औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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यद्यपि अलंकार-युग के ही अन्तिम आचार्य रुद्रट हैं, अतः उन्होंने अपने ग्रन्थ
का नाम 'काव्यालंकार' रखा और उसमें प्रधानतया अलंकारों का ही विवेचन
किया तथापि वे इस सिद्धान्त से पूर्ण परिचित प्रतीत होते हैं। रस के साथ अलं-
कारों का सम्बन्ध कैसा होना चाहिए इसका विवेचन भी रुद्रट ने अतिसूक्ष्म
पद्धति से किया है। आनन्दवर्धन ने ध्वन्यालोक में जिस सिद्धान्त का पल्लवन
किया है उसका उल्लेख—सूत्ररूप में ही सही पर—काव्यालंकार में है अवश्य।
काव्य में वे ही अलंकार ग्राह्य हैं जो प्रकृत रस का पोषण करते हों। इस तथ्य
का उन्मीलन रुद्रट ने अपने ग्रन्थ में किया है जिससे औचित्यविषयक उनकी
धारणा उच्चतर ज्ञात होती है। काव्यालंकार के द्वितीय अध्याय में अनुप्रास
अलंकार की पाँच जातियों का विवरण देने के अनन्तर काव्य में उनके प्रयोग
का वर्णन रुद्रट ने किया है। इस प्रसङ्ग पर उन्होंने औचित्य को ही प्रधान
कसौटी मानी है।
काव्य में औचित्य के आधार पर ही अनुप्रास का प्रयोग होना चाहिए।
रुद्रट ने ठीक ही कहा है—
एताः प्रयत्नदधिगम्य सम्यगौचित्यमालोच्य तथार्थसंस्थाम् ।
मिश्राः कवीन्द्रै रचनाल्पदीर्घाः कार्या मुहुश्चैव गृहीतमुक्ताः ॥
काव्यालंकार २।३२
यही है रसौचित्य का सिद्धान्त। रुद्रट के इस पद्य के 'गृहीतमुक्ताः' अंश के
आधार पर ही आनन्दवर्धन ने अपने ग्रन्थ में आवश्यकता के अनुसार अलंकार
के ग्रहण तथा त्याग की व्यवस्था 'काले च ग्रहणत्यागौ' लिख कर की है।
( ख ) यस्तु सरिद्रिसागर-पुरतुरगरथादिवर्णने यत्नः ।
कविशक्तिख्यातिफलो विततधियां नो मतः स इह ॥
( ग ) यमकानुलोमतदितरचक्रादिभिदोऽतिरसविरोधिन्धः ।
अभिमानमात्रमेतद् गड्डरिकादिप्रवाहो वा ॥
इन तीनों पद्यों में से प्रथम दो पद्यों को राजशेखर ने काव्यमीमांसा के
नवम अध्याय में 'आपराजिति' नामक आचार्य के नाम से उद्धृत किया है।
हेमचन्द्र ने काव्यानुशासन में अन्तिम दो पद्यों को भट्ट लोल्लट के नाम से
उद्धृत किया है। इससे यह सिद्ध होता है कि भट्ट लोल्लट का ही दूसरा नाम
आपराजिति है। सम्भवतः लोल्लट के पिता का नाम अपराजित था।