सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 530 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 81

[Header] ३२ आत्मतत्त्वविवेके

क्वचिदुपयोगेप्येकस्य तेन रूपेण सर्वेषामविशेषस्ताद्रूप्यात् ।
तथा च कथं किञ्चिदेव बीजं स्वकार्यं कुर्यात् नापराणि ।
न च वस्तुमात्रं तत्कार्यम्, अबीजात् तदनुत्पत्तिप्रसङ्गात् ।
नापि बीजमात्रम्, अङ्कुरकारिणोऽपि तदुत्पत्तिप्रसङ्गात् ।
नाप्यङ्कुराद्यन्यतममात्रम्, प्रागपि १ तदुत्पत्तिप्रसङ्गात् ।
जायगा। क्योंकि बीजत्वरूपसे वह कहीं उपयोगी है नहीं । इस तरह
तो—प्रत्यक्ष-सिद्ध बीजस्वभावत्व असत् है और सभी प्रमाणोंसे असिद्ध
जो कुर्वद्रूपत्व वह सही है—यह तुम्हारी बहुत ही अच्छी सूझ है ।
यदि एक ही बीज बीजत्वरूपसे कहीं उपयोगी हो तो उस रूपसे
सभी (कुशूलस्थ आदि) बीजोंका उपयोग सिद्ध हो जाता है, क्योंकि
वह बीज-स्वभावत्व सभीमें है । तब कैसे कुछ ही बीज अपना कार्य
करे' और दूसरे नहीं ?
वस्तुमात्र तो बीजस्वभावका कार्य हो नहीं सकती, क्योंकि वैसी
दशामे बिना बीजके किसीकी भी उत्पत्ति नहीं हो सकेगी । अर्थात्
बिना बीजके घट पट आदि कैसे बन सकेंगे ?
बीजमात्र भी बीजस्वभावका कार्य नहीं हो सकता है । अर्थात् बीज
स्वभावसे बीज ही पैदा होते हैं-यह भी नहीं कह सकते हो, क्योंकि तब
अङ्कुर जन्माने वाले बीजसे भी अङ्कुर न होकर बीज ही पैदा होने चाहिये ।
यह भी नहीं कहा जा सकता कि—"बीजस्वभावका कार्य कभी बीज
कभी अङ्कुर और कभी बीजका अनुभव है" क्योंकि तब उसी बीजसे
पहले अङ्कुर की और पीछे बीजकी उत्पत्ति होनी चाहिये । अर्थात्
यही बीज-जाति कुशूलावस्थामे बीज पैदा करती है और क्षेत्रावस्थामे
अङ्कुर पैदा करती है तथा कभी उससे अनुभवरूपी कार्य पैदा होता है,
ऐसा मानने पर पहले ही अर्थात् कुशूलावस्थामे ही अङ्कुर कर देना
चाहिये एव क्षेत्रावस्थामे बीज करना चाहिये । क्योंकि बीजस्वभाव
का कार्य आपने अंकुर बीज आदि सब बताया है । किन्तु ऐसा नहीं
देखा जाता है, अतः आपका उक्त नियम असङ्गत है ।
१. प्रागपि = सहकारिसमवधानादिति शेषः ।