आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
पृष्ठ 73, कुल 530 में से
संदर्भ में पढ़ें२४ आत्मतत्त्वविवेके
कल्पनागौरवप्रसङ्गप्रतिहतत्वात् अतीन्द्रियेन्द्रियादिलोपप्रसङ्गात्
विकल्पानुपपत्तेः विशेषस्य विशेषं प्रति प्रयोजकत्वाच्चेति ।
तथाहि उत्पत्तेरारभ्य मुद्गरप्रहारपर्यन्तं घटस्तान्द् जात्यन्त-
रानाक्रान्त एवानुभूयमानः क्रमवत्सहकारिवैचित्र्यात् कार्यकोटोः१
सरूपा विरूपाः करोति । तत्र एतावतेव सर्वस्मिन् समञ्जसे
अनुपलभ्यमानजातिकोटिस्त्वन्ना२ केन प्रमाणेन केन चोपयोगेन,
येन कल्पनागौरवप्रसङ्गदोषो न स्यात्३ । यो यदर्थं कल्प्यते
तस्यान्यथासिद्धिरैव तस्याभाव इति भवानेव आह इति ।
जातिकी संग्राहिका नहीं हो सकती है, जैसे कि शिंशपात्व जाति वृक्षत्व
जातिकी संग्राहिका होती है । एव कुर्वद्रूपत्व-जाति बीजत्वकी प्रति-
क्षेपिका भी नहीं हो सकती है, जैसे कि गोत्वजाति अश्वत्वकी प्रतिक्षेपिका
होती है ।
तुम्हारे कथन के विरुद्ध चौथा आक्षेप यह है कि बीजविशेष
(कुर्वद्रूपबीज) अङ्कुरविशेष के प्रति कारण है, इससे अङ्कुरसामान्यके
प्रति बीजसामान्यका कारण होना खण्डित नहीं होता है। क्योंकि
जैसे विशेषका कारण विशेष होता है, वैसे सामान्य भी सामान्यका
कारण होता है ।
उपर्युक्त मेरे कथनमें उपपत्ति यह है कि घट अपनी उत्पत्तिसे
लेकर मुद्गरप्रहार तक अर्थात् विनाशपर्यन्त घटत्वके अतिरिक्त कुर्वद्रूपत्व
आदि जातियोंसे अनाक्रान्त ही अनुभव में आता हुआ क्रमश प्राप्त
सहकारियों की विचित्रताके कारण ही सरूप या विरूप विविध कार्योंको
करता है । अतः जब इतनेसे ही सब कुछ बन जाता है, तब अनुभवमे
नहीं आनेवाली कुर्वद्रूपत्वजाति की कल्पना किस प्रमाणके आधार
पर या किस प्रयोजनसे की जाय, जिससे कल्पनागौरवप्रसङ्गरूप दोष
१. कर्मकोटी — २ पु० पा०
२. कल्पन—१ पु० पा०
३. न सिद्ध्येत्—२ पु० पा०