औचित्यविचारचर्चा (महाकवि क्षेमेन्द्र - औचित्य रससिद्धस्य स्थिरं काव्यस्य जीवितम् सटीक)
Aucitya Vicara Charcha of Kshemendra with Commentary
महाकवि क्षेमेन्द्र (टीकाकार: पं. ब्रजमोहन झा) द्वारा
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रहेगें। अनुचित स्थान में धारण किया गया अलंकार स्वयं को ही असुन्दर नही
बनाता अपितु धारण करने वाले व्यक्ति को भी मूर्ख सिद्ध कर देता है, उपहासा-
स्पद बना देता है ।
बिहारी का कथन ठीक है कि जिस मुकुट को मस्तक पर धारण कर राजे-
महाराजे महिमान्वित होते हैं उसी को जड़ जन चरण में पहन कर अपनी जड़ता
को प्रकट करते हैं—
जो सिर धरि महिमा मही, लहियत राजा-राव ।
प्रगटत जड़ता आपनी, मुकुट पहिरियत पाव ॥
गुणों की भी स्थिति ठीक इसी तरह की है—अर्थात् गुण भी औचित्य की
सीमा के अन्दर रहकर ही गुण होते हैं, औचित्य-सीमा से बाहर होने पर गुण,
गुण नहीं, दोष हो जाते हैं। अहिंसा तथा दया दोनों निःसन्देह दैवी गुण हैं।
इनका प्रयोग करना मानव-धर्म माना गया है। किन्तु आततायी के ऊपर दया
दिखलाना अनुपयुक्त होने के कारण पाप है, तभी तो शास्त्रकारों ने भी कह
दिया—
“आततायिनमायान्तं हन्यादेवाविचारयन् ।”
ग्राम में आकर उपद्रव मचाने वाले नरभक्षी व्याघ्र के प्रति अहिंसा का
पालन करना क्या कभी पुण्य माना जा सकता है ? फलतः यही मानना पड़ता
है कि दया, अहिंसा आदि दैवी गुण भी औचित्य का पल्ला पकड़ कर ही गुणता
को प्राप्त करते हैं ।
इस प्रकार हम देखते हैं कि ईश्वरीय व्यापारों से लेकर मानवीय व्यवहारों
तक—सर्वत्र—औचित्य का ही अखण्ड साम्राज्य विराजमान है ।
ऐसी स्थिति में, जब कि देवलोक से लेकर मानवलोक तक के व्यापार-
कलापों में औचित्यतत्त्व की महनीय महत्ता दृष्टिगोचर होती है, यदि काव्य-
कला-जगत् में भी औचित्य का समधिक आदर हो तो यह कोई आश्चर्य की
बात नहीं, क्योंकि काव्य तथा कला आखिर लोकवृत्त के प्रतिबिम्ब ही तो हैं ।
यद्यपि ललित कलाओं में आदर्श के साथ यथार्थ का सामञ्जस्य रहता है
अथवा नहीं; रहना चाहिए किंवा नहीं; इस विषय में समालोचकों के मत
समान नहीं हैं तथापि कोई भी कला सर्वथा लोक का परित्याग नहीं कर सकती
यह बात अकामेनापि सब को माननी पड़ेगी। आदर्शबाद की रक्षा के लिए