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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 530 में से

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पृष्ठ 82

क्षणभङ्गवादः ३३
यदा यदुत्पन्नं सत् यत्कार्यानुकूलसहकारिमध्यमधिशेते
तदा तदेव कार्यं प्रति तस्य प्रयोजकत्वमिति चेत्, तत् किमवान्तर-
जातिभेदमुपादाय ? बीजस्वभावेनैव वा ? आद्ये स एव जाति-
भेदस्तत्र प्रयोजकः, किमायातं बीजत्वस्य ? द्वितीये तु समान-
शीलानापि¹सहकारिवैकल्यादकरणमित्यायातम्, तत्तत्सहकारि-
साहित्ये² सति तत्तत्कार्यं प्रति प्रयोजकस्य बीजस्वभावस्य³
सर्वसाधारणत्वादिति ।
अत्रापि प्रयोगः—यद्येन रूपेणार्थक्रियासु नोपयुज्यते, न तत्
तद्रूपम् , यथा बीजं कुञ्जरत्वेन किञ्चिदप्यकुर्वन्न कुञ्जरस्वरूपम् ।
इसका उत्तर यदि यह कहो कि “जो कारण उत्पन्न होकर जब जिस
कार्यके अनुकूल सहकारियोंके बीच रहता है, तब उसी कार्यके प्रति
वह प्रयोजक होता है, तो बताओ, वह बीज किसी अवान्तर जातिविशेष-
को लेकर उस कार्यके प्रति प्रयोजक है ? अथवा