औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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इस सूक्ष्म विवेचन का सूत्रपात भामह ने ही किया था। भामह ने अपने
काव्यालंकार नामक निबन्ध के प्रथम परिच्छेद में कई दोषों के विषय में
विशिष्ट सन्निवेश के कारण दोषत्व से मुक्त होने की बात लिखी है।
सन्निवेश-विशेष के कारण दुष्ट उक्ति भी उसी प्रकार शोभामय हो उठती
है जिस तरह माला के मध्य में गुम्फित नील पलाश ।१ 'असाधु वस्तु भी आश्रय
के सौन्दर्य से अत्यन्त सुन्दर हो जाती है' यह भी भामह कहते हैं। जिस प्रकार
स्वभावतः काला ( कुरूप ) कज्जल भी कमिनी-नयन-विन्यस्त होने पर शोभा-
वर्धक हो जाता है।२
आगे चलकर उनका एक और स्पष्ट कथन है कि 'पुनरुक्ति' दोष अवश्य
है परन्तु भय, शोक, असूया, हर्ष तथा विस्मय आदि भावों से चित्त के आक्षिप्त
होने पर पुनरुक्ति दोष नहीं है।३
ऊपर के विश्लेषण से स्पष्ट ज्ञात होता है कि औचित्य होने के कारण ही
भयादि के अवसर पर 'पुनरुक्ति' का दोषत्व समाप्त हो जाता है। इस प्रकार
भामह ने भी औचित्य-तत्त्व की ओर संकेत किया है।
दण्डी
आचार्य दण्डी के विचारानुसार प्रत्येक दोष किसी विशिष्ट स्थिति में ही
दोष कहा जा सकता है। जैसे अपार्थ दोष पागल के वकवाद, बालक के आलाप
तथा अस्वस्थ चित्त वाले व्यक्ति के प्रलाप को पुष्ट करने के कारण, उनके
वर्णन में गुण हो जाते हैं।४
इसी तरह सामान्यतः दोषरूप में स्वीकृत परस्पर-विरुद्धार्थक वाक्यस्थलीय
१. सन्निवेशविशेषात्तु दुरुक्तमपि शोभते ।
नीलं पलाशमाबद्धमन्तराले स्रजामिव । ( का. अ. १।५४ )
२. किञ्चिदाश्रयसौन्दर्याद् धत्ते शोभामसाध्वपि ।
कान्ता-विलोचनन्यस्तं मलीमसमिवाञ्जनम् ॥ ( का. अ. १.५५ )
३. भयशोकाभ्यसूयासु, हर्षविस्मययोरपि ।
यथाह गच्छ-गच्छेति, पुनरुक्तं न तद्विदुः ॥ ( का. अ. ४।१४ )
४. समुदायार्थशून्यं यत् तदपार्थमितीष्यते ।
उन्मत्त-मत्त-बालानामुक्तेरन्यत्र दुष्यति ॥ ( का. आदर्श ४।५ )