आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
२४ आत्मतत्त्वविवेके
कल्पनागौरवप्रसङ्गप्रतिहतत्वात् अतीन्द्रियेन्द्रियादिलोपप्रसङ्गात्
विकल्पानुपपत्तेः विशेषस्य विशेषं प्रति प्रयोजकत्वाच्चेति ।
तथाहि उत्पत्तेरारभ्य मुद्गरप्रहारपर्यन्तं घटस्तान्द् जात्यन्त-
रानाक्रान्त एवानुभूयमानः क्रमवत्सहकारिवैचित्र्यात् कार्यकोटोः१
सरूपा विरूपाः करोति । तत्र एतावतेव सर्वस्मिन् समञ्जसे
अनुपलभ्यमानजातिकोटिस्त्वन्ना२ केन प्रमाणेन केन चोपयोगेन,
येन कल्पनागौरवप्रसङ्गदोषो न स्यात्३ । यो यदर्थं कल्प्यते
तस्यान्यथासिद्धिरैव तस्याभाव इति भवानेव आह इति ।
जातिकी संग्राहिका नहीं हो सकती है, जैसे कि शिंशपात्व जाति वृक्षत्व
जातिकी संग्राहिका होती है । एव कुर्वद्रूपत्व-जाति बीजत्वकी प्रति-
क्षेपिका भी नहीं हो सकती है, जैसे कि गोत्वजाति अश्वत्वकी प्रतिक्षेपिका
होती है ।
तुम्हारे कथन के विरुद्ध चौथा आक्षेप यह है कि बीजविशेष
(कुर्वद्रूपबीज) अङ्कुरविशेष के प्रति कारण है, इससे अङ्कुरसामान्यके
प्रति बीजसामान्यका कारण होना खण्डित नहीं होता है। क्योंकि
जैसे विशेषका कारण विशेष होता है, वैसे सामान्य भी सामान्यका
कारण होता है ।
उपर्युक्त मेरे कथनमें उपपत्ति यह है कि घट अपनी उत्पत्तिसे
लेकर मुद्गरप्रहार तक अर्थात् विनाशपर्यन्त घटत्वके अतिरिक्त कुर्वद्रूपत्व
आदि जातियोंसे अनाक्रान्त ही अनुभव में आता हुआ क्रमश प्राप्त
सहकारियों की विचित्रताके कारण ही सरूप या विरूप विविध कार्योंको
करता है । अतः जब इतनेसे ही सब कुछ बन जाता है, तब अनुभवमे
नहीं आनेवाली कुर्वद्रूपत्वजाति की कल्पना किस प्रमाणके आधार
पर या किस प्रयोजनसे की जाय, जिससे कल्पनागौरवप्रसङ्गरूप दोष
१. कर्मकोटी — २ पु० पा०
२. कल्पन—१ पु० पा०
३. न सिद्ध्येत्—२ पु० पा०
क्षणभङ्गवादः २५
दृष्टं च जातिभेदं तिरस्कृत्य स्वभावभेदकल्पनयैव कार्योत्पत्तौ १
सहकारिणोऽपि दृष्टत्वात् कथञ्चित् स्वीक्रियन्ते, अतीन्द्रियेन्द्रि-
यादिकल्पना तु विलीयेत, मानाभावात् विकल्पानुपपत्तेश्च ।
स खलु जातिविशेषः शालित्वसंग्राहको २ वा स्यात् तत्प्रति-
क्षेपको वा । आद्ये कुशूलस्थस्यापि शालेः कथं न तद्रूपत्वम्, ३
द्वितीये स्वभिमतस्यापि शालेः कथं तद्रूपत्वम् । एवं शालित्वमपि
न हो । अर्थात् प्रमाण और प्रयोजनके अभावमें कुर्वद्रूपत्व-जाति
माननेपर कल्पनागौरवप्रसङ्गरूप दोष होगा ही । आपहीका कहना है कि
"जिस प्रयोजनसे जिस वस्तुकी कल्पना की जाती है, उस प्रयोजनकी
प्रकारान्तरसे सिद्धि ही उस वस्तु के अभावमे प्रमाण है।"
एवं प्रत्यक्षसिद्ध बीजत्व-जातिका तिरस्कार करके कुर्वद्रूपत्व-जातिकी
कल्पनासे ही अंकुरादि कार्यकी उत्पत्ति माननेमें सहकारियोंको भी
अंकुरादि कार्यके प्रति कारण मानना निरर्थक हो जायगा । यद्यपि
प्रत्यक्ष दृष्ट होनेके कारण सहकारी भी कारणके रूपमें किसी तरह माने
जा सकते हैं, परन्तु अप्रत्यक्ष इन्द्रियादिकी कल्पना तो प्रमाण न होने
से सर्वथा विलीन हो जायगी । क्योंकि तुम्हारे मतानुसार आलोक
(प्रकाश) गोलकादि गत कुर्वद्रूपत्वसे ही रूप-रसादि ज्ञान हो जायगा
और इन्द्रियाँ अनावश्यक हो जायेंगी ।
अग्रिम विकल्प भी कुर्वद्रूपत्व-जातिमें नहीं बन सकता है । क्योंकि
वह बीजगत जातिविशेष (कुर्वद्रूपत्व) शालित्वका संग्राहक है ? अथवा
उसका प्रतिक्षेपक (विरोधी) है ? यदि प्रथम पक्ष मानो तो बखारमें
रहनेवाला बीज भी तो शालि ही है, फिर उसमे भी क्यों नहीं कुर्व-
द्रूपत्व मानते हो ? यदि द्वितीय पक्ष कहो तो तुम्हारे अभिमत क्षेत्रस्थ
शालिमें भी कुर्वद्रूपत्व कैसे रह सकता है ?
१. कार्योत्पत्तौ-१ पु० पा०
२. शालित्वस्य संग्राहकः- २ पु० पा०
३. तद्रूपवत्त्वम्-२ पु० पा०
तस्य संग्राहकं प्रतिक्षेपकं वा । आद्येऽशालेरतत्त्वप्रसङ्गः१ । द्वितीये
तु शालेरेवातत्त्वप्रसङ्गः ।
न च नोभयमपीति वाच्यम् , विरोधाविरोधयोः प्रकारान्तरा-
भावात् । व्यक्तिभेदेन संग्रहप्रतिक्षेपावपि न विरुद्धाविति२ चेत्,
हतो न्विदानीं तदतज्जातीयताविरोधेन परिदृश्यमानकतिपय-
व्यक्तिप्रतिक्षेपेऽपि मिथः क्वचित् तुरगविहङ्गयोरपि सम्भेद-
सम्भवात् ।
यश्च यस्य जातिविशेषः, स चेत् तं व्यभिचरेद् व्यभिचरेदपि
शिंशपा पादपमविशेषात् , तथा च गतं स्वभावहेतुना । विपर्यये
इसी प्रकार शालित्व-जाति भी कुर्वद्रूपत्व जातिका संग्राहक है ?
अथवा उसका प्रतिक्षेपक अर्थात् विरोधी है ? प्रथम पक्षमे शालिसे भिन्न
मसूर आदिके बीजमे कुर्वद्रूपत्वका अभाव हो जायगा ।
यह भी नहीं कह सकते हो कि 'कुर्वद्रूपत्व और शालित्व परस्पर न
संग्राहक हैं और न विरोधी ही हैं, क्योंकि उनमे या तो परस्पर विरोध
मानना होगा अथवा अविरोध मानना होगा। इन दोनों प्रकारोंसे
अतिरिक्त कोई तीसरा प्रकार हो नहीं सकता है ।
यदि कहो कि "व्यक्ति के भेदसे संग्रह और प्रतिक्षेप दोनों बन सकते
हैं । अर्थात् खेतमे रहने वाले शालिमे शालित्व और कुर्वद्रूपत्व दोनो
साथ रहते हुए परस्परका संग्राहक भी हो सकते हैं और कुशूलस्थ
शालिमें वही शालित्व-जाति कुर्वद्रूपत्वका प्रतिक्षेपक भी हो सकती है
तथा अकेले ही रह सकती है" तब तो एक जातिका अन्य जातिके साथ
विरोध ही लुप्त हो जायगा । क्योंकि प्रत्यक्ष दीख पड़ने वाले कुछ घोडों
और पक्षियोंमे परस्पर विरोध रहते हुए भी कहीं अश्वत्व और पक्षित्व
जातिका मिश्रित होकर भी रहना सम्भव हो जायगा ।
एव, जो जिसकी अवान्तर जाति है वह यदि उसे छोड़कर रहे—
१ अतत्त्वापत्ति —२ पु० पा० द्र० मि० सम्मत
२. संग्रहप्रतिक्षेपावविरुद्धाइविति—१ पु० पा०
क्षणभङ्गवादः २७
बाधकं विशेष इति चेत् न, तन्म्येहापि सत्त्वात्¹, तदभावे स्वभाव-
त्त्वानुपपत्तेः । उपपत्तौ वा किं बाधकानुसरणव्यसनेनेति ।
विशेषस्य विशेषं प्रति प्रयोजकत्वाच्च । तथाहि कार्यगतमङ्कुरत्व
प्रति बीजत्वस्याप्रयोजकत्वेऽबीजादपि तदुत्पत्तिप्रसङ्गः ।
बीजस्य विशेषः कथमबीजे भविष्यतीति चेत् तर्हि शालेर्वि-
जैसे कि तुम शालित्वकी अवान्तरभूत कुर्वद्रूपत्व जातिको शालिके
अलावा क्षेत्रस्थ यवादिमे भी मानते हो—तो उसीके समान शिंशपात्व
भी वृक्ष को छोड अवृक्षमे अर्थात् पत्थर आदिमे भी रहे क्योंकि वह
भी वृक्षत्वकी अवान्तरजाति है । ऐसी दशामे 'यह वृक्ष है, क्योंकि
शिंशपा है" इस अनुमानमे शिंशपात्वधर्म वृक्षत्वका हेतु नहीं बन
सकता है ।
'यदि शिंशपात्व वृक्षको छोडकर रहे तो अपनेको भी छोड देवे—
इसप्रकारका विपक्षमे बाधक होनेसे शिंशपात्व वृक्षका परित्याग नहीं
कर सकता है तथा वृक्ष होनेमे शिंशपात्व हेतु बन सकता है' इस प्रकार
की विशेषता दिखाना भी ठीक नहीं है क्योंकि इस प्रकारका विपक्ष
बाधक शालित्व और कुर्वद्रूपत्वके सम्बन्धमे भी दिखाया जा सकता
है । क्योंकि जैसे शिंशपा वृक्षत्व स्वभावकी है, वैसे ही कुर्वद्रूप
भी शालित्व स्वभावका है । इसलिये उसीके समान कुर्वद्रूपत्व भी यदि
शालिको छोड़कर गेहूँ आदिमे रहे तो स्वय वह कुर्वद्रूप ही न रह जाय ।
इस प्रकारका विपक्ष म बाधक यहाँ भी हो ही सकता है । यदि विपक्षमे
कोई बाधक न हो तो कुर्वद्रूप मे शालिस्वभावत्व ही अनुपपन्न हो
जायगा । यदि उस स्थितिमे भी शालिस्वभावत्व मानो तो कहीं भी
विपक्षमे बाधकका दिखाना व्यर्थ हो जायगा ।
एव विशेष विशेषके ही प्रति प्रयोजक होता है, सामान्य के प्रति तो
सामान्य प्रयोजक होता है । क्योंकि सामान्यरुपसे अंकुरकार्यके प्रति
यदि बीजत्व प्रयोजक न हो तो जो बीज नहीं है—ऐसे पत्थर आदिसे
भी अङ्कुरकी उत्पत्ति होनी चाहिये ।
१ म. ० ० ० -२ प० पा०
२८ आत्मतत्त्वविवेके
शेषः कथमशालौ स्यादिति अशालोरङ्कुरानुत्पत्तिप्रसङ्गः। अशा-
लिगदबीजेऽप्यसौ भवतु विशेषः, तथापि बीजत्वैकार्थसमवेत
एवासावङ्कुरं प्रति प्रयोजक इति चेत् न, शालित्वव्यभिचारे
शालित्वैकार्थसमवायवद्बीजत्वव्यभिचारे बीजत्वैकार्थसमवाये-
नापि नियन्तुमशक्यत्वादविशेषात् ।
तस्माद् यो यथाभूतो यथाभूतमात्मनोऽन्वयव्यतिरेकानु-
कारयति, तस्य तथाभूतस्यैव तथाभूते सामर्थ्यम् । तद्विशेषास्तु
कार्यविशेषं प्रयोजयन्ति शाल्यादिवदिति युक्तमुत्पश्यामः ।
यदि यह कहो कि "बीजत्व-जाति तो अङ्कुरके प्रति प्रयोजक नहीं है
किन्तु उसका अवस्थाविशेष (बैजिककुर्वद्रूपता) ही मेरे मतसे अङ्कुर-
सामान्यका प्रयोजक है, तथा वह बीजसम्बन्धी कुर्वद्रूपता बीजातिरिक्त
पत्थर आदिमे कैसे होगी कि पत्थरसे अङ्कुर हो" तब तो उसीके समान
शालिका विशेषभूत कुर्वद्रूपत्व अशालीमे कैसे होगा ? इस तरह शालि
से भिन्न गेहूँ आदिसे अङ्कुर नहीं पैदा होना चाहिये। क्योंकि शालिगत
विशेषभूत कुर्वद्रूपत्व गेहूँमे रहेगा नहीं।
यदि कहो कि—शालिसे भिन्न गेहूँके समान ही बीजसे भिन्न पत्थर
आदि में भी कुर्वद्रूपत्व नामका वह विशेष रहे, फिर भी पत्थरसे अङ्कुर
की उत्पत्ति का प्रसङ्ग नहीं आ सकता है, क्योंकि बीजत्वधर्मके साथ
एक स्थानपर (अर्थात् बीजमें) समवेत जो विशेष (बीजमे रहने वाला
ही विशेष ऐसा होगा न कि पत्थरमें रहने वाला) वही अङ्कुरके प्रति-
कारण है। इसलिये पत्थरसे अङ्कुरका प्रसङ्ग नहीं हो सकता है-तो यह
भी ठीक नहीं है। क्योंकि जैसे शालिमे कुर्वद्रूपत्व विशेषका रहना
अशालिसे (गेहूँ आदिसे) अङ्कुर होनेमे बाधक नहीं हो सकता, वैसे ही
बीजमें कुर्वद्रूपत्व विशेषका रहना भी अबीजसे (पत्थरसे) अंकुर होने
को नहीं रोक सकता। क्योंकि दोनोंकी स्थिति समान है।
इस लिये जो जिस रूपमे होकर जैसे कार्यको अपने अन्वय और
व्यतिरेकका अनुसरण कराता है, उस रूपमे ही उसकी वैसे कार्यके प्रति
१. अशालौ भविष्यतीत्यशाले—१ पु० पा०
क्षणभङ्गवादः २९
कस्य पुनः प्रमाणस्यायं व्यापारकलाप इतिचेत्, तदुत्पत्ति-
निश्चयहेतोः१ प्रत्यक्षानुपलम्भात्मकस्येति ब्रूमः ।
अथ न्यायेन विना न ते परितोष', शृणु तमपि । तदा यद्-
ङ्कुरं प्रत्यप्रयोजकं न तद्वीजजातीयं यथा शिलाशकलम्,
अङ्कुरं प्रत्यप्रयोजकं च कुशूलनिहितं बीजमभ्युपेतं परैरिति व्याप-
कानुपलब्धिः प्रसङ्गहेतुः ।
सामर्थ्य रहती है । उसके विशेष तो कार्यकी विशेषताके प्रति प्रयोजक
होते हैं । जैसे सामान्यरूपसे बीज सामान्यरूपसे अंकुरके प्रति कारण
होता है । किन्तु उसके विशेषभूत शालि गेहूँ आदि तो विशेष रूप से
खास-खास अंकुरके प्रति कारण होते हैं—यह हमारी कल्पना ही
ठीक है ।
यदि यह पूछो कि “बीजजातिका होना ही अंकुरका प्रयोजक है—
यह किस प्रमाणके बलसे जाना जाय” तो हम यही कहेंगे कि प्रत्यक्ष
और अनुपलम्भ अर्थात् अन्वय और व्यति
३० आत्मतत्त्वविवेके
विपर्ययेऽपि किं बाधकमिति चेत्, अङ्कुरस्य जातिप्रतिनिय-
माकस्मिकत्वप्रसङ्गः१ इत्युक्तम् ।
बीजत्वं तस्य प्रत्यक्षसिद्धमशक्यापह्नवमिति चेदस्तु तर्हि
विपर्ययः । यद्बीजं तदङ्कुरं प्रति प्रयोजकं यथान्त्यसामग्री-
मध्यमध्यासीनं बीजं, बीजं चेदं विवादास्पदमिति स्वभावहेतुः२ ।
अङ्कुरस्य च जातिप्रतिनियमो न तावन्निर्निमित्तः, सार्वत्रि-
कत्वप्रसङ्गात् । नाप्यन्यनिमित्तः३, तथाभूतस्य तस्याभावात् ।
यदि कहो कि “जो अंकुर न भी करे, उसके भी बीज होनेमें बाधक
ही क्या है ?” तो मैं कह चुका हूँ कि तब अङ्कुरमे कार्यत्वका नियम
अहेतुक हो जायगा, अर्थात् अङ्कुर कार्य नहीं कहा जा सकेगा । क्योंकि
बीजजातिसे उसकी उत्पत्ति मानते नहीं हो और दूसरे किसीसे वह पैदा
होता नहीं । इसका स्पष्ट अर्थ है कि वह कार्य ही नहीं है । क्योंकि
कार्य वही है जो किसी कारणसे पैदा हो ।
यदि यह कहो कि “कुशूलमे स्थित धान्यादि वस्तुका बीजत्व प्रत्यक्ष
सिद्ध है, अतः अङ्कुर के प्रति प्रयोजक नहीं होनेपर भी उक्त प्रसङ्गद्वारा
उसके बीजत्वका अपलाप नहीं किया जा सकता, तब तो कुशूलस्थ-
बीजमे अङ्कुराप्रयोजकत्वका विपर्यय अर्थात् अङ्कुरप्रयोजकत्व ही सिद्ध
हो जायगा यह यों होगा—“जो बीज है, वह अंकुरके प्रति प्रयोजक है,
जैसे अङ्कुर जन्मानेवाली अन्तिम सामग्रीके मध्य विराजमान बीज, कुशू-
लस्थ भी बीज ही है, इसे तुम भी अभी मान चुके हो, इसलिये यह
भी अंकुरके प्रति प्रयोजक है” इस प्रकारका अनुमापक हेतु होगा ।
एव अङ्कुरमे कार्यजातीयत्वका नियमितरूपसे रहना भी अहेतुक
नहीं है । क्योंकि अङ्कुरके कार्य होनेमे यदि कोई निमित्त न हो तो
कार्य अकार्य सबको ( नित्य वस्तुको भी ) अङ्कुर कहने लगेंगे । यह भी
१. जातिप्रतिनियम = कार्यजातीयत्वम् । आकस्मिकत्वं = निर्निमित्तकत्वम् ।
२ स्वभावहेतुः = अनुमापको हेतुः । कुशूलस्थबीजम् अङ्कुरप्रयोजकम् बीज-
त्वात् क्षेत्रपतितबीजवत् इत्यनुमानाकारः ।
३. अन्यनिमित्त = कुर्वद्रूपत्वनिमित्तः ।
क्षणभङ्गवादः ३१
सेयं निमित्तवत्ता विपक्षाद्¹ व्यावर्तमाना² स्वव्याप्यमादाय
बीजप्रयोजकतायामेव विश्राम्यतीति प्रतिबन्धसिद्धिः ।
अथवा कृतमङ्कुरग्रहेण, बीजस्वभावत्वं क्वचित् कार्ये प्रयो-
जकं न वा ? न चेत्, न तत्स्वभावं बीजं, तेन रूपेण क्वचिदप्य-
नुपयोगात् । एवं च प्रत्यक्षसिद्धे बीजस्वभावत्वं नास्ति सर्व-
प्रमाणागोचरस्तु विशेषोऽस्तीति विशुद्धा बुद्धिः ।
नहीं कह सकते हो कि "अंकुरके कार्य होनेमे निमित्त उसका बीज
जातिसे पैदा होना नहीं है, किन्तु कुर्वद्रूपसे पैदा होना है" क्योंकि
कुर्वद्रूपत्व अप्रामाणिक है ।
इसलिए अंकुरत्व-जातिका केवल कार्यमे रहना आकस्मिक नहीं है,
किन्तु किसी निमित्तवश है । उस निमित्तको ढूँढते हुए हम बीजत्वको
ही उसका निमित्त निश्चित करते हैं । क्योंकि कुर्वद्रूपत्व तो अप्रामाणिक
है । शालित्वको निमित्त माननेमे गोधूमका अंकुर छूट जाता है और
गोधूमत्वको निमित्त माननेपर शालिका अङ्कुर छूट जाता है । अत
सामान्यरूपसे बीजत्व ही निश्चित होता है । इस प्रकार 'जो जो बीज
है, वह वह अंकुरप्रयोजक है" यह हमारी व्याप्ति भी सिद्ध हो जाती
है । तथा इस व्याप्तिके बलसे कुशूलस्थ बीजमे भी अंकुरप्रयोजकत्व
सिद्ध हो जाता है ।
अथवा अंकुर की बात रहने दो और यह बताओ कि बीजका बीज-
स्वभावत्व किसी कार्यमे प्रयोजक है कि नहीं ? यदि नहीं, तो वह
बीज बीजस्वभावका नहीं रहेगा । अर्थात् बीजका बीजत्व असत् हो
१. विपक्षात् = निमित्तात् इत्यर्थं । स्वव्याप्य = कार्यजातीयत्वमा-
दायेत्यर्थं । बीजप्रयोजकतायामित्यत्र बहुव्रीहिः । तेन बीजं प्रयोजक
यस्य अङ्कुरगतकार्यत्वस्य, तस्य भावो बीजप्रयोजकता तस्यामित्यर्थं ।
बीजप्रयोज्यतायामिति क्वचित् पाठः । अस्मिन् पाठे अङ्कुरगतकार्यत्वे
बीजप्रयोज्यता सुगमैव । प्रतिबन्धसिद्धिः = व्याप्तिसिद्धिः । तदाकारश्च
यद् यद् बीज तत्सर्वमङ्कुरप्रयोजकमिति ।
२. निवर्तमाना—१ पु० पा० ।
[Header] ३२ आत्मतत्त्वविवेके
क्वचिदुपयोगेप्येकस्य तेन रूपेण सर्वेषामविशेषस्ताद्रूप्यात् ।
तथा च कथं किञ्चिदेव बीजं स्वकार्यं कुर्यात् नापराणि ।
न च वस्तुमात्रं तत्कार्यम्, अबीजात् तदनुत्पत्तिप्रसङ्गात् ।
नापि बीजमात्रम्, अङ्कुरकारिणोऽपि तदुत्पत्तिप्रसङ्गात् ।
नाप्यङ्कुराद्यन्यतममात्रम्, प्रागपि १ तदुत्पत्तिप्रसङ्गात् ।
जायगा। क्योंकि बीजत्वरूपसे वह कहीं उपयोगी है नहीं । इस तरह
तो—प्रत्यक्ष-सिद्ध बीजस्वभावत्व असत् है और सभी प्रमाणोंसे असिद्ध
जो कुर्वद्रूपत्व वह सही है—यह तुम्हारी बहुत ही अच्छी सूझ है ।
यदि एक ही बीज बीजत्वरूपसे कहीं उपयोगी हो तो उस रूपसे
सभी (कुशूलस्थ आदि) बीजोंका उपयोग सिद्ध हो जाता है, क्योंकि
वह बीज-स्वभावत्व सभीमें है । तब कैसे कुछ ही बीज अपना कार्य
करे' और दूसरे नहीं ?
वस्तुमात्र तो बीजस्वभावका कार्य हो नहीं सकती, क्योंकि वैसी
दशामे बिना बीजके किसीकी भी उत्पत्ति नहीं हो सकेगी । अर्थात्
बिना बीजके घट पट आदि कैसे बन सकेंगे ?
बीजमात्र भी बीजस्वभावका कार्य नहीं हो सकता है । अर्थात् बीज
स्वभावसे बीज ही पैदा होते हैं-यह भी नहीं कह सकते हो, क्योंकि तब
अङ्कुर जन्माने वाले बीजसे भी अङ्कुर न होकर बीज ही पैदा होने चाहिये ।
यह भी नहीं कहा जा सकता कि—"बीजस्वभावका कार्य कभी बीज
कभी अङ्कुर और कभी बीजका अनुभव है" क्योंकि तब उसी बीजसे
पहले अङ्कुर की और पीछे बीजकी उत्पत्ति होनी चाहिये । अर्थात्
यही बीज-जाति कुशूलावस्थामे बीज पैदा करती है और क्षेत्रावस्थामे
अङ्कुर पैदा करती है तथा कभी उससे अनुभवरूपी कार्य पैदा होता है,
ऐसा मानने पर पहले ही अर्थात् कुशूलावस्थामे ही अङ्कुर कर देना
चाहिये एव क्षेत्रावस्थामे बीज करना चाहिये । क्योंकि बीजस्वभाव
का कार्य आपने अंकुर बीज आदि सब बताया है । किन्तु ऐसा नहीं
देखा जाता है, अतः आपका उक्त नियम असङ्गत है ।
१. प्रागपि = सहकारिसमवधानादिति शेषः ।
क्षणभङ्गवादः ३३
यदा यदुत्पन्नं सत् यत्कार्यानुकूलसहकारिमध्यमधिशेते
तदा तदेव कार्यं प्रति तस्य प्रयोजकत्वमिति चेत्, तत् किमवान्तर-
जातिभेदमुपादाय ? बीजस्वभावेनैव वा ? आद्ये स एव जाति-
भेदस्तत्र प्रयोजकः, किमायातं बीजत्वस्य ? द्वितीये तु समान-
शीलानापि¹सहकारिवैकल्यादकरणमित्यायातम्, तत्तत्सहकारि-
साहित्ये² सति तत्तत्कार्यं प्रति प्रयोजकस्य बीजस्वभावस्य³
सर्वसाधारणत्वादिति ।
अत्रापि प्रयोगः—यद्येन रूपेणार्थक्रियासु नोपयुज्यते, न तत्
तद्रूपम् , यथा बीजं कुञ्जरत्वेन किञ्चिदप्यकुर्वन्न कुञ्जरस्वरूपम् ।
इसका उत्तर यदि यह कहो कि “जो कारण उत्पन्न होकर जब जिस
कार्यके अनुकूल सहकारियोंके बीच रहता है, तब उसी कार्यके प्रति
वह प्रयोजक होता है, तो बताओ, वह बीज किसी अवान्तर जातिविशेष-
को लेकर उस कार्यके प्रति प्रयोजक है ? अथवा
३४ आत्मतत्त्वविवेके
तथा च शाल्यादयः सामग्रीप्रविष्टा बीजत्वेनार्थक्रियासु नोप-
युज्यन्त इति व्यापकानुपलब्धिः प्रसङ्गहेतुः, तद्रूपताया अर्थक्रियां
प्रति योग्यतया व्याप्तत्वात्, अन्यथातिप्रसङ्गात् ।
तद्रूपत्वमेतस्य प्रत्यक्षसिद्धत्वादशक्यापह्नवमिति चेत्, अस्तु
तर्हि विपर्ययः—यद्रूपं तत् तेन रूपेणार्थक्रियासूपयुज्यते यथा
स्वभावेन सामग्रीनिवेशिनो भावाः, बीजजातीयाश्चैते१ कुशूलस्थादय
होता है । जिस प्रकार बीज कुञ्जररूपसे कुछ भी नहीं करता, अतः वह
कुञ्जरस्वरूप नहीं है । उसी प्रकार सामग्री सहित भी धान आदिको
बीजत्वरूपसे तुम कहीं उपयोगी नहीं मानते हो । ऐसी स्थिति में
बीजत्वस्वरूपका व्यापक जो अर्थक्रियाकारित्व है, उसकी अनुपलब्धि हो
जाती है, जो कि प्रसङ्गमे हेतु बन जाती है ।
वह प्रसङ्ग यों होगा—सामग्रीयुक्त बीजमें यदि बीजस्वरूपत्व होता
तो वह बीजत्वरूपसे अर्थ—( प्रयोजन ) क्रिया करता । तुम्हारे मतानु-
सार तो वह बीजत्वरूपसे अर्थक्रियामे उपयोगी नहीं है । इस प्रकार
अर्थक्रियाकारित्वरूप व्यापकके अभावमे व्याप्यभूत बीजरूपत्वका अभाव
प्रसक्त हो जाता है । क्योंकि जो तद्रूपवाला है, वह उस रूपसे अर्थ-
क्रियाके प्रति उपयोगी भी है । ऐसा न माननेपर बीज भी कुञ्जरजातीय
होने लगेगा । भले ही वह कुञ्जररूपसे कोई भी प्रयोजन नहीं सिद्ध
करता है ।
यदि कहो कि “प्रत्यक्षसिद्ध होनेके कारण कुशूलस्थको बीजजातिसे
अलग नहीं किया जा सकता” । तो प्रसङ्गकी जगह विपर्य्यय ही रहे ।
वह यों होगा—जो जिस रूपका होता है, वह उस रूपसे अर्थक्रिया
( प्रयोजनसिद्धि ) मे उपयोगी होता है, जैसे सामग्रीमध्यवर्ती क्षेत्रस्थ
बीज तुम्हारे मतानुसार कुर्वद्रूपत्वसे युक्त है और वह उस रूपसे उपयोगी
भी है । उसी प्रकार कुशूलस्थ भी बीजरूप है, अतः बीजरूपसे उसे
उपयोगी भी मानना पड़ेगा । इस तरह उस रूपका होना ही यहाँ उस
रूपसे उपयोगी होनेमें हेतु है । क्योंकि तद्रूपत्वमात्र ही उपयोगिताका
१. बीजरूपाश्चैते—२ पु० पा०
इति स्वभावहेतुः, तद्रूपत्वमात्रानुबन्धित्वाद् योग्यतायाः । तत-
श्चास्ति किञ्चित् कार्यं यत्र बीजत्वेन बीजमुपयुज्यत इति ।
बीजानुभव एवासाधारणं कार्यं यत्र बीजत्वं प्रयोजकं, तच्च
सर्वस्मादेव बीजाद्भवतीति किमनुपपन्नम् इति चेत्, न, यौगिक-
तदनुभवस्य तदन्तरेणाप्युपपत्तेः । लौकिक इति चेत्, न, सत्यमेतत्,
न त्विदमवश्यं सर्वस्माद्बीजाद्भवति इन्द्रियादिप्रत्यासत्तेरसदात-
नत्वात् असार्वत्रिकत्वाच्च । ततश्च योग्यमपि सहकार्यसन्निधानान्न¹
करोतीत्यर्थसिद्धम् ।
कार्यान्तरमेवातीन्द्रियं सर्वबीजाव्यभिचारि भविष्यतीति चेत्,
तन्न तावदुपादेयम्, अमूर्तस्य मूर्तानुपादेयत्वात्, परिदृश्यमान-
व्याप्य है। इसलिये कोई कार्य अवश्य है, जिसमें बीजत्वरूपसे बीज
उपयोगी है।
यदि कहो कि 'बीजका अनुभव ही वह विशेष कार्य है, जिसमें
बीजत्व प्रयोजक है, क्योंकि वह सभी बीजोंमें होता है, ऐसा माननेमें
क्या हानि है"? तो वह ठीक नहीं है। क्योंकि योगबलसे होने वाला
अनुभव बीजके बिना भी हो जाता है। यदि “अनुभवका मानी
लौकिक अर्थात् हमलोगोंका अनुभव लो, जो बीजकी उपस्थितिमे ही हो
सकता है" तो यह ठीक है, किन्तु यह लौकिक अनुभव भी तो सभी
बीजसे अवश्य नहीं होता। क्योंकि अनुभवके लिये बीजके साथ इन्द्रि-
यका संयोग जरूरी है और वह संयोग सदा सब बीजोंसे है नहीं। अतः
जब जिस बीजके साथ इन्द्रियसन्निकर्ष नहीं हुआ, उस बीजसे तो
अनुभव भी पैदा नहीं हुआ। इससे यह स्वतः सिद्ध हो गया कि कार्यके
योग्य भी कारण सहकारीके अभावमें कार्य नहीं करता है। इससे भी
बीजका स्थिरत्व ही सिद्ध होता है न कि क्षणिकत्व।
यदि "सब बीजसे पैदा होने वाला कोई दूसरा ही कार्य होगा जो
अतीन्द्रिय होगा" ऐसा कहो तो वह कार्य उपादेय (बीजका ही एक
१. सन्निधेर्न—२ पृ० पा०
३६ आत्मतत्त्वविवेके
मूर्तघटिततया¹ मूर्तान्तरस्य तद्देशस्यानुपपत्तेः । नापि सहकार्यं,
मिथः सहकारिणामव्यभिचारानुपपत्तेः ।
अपि चैवं सति प्रयोजकस्वभावो नान्वयव्यतिरेकगोचरः,
तद्गोचरस्तु न प्रयोजकः । दृश्यं च कार्यजातमदृश्येनैव स्वभावेन
क्रियते, दृश्येन त्वदृश्यमेवेति, सोऽयं यो ध्रुवाणीत्यस्य विषयः ।
अथवा व्यतिरेकेण प्रयोगः—विवादाध्यासितं बीजं सहकारि
परिणाम ) नहीं कहा जा सकता है । क्योकि यदि उस कार्यको अमूर्त
मानो तो वह मूर्तिहीन कार्य मूर्तिमान बीजका परिणाम नहीं हो सकता
है । यदि उसे मूर्त मानो तो ठीक नहीं, क्योंकि उस बीजसे जहा तुम्हारे
मतानुसार दृश्यमान मूर्त्तिधारी अग्रिम बीज पैदा होता है, उसी देशमे
दूसरा मूर्त कार्य नहीं उत्पन्न हो सकता है । कारण, एक ही स्थानपर
दो मूर्त्त रह नहीं सकते ।
वह कार्य बीजका सहकार्य भी नहीं कहा जा सकता । अर्थात् 'यह
कार्य बीजका परिणामरूप तो नहीं है, पर-तु इस ढङ्गका कार्य है, जिसमे
सहकारी सहित बीज निमित्त है” यह भी नहीं कह सकते हो क्योंकि
बीजको सहकारियोंका योग सदा प्राप्त ही रहेगा—यह नियम नहीं है ।
इसलिये सहकारियोंकी अनुपस्थितिकी हालतमे वही बीज उस कार्यको
नहीं भी करेगा । इस प्रकार भी बीजका स्थिरत्व ही सिद्ध होता है,
न कि क्षणिकत्व ।
इसके अतिरिक्त तुम्हारे कथनानुसार कार्यका प्रयोजक जो कुर्वद्रूपत्व-
स्वभाव है, वह कारणताका निश्चय कराने वाले अन्वय व्यतिरेक का विषय
नहीं है, और जो बीजत्व अन्वय-व्यतिरेकका विषय है, वह तो प्रयोजक
नहीं है । तथा जो दृश्य कार्य अङ्कुर है, उसे अदृश्य कुर्वद्रूपत्वसे ही
किया मानते हो और दृश्य बीजत्वसे तो अतीन्द्रिय ही कार्यकी उत्पत्ति
मानते हो । इस तरह तो यह—'योऽध्रुवाणि परित्यज्य अध्रुवाणि निषेवते ।
ध्रुवाणि तस्य नश्यन्ति, अध्रुवं नष्टमेव हि” इस उक्तिका विषय बन गया ।
१. मूर्तप्रतिहततया—१ पृ० पा०
क्षणभङ्गवादः ३७
वैकल्यप्रयुक्ताङ्कुरादि कार्यवैकल्यं, तदुत्पत्तिनिश्चयविषयीभूतबीज-
जातीयत्वात् । यत् पुनः सहकारिवैकल्यप्रयुक्ताङ्कुरादिकार्य-
वैकल्यं न भवति, न तदेवम्भूतबीजजातीयं, यथा शिला-
शकलमिति ।
न च किमुक्तमाध्यव्यावृत्तेरुक्तसाधनव्यावृत्तिरुदाहृतात्, किं
वा परम्परयापि तथाविध¹ प्रभवसामर्थ्यविरहादिति व्यतिरेक-
सन्देह इति वाच्यम्, प्रागेव शङ्काबीजस्य निराकृतत्वादिति ।
स्यादेतत् । मा भूत सामर्थ्यासामर्थ्यलक्षणविरुद्धधर्म-
अथवा व्यतिरेकी-अनुमानका प्रयोग किया जाता है । जैसे—
“विवादका विषय कुशूलस्थ बीज सहकारियोंके अभावके कारण ही अङ्कुर
आदि कार्य नहीं करता है । क्योंकि कार्यकारणभावनिश्चयका विषयीभूत
जो क्षेत्रस्थ बीज है, उसी जातिका यह भी है । अर्थात् जिस बीजसे
तुम भी अङ्कुरकी उत्पत्ति मानते हो, उसी बीजजातिका कुशूलस्थ बीज
भी है । किन्तु जो सहकारीके कारण अङ्कुरादि कार्य नहीं करने वाला
नहीं है, बल्कि हमेशा ही अङ्कुर करनेमे असमर्थ है, वह अङ्कुर जन्माने
वाले क्षेत्रस्थ बाजकी जातिका भी नहीं है, जैसे शिलाखण्ड ।
ऐसी आशङ्का नहीं कर सकते कि “शिलाखण्डमे जो तथाकथित
बीज-जातीयत्वका अभाव है, क्या वह तथाकथित साध्यके ही नहीं रहने-
के कारण है ? या परम्परासे भी अङ्कुर न जन्मा सकनेके कारण है ?
अतः यहाँ व्यतिरेक व्याप्ति भी सन्दिग्ध है ।” क्योंकि पहले ही शङ्काका
बीज मिटा दिया गया है । अर्थात् सभी बीज जब अङ्कुरके प्रति प्रयो-
जक सिद्ध किये जा चुके हैं, तब यह ठीक ही है कि कोई बीज यदि
अंकुर नहीं करता है तो वह केवल सहकारीके न जुटनेके कारण ही ।
शिलाखण्ड तो हमेशा ही अङ्कुरमे असमर्थ है, इसलिये वह बीज जातिसे
भी पृथक् है ।
अस्तु, “सामर्थ्य और असामर्थ्यरूप विरुद्ध धर्मोंका एक जगह
१. तथाभूत—१ पु० पा०
३८ आत्मतत्त्वविवेके
संसर्गः१, अस्तु बीजत्वमेव प्रयोजकं, भवतु च सहकारिसमवधाने
सति तद्धेतुस्वभावत्वं भावस्य, तथा च तदसन्निधानेऽकरणमप्यु-
पद्यताम् । तथापि तज्जातीयमात्र एवेयं व्यवस्था न त्वेकस्यां
व्यक्तौ, करणाकरणलक्षणविरुद्धधर्मसंसर्गस्य प्रत्यक्षसिद्धतया तत्र
दुर्वारत्वादिति चेत्, न, विरोधस्वरूपानवधारणात्२ ।
स खलु धर्मयोः परस्पराभावरूपत्वं वा स्यान्नित्यत्वानित्यत्व-
वत्, धर्मिणि तदापादकत्वं वा शीतोष्णवत्, तद्वत्ता वा दण्डित्व-
कुण्डलित्ववत् ।
संसर्ग मत हो, अंकुरके प्रति प्रयोजक भी बीजत्वसामान्य ही होवे,
सहकारियोंका योग होनेपर भाववस्तुका कर्तृत्व-स्वभाव भी रहे, तथा
सहकारियोंके अभावमें न करना भी सही होवे, तो भी यह व्यवस्था
बीजजातिमात्रके लिये ही हो सकती है, न कि एक व्यक्तिके लिये ।
क्योंकि आपके मतानुसार बखारेमे रहनेसे लेकर खेतमें जाने तक जो
एक बीज है, उसीमे करना और न करनारूप विरुद्ध धर्मोका संसर्ग
रूप दोष प्रत्यक्षसिद्ध होनेसे अनिवार्य है" ऐसा कहना भी ठीक नहीं
है । क्योंकि करण और अकरणमे किस प्रकारका विरोध है, इसीका
निश्चय नहीं हो सकता है ।
क्योंकि क्या यह विरोध करण और अकरणरूप धर्मोंका परस्परका
अभावरूप होना है ? जैसा कि नित्यत्वका अभावरूप अनित्यत्व और
अनित्यत्व का अभावरूप नित्यत्व है, तथा वे परस्परमे विरोधी है ।
अथवा धर्मीमे परस्परके अभावका आक्षेप करनारूप विरोध है ? जैसा
कि शीतत्व जलमें रहता हुआ उसमे उष्णत्वाभावका आक्षेप कर देता है
और उष्णत्व अग्निमे रहता हुआ उसमे शीतत्वाभाव का आक्षेप कर देता
है । या एकमे रहते हुए भी परस्पर भेदरूप विरोध है ? जैसा कि
एक ही पुरुषमें दण्डित्व और कुण्डलित्व दोनों रहते हैं पर दण्डित्व
और कुण्डलित्व आपसमें एक दूसरे से भिन्न हैं ।
१ धर्मद्वयस्य—१ पु० पा० २. अनवबोधात्—१ पु० पा०
क्षणभङ्गवादः ३९
न प्रथमः, निर्विशेषणस्यासिद्धत्वात् १। यावत्सत्त्वं किञ्चित्-
करणात्, सविशेषणस्य तु विरोधसिद्धावपि अध्यासानुपपत्तेः।
यदा यदकरणं हि तदा तत्करणस्याभावो नत्वन्यदा तत्कर-
णस्य, न चैतयो२रेकधर्मिसमावेशमातिष्ठामहे।
न द्वितीयः, भावाभावव्यतिरिक्तयोः करणाकरणयोरसिद्धेः।
व्यापारापरव्यपदेशसहकारिभावाभावौ हि करणाकरणे कार्यभावा-
भावौ वेति।
अतिरेकसिद्धावपि स्वकाल एव स्वाभावप्रतिक्षेपवत् अकर-
णाभावमाक्षिपेत् करणं, न त्वन्यदा, न हि यो यदा नास्ति स
इनमें प्रथम पक्ष ठीक नहीं है। क्योंकि करण और अकरण
परस्परका अभावरूप भलेही होवें, पर बिना विशेषणके सामान्यतः
अकरणत्व बीजमें असिद्ध है। क्योंकि जितने सत्पदार्थ हैं, सब
अवश्य कुछ करते हैं। इसलिये बीजमें करण और अकरण एक कालमें
कहां रहा कि विरोध हो।
यदा तदारूप कालात्मक विशेषणके सहित करण-अकरणमें विरोध
रहनेपर भी उनका एक जगह समावेश नहीं हो सकता है। क्योंकि
जब जो नहीं करता है, तभी उसमें करणका अभाव है, न कि अन्य
कालमें, अर्थात् करनेके समयमे भी। हम तो 'जब करना' और 'तभी
न करना' इन दोनों विशेषणसहित विरुद्धधर्मोंका एक धर्मीमें समावेश
मानते नहीं हैं।
दूसरा पक्ष भी ठीक नहीं है। क्योंकि भाव और अभाव के अति-
रिक्त करण और अकरण असिद्ध हैं। क्योंकि अन्तिम व्यापाररूप
सहकारीका भाव ही करण है और उसका अभाव ही अकरण है। अथवा
कार्य होना करण है और कार्य न होना अकरण है। अर्थात् करण और
अकरण परस्पराभाव के आपादक तब होते यदि वे परस्पराभावके
व्याप्य होते।
१. असिद्धेः—१ पु० पा० २. न चानयो—२ पु० पा०
४० आत्मतत्त्वविवेके
तदा स्वाभावं प्रतिषेत्तुमर्हतीति विरोध्यभावं वा आक्षेप्तुम् । तथा
सति न कदापि तन्न स्यात् न वा कदापि तद्विरोधो भवेदिति
“नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः” इत्यायातम्, न वा
विरोधः¹ ।
नन्वेवं सति परिमाणभेदोऽपि कालभेदेन न विरुध्यते, तत्रा-
प्येवं वक्तुं सुकरत्वात्, न, बाधकबलेन तत्र कालभेदस्य विवक्षि-
तत्त्वात् । तथाहि नारब्धद्रव्यैरेव द्रव्यावयवैर्द्रव्यान्तरमारभ्यते
करण-अकरणको सहकारिभावाभावसे अतिरिक्त माननेपर भी, जैसे,
घट अपने कालमे ही घटाभावका विरोध करता है, न कि घटा-
भावके कालमे, वैसे ही करण भी अपने कालमे ही स्वविरोधीभूत
अकरणके अभावका आक्षेप कर सकता या अकरणका विरोध कर
सकता है, न कि अकरणकाल मे भी । ऐसा नहीं होता कि जो जब
नहीं है, तभी वह अपने अभावका विरोध करता हो अथवा अपने
विरोधीके अभावका आक्षेप करता हो । वैसा होनेपर कभी भी उसका
ना नहीं होगा और कभी भी उसके विरोधीको होनेका अवसर नहीं
आयगा । इस तरह यहाँ “नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सत ”
इस गीतावचनका विषय उपस्थित हो गया और तुम्हारे क्षणिकवादके
विरुद्ध वस्तुओंका नित्यत्व ही सिद्ध हो गया । एव, अपने कालमे
तथा विरोधीके भी कालमें तुम्हारे कथनानुसार यदि अपने ही रहे
तो सदैव विरोधीका अभाव हो जानेसे कहीं भी विरोध नहीं सिद्ध
हो सकेगा ।
( शङ्का ) जैसे कालभेदसे एकही वस्तुमे करण और अकरण
विरोधी नहीं कहा जाता है, वैसे कालभेदसे एक ही वस्तुमे दीर्घत्व और
ह्रस्वत्वरूप भिन्न परिमाणके रहनेमे भी विरोध नहीं होना चाहिये,
क्योंकि यहाँ भी ऐसा कहा जा सकता है कि “अपने कालमे ही एक
परिमाण अपने विरोधी दूसरे परिमाणका विरोध कर सकता है, नकि
अन्यकाल मे भी”
१. न चाविरोध.—१ पु० पा०
क्षणभङ्गवादः ४१
मूर्तत्वसमानदेशत्वयोरेकदा विरोधात् । तथा चारम्भपक्षे पूर्व-
द्रव्यनिवृत्तिः अनिवृत्तावनारम्भ इति ।
तत्र निवृत्तावाश्रयभेदादेव परिमाणभेदः, अनिवृत्तौ संयोगि-
द्रव्यान्तरानुपचये क्व परिमाणभेदोपलम्भो यो विरोधमावहेत् ।
तदुपचये ^१तु क्व परिमाणान्तरोत्पत्तिः, आश्रयानुत्पत्तेः । अतएव
स्थौल्यातिशयप्रत्ययोऽपि तत्र भ्रान्तः । तस्मात् कालभेदेनापि न
( उत्तर ) यह कहना ठीक नहीं है। क्योंकि बाधकबलसे यहाँ काल-
भेद होनेपर भी दीर्घत्व ह्रस्वत्वमे विरोध ही कहा गया है । अर्थात् एक
ही वस्तु पहले ह्रस्व होकर दीर्घ नहीं हो जाती है, बल्कि पहली वस्तुके
नष्ट हो जानेपर दूसरी ही वस्तु दीर्घ परिमाणवाली पैदा होती है ।
क्योंकि जिन अवयवोंसे पहले द्रव्यका निर्माण हुआ है, उन्हीं अवयवोंमे
दूसरा द्रव्य नहीं बनता है। क्योंकि प्रथम द्रव्यके रहते ही वहां दूसरा
द्रव्य कैसे रह सकता है ? एक समयमे दो मूर्त द्रव्योंके एक जगह
रहनेमे विरोध है। इसलिये नये द्रव्यकी उत्पत्तिपक्षमे पूर्वद्रव्यकी
निवृत्ति माननी पड़ेगी। यदि पूर्वद्रव्यकी निवृत्ति न हो तो नये द्रव्यका
आरम्भ भी नहीं हो सकता है ।
यदि वहां पूर्वद्रव्यकी निवृत्तिके बाद नया द्रव्य दीर्घ परिमाण-
वाला पैदा हुआ, तब तो आश्रयके भेदसे ही परिमाणमे भेद हुआ, न कि
आश्रयद्रव्य पूर्वका ही रहा और परिमाण बदल गया ।
पूर्व द्रव्यकी अनिवृत्तिपक्षमे - अर्थात् पूर्व द्रव्य यदि वैसाका वैसा
बना रहा, उस पक्षमे - वहाँ यदि किसी दूसरे संयोगी द्रव्यका
मेल नहीं हुआ तो परिमाणभेदकी उपलब्धि ही कहाँ होगी, जो कि
विरोध लावे । यदि दूसरे द्रव्यका मेल हुआ, तब भी किसमें परि-
माणभेदकी उत्पत्ति होगी ? क्योकि पूर्वद्रव्यकी निवृत्ति नहीं होनेसे
किसी आश्रयकी उत्पत्ति हुई नहीं, जिसमे वह दूसरा परिमाण पैदा
होवे । इसलिए जहाँ दूसरे संयोगी द्रव्यके मिल जानेसे स्थूलता बढ़ी
हुई सी मालूम पडती है, यहाँ यह स्थूलता प्रतीति भ्रमात्मक है । अतः
१ ऽपचयेऽपि च — १ पु० पा०
४२ आत्मतत्त्वविवेके
परिमाणभेदः एकस्मिन् धर्मिण्युपसंहर्तुं शक्यत इत्यादि पदार्थ-
चिन्ताचतुरैः सह विवेचनीयम् १ ।
अस्तु तर्हि इहापि बाधकं बलं प्रसङ्गतद्विपर्ययोरुक्तत्वादिति
चेत्, न, तयोः सामर्थ्यासामर्थ्यविषयत्वात् तत्र च उक्तत्वात् । स्तां
वा, न तथापि ताभ्यां शक्त्यशक्त्योरविवक्षितकालभेद एव
विरोधः साध्यते तथोपसंहर्तुमशक्यत्वात् । यदा तदेत्युपेक्ष्य
यत् समर्थं तत्करोत्येवेत्युपसंहर्तुं शक्यमिति चेन्न, कालनियमा-
कालभेदसे भी परिमाणभेदका एक धर्मीमे होना नहीं माना जा
सकता है। ये सब बातें पदार्थविचारमे चतुर वैशेषिकोंके साथ
विचारनी चाहिये ।
(शङ्का) यहा भी बाधक बल होवे, क्योंकि बाधकस्वरूप प्रसङ्ग
और विपर्ययको मैं पहले दिखा चुका हूँ ।
(उत्तर) ऐसा कहना ठीक नहीं है। क्योंकि वे प्रसङ्ग और
विपर्यय सामर्थ्य और असामर्थ्य विषयक ही हैं, तथा उनके विषयमे
दूषण भी पहले ही दिखाये जा चुके हैं। अथवा यदि वे प्रसङ्ग-विपर्यय
हों भी, तथापि उनके द्वारा किसी कालविशेषका निवेश किये बिना
करण और अकरणमें विरोध सिद्ध नहीं हो सकता है, क्योंकि वैसा
उपसहार नहीं हो सकता । अर्थात् - कुशूलस्थ दशामे सामर्थ्यहेतुसे
करणका प्रसग करो तो वह हमे भी इष्ट ही है। कारण, आगे चलकर
वह अकुर करता ही है। इसके विपरीत अकरणसे यदि कुशूलस्थ
दशामे बीजमें सामर्थ्यका अभाव सिद्ध करो तो हेतु ही असिद्ध है।
क्योंकि कुशूलस्थबीजमे जो अकरण है, वह करणविरोधी नहीं है।
इसलिए कदाचित् अकरणके कारण कुशूलस्थबीजमे अङ्कुरसामर्थ्यका
अभाव नहीं सिद्ध हो सकता है।
(शङ्का) जब तब इत्यादि कालभेदका निर्देश किये बिना ही 'जो
समर्थ है वह करता ही है' इस प्रकारका उपसंहार हो सकता है।
१. चिन्तनीयम् - ३ पु० पा०
विवक्षायां यत् समर्थं तत्करोत्येवेत्युपसंहर्तुं शक्यमिति चेन्न, काल-
नियमाविवक्षायां यत् समर्थं तत्करोत्येवेति कदाचित् स्यात् । तथा
च संभवविधेरत्यन्तायोगो विरुद्धो न स्वयोगः । नीलं सरोजं
भवत्येवेतिवत् ।
ननु यदसमर्थं प्रथममासीत् तस्य सामर्थ्यं पश्चादपि कुत
आगतम्, प्रथमं समर्थस्य वा पश्चात् कुत्र गतम् । नैतदेवं,
तत्तत्सहकारिमत्तत्तत्कारकत्वं हि सामर्थ्यम्, अतद्वतस्तदन्यवतो
वा तदकर्तृत्वममामर्थ्यम् । इदं चौत्पत्तिकमस्य रूपं, ते च
( उत्तर ) यह भी ठीक नहीं है। कालविशेषका निर्देश किये बिना
'जो समर्थ है वह करता ही है यह बात सदाके लिए नहीं है किन्तु
कदाचित्के लिये है। इस स्थितिमे उस उपसहारका यह स्वरूप हुआ
कि 'जो समर्थ है उसका करना संभव है'। यदि इस संभव-विधिको
किसीके साथ विरोध है तो करणके अत्यन्तिक अयोगके साथ है न कि
सामान्य अयोग के साथ । जैसे 'नील कलम होता ही है' यहाँ नील
कमलकी संभावना बताकर नीलकमलका सर्वथा न होना ( आत्यन्तिक
अभाव ) रोका जाता है, न कि नीलकमलके न होनेको भी रोक देता है ।
क्योंकि नीलकमल नहीं भी होता है ।
( शङ्का ) तो, जो पहले अङ्कुर करनेमें असमर्थ रहा, उसमे पीछे
भी सामर्थ्य कहासे आगयी ? अथवा जो पहले समथ था, उसकी
सामर्थ्य पीछे कहाँ चली गयी ?
( उत्तर ) इस तरहका प्रश्न नहीं कर सकते । क्योंकि यहाँ
सामर्थ्यका अर्थ योग्यता लो, तबतो पहले और पीछे भी वह समर्थ ही है ।
सामर्थ्यपदसे यदि कार्यका करना अर्थ लो, तो उस उस सहकारीसे युक्त
होकर उस उस कार्यको कर देना ही सामर्थ्य है और उस उस सहकारीके
अभावमे अथवा अन्य कार्यके सहकारीके योगमे उस कार्यका न करनाही
असामर्थ्य है । भावोंका यही स्वाभाविक रूप है । और वे सहकारी
अपने उपस्थापक कारणके अधीन होनेसे अनियत कालमे उपस्थित होते
है । इसलिये कार्योंका भी काल अनियत रहता है । अर्थात् सामर्थ्य