आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंक्षणभङ्गवादः २९
कस्य पुनः प्रमाणस्यायं व्यापारकलाप इतिचेत्, तदुत्पत्ति-
निश्चयहेतोः१ प्रत्यक्षानुपलम्भात्मकस्येति ब्रूमः ।
अथ न्यायेन विना न ते परितोष', शृणु तमपि । तदा यद्-
ङ्कुरं प्रत्यप्रयोजकं न तद्वीजजातीयं यथा शिलाशकलम्,
अङ्कुरं प्रत्यप्रयोजकं च कुशूलनिहितं बीजमभ्युपेतं परैरिति व्याप-
कानुपलब्धिः प्रसङ्गहेतुः ।
सामर्थ्य रहती है । उसके विशेष तो कार्यकी विशेषताके प्रति प्रयोजक
होते हैं । जैसे सामान्यरूपसे बीज सामान्यरूपसे अंकुरके प्रति कारण
होता है । किन्तु उसके विशेषभूत शालि गेहूँ आदि तो विशेष रूप से
खास-खास अंकुरके प्रति कारण होते हैं—यह हमारी कल्पना ही
ठीक है ।
यदि यह पूछो कि “बीजजातिका होना ही अंकुरका प्रयोजक है—
यह किस प्रमाणके बलसे जाना जाय” तो हम यही कहेंगे कि प्रत्यक्ष
और अनुपलम्भ अर्थात् अन्वय और व्यति