आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः २७
बाधकं विशेष इति चेत् न, तन्म्येहापि सत्त्वात्¹, तदभावे स्वभाव-
त्त्वानुपपत्तेः । उपपत्तौ वा किं बाधकानुसरणव्यसनेनेति ।
विशेषस्य विशेषं प्रति प्रयोजकत्वाच्च । तथाहि कार्यगतमङ्कुरत्व
प्रति बीजत्वस्याप्रयोजकत्वेऽबीजादपि तदुत्पत्तिप्रसङ्गः ।
बीजस्य विशेषः कथमबीजे भविष्यतीति चेत् तर्हि शालेर्वि-
जैसे कि तुम शालित्वकी अवान्तरभूत कुर्वद्रूपत्व जातिको शालिके
अलावा क्षेत्रस्थ यवादिमे भी मानते हो—तो उसीके समान शिंशपात्व
भी वृक्ष को छोड अवृक्षमे अर्थात् पत्थर आदिमे भी रहे क्योंकि वह
भी वृक्षत्वकी अवान्तरजाति है । ऐसी दशामे 'यह वृक्ष है, क्योंकि
शिंशपा है" इस अनुमानमे शिंशपात्वधर्म वृक्षत्वका हेतु नहीं बन
सकता है ।
'यदि शिंशपात्व वृक्षको छोडकर रहे तो अपनेको भी छोड देवे—
इसप्रकारका विपक्षमे बाधक होनेसे शिंशपात्व वृक्षका परित्याग नहीं
कर सकता है तथा वृक्ष होनेमे शिंशपात्व हेतु बन सकता है' इस प्रकार
की विशेषता दिखाना भी ठीक नहीं है क्योंकि इस प्रकारका विपक्ष
बाधक शालित्व और कुर्वद्रूपत्वके सम्बन्धमे भी दिखाया जा सकता
है । क्योंकि जैसे शिंशपा वृक्षत्व स्वभावकी है, वैसे ही कुर्वद्रूप
भी शालित्व स्वभावका है । इसलिये उसीके समान कुर्वद्रूपत्व भी यदि
शालिको छोड़कर गेहूँ आदिमे रहे तो स्वय वह कुर्वद्रूप ही न रह जाय ।
इस प्रकारका विपक्ष म बाधक यहाँ भी हो ही सकता है । यदि विपक्षमे
कोई बाधक न हो तो कुर्वद्रूप मे शालिस्वभावत्व ही अनुपपन्न हो
जायगा । यदि उस स्थितिमे भी शालिस्वभावत्व मानो तो कहीं भी
विपक्षमे बाधकका दिखाना व्यर्थ हो जायगा ।
एव विशेष विशेषके ही प्रति प्रयोजक होता है, सामान्य के प्रति तो
सामान्य प्रयोजक होता है । क्योंकि सामान्यरुपसे अंकुरकार्यके प्रति
यदि बीजत्व प्रयोजक न हो तो जो बीज नहीं है—ऐसे पत्थर आदिसे
भी अङ्कुरकी उत्पत्ति होनी चाहिये ।
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