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आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

बाह्यार्थभङ्गवादः २७५
सत्त्वाद् व्यवहर्त्तव्यत्वाद् वा, बोधयदिति शक्यते । विपर्य्य-
स्यापि धर्मिग्राहकमRoot/man? मानसाधितत्वादनवकाशमिदमिति चेत्, एव-
मन्यत्रापि प्रतिसन्दधीथा इत्येषा दिक् ॥
अन्यस्तु चक्षुषी निमील्य निर्भयोभवितुमिच्छन्नाह—अस्तु
तर्हि बुद्धेरपि विलोप इति ।
अत्र तु किं वक्तव्यं यत्र हेत्वादि व्यवहारो नास्ति ।
अस्तु, परं सांवृत इति चेत् , भवेदेयं यदि संवृतिरपि परमार्थ-
अभावकी भी सिद्धि करा देगा । अतः बुद्धिमें षट्कसम्बन्ध और
मूर्त्तिमत्ताका यह अनुमान निरुपयोगी होगा—तो इसी प्रकार परमाणु और
अवयवीके बारेमे भी समझो । अर्थात् धर्मिग्राहक मानसे परमाणु
सिद्ध है । क्योंकि परमाणुरूप धर्मी न हो तो तुम सावयवत्वका अनुमान
किस पक्षमें कर सकोगे । इसी प्रकार परमाणुका निरवयवत्व भी लाघव
और अनवस्थाप्रसङ्गरूप तर्कके

२७६ आत्मतत्त्वविवेके

सती स्यात् । अन्यथा तु यथा न वास्तवस्तथा न सांवृतोऽपि ।
संवृतिरपि संवृतिसतीति चेत्, अस्यास्सत्त्वे न किञ्चिदधिक-
मुक्तम् । परसंवृतेस्तु परमार्थसत्त्वस्वीकारे सैव बुद्धिरपरिहे-
येति । सती च बाधकवती चेति संवृतिसती चेति चेत्, सत्येव
यदि तत् कथं बाधकम् ? तथा चेत्, कथं तदलीढस्य
सत्त्वमिति ?
दृश्यते तावदेव मिति चेत्, सत्त्वैकार्थसमवायिनो बाध-
कत्वमेव तर्हि हेयम् । बाधकैकार्थसमवायिनः सत्त्वमेव किं न


है—तो हेत्वादिव्यवहारका संवृतत्व भी तभी सम्भव है, जब कि
संवृति भी स्वयं परमार्थ सत् हो। ऐसा नहीं होनेपर हेत्वादि व्यवहार
जैसे वास्तव नहीं है, वैसे संवृत भी नहीं हो सकेगा। यदि कहो कि—
संवृति भी परमार्थ सत् न होकर संवृत सत् ही है—तो यह दूसरी
संवृति भी यदि सत् हो तो उसीसे शून्यवाद खण्डित हो गया। इस
दूसरी संवृत्तिके भी असत् होनेपर तो कोई नयी बात नहीं कही गयी।
अर्थात् हेत्वादिव्यवहारके समान संवृत्तिका भी संवृतत्व नहीं सिद्ध हो
सकेगा। अन्तिम संवृत्तिको यदि परमार्थसत् स्वीकार करो तो उसी
(संवृत्तिरूप) बुद्धिके पारमार्थिक होनेसे सर्वशून्यत्व फिर भी नहीं
सिद्ध हो सका।
यदि कहो कि—अन्तिम संवृति भी सत् है, किन्तु बाधकयुक्त होनेसे
बाधित है, तथा परमार्थ सत् न होकर संवृत सत् है—तो यदि वह
सत् है तो उसका बाधक कैसे होगा ? क्योंकि सत् अबाध्य होता
है। यदि उसका बाधक हो तो बाधकाक्रान्त होनेके कारण वह सत्
कैसे होगी ?
यदि कहो कि—सत्त्व और बाधक दोनों ही साथ साथ देखे जाते
हैं, इसलिये दोनोंमें एक भी निश्चयात्मक नहीं हो सकता। अर्थात्
दोनों ही मेरे मतानुसार सांवृतिक (काल्पनिक) हैं—तो सत्त्वके साथ
रहनेके कारण उसका बाधकत्व ही छोड़ देना पड़ेगा। अर्थात् वह
बाधक ही नहीं होगा जो सत्त्वके साथ रहे। यदि कहो कि—बाधकके

हीयत इति चेत्, न बाधकस्यापि त्यागप्रसङ्गात् । उभमप्य-
वर्जनीयमेव तर्हि, एवमेतत् । मिथो विरोधस्तु हेयः । न हि
विरुद्धयोरेकार्थसमवायस्तथाभूतयोर्वा विरोधः शक्य उपपाद-
यितुमृते स्वसमयात् । न च विचारावसरे स्वसमयावतार
इति । यथा यथा च बुद्धिनिवारणाय यत्नस्तथा तथोज्ज्वलः
प्रकाशः, तन्निवारणमपि बोद्धव्यमेवेति । तदेतदायातम्, प्रदी-
साथ रहनेके कारण सत्त्वका ही त्याग क्यों न कर दिया जाय—तो
ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि शून्यवादके अनुसार सबकी सत्ताका
त्याग कर देनेपर बाधकका भी त्याग कर देना पड़ेगा । ऐसी स्थितिमे
बाधकके नहीं रहनेसे सर्वशून्यत्व कैसे सिद्ध हो सकेगा ?
तब यह कहना कि सत्त्व और बाधक दोनोंमे किसीका परित्याग
न किया जाय, बल्कि दोनों ही मान लिये जाँय—तो ऐसा हो, किन्तु
इन दोनोंमें पारस्परिक विरोधका मानना छोड देना पड़ेगा । क्योंकि
परस्पर विरुद्धोंकी एकत्र स्थिति युक्तिद्वारा सिद्ध नहीं की जा सकती,
ऐसे ही एकत्र रहनेवालोंमें परस्पर विरोध भी युक्ति-सह्य नहीं हो
सकता, बिना इसके कि अपनी परिभाषाका आश्रय लिया जाय । अर्थात्
उक्त बात बौद्ध अपनी मनगढन्त परिभाषाके बलसे ही मान सकता है,
युक्तिद्वारा सिद्ध नहीं कर सकता । किन्तु यह भी ध्यान रखना है
कि प्रतिवादीके साथ विचारके अवसरपर मनगढन्त परिभाषा काम नहीं
देती है । इस प्रकार शून्यवादका आश्रय लेकर जैसे-जैसे बुद्धिका भी
लोपकर देनेके लिये यत्न करते हो, वैसे-वैसे और उज्ज्वल प्रकाश होता
जाता है । अर्थात् बुद्धिकी सिद्धि होती ही जाती है । क्योंकि
बुद्धिनिराकरण भी बाधकज्ञानाधीन है । इसलिये बाधकज्ञानकी सत्ता
स्वीकार करनी पड़ेगी । अथवा बुद्धिनिराकरणको भी असत् होनेसे
ज्ञानरूप ही मानोगे । अतः बाध्य होकर ज्ञानकी सत्ता माननी
ही पड़ेगी ।
इस प्रकार आपका बुद्धिविलोपका प्रयास ऐसा ही हुआ, जैसे
कोई दूसरे प्रदीपके द्वारा पूर्वप्रदीपको बुझाकर अन्धकार लानेकी चेष्टा
करे । वहाँ जैसे-जैसे पूर्वप्रकाशको नष्टकर देनेके विचारसे दूसरा

२७८ आत्मतत्त्वविवेके
पान्तरेण प्रदीपं निर्वाप्य तिमिरापादनमिति ।
एतेन हेतुफलभावानुपपत्तेः सर्वविलोपि इति निरस्तम् ।
तन्निराकरणप्रयासस्य साफल्यवैकल्याभ्यां तन्निराकरणानुप-
पत्तः, सत्कार्यदूषणस्येष्टत्वात्, असत्कार्यदूषणस्य च प्रत्यक्षा-
दूसरा प्रदीप लाता जायगा, वैसे-वैसे और उज्ज्वल प्रकाश होता
जायगा, अन्धकार लाना तो दूर रहा । यही स्थिति बुद्धिनिराकरण-
की भी है ।
इस बुद्धिनिराकरणकी व्यवस्थाके अनुसार यह कथन भी खण्डित
हो गया कि—हेतुफलभाव (कार्यकारणभाव) के अनुपपन्न होनेसे सर्व-
विलोप (सर्वशून्यत्व) सिद्ध हो जायगा । अर्थात् कार्यकारणभाव
यदि प्रामाणिक हो तो अवयविरूप कार्य तथा उसके मूलकारणभूत
परमाणुकी सिद्धि हो सके । किन्तु कार्यकारणभाव ही अयुक्त है ।
इस लिये अवयवी तथा परमाणु आदिकी सत्ता तथा कारणके अधीन
होनेवाली बुद्धिकी भी सत्ता काल्पनिक ही होगी । इस प्रकार सर्व-
विलोप सुतरा सिद्ध है—क्योंकि आपका हेतुफलभावनिराकरणका प्रयास
सफल है या निष्फल है ? यदि सफल है तो इससे हेतुफलभाव सिद्ध
हो गया । यदि आपका उक्त प्रयास निष्फल है तो निष्फल होनेसे ही
वह हेतुफलभावका निराकरण नहीं कर सकेगा ।
कार्यकारणभावके दूषणसे यदि आपका अभिप्राय यह हो कि—
घटादिकार्य सत् है, इसीलिये उसकी उत्पत्ति नहीं हो सकती—तो यह
मुझे इष्ट ही है । क्योंकि सत्कार्यकी उत्पत्ति मैं भी नहीं मानता ।
यदि आपका यह अभिप्राय हो कि—असत् कार्यकी उत्पत्ति नहीं हो
सकती—तो यह कथन प्रत्यक्षबाधित है । क्योंकि घटोत्पत्तिके पूर्व
घटकी उपलब्धि किसे होती है ? अर्थात् उत्पत्तिके पूर्व घट असत् ही
रहता है और उत्पन्न होकर सत् बनता है ।
एव, “घटो नोत्पद्यतेऽसत्त्वात्” इस दूषणका प्रतिपादन तथा तुम्हारे
द्वारा किया जानेवाला कार्यकारणभावनिराकरणका प्रतिपादन यदि पूर्वमें
असत् होकर बादमें उत्पन्न हुआ है तो “असत्की उत्पत्ति नहीं हो

बाह्यार्थभङ्गवादः [२७९]

धितत्वात्, तत्प्रतिपादनस्यासत एवोत्पत्ताद्यनैकान्तिकत्वात्,
सत्त्वे वा प्रयास वै¹फल्यादिति ।
स्यादेतत्, मा भूवन्नेतानि दूषणान्यवयविनि², अनुपलं-
म्भस्तु स्यात्, न हि परमाणुसञ्चयादपरं किञ्चिदुपलभ्यत इति
चेत्, बैलक्ष्यविटम्बिकेयम्³, स्थूलैकानुभवस्य सर्वजनसिद्ध-
त्वात् ।
विकल्पमात्रं तदिति चेन्न, स्पष्टप्रतिभासत्वात् । औपा-
धिकमस्य स्पष्टत्वमिति चेत्, तथाभूतानुभवमन्तरेणोपाधेरप्य-

सकती है" यह तुम्हारा नियम यहीं व्यभिचरित हो गया । यदि तो
उक्तदूषण तथा हेतुफलभावनिराकरणका प्रतिपादन भी पूर्वसे ही सत् है
तो इस समय प्रतिपादनका तुम्हारा प्रयास व्यर्थ ही है ।


अवयवीके सम्बन्धमें अनुपलम्भका निराकरण ।

**शङ्का—**अस्तु, अवयवीका खण्डन करनेके लिये दिये गये दूषण भले
ही न हों, किन्तु अनुपलम्भ तो दूषण हो सकता है । क्योंकि परमाणु-
समूहसे भिन्न अवयवी नामकी कोई वस्तु उपलब्ध नहीं होती है ।
**समाधान—**उक्त कथन भी युक्तिके अभावमें पराजयसे उत्पन्न
लज्जाका ही विजृम्भण है । क्योंकि स्थूलात्मक एक वस्तुका अनुभव
सर्वजनसिद्ध है । अर्थात् "इदं स्थूलम्” इस प्रत्यक्षसे ही अवयवीकी
उपलब्धि सबको होती है । क्योंकि घटादिको अवयवी न मानकर
परमाणुका पुञ्ज माना जाय तो परमाणुओंके अनेक होनेसे “एकम्”
तथा अणुरूप होनेसे ‘स्थूलम्” ये दोनों ही व्यवहार नहीं हो सकते ।
अतः इस प्रत्यक्ष व्यवहारसे ही अवयवी की उपलब्धि माननी होगी ।
यदि कहो कि-“एक स्थूलम्” यह प्रतीति अनुभवरूप (निर्विकल्पक)
नहीं है, किन्तु सविकल्पात्मक है, अतः प्रमाण नहीं है । क्योंकि
बौद्धनयानुसार निर्विकल्पात्मक ज्ञान ही अनुभव होता है और


१. वैयर्थ्यादिति ३ पु० पा० २. बाधकान्यवयविनि इति १ पु० पा०
३. विजृम्भिकेयम् इति १ पु० पा०

२८० आत्मतत्त्वविवेके
भावात् । अन्यथा नीलादिविकल्पानामपि तथैव स्पष्टत्वोप-
पत्तौ सर्वप्रत्यक्षोच्छेदप्रसङ्गात्, गृहीतनिश्चित एवार्थे प्रत्यक्ष-
˚प्रामाण्यात्, निश्चयोपप्लवे तस्याप्युपप्लवादिति ।
न च परमाणव एव स्थूला१, तद्व्याघातात् । न च
प्रमाण होता है—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि उक्त प्रतीति
साक्षात्कारात्मक है, अतः अवश्य अनुभवरूप होगी और प्रमाण होगी ।
यदि कहो कि—उक्त प्रतीति स्वयं साक्षात्कारात्मक नहीं है किन्तु
उपाधिकृत उसकी साक्षात्कारात्मकता है अतः वह प्रमाण नहीं हो
सकती—तो यहाँ उस प्रतीतिके समानाकार निर्विकल्पात्मक अनुभवके
सिवाय दूसरी उपाधि भी नहीं हो सकती है । अर्थात् “एक स्थूलम्’
इस सविकल्पक ज्ञानके साक्षात्कारात्मक होनेमे उसका मूलभूत समाना-
कार निर्विकल्पक अनुभव ही उपाधि है । ऐसी अवस्थामे यदि उक्त
सविकल्पक प्रतीतिको अवयवीकी सिद्धिमें प्रमाण न भी मानो तो भी
उपाधिभूत उस निर्विकल्पक अनुभवसे ही एक स्थूल अवयवीकी सिद्धि
हो जायगी । अन्यथा नीलादिप्रतीतियोँकी भी साक्षात्कारात्मकता इसी
प्रकार उपाधिकृत हो जायगी और वे प्रमाण न हो सकेंगी । इस प्रकार
सभी प्रत्यक्षोंकी प्रामाणिकता उच्छिन्न हो जायगी और प्रत्यक्षके प्रति
लोगोंकी आस्था ही उठ जायगी ।
एवं, निर्विकल्पकद्वारा गृहीत तथा सविकल्पकद्वारा निश्चित किये
गये विषयमे ही प्रत्यक्षकी प्रमाणता है । अतः सविकल्पकके अप्रामाणिक
होनेपर निर्विकल्पक भी आस्थाके योग्य नहीं रह सकेगा । क्योंकि
निर्विकल्पकज्ञानके अतीन्द्रिय होनेसे सविकल्पक ज्ञान ही उसके प्रामाण्य
का तथा उसकी नियत विषयताका उपपादक है ।
यह नहीं कह सकते कि—स्थूलताप्रतीतिके विषय परमाणु ही हैं न
कि कोई अवयवी—क्योंकि परमाणुको यदि स्थूल माना जाय तो उसका
परमाणुत्व ही खण्डित हो जायगा । अर्थात् वह परमाणु (परम = अणु)
नहीं कहा जा सकेगा ।
१. प्रत्यक्षस्य इति १ पु० पा०

तत्समुदायस्तथा, तस्य समुदितस्थानस्य त्वयाऽनभ्युपगमात्,
अभ्युपगमे वाऽवयविना किमपराद्धम् । न च समुदिता एव
तथा प्रतिभासितुमर्हन्ति, तेषां १ प्रत्येकमस्थूलत्वात् । न च
नानादिग्देशव्यापितैव स्थौल्यम्, परमाणुषु प्रत्येकमसम्भ-
वात् । न च नानात्वैकार्थसमवायिन्येव सा स्थौल्यमिति
साम्प्रतम्, स्थूल एक इति प्रत्ययनियमात् ।
यह भी नहीं हो सकता कि—परमाणुओंके समुदायमें ही स्थूलताका
व्यवहार होता है, क्योंकि समुदित परमाणु ही हैं स्थान (आश्रय)
जिसका, ऐसे समुदायको तुम मानते ही नहीं हो। यदि मानो तो
अवयवीने क्या अपराध किया है कि वैसे ही अनेक परमाणुरूप
अवयवोंमें आश्रित उसे (अवयवीको) नहीं मानते। अर्थात् उक्त
प्रकारका समुदाय ही तो अवयवी है।
यह नहीं कह सकते कि—समुदित परमाणु ही स्थूलरूपसे भासित
होते हैं—क्योंकि वे प्रत्येक परमाणु अस्थूल हैं। वहा यह नहीं कह
सकते कि—स्थूलता कोई परिमाणविशेष नहीं है, जो अवयवीमें या
समुदायमे रहता हो, किन्तु नानादिग्देशमे व्याप्त रहना ही स्थूलता है।
अर्थात् नाना दिग्देशमे सम्बद्ध परमाणुओंमे भी स्थूलताका व्यवहार हो
सकता है—क्योंकि परमाणुओंमे कोई भी परमाणु ऐसा नहीं है, जो नाना
दिग्देशमे व्याप्त हो सके। यह भी कहना युक्त नहीं है कि—प्रत्येक
परमाणुके नाना दिग्देशव्यापी न हो सकनेपर भी परस्परमे सटकर अव-
स्थित नाना परमाणु तो नानादिग्देशव्यापी हो ही सकते हैं। अर्थात् उक्त
रूपमे अवस्थित नाना परमाणुओंके लिये ही स्थूलता की प्रतीति होती है—
क्योंकि “एक स्थूल” यही प्रतीति होती है। अर्थात् उक्तरूपमें अवस्थित
नाना परमाणुओंमे स्थूलता मानो तो उसे “एकः” कहना असङ्गत होगा।
तात्पर्य यह है कि एक परमाणुके लिये स्थूलताका व्यवहार असङ्गत होगा
तथा अनेक परमाणुके लिये एकताका व्यवहार असङ्गत होगा। अत
अनेक अवयवोंसे उत्पन्न एक अवयवी मानना आवश्यक है, जिसके लिये
“एक स्थूलः” ऐसा लोकमें व्यवहार हुआ करता है।
१. तेषामस्थूलत्वादिति १ पु० पा०

२८२ आत्मतत्त्वविवेके
न च भागेष्वेव रोपितेनैकत्वेनेदमुपपत्तिमत्, तदसंभ-
वात्। न हि करचरणचिबुकनासिकादिपरमाणूनामैक्यं
कश्चित् क्वचि¹दारोपयति। न च² तेषु भेदेन प्रथमानेषु न
स्थूलप्रत्ययः। न च तत्वे स्फुरत्येव³ तद्विपरीततत्वसमा-
रोपसम्भवः।
अपि चैवमेकपरमाण्वात्मना परमाणुकोटिरप्यारोपिता
परमाणुमात्रतयैव परिस्फुरेत्, न स्थूलतया !
यह भी नहीं कह सकते कि—भागी ( अवयवी ) को स्वीकृत नहीं
करनेपर भी भागों ( अवयवों ) में ही एकत्वका आरोप होनेसे 'एक"
प्रतीति बन सकती है—क्योंकि वैसा आरोप असम्भव है। अर्थात्
परस्पर भिन्नरूपसे प्रतीत होने वाले अवयवोंमें एकत्वारोप कैसे होगा ?
क्योंकि परस्पर भिन्न हाथ, पैर, चिबुक ( ओष्ठके नीचेका भाग ) और
नासिका आदिके परमाणुओंमें कोई भी कभी एकत्वका आरोप नहीं
करता है। फिर भी ऐसा नहीं होता कि परस्पर भिन्नरूपसे भासित
होनेवाले उन कर चरणादिकोंमे एकत्वारोप नहीं होनेके कारण स्थू-
लत्वकी प्रतीति न होती हो। और यह भी सम्भव नहीं है कि कर-
चरणादिकोंमें अनेकत्वके स्फुरणकालमें ही उसके विपरीत एकत्वका
आरोप हो सके।
एव, एक परमाणुके रूपमें यदि करोड़ों भी परमाणु आरोपित हो तो
वह परमाणुमात्ररूपसे ही स्फुरित होगा न कि स्थूलरूपसे। अर्थात् दस
बीस परमाणुको कौन कहे करोड़ों परमाणुओंमें भी यदि एकत्वका आरोप
होगा तो अन्तत वह परमाणु ही रहेगा स्थूल कैसे हो जायगा ? तात्पर्य
यह है कि परमाणु समुदायमे एकत्वारोप होनेसे 'एक" यह प्रतीति
भले ही बन जाय किन्तु परमाणु ( परम + अणु ) में "स्थूल" यह प्रतीति
कैसे हो सकेगी ?
१ कश्चिदारोपयेत् इति १ पु० पा०
२ न च तेष्वभेदेन प्रथमानेषु स्थूलप्रत्यय इति २ पु० पा०
३ परिस्फुरत्येव इति १ पु० पा०

बाह्यार्थभङ्गवाद २८३
न च नानादिग्देशव्यापित्वस्यैव महिमेति साम्प्रतम्,
विरोधात् । यदि हि नानादिक्काः परमाणवो देशतयाऽवभासेरन्
नैकतया देशितया चारोप्येरन् । तथा च कस्य नानादिग्दे-
शव्यापिता ? देशिनोऽपरिस्फूर्त्तेः ।
अथ तथात्वेनारोप्येरन्, न नानात्वेन देशत्वेन वाऽवभा-
सेरन्, तथा च कस्य नानादिग्देशव्यापिता ? देशिनोऽ-
यह भी कहना समुचित नहीं है कि—परमाणु-समूहके नाना
दिग्देशमे व्याप्त होनेकी ही यह महिमा है कि वह परमाणुरूपमें न
भासित होकर एक स्थूलरूपमें भासित होने लगता है—क्योंकि नाना
दिग्देशव्यापित्व और स्थूलत्वमे भी परस्पर विरोध ही है । कारण,
आधारभूत दिग्देश भी आपके मतानुसार परमाणुसमूह ही है । ऐसी
परिस्थितिमें आधारभूत वे नाना दिग्देशात्मक परमाणु यदि अपने
नानात्वके साथ देशरूपमें भासित हों तो उनमे एकत्व और स्थूलात्मक
देशित्वका आरोप हो नहीं सकता । तथा वहाँ देशीके रूपमे अर्थात्
उस नाना दिग्देशरूप आधारमे व्याप्त रहनेवाले आधेयके रूपमे किसी
अन्यका भान होता नहीं है । इसलिए नानादिग्देशव्यापित्वकी प्रतीति
किसमे होगी ?
यदि आधारभूत नानादिग्देशात्मक परमाणुओंमे ही एकत्व और
स्थूलात्मक देशित्व ( आधेयत्व ) का आरोप हो तो भी नानादिग्देशव्या
पित्व किसमे गृहीत हो सकेगा ? क्योंकि वहाँ नानादेशरूपमे किसीका
भान ही नहीं होता है । कारण, देश तो देशीके रूपमें भासित हो
रहा है ।※ इसलिए परमाणुसमुदायमे एकत्वारोप करनेपर भी उसमें
१. देशानामपरि० इति २ पु० पा०
※ यहाँ घटादि परमाणुको देशी और भूतलादि परमाणुको देश नहीं कह
सकते, क्योंकि भूतलादिमे भी तो एकत्व और स्थूलत्वकी प्रतीति घटके
समान ही होती है । अत उसके लिए पृथक् देश देशीकी कल्पना
आवश्यक हो जायगी । यदि उक्त दोषके कारण नानादिग्देशव्यापित्वको
एक परिमाणविशेष मानो तो यह परिमाणविशेष एक परमाणुमें नही
रह सकता । अत उसका आश्रयभूत अवयवी सिद्ध ही हो गया ।

२८४ आत्मतत्त्वविवेके
परिस्फूर्त्तेः। तस्मादेकत्वारोपे परमाणुमात्रा१वभास एव
स्यादिति ।
एवं तर्ह्यनारब्धद्रव्यराशिषु का वार्तेति चेत्, न तावद्देश-
व्याप्ति२ साम्येन तावत्परिमाणद्रव्यत्वा३रोपः। न चेहापि
तथा स्यात्, अन्यत्राप्यसिद्धेः। न चासन्नेवैकः स्थूलः परि-
स्फुरति, बाधकानामपास्तत्वात् ।
एतेन प्रतिभासधर्मोऽपि निरस्तः। सोऽपि ह्यसन् बौद्धो
परमाणुमात्रत्वका ही भान हो सकेगा न कि स्थूलत्वका। अर्थात् बिना
अवयवी माने “एक स्थूल यह प्रतीति असम्भव है।
यहाँ यह प्रश्न उठ सकता है कि—जहाँ किसी अवयवीका आरम्भ
नहीं होता, ऐसी धान्यादि राशियोंमे 'एको महान् धान्यराशि' ऐसी
एकत्व और स्थूलत्वकी प्रतीति कैसे होती है?—किन्तु ऐसा प्रश्न नहीं
कर सकते। क्योंकि कोई अवयवी द्रव्य जितनी जगह घेरता है, उतनी
ही जगहमें व्याप्त होनेके कारण उतने ही परिमाणवाले द्रव्यका यहाँ
आरोप होता है। इसलिए वहाँ वास्तविक अवयवीके न होनेपर भी
“एक स्थूलो राशि' यह आरोपात्मक प्रतीति होती है, न कि वास्तविक।
यह नहीं कह सकते कि—यहाँ भी अर्थात् परमाणु समूहमे भी
आरोपात्मक ही “एक स्थूल" प्रतीति हो जायगी—क्योंकि आरोपके
लिए आरोप्य वस्तुकी कहीं अन्यत्र प्रसिद्धि होनी चाहिये। तुम्हारे
मतमें तो कहीं भी स्थूल अवयवी प्रसिद्ध ही नहीं है। यह भी नहीं
कह सकते कि—असत्ख्यातिके अनुसार असत् ही एकत्व और स्थूलत्व
भासित होता है—क्योंकि अवयवीके सत् होनेमे जितने भी बाधक दिये
जा सकते हैं, उन सभीका निराकरण पूर्वमें किया जा चुका है। साथ
ही असत् ख्यातिवाद भी खण्डित हो चुका है।
अवयवीके बारेमे बाधकोंका निराकरण कर दिये जानेके कारण यह

१ परमाणुमात्रत्वावभास इति २ पु० पा०
२ तावद्देशव्यापित्वसाम्येन इति २ पु० पा०
३ द्रव्यत्वारोपः इति २ पु० पा०

बाह्यार्थभङ्गवाद २८५
वास्तवो चेति त्रयीं गतिं नातिवर्तत इति। अतीन्द्रियाश्च
परमाणवः कथं मिलिता अपि दृश्येरन् ? अतीन्द्रियसमूहस्या-
प्यतीन्द्रियत्वात् । विशिष्टोत्पादादैन्द्रियकत्वमिति चेत्, किम-
द्यपि स्वप्ने हस्तं प्रसारयसि ।
अस्तु चैवम्, तथापि क्षणभेदाज्जातिभेदो निराकृतः,
मान्यता भी खण्डित हो जाती है कि—ज्ञानका ही धर्म एकत्व और
स्थूलत्व है । अर्थात् ज्ञान ही स्थूलरूपसे भासित होता है, अवयवी
नहीं। तात्पर्य यह है कि स्थूलत्वादि ज्ञानका ही एक आकारविशेष
है—क्योंकि वह आकार भी असत् है ? या बौद्ध है ? अथवा वास्तव
है ? इन तीनके सिवाय अन्य गति नहीं हो सकता। यदि असत् हो
तो उसकी प्रतीति नहीं हो सकेगी। यदि वह भी बौद्ध अर्थात् बुद्धि-
धर्म हो तो अनवस्थादोष आ जाता है, यदि वास्तव हो तो आकारके
वास्तव होनेसे उसका विषय स्थूलत्व भी अपने आप वास्तव सिद्ध हो
जायगा । और स्थूलत्वके वास्तव होनेसे अवयवी भी अनायास सिद्ध
हो जायगा ।
एव, जब कि प्रत्येक परमाणु अतीन्द्रिय है, तब वे मिलितरूपमे भी
कैसे दिखाई पड़ेंगे ? क्योंकि अतीन्द्रियका समूह भी अतीन्द्रिय ही
होगा। यदि कहो कि—समुदित अवस्थामे वे इन्द्रिय द्वारा प्रत्यक्ष होने
योग्य पैदा होते है, इसलिए उनका प्रत्यक्ष होता है—तो क्यों कभी भी
स्वप्नमें हाथ फैला रहे हो । अर्थात् अतीन्द्रिय परमाणुओंसे ऐन्द्रियक
परमाणु समूह तभी पैदा हो सकता है, यदि पदार्थ क्षणिक हों। किन्तु
क्षणिकवाद तो खण्डित हो चुका है। अतः ऐसा कहना सपनेमे मिथ्या
द्रव्य लेनेके लिए हाथ फैलानेके समान है।
अथवा क्षणिकत्व रहे, फिर भी वह परमाणुसमूह अग्रिम क्षणमे
प्रत्यक्ष होनेके योग्य कुर्वद्रूपत्व नामक जातिविशेषसे विशिष्ट होकर पैदा
होगा—ऐसा नहीं हो सकता है। क्योंकि जातिसाङ्कर्यदोषसे कुर्वद्रूपत्व
जातिका पूर्वमें निराकरण हो चुका है। यदि तो उक्त (कुर्वद्रूपत्व)
जातिविशिष्ट पैदा न होकर अभिन्नरूपसे पैदा हो, तो भी वही पैदा हो
अथवा उसके सदृश पैदा हो, इससे तत्त्वदृष्टिसे कोई अन्तर नहीं है।

२८६ आत्मतत्त्वविवेके
जातिसंकरप्रसङ्गात् । तदभेदेन१ तूत्पादेऽपि तद्वा तादृग्वेति
तत्त्वदृशा न कश्चिद् विशेषः ।
भवतु वा जातिविशेषोऽपि, तथापि स्थूलतमेवैन्द्रियकत्व
प्रति प्रयोजकं मन्तव्यम्२ । अन्यथा स्थूलतामनाप्नुवन्नेको
ऽपि परमाणुः कदापि तथोत्पन्नः प्रत्यक्षतामियात् । नियमेन
तु तद्विपरीतस्य प्रत्यक्षता तथाविधस्या३प्रत्यक्षतायामेव
विश्राम्यति, अन्वयव्यतिरेक४फलत्वाद्धेतुफलभावस्य ।
न च सञ्चिता अपि स्थूलतयोत्पन्नाः । न च बहुत्वमेव
अर्थात् अतीन्द्रिय परमाणुसमूहसे पुन अग्रिम क्षणमें वही पैदा हो तो
वह अतीन्द्रिय ही रहेगा । अथवा यदि उससे उसीके समान पैदा होता
हो तो भी अतीन्द्रिय ही रहेगा, कोई अन्तर नहीं आ सकता है ।
अथवा कुर्वद्रूपत्वनामक जातिविशेष भी भले ही हो, फिर भी
ऐन्द्रियक (प्रत्यक्ष) होनेके लिये स्थूलत्व ही प्रयोजक है । नहीं तो
स्थूलता (महत्त्व) को नहीं प्राप्त किया हुआ एक परमाणु भी कदाचित्
कुर्वद्रूपत्वजातिसे विशिष्ट पैदा हुआ प्रत्यक्ष हो जाय । नियमपूर्वक
परमाणु अवस्थासे विपरीत स्थूलावस्थामे प्रत्यक्ष होना इसी निष्कर्षपर
पहुँचाता है कि परमाणु अवस्थामें कथमपि प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है ।
क्योंकि कहीं भी कार्यकारणभावका ज्ञान अन्वय व्यतिरेकके द्वारा ही
होता है । अर्थात् जहाँ स्थूलता है, वहाँ प्रत्यक्षत्व है—यह अन्वय
हुआ । तथा जहाँ स्थूलता नहीं है वहाँ प्रत्यक्षत्व भी नहीं है—यह
व्यतिरेक हुआ । इससे सिद्ध होता है कि प्रत्यक्षत्वके प्रति स्थूलत्व ही
कारण है । एकत्र सञ्चित होनेपर भी वे परमाणु स्थूलरूपमें तो उत्पन्न
नहीं हुए, जिससे कि उनका प्रत्यक्ष हो सके ।
यह भी नहीं कह सकते कि—परमाणुओंका बहुत होना ही स्थूलता
१ तदभेदेऽपि तत्त्वदृशा न कश्चिद् विशेष इति २ पु० पा०
२ प्रयोजकमास्थेयम् इति १ पु० पा०
३ तथाविधस्य प्रत्यक्षता(यां)म् इति १ पु० पा०
४ अन्वयव्यतिरेकगम्यत्वाद्धेतुफलभावस्य इति १ पु० पा०

बाह्यार्थभङ्गवादः २८७
स्थौल्यं तद्विपर्यय एव सूक्ष्मता, विततदेशानामपि प्रत्यक्षत्व-
प्रसङ्गात् । नैरन्तर्यमपि विवक्षितमिति चेन्न, तस्य प्रकृतेऽप्य-
संभवात्, रूपपरमाणूनां रसादिपरमाणुभिरन्तरितत्वात् । न
चारोप्येत नैरन्तर्यम्, इतरेतराश्रयप्रसङ्गात्, नैरन्तर्यारोपे तेषां
स्थूलानां ग्रहणं तद्ग्रहणे च सति नैरन्तर्यारोप इति ।
तस्मादैन्द्रियकत्वे स्थूलतायाः प्रयोजकत्वात्, अप्रयोज-
कत्वे विततदेशानामपि प्रत्यक्षत्वप्रसङ्गात्, तेषां च प्रत्येक-
मस्थूलत्वादतीन्द्रिया एव परमाणवः । तथा च सर्वाग्रहणमव-
यव्यसिद्धेरिति ।
है और बहुत्वका विपर्यय ही सूक्ष्मता है—क्योंकि तब छिटपुट जगहों-
में फैले हुए भी परमाणुओंका प्रत्यक्ष होने लगेगा। यदि कहो कि—
प्रत्यक्षके लिये परमाणुओंका नैरन्तर्य भी (बिना व्यवधानके परस्पर
सटे रहना भी) अपेक्षित है—तो ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि
प्रकृतमें वैसा होना भी असम्भव है। कारण, रूपके परमाणु अवश्य
ही रसादिके परमाणुओंसे अन्तरित (व्यवहित) होंगे। एवं उनमें
नैरन्तर्यका आरोप भी नहीं हो सकता है। क्योंकि तब अन्योन्याश्रय-
दोषका प्रसङ्ग हो जायगा। जैसे—नैरन्तर्यका आरोप हो तो उनमें
स्थूलताका ग्रहण हो और स्थूलताका ग्रहण होनेपर ही नैरन्तर्यका आरोप
हो सकेगा।
इसलिये ऐन्द्रियक होनेमें स्थूलता प्रयोजक है। यदि स्थूलता
प्रयोजक न हो तो छिटफुट जगहोंमें फैले हुये भी परमाणुओंका प्रत्यक्ष
होने लगेगा। वे प्रत्येक परमाणु अस्थूल हैं, इसलिये वे अतीन्द्रिय ही
हैं। इसी बातको परमर्षि गौतमने न्यायदर्शनके "सर्वाग्रहणम् अव-
यव्यसिद्धेः" इस सूत्रसे दृढ किया है। इस सूत्रका अभिप्राय यह है
कि—यदि अवयवी न माना जाय तो संसारकी सभी वस्तु अप्रत्यक्ष हो
जायगी और जगत्में आन्ध्य फैल जायगा।

३८८ आत्मतत्त्वविवेके
अस्तु तर्हि क्षणमात्रस्थायी स्थूलोऽर्थ इति चेन्न, भाग-
भागिनोर्युगपदुपलम्भबाधितत्वात्, घटपटादिभङ्गे तन्तुकपा-
लादीनामुत्पाद समानोपादानतया सप्रतिघत्वव्याघाताच्चेति ।
सोऽयमधिकरणसिद्धान्तन्यायेन स्थूलत्वसिद्धौ क्षण-
भङ्गभङ्गः ।
यदि कहो कि—प्रत्यक्षत्वकी उपपत्तिके लिये स्थूल वस्तु रहे किन्तु
यह भी क्षणिक ही होगी—तो ऐसा नहीं कह सकते । क्योंकि अवयव
और अवयवी दोनोंकी एककालमे उपलब्धि होनेसे क्षणिकत्वका बाध
हो जाता है । अर्थात् जिस कालमें स्थूल अवयवीका प्रत्यक्ष होगा,
उस काल तक उसका अवयव भी साथ साथ विद्यमान रहेगा, अतः दो
क्षणपर्यन्त उस अवयवके अनुवर्तमान रहनेके कारण क्षणिकवाद वहीं
खण्डित हो गया । एव उत्पत्तिके अग्रिम क्षणमे ही जो घटपटादि नष्ट
हो गया उसका उपादान कारण तन्तु और कपालादि है । तथा वही
तन्तुकपालादि घटपटादिकी भङ्गावस्था मे उत्पन्न तन्तुकपालादिका भी
उपादानकारण है, क्योंकि तुम्हारे मतमे विसदृश सन्तान और सदृश
सन्तान दोनों ही मान्य हैं। ऐसी स्थितिमें एक ही तन्तुकपालादिमाल
घटपटादिका और भङ्गावस्था में उत्पन्न होनेवाली तन्तुकपालादिमालका
भी उपादानकारण होगी, किन्तु यह अनुचित है । क्योंकि समानदेशमें
दो मूर्तोंका रहना व्याहत है ।
इस प्रकार स्थूलत्वकी सिद्धि हो जानेपर अधिकरणसिद्धान्तके
न्यायसे क्षणभङ्ग ( क्षणिकत्व ) का भी अनायास भङ्ग ( खण्डन ) हो
जाता है । अर्थात् स्थूलत्व सिद्ध होता हुआ स्थैर्यको लेकर ही सिद्ध
होता है । क्योंकि पूर्वोक्तरीतिसे अवयव और अवयवीकी एक साथ
उपलब्धिकी दशामे जो स्थूलत्वकी उपलब्धि है, वही स्थिरत्व सिद्धिमे
पर्यवसित हो जाती है । यद्यपि जहाँ अनुमानद्वारा किसी वस्तुकी
सिद्धि करते समय पक्षधर्मताब्रलसे अन्य वस्तुकी सिद्धि हो जाती
है, वहीं अधिकरणसिद्धान्त लागू होता है, यहाँपर तो स्थूलत्वका
प्रत्यक्षद्वारा व्यवस्थापन किया गया है, अतः यहाँ अधिकरणसिद्धान्त
नहीं लागू होगा । फिर भी उसके तुल्य तो इसे कहा ही जा सकता

बाह्यार्थभङ्गवाद २८९
एतेन यत् सत् तन्निरवयवं यथा विज्ञानम्, संश्च विवादा-
स्पदीभूतो घटादिरिति निरस्तम् । विपर्यये बाधकाभावेन
व्याप्त्यसिद्धेः । यत् सत् तत्सावयवं यथा घटः, सच विज्ञान-
मिति चार्वाकपरिवर्तस्याप्यवकाशाच्च । समो वा समाधिः ।
ननु निरवयवमेव विज्ञानं स्वसंविदितरूपम्, घटस्य च
सावयवतायामद्यापि विवाद एव, तत्कथं परिवर्त ? कथं वा
समः समाधिरिति चेत्, शुष्कविवादस्य विज्ञानेऽपि दुर्निवारत्वात् ।
न हि कश्चित् कण्ठौष्ठपार्श्वजठरादिपरिहीनं पिठरमनुभवति ।
है । इसीलिये आचार्यने मूलमे 'अधिकरणसिद्धान्तन्यायेन' यहाँ
न्यायशब्दका प्रयोग तुल्यता सूचित करनेके लिये किया है ।
इस स्थूलत्व व्यवस्थापनके द्वारा—जो सत् है वह निरवयव होता
है, जैसे विज्ञान, प्रकृतमे विवादका विषय घटादि भी सत् है इसलिये
वह भी निरवयव होगा । अर्थात् अवयवहीन होनेसे अवयवी नहीं हो
सकेगा—यह अनुमान भी खण्डित हो गया । क्योकि विपर्ययमें कोई
बाधक नहीं होनेसे “जो सत् है वह निरवयव है” यह व्याप्ति ही
असिद्ध है । अर्थात् सत् होते हुए भी निरवयव नहीं होगा किन्तु
सावयव हो सकता है, इसमे कोई बाधक नहीं है ।
एव, जो सत् है वह सावयव है, जैसे घट, विज्ञान भी सत् है,
इसलिये वह भी सावयव होगा—इस प्रकार चार्वाक भी परिवर्त
(करवट) बदल सकता है । यदि चार्वाक का यह अनुमान अनुकूल
तर्कके अभावमें असाधक है, तो तुम्हारा अनुमान भी अनुकूल तर्क
नहीं रहनेसे साधक नहीं होगा । इस प्रकार दोनों अनुमानोंकी
समान गति है ।
यदि कहो कि—स्वयंप्रकाशरूप विज्ञान तो निरवयव ही है, और
घटके सावयव होनेमे तो अभी भी विवाद ही है । अतः उक्त प्रकारका
चार्वाकका उलटा अनुमान कैसे हो सकेगा ? और दोनों अनुमानोंकी
समान गति कैसे होगी ?—इसपर मेरा कहना है कि उक्त प्रकारका शुष्क
विवाद विज्ञानके बारेमें भी बेरोक होगा । कोई भी कण्ठ, ओष्ठ पार्श्व

१० आत्मतत्त्वविवेके
ास्तु वा सत्त्वात् सप्रतिघत्वसिद्धिर्बुद्धावप्रतिघत्वं वा घटा-
दाविति ।
अपि च स्वतन्त्रसाधनमिदं प्रसङ्गो वा ? न प्रथमः,
घटादिशब्देन स्थूलेतराणां रूपादीना परमाणूनां वा पक्षीकरणे
सिद्धसाधनात्, स्थूलमेकमभ्युपगम्य पक्षविधौ कालात्यया-
पदेशात्, अनभ्युपगमे त्वाश्रयासिद्धेरिति ।
ननु प्रामाणिकेऽभ्युपगमे बाधः स्यात्, सर्वथाऽनभ्युप-
गमे च श्रयासिद्धिः स्यात् । नचैवमत्रेति चेत् , तदेतन्नभ स्थल-
कमलपरिमलसाधनस्यापि साश्रयतामापादयदाश्रयासिद्धिदोष-
मोषायेत्यलमनेन ।
( पसली ) तथा जठर आदि अवयवोंसे रहित पिठर ( देहपिण्ड ) का
अनुभव नहीं करता है। अर्थात् देहादिके समान घटादि भी सावयव
ही है, इसमें कोई भी विवाद नहीं है। अन्यथा उसी सत्त्व हेतुसे
बुद्धिमें ( विज्ञानमें ) मूर्तत्वकी सिद्धि या घटमें अमूर्तत्वकी सिद्धि
हो जाय ।
एवं 'घट निरवयव है, सत् होनेसे, जैसे विज्ञान' यह स्वतन्त्र अनु-
मान है ? अथवा 'घट यदि सत् होता तो निरवयव होता, जैसे विज्ञान"
इस प्रकारका तर्क है ? इसमें प्रथम पक्ष नहीं हो सकता है। क्योंकि घट
आदि शब्दोंसे यदि स्थूलसे इतर रूपादि गुण या परमाणुओंको पक्ष करो
तो सिद्धसाधन दोष हो जायगा। क्योंकि रूपादिको या परमाणुको हम
भी निरवयव मानते ही हैं। यदि घट शब्दसे किसी स्थूलका पक्ष
बनाओ तो बाध दोष हो जायगा। क्योंकि जो स्थूल होगा, उसमें
निरवयवत्व बाधित है। यदि घटरूप पक्षको स्थूल भी न मानो तो
इसका अर्थ होगा--वह कुछ नहीं है। ऐसी परिस्थितिमें आश्रयासिद्धि
( पक्षासिद्धि ) दोषसे आपका अनुमान ग्रस्त हो जायगा।
यदि कहो कि-घटादिकी स्थूलताको प्रामाणिक मानेंगे तभी बाध
होगा तथा घटादिको सर्वथा न मानें तभी आश्रयासिद्धि होगी। यहाँ
तो ऐसा मानते नहीं, अतः उक्त अनुमान निर्दोष है-तब तो इस

बाह्यार्थभङ्गवादः २९१
पर्वतादिवल्लोकप्रसिद्धिसिद्धान् घटादीनुपादाय निरवयव-
त्वानुमानं स्यात्, अन्यथा ब्रह्मविवर्तादिविप्रतिपत्तिविहततया
दहनानुमानमपि पर्वतादौ न स्यादिति चेन्, नैवम्, अवि-
रोधात् । न हि ब्रह्मविवर्तादिसिद्धावप्याश्रयादयोऽन्यप्रकाराः
सम्भवन्ति¹ ।
तथा हि, सर्वत्रैव स्वप्नपर्वते स्वप्नधूमेन स्वप्नवह्निरेव
साध्यते, केवलं सांवृतेऽपि व्यवहारे सत्यानृतव्यवस्थाऽस्तीति
तस्यां निर्भरः कर्तव्यः । इह तु घटादिव्यपदेशेन स्थूल एव
यदि पक्षीकृतः, कथं निरवयवत्वेन साध्येन न विरोधः ?
रीतिसे आकाशकमलमें सुगन्धका अनुमान भी साश्रय हो जायगा।
और संसारसे आश्रयासिद्धिनामक दोष ही उठ जायगा। अतः
ऐसा न कहो।
यदि कहो कि—जैसे, लोकव्यवहारसे सिद्ध पर्वतादिको लेकर उसमें
अग्निका अनुमान होता है, वैसे ही लोकव्यवहारसे सिद्ध घटादिको
लेकर उसमें निरवयवत्वका अनुमान होगा। नहीं तो ब्रह्मविवर्तवाद
आदि विभिन्न मान्यताओंसे प्रतिहत होनेके कारण पर्वत भी गगन कमलके
समान ही हो जायगा और उसमें अग्निका अनुमान भी न हो सकेगा—
तो ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि पर्वतादिके ब्रह्मविवर्तादिरूप होने-
पर भी अग्निरूप साध्यके साथ कोई विरोध नहीं है। कारण, ब्रह्म
विवर्त आदि पक्षमें भी आश्रय (पक्ष) दूसरे प्रकारका हो और साध्य
तथा साधनादि दूसरे प्रकारके हों, ऐसा नहीं होता। अर्थात् ब्रह्मविवर्त-
रूप पर्वतमें ब्रह्मविवर्तरूप ही अग्निका अनुमान किया जाता है। अतः
पक्ष और साध्यादिमें कोई विरोध नहीं है।
जैसे, स्वाप्न-पर्वतमें स्वाप्न-धूमसे स्वाप्न-अग्निका ही साधन किया
जाता है। इस प्रकार केवल सांवृत (काल्पनिक) व्यवहारमें भी सत्य
और अनृतकी व्यवस्था है ही। अतः उस व्यवस्थाका आश्रय लेना
ही चाहिए। तुम्हारे अनुमानमें तो यदि घटादि-शब्दसे स्थूल
१. सन्ति इति १ पु० पा०

अथ परमाणुरेव१, कथं न सिद्धसाधनम् ? विप्रतिपन्नं
प्रति न तथेति चेत्, न वै कश्चित् परमाणूनां निरवयवत्वे वि-
प्रतिपद्यते । लोकव्यामोहनिवर्हणाय साधनमिति चेत्, तथापि
यं लोकः स्थूलमेकमुपलब्धवान् तस्य पक्षत्वे विरोध एव,
ततोऽन्यस्य पक्षत्वे सिद्धसाधनमेव । एकः स्थूलोऽयमिति
मिथ्येति चेत्, एतदेव तर्हि साध्यताम्, किमनेनाजागलस्तन-
कल्पेन सत्त्वेन । न च तत्रेदं शक्यमुपसंहर्तुम्, व्यधिकरण
पक्ष करते हो तो निरवयवत्व साध्यके साथ क्यो न विरोध होगा ? यदि
घट शब्दसे परमाणु ही पक्ष हो तो सिद्धसाधन दोष क्यों न होगा ?
यदि कहो कि—घटपदवाच्य ( परमाणु ) के निरवयव होनेमे
जिसको विप्रतिपत्ति है, उसके प्रति सिद्धसाधन नहीं होगा—तो पर-
माणुओंके निरवयव होनेमें किसीको भी विप्रतिपत्ति नहीं है । अत
उन्हें निरवयव सिद्ध करनेमे सिद्धसाधन होगा ही । यदि कहो—
परिक्षकोंको भले ही विप्रतिपत्ति न हो, कि तु लौकिकोंको तो है ही ।
अत घटपदवाच्यके सावयव होनका जो व्यामोह लौकिकोंमे है, उसे
मिटानेके लिये यह निरवयवत्वका साधन किया जा रहा है । इसलिये
सिद्धसाधन नहीं होगा—तो भी लोकने जिसे ( घटको ) एक स्थूलके
रूपमें जाना है, उसे यदि पक्ष करो तो निरवयव सिद्ध करनेमे विरोध ही
( बाध ही ) होगा । यदि स्थूलसे भिन्न ( परमाणु ) को पक्ष करो तो
सिद्धसाधन होगा ही ।
यदि कहो— लौकिकोंका “एक स्थूलोऽयम्” यह ज्ञान भ्रम है। अत
प्रमात्मक नहीं होनेके कारण उसके द्वारा निरवयवत्वानुमान बाधित
नहीं होगा—तो उस लौकिकज्ञानका मिथ्यात्व ही सिद्ध करो । अर्थात्
मिथ्यात्वका साधक जो हेतु हो उसीका उपन्यास करो । अजागलस्तनके
तुल्य निरर्थक इस सत्त्व-हेतुसे क्या लाभ ? यदि कहो—' स्थूलप्रत्ययो
मिथ्या सत्त्वात्' इस अनुमानद्वारा लौकिक स्थूल प्रतीतिको मिथ्या
सिद्ध करनेमें ही सत्त्व हेतुका उपयोग कर लिया जा सकता है—तो यह
१ परमाण्वादिरैव इति १ पु० पा०

[वाह्यार्थभङ्गवादः २९३]

त्वात् । तस्माद् येन रूपेण यस्य पक्षत्वं विवक्षितम् तेन सिषा-
धयिषितधर्मविरोधविवादाभ्यां तत्रानुमानप्रवृत्तिर्नातोऽन्यथेति ।
नापि द्वितीयः, विपर्ययापर्यवसानात् । न च विवाद-
विषयो निरवयवस्तस्मान् सन्निति विपर्ययः, न चैवं सावय-
वत्वं पक्षस्यानिच्छता प्रवर्तयितुं शक्यते । न च तत् त्वयेष्यते ।
न च तस्येष्टौ तेनासत्त्वं शक्यसाधनम् , आश्रयासिद्धेर्विरो-

भी नहीं हो सकता । क्योंकि तुम्हारे द्वारा प्रमा माने गये निर्विकल्पक
ज्ञानमें भी सत्त्व-हेतुके रहनेसे यह हेतु व्यभिचारी है । इसलिये
जिस रूपसे जो पक्ष हो, उस रूपसे जहाँ सिषाधयिषित धर्म ( साध्य )
का बाध न हो तथा संशय हो, वहीं अनुमानकी प्रवृत्ति हो सकती है
अन्यथा नहीं ।
प्रसङ्गरूप ( तर्करूप ) द्वितीय पक्ष भी नहीं हो सकता है । क्योंकि
तर्कमें विपर्ययमें पर्यवसान होना आवश्यक है, किन्तु यहां विपर्ययमें पर्य-
वसान नहीं हो सकता है । जैसे, "घट यदि सत् हो तो निरवयव हो"
इस तर्कका पर्यवसान इसी विपर्ययमें होगा कि—विवादका विषय घट
निरवयव नहीं है, इसलिये सत् भी नहीं है । किन्तु जो बौद्ध घटरूप
पक्षको सावयव नहीं चाहता, वह इस प्रकारके विपर्ययको नहीं
प्रवृत्त कर सकता है । तुझे तो घटका सावयवत्व इष्ट नहीं है ।
यदि इष्ट भी हो तो उससे ( सावयवत्वके द्वारा ) उसमें ( घटमें )
असत्त्वका साधन भी नहीं हो सकता है । क्योंकि यहां आश्रयासिद्धि,
विरोध और असाधारण्य दोष उपस्थित हो जायेंगे ।
अर्थात् "घटः असन् सावयवत्वात्" इस विपर्ययसिद्धिमें सावयवत्व-
हेतुका आश्रय ही तुम्हारे मतसे असत् है, अतः आश्रयासिद्धि दोष हुआ ।
यदि उस दोषसे बचनेके लिये आश्रयको सत् मानो तो "असन्" इस
साध्यके साथ विरोध हो जाता है । साथ ही सावयवत्व-हेतुके असत्-
रूपमें प्रसिद्ध शशशृङ्गादिरूप सपक्ष और सत् रूपसे प्रसिद्ध विज्ञान,
परमाणु आदि विपक्ष, दोनों ही से व्यावृत्त होने तथा घटादिरूप पक्ष-
मात्रमें वर्तमान होनेके कारण असाधारण्य दोष हो जाता है । एवं,

[Page Header: २९४ आत्मतत्त्वविवेके]

घादसाधारण्याद्वा । न च विपर्ययोऽपि परेष्या प्रवर्तत इति ।
कः पुनरवयविनि न्यायः ? तत् किं प्रत्यक्षात्न्यायो
गरीयान् ? यद्येवम्, बुद्धावेव१ कोऽसौ ? तस्मादसारमेतत् ।
तथापि, यन्निरस्तसमस्तविरुद्धधर्माध्यासं तदेकमेव व्यव-
हर्तव्यं, यथा विज्ञानम् । तथा च विवादाध्यासित एकस्थूलो-
ऽनुभवगोचर इति स्वभावहेतुः, तन्मात्रानुबन्धित्वादेकता-
व्यवहारस्य । न ह्ययमेकव्यवहारो निर्निमित्तोऽनियमप्रस-

घटको मैं सावयव मानता हूँ, इस आधारपर भी तुम विपर्ययका उपन्यास
नहीं कर सकते । क्योंकि दूसरेकी मान्यताके आधारपर विपर्ययकी
प्रवृत्ति नहीं हुआ करती है ।

अवयवीकी सिद्धिमें न्यायप्रदर्शन

प्रश्न—अवयवीके सम्बन्धमें प्रत्यक्ष अनुभव प्रमाणके रहनेपर भी
उसमे अनुमान प्रमाण क्या है ? बताओ ।
उत्तर—क्या प्रत्यक्षसे अनुमान श्रेष्ठ है ? यदि है तो तुम्हारे
विज्ञानमें भी क्या अनुमान है ? क्योंकि विज्ञानको तुम अनुमानके
बिना ही स्वसंवेद्य मानते हो । अतः उक्त प्रश्न सारहीन है । अर्थात्
अवयवीके बारेमें प्रत्यक्ष-अनुभवको सर्वथा दोषरहित सिद्ध कर चुका
हूँ । साथ ही अनुमानका अङ्गभूत व्याप्तिका ग्राहक प्रत्यक्ष ही है ।
इसलिये अवयवीमे प्रत्यक्ष अनुभव प्रमाणके रहते अनुमान प्रमाणकी
जिज्ञासाका कोई महत्त्व नहीं है ।
तथापि इसमें अनुमान भी यह है कि—जो समस्त विरुद्ध धर्मोंके
अध्याससे रहित है वह एक ही है, ऐसा व्यवहार करना चाहिये, जैसे
तुम्हारा विज्ञान । वैसे ही विवादका विषय तथा एक स्थूलके रूपमे अनु-
भवका गोचर (विषय) घट भी विरुद्धधर्माध्याससे रहित है । इस प्रकार
घटमें विरुद्धधर्माध्यासरहितत्व हेतु स्वभावतः है । क्योंकि एकत्वका
व्यवहार विरुद्धधर्माध्यासराहित्यमात्रकी अपेक्षा करता है । कारण,


१. बुद्धावपि कोऽसौ इति १ पु० पा०