आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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जातिसंकरप्रसङ्गात् । तदभेदेन१ तूत्पादेऽपि तद्वा तादृग्वेति
तत्त्वदृशा न कश्चिद् विशेषः ।
भवतु वा जातिविशेषोऽपि, तथापि स्थूलतमेवैन्द्रियकत्व
प्रति प्रयोजकं मन्तव्यम्२ । अन्यथा स्थूलतामनाप्नुवन्नेको
ऽपि परमाणुः कदापि तथोत्पन्नः प्रत्यक्षतामियात् । नियमेन
तु तद्विपरीतस्य प्रत्यक्षता तथाविधस्या३प्रत्यक्षतायामेव
विश्राम्यति, अन्वयव्यतिरेक४फलत्वाद्धेतुफलभावस्य ।
न च सञ्चिता अपि स्थूलतयोत्पन्नाः । न च बहुत्वमेव
अर्थात् अतीन्द्रिय परमाणुसमूहसे पुन अग्रिम क्षणमें वही पैदा हो तो
वह अतीन्द्रिय ही रहेगा । अथवा यदि उससे उसीके समान पैदा होता
हो तो भी अतीन्द्रिय ही रहेगा, कोई अन्तर नहीं आ सकता है ।
अथवा कुर्वद्रूपत्वनामक जातिविशेष भी भले ही हो, फिर भी
ऐन्द्रियक (प्रत्यक्ष) होनेके लिये स्थूलत्व ही प्रयोजक है । नहीं तो
स्थूलता (महत्त्व) को नहीं प्राप्त किया हुआ एक परमाणु भी कदाचित्
कुर्वद्रूपत्वजातिसे विशिष्ट पैदा हुआ प्रत्यक्ष हो जाय । नियमपूर्वक
परमाणु अवस्थासे विपरीत स्थूलावस्थामे प्रत्यक्ष होना इसी निष्कर्षपर
पहुँचाता है कि परमाणु अवस्थामें कथमपि प्रत्यक्ष नहीं हो सकता है ।
क्योंकि कहीं भी कार्यकारणभावका ज्ञान अन्वय व्यतिरेकके द्वारा ही
होता है । अर्थात् जहाँ स्थूलता है, वहाँ प्रत्यक्षत्व है—यह अन्वय
हुआ । तथा जहाँ स्थूलता नहीं है वहाँ प्रत्यक्षत्व भी नहीं है—यह
व्यतिरेक हुआ । इससे सिद्ध होता है कि प्रत्यक्षत्वके प्रति स्थूलत्व ही
कारण है । एकत्र सञ्चित होनेपर भी वे परमाणु स्थूलरूपमें तो उत्पन्न
नहीं हुए, जिससे कि उनका प्रत्यक्ष हो सके ।
यह भी नहीं कह सकते कि—परमाणुओंका बहुत होना ही स्थूलता
१ तदभेदेऽपि तत्त्वदृशा न कश्चिद् विशेष इति २ पु० पा०
२ प्रयोजकमास्थेयम् इति १ पु० पा०
३ तथाविधस्य प्रत्यक्षता(यां)म् इति १ पु० पा०
४ अन्वयव्यतिरेकगम्यत्वाद्धेतुफलभावस्य इति १ पु० पा०