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सर्वकोश
औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)

Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary

महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा

DevanagariHindipublished256 पृष्ठ

पृष्ठ 24, कुल 256 में से

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पृष्ठ 24

( २० )

यमकालंकार का विस्तृत विवरण रुद्रट के ग्रन्थ में मिलता है। परन्तु काव्य
में यमक के निवेश को वे कवि-कौशल का कार्य नहीं समझते प्रत्युत कविहृदय
की अभिव्यक्ति मानते हैं। औचित्यतत्त्व का पारखी महाकवि ही काव्य में रस-
पोषक यमक का निवेश कर सकता है। अनुचित स्थान में सन्निविष्ट होने पर
यमक शोभावर्धक नहीं, अपितु गलगण्ड के समान काव्य के वैरूप्य का ही
संपादन करता है। इस प्रसङ्ग पर नमिसाधु की टीका दर्शनीय है।१ भामह
आदि के समान रुद्रट ने भी दोषों की गुणवत्त्वापत्ति की चर्चा की है। 'ग्राम्य'
दोष अवश्य है किन्तु विशिष्ट अवस्थाओं में इस दोष का ग्राम्यत्व सर्वथा अपहृत
हो जाता है और यह गुण कोटि में समाविष्ट हो जाता है।२
पुनरुक्ति दोष भी औचित्यवशात् स्थलविशेष में गुण हो जाता है ऐसी
मान्यता रुद्रट की है।३ दोष-प्रकरण का उपसंहार करते हुए रुद्रट ने लिखा है
कि सभी दोषों का दोषत्व तब परिहृत हो जाता है जब उसका काव्य अथवा
नाटक में केवल अनुकरण किया जाता है। यह सिद्धान्त नितान्त मार्मिक है अत-
एव परवर्ती आलंकारिक मम्मट, विश्वनाथ आदि ने भी अपने-अपने ग्रन्थों में
'अनुकरणे च सर्वेषाम्' लिखकर रुद्रट का अनुगमन किया है। यदि नाटक में
किसी मूर्ख का चित्रण करना हो तो उसके असंबद्ध प्रलाप, असमर्थ वाक्य तथा
अवाचक पदों का प्रयोग करना ही होगा। अनुकरण के अतिरिक्त इस पात्र के
चित्रण का उपाय ही कौन सा है ? अतः अनुकरण की दशा में दोषत्व-परिहार


१. इति यमकविशेषं सम्यगालोचयद्भिः सुकविभिरभियुक्तैर्वस्तु चौचित्यवद्भिः ।
सुविहितपदभङ्गं सुप्रसिद्धाभिधानं, तदनु विरचनीयं सर्गबन्धेषु भूम्ना ॥
“तथा च वस्तुविषयविभागमालोचयद्भिः यथा कस्मिन् रसे कर्तव्यम्' क्व
वा न कर्तव्यम् । यमकश्लेषचित्राणि हि सरसे काव्ये क्रियमाणानि रसखण्डनों
कुर्युः । विशेषतस्तु शृङ्गारकरुणयोः । कवेः किलैतानि शक्तिमात्रं पोषयन्ति न
रसवत्ताम् । यदुक्तम् 'यमकानुलोम-गड्डरिकाप्रवाहो वा ।।'
( नमिसाधु की टीका )
२. अर्थविशेषवशाद्वा सभ्येऽपि तथा क्वचिद् विभक्तेर्वा ।
अनुचितभावं मुञ्चति तथाविधं तत्पदं सदपि ।। (क.व्यालंकार ६.२३)
३. वक्ता हर्षभयादिभिराक्षिप्तमनास्तथा स्तुवन् निन्दन् ।
यत्पदमसकृद् ब्रूयात् तत्पुनरुक्तं न दोषाय ॥ (का. अ. ६।२९)