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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 334, कुल 530 में से

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पृष्ठ 334

बाह्यार्थभङ्गवाद २८५
वास्तवो चेति त्रयीं गतिं नातिवर्तत इति। अतीन्द्रियाश्च
परमाणवः कथं मिलिता अपि दृश्येरन् ? अतीन्द्रियसमूहस्या-
प्यतीन्द्रियत्वात् । विशिष्टोत्पादादैन्द्रियकत्वमिति चेत्, किम-
द्यपि स्वप्ने हस्तं प्रसारयसि ।
अस्तु चैवम्, तथापि क्षणभेदाज्जातिभेदो निराकृतः,
मान्यता भी खण्डित हो जाती है कि—ज्ञानका ही धर्म एकत्व और
स्थूलत्व है । अर्थात् ज्ञान ही स्थूलरूपसे भासित होता है, अवयवी
नहीं। तात्पर्य यह है कि स्थूलत्वादि ज्ञानका ही एक आकारविशेष
है—क्योंकि वह आकार भी असत् है ? या बौद्ध है ? अथवा वास्तव
है ? इन तीनके सिवाय अन्य गति नहीं हो सकता। यदि असत् हो
तो उसकी प्रतीति नहीं हो सकेगी। यदि वह भी बौद्ध अर्थात् बुद्धि-
धर्म हो तो अनवस्थादोष आ जाता है, यदि वास्तव हो तो आकारके
वास्तव होनेसे उसका विषय स्थूलत्व भी अपने आप वास्तव सिद्ध हो
जायगा । और स्थूलत्वके वास्तव होनेसे अवयवी भी अनायास सिद्ध
हो जायगा ।
एव, जब कि प्रत्येक परमाणु अतीन्द्रिय है, तब वे मिलितरूपमे भी
कैसे दिखाई पड़ेंगे ? क्योंकि अतीन्द्रियका समूह भी अतीन्द्रिय ही
होगा। यदि कहो कि—समुदित अवस्थामे वे इन्द्रिय द्वारा प्रत्यक्ष होने
योग्य पैदा होते है, इसलिए उनका प्रत्यक्ष होता है—तो क्यों कभी भी
स्वप्नमें हाथ फैला रहे हो । अर्थात् अतीन्द्रिय परमाणुओंसे ऐन्द्रियक
परमाणु समूह तभी पैदा हो सकता है, यदि पदार्थ क्षणिक हों। किन्तु
क्षणिकवाद तो खण्डित हो चुका है। अतः ऐसा कहना सपनेमे मिथ्या
द्रव्य लेनेके लिए हाथ फैलानेके समान है।
अथवा क्षणिकत्व रहे, फिर भी वह परमाणुसमूह अग्रिम क्षणमे
प्रत्यक्ष होनेके योग्य कुर्वद्रूपत्व नामक जातिविशेषसे विशिष्ट होकर पैदा
होगा—ऐसा नहीं हो सकता है। क्योंकि जातिसाङ्कर्यदोषसे कुर्वद्रूपत्व
जातिका पूर्वमें निराकरण हो चुका है। यदि तो उक्त (कुर्वद्रूपत्व)
जातिविशिष्ट पैदा न होकर अभिन्नरूपसे पैदा हो, तो भी वही पैदा हो
अथवा उसके सदृश पैदा हो, इससे तत्त्वदृष्टिसे कोई अन्तर नहीं है।