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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 336, कुल 530 में से

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पृष्ठ 336

बाह्यार्थभङ्गवादः २८७
स्थौल्यं तद्विपर्यय एव सूक्ष्मता, विततदेशानामपि प्रत्यक्षत्व-
प्रसङ्गात् । नैरन्तर्यमपि विवक्षितमिति चेन्न, तस्य प्रकृतेऽप्य-
संभवात्, रूपपरमाणूनां रसादिपरमाणुभिरन्तरितत्वात् । न
चारोप्येत नैरन्तर्यम्, इतरेतराश्रयप्रसङ्गात्, नैरन्तर्यारोपे तेषां
स्थूलानां ग्रहणं तद्ग्रहणे च सति नैरन्तर्यारोप इति ।
तस्मादैन्द्रियकत्वे स्थूलतायाः प्रयोजकत्वात्, अप्रयोज-
कत्वे विततदेशानामपि प्रत्यक्षत्वप्रसङ्गात्, तेषां च प्रत्येक-
मस्थूलत्वादतीन्द्रिया एव परमाणवः । तथा च सर्वाग्रहणमव-
यव्यसिद्धेरिति ।
है और बहुत्वका विपर्यय ही सूक्ष्मता है—क्योंकि तब छिटपुट जगहों-
में फैले हुए भी परमाणुओंका प्रत्यक्ष होने लगेगा। यदि कहो कि—
प्रत्यक्षके लिये परमाणुओंका नैरन्तर्य भी (बिना व्यवधानके परस्पर
सटे रहना भी) अपेक्षित है—तो ऐसा नहीं कह सकते। क्योंकि
प्रकृतमें वैसा होना भी असम्भव है। कारण, रूपके परमाणु अवश्य
ही रसादिके परमाणुओंसे अन्तरित (व्यवहित) होंगे। एवं उनमें
नैरन्तर्यका आरोप भी नहीं हो सकता है। क्योंकि तब अन्योन्याश्रय-
दोषका प्रसङ्ग हो जायगा। जैसे—नैरन्तर्यका आरोप हो तो उनमें
स्थूलताका ग्रहण हो और स्थूलताका ग्रहण होनेपर ही नैरन्तर्यका आरोप
हो सकेगा।
इसलिये ऐन्द्रियक होनेमें स्थूलता प्रयोजक है। यदि स्थूलता
प्रयोजक न हो तो छिटफुट जगहोंमें फैले हुये भी परमाणुओंका प्रत्यक्ष
होने लगेगा। वे प्रत्येक परमाणु अस्थूल हैं, इसलिये वे अतीन्द्रिय ही
हैं। इसी बातको परमर्षि गौतमने न्यायदर्शनके "सर्वाग्रहणम् अव-
यव्यसिद्धेः" इस सूत्रसे दृढ किया है। इस सूत्रका अभिप्राय यह है
कि—यदि अवयवी न माना जाय तो संसारकी सभी वस्तु अप्रत्यक्ष हो
जायगी और जगत्में आन्ध्य फैल जायगा।