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सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 22, कुल 256 में से

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पृष्ठ 22

( १८ )
शुद्धिश्च प्रस्तुतसंविधानकविधौ प्रौढिश्च शब्दार्थयो-
र्विद्वद्भिः परिभाव्यतामविहितैरेतावदेवास्तु नः ॥”
—शृङ्गारप्रकाश भाग २
यशोवर्मा ने इस श्लोक में नाटक के आवश्यक गुणों का उल्लेख करते हुए
जिस वस्तु की प्रथम चर्चा की है, वह है वचनोचित्य, अर्थात् नाटक के पात्रों
का कथन उन पात्रों की प्रकृति के अनुरूप होना चाहिए। साहित्य में 'औचित्य'
पद का यह प्रथम प्रयोग है। इससे पूर्व इस पद का प्रयोग इस अर्थ में प्राप्त
नहीं होता।
भट्ट लोल्लट
नाट्यशास्त्र के मान्य टीकाकार तथा रस के सम्बन्ध में स्वतन्त्र मत के
संस्थापक भट्ट लोल्लट के तीन पद्यों को राजशेखर, हेमचंद्र एवम् नमिसाधु ने
उद्धृत किया है जिनमें औचित्य-सिद्धान्त पर प्रकाश पड़ता है। भट्ट लोल्लट
कहते हैं कि—“अर्थ-समूह अनन्त है, परन्तु काव्य में रसमय अर्थ का ही वर्णन
उचित है, नीरस का नहीं। काव्य में मज्जन, पुष्पावचय, सन्ध्या, चन्द्रोदय आदि
का वर्णन सरस होने पर भी प्रकृतरसानुकूल ओर अनतिविस्तृत ही करना
चाहिए। नदी, पहाड़, समुद्र, गज, तुरग, नगर आदि के वर्णन करने में जो
महान् यत्न भिन्न-भिन्न कवियों के द्वारा किया जाता है उससे उन कवियों की
शक्तिशालिता भले ही प्रथित होती हो, पर उससे प्रबन्ध-काव्य में किसी प्रकार
की रुचिरता नहीं आती। इसी प्रकार यमक आदि का महाकाव्य में निबन्ध
कवि के अभिमानमात्र का सूचक होता है, काव्यगत प्रमुख रस का उससे पोषण
नहीं होता।”१ सारांश यह कि लोल्लट की दृष्टि में महाकाव्य के मुख्य रस
और उसके विभिन्न अङ्गों में पूर्ण समरसता अवश्य होनी चाहिए। यह रसो-
चित्य का एक प्रकार ही तो है।
रुद्रट
औचित्य का इतिहास लिखते समय आचार्य रुद्रट भुलाये नहीं जा सकते
१. (क) “अस्तु नाम निस्सीमा अर्थसार्थः। किन्तु रसवत एव निबन्धो युक्तो
न तु नीरसस्य” इति आपराजितिः, यदाह—
मज्जन-पुष्पावचयन-सन्ध्या-चन्द्रोदयादिवाक्यमिह ।
सरसमपि नातिबहुलं प्रकृतरसेनान्वितं रचयेत् ॥