आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः ३१
सेयं निमित्तवत्ता विपक्षाद्¹ व्यावर्तमाना² स्वव्याप्यमादाय
बीजप्रयोजकतायामेव विश्राम्यतीति प्रतिबन्धसिद्धिः ।
अथवा कृतमङ्कुरग्रहेण, बीजस्वभावत्वं क्वचित् कार्ये प्रयो-
जकं न वा ? न चेत्, न तत्स्वभावं बीजं, तेन रूपेण क्वचिदप्य-
नुपयोगात् । एवं च प्रत्यक्षसिद्धे बीजस्वभावत्वं नास्ति सर्व-
प्रमाणागोचरस्तु विशेषोऽस्तीति विशुद्धा बुद्धिः ।
नहीं कह सकते हो कि "अंकुरके कार्य होनेमे निमित्त उसका बीज
जातिसे पैदा होना नहीं है, किन्तु कुर्वद्रूपसे पैदा होना है" क्योंकि
कुर्वद्रूपत्व अप्रामाणिक है ।
इसलिए अंकुरत्व-जातिका केवल कार्यमे रहना आकस्मिक नहीं है,
किन्तु किसी निमित्तवश है । उस निमित्तको ढूँढते हुए हम बीजत्वको
ही उसका निमित्त निश्चित करते हैं । क्योंकि कुर्वद्रूपत्व तो अप्रामाणिक
है । शालित्वको निमित्त माननेमे गोधूमका अंकुर छूट जाता है और
गोधूमत्वको निमित्त माननेपर शालिका अङ्कुर छूट जाता है । अत
सामान्यरूपसे बीजत्व ही निश्चित होता है । इस प्रकार 'जो जो बीज
है, वह वह अंकुरप्रयोजक है" यह हमारी व्याप्ति भी सिद्ध हो जाती
है । तथा इस व्याप्तिके बलसे कुशूलस्थ बीजमे भी अंकुरप्रयोजकत्व
सिद्ध हो जाता है ।
अथवा अंकुर की बात रहने दो और यह बताओ कि बीजका बीज-
स्वभावत्व किसी कार्यमे प्रयोजक है कि नहीं ? यदि नहीं, तो वह
बीज बीजस्वभावका नहीं रहेगा । अर्थात् बीजका बीजत्व असत् हो
१. विपक्षात् = निमित्तात् इत्यर्थं । स्वव्याप्य = कार्यजातीयत्वमा-
दायेत्यर्थं । बीजप्रयोजकतायामित्यत्र बहुव्रीहिः । तेन बीजं प्रयोजक
यस्य अङ्कुरगतकार्यत्वस्य, तस्य भावो बीजप्रयोजकता तस्यामित्यर्थं ।
बीजप्रयोज्यतायामिति क्वचित् पाठः । अस्मिन् पाठे अङ्कुरगतकार्यत्वे
बीजप्रयोज्यता सुगमैव । प्रतिबन्धसिद्धिः = व्याप्तिसिद्धिः । तदाकारश्च
यद् यद् बीज तत्सर्वमङ्कुरप्रयोजकमिति ।
२. निवर्तमाना—१ पु० पा० ।