलंकार-चतुष्टय का
निवेश करने का आदेश उन्होंने कवियों को दिया है।
अभिनय, प्रकृति, पाठ्य, छन्द, अलंकार, स्वर, संगीत—नाट्य की इस
विशाल सामग्री का अवसान दर्शकों के हृदय में अनुकूल रस-भाव के उन्मीलन में
ही होता है। रस के आधार पर ही भरत ने गुण-दोष की व्यवस्था की है।
रसोद्बोध में सहायक 'गुण' हैं और रसोद्बोध में बाधक हैं 'दोष'। समग्र
नाट्य-विधान का यही मूलमन्त्र है।
भरत ने अभिनय के सिद्धान्त का रहस्य प्रकट करते हुए कहा है—“सर्वप्रथम
अवस्था के अनुरूप वेष होना चाहिए। वेष के अनुरूप गति तथा क्रिया होनी
चाहिए। गति-प्रचार के अनुरूप पाठ्य होता है और पाठ्य के अनुरूप अभिनय
करना चाहिए।”१
नानाशीलाः प्रकृतयः शीले नाट्यं प्रतिष्ठितम् ।
तस्माल्लोकप्रमाणं हि कर्तव्यं नाट्ययोक्तृभिः ॥
( ख ) नोक्तानि च मया यानि लोकग्राह्याणि तान्यपि ॥
( ना. शा. २४।२१...
१. वयोऽनुरूपः प्रथमस्तु वेषो
वेषानुरूपश्च गतिप्रचारः ।