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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 79, कुल 530 में से

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पृष्ठ 79

३० आत्मतत्त्वविवेके
विपर्ययेऽपि किं बाधकमिति चेत्, अङ्कुरस्य जातिप्रतिनिय-
माकस्मिकत्वप्रसङ्गः१ इत्युक्तम् ।
बीजत्वं तस्य प्रत्यक्षसिद्धमशक्यापह्नवमिति चेदस्तु तर्हि
विपर्ययः । यद्बीजं तदङ्कुरं प्रति प्रयोजकं यथान्त्यसामग्री-
मध्यमध्यासीनं बीजं, बीजं चेदं विवादास्पदमिति स्वभावहेतुः२ ।
अङ्कुरस्य च जातिप्रतिनियमो न तावन्निर्निमित्तः, सार्वत्रि-
कत्वप्रसङ्गात् । नाप्यन्यनिमित्तः३, तथाभूतस्य तस्याभावात् ।
यदि कहो कि “जो अंकुर न भी करे, उसके भी बीज होनेमें बाधक
ही क्या है ?” तो मैं कह चुका हूँ कि तब अङ्कुरमे कार्यत्वका नियम
अहेतुक हो जायगा, अर्थात् अङ्कुर कार्य नहीं कहा जा सकेगा । क्योंकि
बीजजातिसे उसकी उत्पत्ति मानते नहीं हो और दूसरे किसीसे वह पैदा
होता नहीं । इसका स्पष्ट अर्थ है कि वह कार्य ही नहीं है । क्योंकि
कार्य वही है जो किसी कारणसे पैदा हो ।
यदि यह कहो कि “कुशूलमे स्थित धान्यादि वस्तुका बीजत्व प्रत्यक्ष
सिद्ध है, अतः अङ्कुर के प्रति प्रयोजक नहीं होनेपर भी उक्त प्रसङ्गद्वारा
उसके बीजत्वका अपलाप नहीं किया जा सकता, तब तो कुशूलस्थ-
बीजमे अङ्कुराप्रयोजकत्वका विपर्यय अर्थात् अङ्कुरप्रयोजकत्व ही सिद्ध
हो जायगा यह यों होगा—“जो बीज है, वह अंकुरके प्रति प्रयोजक है,
जैसे अङ्कुर जन्मानेवाली अन्तिम सामग्रीके मध्य विराजमान बीज, कुशू-
लस्थ भी बीज ही है, इसे तुम भी अभी मान चुके हो, इसलिये यह
भी अंकुरके प्रति प्रयोजक है” इस प्रकारका अनुमापक हेतु होगा ।
एव अङ्कुरमे कार्यजातीयत्वका नियमितरूपसे रहना भी अहेतुक
नहीं है । क्योंकि अङ्कुरके कार्य होनेमे यदि कोई निमित्त न हो तो
कार्य अकार्य सबको ( नित्य वस्तुको भी ) अङ्कुर कहने लगेंगे । यह भी
१. जातिप्रतिनियम = कार्यजातीयत्वम् । आकस्मिकत्वं = निर्निमित्तकत्वम् ।
२ स्वभावहेतुः = अनुमापको हेतुः । कुशूलस्थबीजम् अङ्कुरप्रयोजकम् बीज-
त्वात् क्षेत्रपतितबीजवत् इत्यनुमानाकारः ।
३. अन्यनिमित्त = कुर्वद्रूपत्वनिमित्तः ।