आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Atmatattvaviveka of Udayanacharya
आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबाह्यार्थभङ्गवाद २८३
न च नानादिग्देशव्यापित्वस्यैव महिमेति साम्प्रतम्,
विरोधात् । यदि हि नानादिक्काः परमाणवो देशतयाऽवभासेरन्
नैकतया देशितया चारोप्येरन् । तथा च कस्य नानादिग्दे-
शव्यापिता ? देशिनोऽपरिस्फूर्त्तेः ।
अथ तथात्वेनारोप्येरन्, न नानात्वेन देशत्वेन वाऽवभा-
सेरन्, तथा च कस्य नानादिग्देशव्यापिता ? देशिनोऽ-
यह भी कहना समुचित नहीं है कि—परमाणु-समूहके नाना
दिग्देशमे व्याप्त होनेकी ही यह महिमा है कि वह परमाणुरूपमें न
भासित होकर एक स्थूलरूपमें भासित होने लगता है—क्योंकि नाना
दिग्देशव्यापित्व और स्थूलत्वमे भी परस्पर विरोध ही है । कारण,
आधारभूत दिग्देश भी आपके मतानुसार परमाणुसमूह ही है । ऐसी
परिस्थितिमें आधारभूत वे नाना दिग्देशात्मक परमाणु यदि अपने
नानात्वके साथ देशरूपमें भासित हों तो उनमे एकत्व और स्थूलात्मक
देशित्वका आरोप हो नहीं सकता । तथा वहाँ देशीके रूपमे अर्थात्
उस नाना दिग्देशरूप आधारमे व्याप्त रहनेवाले आधेयके रूपमे किसी
अन्यका भान होता नहीं है । इसलिए नानादिग्देशव्यापित्वकी प्रतीति
किसमे होगी ?
यदि आधारभूत नानादिग्देशात्मक परमाणुओंमे ही एकत्व और
स्थूलात्मक देशित्व ( आधेयत्व ) का आरोप हो तो भी नानादिग्देशव्या
पित्व किसमे गृहीत हो सकेगा ? क्योंकि वहाँ नानादेशरूपमे किसीका
भान ही नहीं होता है । कारण, देश तो देशीके रूपमें भासित हो
रहा है ।※ इसलिए परमाणुसमुदायमे एकत्वारोप करनेपर भी उसमें
१. देशानामपरि० इति २ पु० पा०
※ यहाँ घटादि परमाणुको देशी और भूतलादि परमाणुको देश नहीं कह
सकते, क्योंकि भूतलादिमे भी तो एकत्व और स्थूलत्वकी प्रतीति घटके
समान ही होती है । अत उसके लिए पृथक् देश देशीकी कल्पना
आवश्यक हो जायगी । यदि उक्त दोषके कारण नानादिग्देशव्यापित्वको
एक परिमाणविशेष मानो तो यह परिमाणविशेष एक परमाणुमें नही
रह सकता । अत उसका आश्रयभूत अवयवी सिद्ध ही हो गया ।