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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 77, कुल 530 में से

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पृष्ठ 77

२८ आत्मतत्त्वविवेके
शेषः कथमशालौ स्यादिति अशालोरङ्कुरानुत्पत्तिप्रसङ्गः। अशा-
लिगदबीजेऽप्यसौ भवतु विशेषः, तथापि बीजत्वैकार्थसमवेत
एवासावङ्कुरं प्रति प्रयोजक इति चेत् न, शालित्वव्यभिचारे
शालित्वैकार्थसमवायवद्बीजत्वव्यभिचारे बीजत्वैकार्थसमवाये-
नापि नियन्तुमशक्यत्वादविशेषात् ।
तस्माद् यो यथाभूतो यथाभूतमात्मनोऽन्वयव्यतिरेकानु-
कारयति, तस्य तथाभूतस्यैव तथाभूते सामर्थ्यम् । तद्विशेषास्तु
कार्यविशेषं प्रयोजयन्ति शाल्यादिवदिति युक्तमुत्पश्यामः ।
यदि यह कहो कि "बीजत्व-जाति तो अङ्कुरके प्रति प्रयोजक नहीं है
किन्तु उसका अवस्थाविशेष (बैजिककुर्वद्रूपता) ही मेरे मतसे अङ्कुर-
सामान्यका प्रयोजक है, तथा वह बीजसम्बन्धी कुर्वद्रूपता बीजातिरिक्त
पत्थर आदिमे कैसे होगी कि पत्थरसे अङ्कुर हो" तब तो उसीके समान
शालिका विशेषभूत कुर्वद्रूपत्व अशालीमे कैसे होगा ? इस तरह शालि
से भिन्न गेहूँ आदिसे अङ्कुर नहीं पैदा होना चाहिये। क्योंकि शालिगत
विशेषभूत कुर्वद्रूपत्व गेहूँमे रहेगा नहीं।
यदि कहो कि—शालिसे भिन्न गेहूँके समान ही बीजसे भिन्न पत्थर
आदि में भी कुर्वद्रूपत्व नामका वह विशेष रहे, फिर भी पत्थरसे अङ्कुर
की उत्पत्ति का प्रसङ्ग नहीं आ सकता है, क्योंकि बीजत्वधर्मके साथ
एक स्थानपर (अर्थात् बीजमें) समवेत जो विशेष (बीजमे रहने वाला
ही विशेष ऐसा होगा न कि पत्थरमें रहने वाला) वही अङ्कुरके प्रति-
कारण है। इसलिये पत्थरसे अङ्कुरका प्रसङ्ग नहीं हो सकता है-तो यह
भी ठीक नहीं है। क्योंकि जैसे शालिमे कुर्वद्रूपत्व विशेषका रहना
अशालिसे (गेहूँ आदिसे) अङ्कुर होनेमे बाधक नहीं हो सकता, वैसे ही
बीजमें कुर्वद्रूपत्व विशेषका रहना भी अबीजसे (पत्थरसे) अंकुर होने
को नहीं रोक सकता। क्योंकि दोनोंकी स्थिति समान है।
इस लिये जो जिस रूपमे होकर जैसे कार्यको अपने अन्वय और
व्यतिरेकका अनुसरण कराता है, उस रूपमे ही उसकी वैसे कार्यके प्रति
१. अशालौ भविष्यतीत्यशाले—१ पु० पा०