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आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

११६ आत्मतत्त्वविवेके
भेदाग्रहादेकत्वमात्रमनुसन्धीयत इति चेत्, न, मायिकस्य
भेदस्याभावात्, भावे वा काल्पनिकत्वस्य व्याघातात् । पर-
मार्थोऽसतः परमार्थाभेदपर्यवसायित्वात् । आरोपितस्याग्रहा-
नुपपत्तेः, अभेदारोपानवकाशाच्च । आरोपितासत्त्वस्य परमार्थ-
सत्त्वप्रसङ्गात् चतुष्कोटिविनिर्मुक्तस्य चातिप्रसञ्जकत्वात्, तद्ग्र-
हस्य त्रैलोक्येऽपि सुलभत्वात् ।
यदि कहो कि—सविकल्पकज्ञानके विषय जो अलीक व्यक्ति, उनमें
परस्पर भेदका ज्ञान नहीं होनेसे एकत्वमात्र की प्रतीति होती है । इस-
लिये 'गौ गौ' ऐसे अनुगत भानके लिये कोई गोत्वादिसामान्य मानना
आवश्यक ही है—तो ऐसा नहीं कह सकते हो । क्योंकि उन
अलीक व्यक्तियोंमें वास्तविक भेद नहीं है । यदि उनके भेद वास्तविक
होवें तो उनका स्वयं अलीक होना व्याहत होगा । अर्थात् जो स्वयं
अलीक है, उनका भेद कभी वास्तविक हो नहीं सकता ।
यदि कहो कि—अलीकगत भेद वास्तविक नहीं है किन्तु अलीकमें
भेदकी असत्ता ही वास्तविक है—तो अलीक कही जानेवाली उन
व्यक्तियोंमें वास्तविक अभेद पर्यवसित हो जायगा और वह उन
व्यक्तियोंमें एक सामान्यरूपता (जाति) का ही साधक होगा ।
यदि अलीकमें परस्पर आरोपित भेद हो तो उस भेदका अग्रह नहीं
बन सकता, क्योंकि ग्रह ही आरोप है । ऐसी स्थितिमें भेदके अग्रहके
कारण आपने उन व्यक्तियोंमें एकत्व (अभेद) का प्रतीत होना बताया
था, उसे भी यहाँ अवसर नहीं मिल सकता है ।
यदि कहो कि—विभिन्न व्यक्तियोंमें भेदकी असत्ताका आरोप हो
जानेसे उनमें अभेद प्रतीत होने लगता है—तो जब भेदकी असत्ता
आरोपित है, तब सुनिए भेदकी सत्ता पारमार्थिक (वास्तविक) हो-
जायगी, और जिनके भेद वास्तविक होंगे, वे व्यक्ति भी वास्तविक ही
हो जायेंगे, आपके मतानुसार अलीक नहीं हो सकते ।
यदि कहो कि—न भेद वास्तविक है और न उसकी असत्ता ही
वास्तविक है, एवं भेद न आरोपित ही है और न उसकी असत्ता ही

क्षणभङ्गवादः १९०
'अन्यत्र पारमार्थिकभेदप्रतीतौ कथमभेद आरोप्यतामिति
चेत्, एतत्तर्हि यस्य प्रतिभासे यन्नारोप्यते, नियमेन तस्यैवा-
प्रकाशे तदारोप्यम्, न तु तन्नामकमात्रस्य, अतिप्रसञ्जकत्वात् ।
अत एव न व्यधिकरणस्यापि सतोऽसतो वा भेदस्याग्रहोऽ-
भेदारोपोपयोगीति ।
आरोपित है । किन्तु इन चारों प्रकारोंसे अतिरिक्त किसी अलीक भेद-
के ही अग्रहसे व्यक्तियोंमे एकाकारता प्रतीत होती है—तो इस प्रकार-
के सर्वतोभावेन अज्ञात भेदका अग्रह तो त्रैलोक्यमात्रमे सुलभ होनेसे
सारे संसारमे एकाकारता की प्रतीति होने लगेगी ।
यदि कहो कि—अलीक भेदका अग्रह यद्यपि सर्वत्र सुलभ है,
तथापि उन उन वस्तुओमे पारमार्थिक भेदग्रहसे प्रतिबन्ध हो जानेके
कारण सर्वत्र अभेदारोप (एकाकारता-प्रतीति) की आपत्ति नहीं हो
सकती है—तो ऐसी स्थितिमे जिसका भान होनेपर जिसका आरोप
नहीं हो सकता, नियमतः उसीकी अभानावस्थामे उसका आरोप संभव
है, न कि उसके नामधारीमात्र किसी काल्पनिककी अभानावस्थामे
भी । अर्थात् जब अभेदारोपके प्रति पारमार्थिक भेदग्रहको प्रतिबन्धक
मानना आवश्यक है, तब अलीक भेदाग्रहसे अभेदारोप माननेमे
कोई प्रमाण नहीं है । आरोप सम्बन्धी उक्त नियम न माना जाय तो
अतिप्रसङ्गदोष हो जायगा । अर्थात् जिस किसीके भेदका अग्रह
सर्वत्र सुलभ होनेसे सर्वत्र ही अभेदारोप होने लगेगा ।
एवं अतिव्याप्तिदोषके कारण ही सन् या असन् अन्यगतभेदका
अग्रह भी कहीं अभेदारोप होनेमे उपयोगी नहीं हो सकता । अर्थात्
अन्यगत भेदाग्रहसे अन्यत्र अभेदारोप माना जाय तो सर्वत्र अभेदारोपकी
आपत्ति हो जायगी । इस प्रकार घटपटके वास्तविक भेदका अग्रह
होनेसे तथा अलीक शशशृङ्ग और कूर्मरोमके अवास्तविक भेदका अग्रह
होनेसे भी गौ अश्व आदि उदासीन अधिकरणोंमे अभेदारोप

११८ आत्म... १५३
नापि न्यायादन्यापोहसिद्धिः, तदभावात् । यद् भावा-
भावसाधारणं¹ तदन्यव्यावृत्तिनिष्ठम्, यथाऽमूर्त्तत्वम्; यच्चा-
त्यन्तविलक्षणानां सालक्षण्यव्यवहारहेतुस्तदन्यव्यावृत्तिरूपम्
इति न्यायौ स्त इति चेत्, न, कालात्ययापदेशात् । न हि
प्रथमानस्य निष्ठा² न्यायसाध्या नाम । प्रथनशरीरं तु
चिन्तितमेवेति निष्फलः प्रयासः ।
न्याय (अनुमान) द्वारा भी अन्यापोह (अतद्व्यावृत्ति) की सिद्धि
नहीं हो सकती है, क्योंकि वैसे अनुमानका अभाव है ।
यदि कहो कि—जो भाव-अभावसाधारण होता है, वह अन्यकी
व्यावृत्तिस्वरूप होता है, जैसे अमूर्तत्व । अर्थात् अमूर्तत्वधर्म अभावमें
तथा आकाश आदि भावमे भी रहता हुआ भावाभावसाधारण होनेसे
मूर्तकी व्यावृत्तिस्वरूप है । ऐसे ही गोत्व भी गोके भाव (सत्ता) मे रहता
है तथा गोका अभाव हो जानेपर भी रहता है, इस प्रकार भावाभाव-
साधारण होनेके कारण गोत्व भी अन्यव्यावृत्तिस्वरूप ही होगा । एव
जो अत्यन्त विलक्षणोंमें भी समानता-व्यवहारका हेतु है, वह अन्य-
व्यावृत्तिरूप होता है, जैसे वही अमूर्तत्व । अर्थात् काल आकाशादि
कई परस्पर विलक्षण पदार्थोंको अमूर्तत्वधर्म समानरूपमें विदित कराता
है, इसलिये अमूर्तत्वधर्म मूर्तकी व्यावृत्तिस्वरूप है । गोत्व भी
परस्पर विलक्षण नाना गौओंमें समानताव्यवहारका हेतु है, इसलिये
गोत्व अन्यव्यावृत्तिरूप है । ये दो अनुमान अन्यापोहके साधक हैं—
तो यह नहीं कह सकते । क्योंकि ये अनुमान बाधित हैं । कारण,
प्रत्यक्षवस्तुका स्वरूपनिर्णय अनुमानद्वारा नहीं होता । प्रत्यक्षके
सम्बन्धमें तो विचार किया जा चुका है कि गोत्व आदिका साक्षात्कार
विधिरूपमें ही होता है न कि निषेध (अतद्व्यावृत्ति) रूपमें ।
इसलिये अनुमानद्वारा आपका अन्यापोहसाधनका प्रयास निष्फल
है । क्योंकि जब जलमें अनुष्णत्वधर्म वास्तविक है और उसका
१ अभावाभावसाधारण्यमस्तिनास्तिप्रत्ययविषयत्वमाश्रयनाशानाशयोऽप्य-
नाशिस्वमिति शङ्करमिश्र ।
२ निष्ठा-स्वरूपम्

यदा चानलीक एव ध्रुवं न्यायस्यानुभवाभासः, तदा कैव
कथाऽलीके । न हि तस्याप्रतीयमानमपि किञ्चिदस्ति, यन्न्या-
येन साध्यमित्युक्तम् ।
किञ्चेदं भावाभावसाधारण्यं न तावदुभयरूपत्वं, विरो-
धात् । न तद्धर्मत्वमनभ्युपगमात् । नहि गोत्वमभावस्यापि
धर्म इत्यभ्युपगम्यते । न तद्धर्मित्वमनैकान्तात् । व्यक्तिरपि
भावाभावधर्मशालिनी न निषेधैकरूपेति ।
न तदुभयसादृश्य¹मसम्भवात् । अतन्निवृत्त्यैव तथात्वे
साध्याविशेषात् ।
अग्निमें साधन करनेवाला अनुमान निश्चितरूपसे आभास होता है, तो
जो अगोव्यावृत्ति स्वरूपत अलीक (मिथ्याभूत) है, उसे सिद्ध करने
वाले आपके अनुमानके आभास होनेमे क्या कहना है ? और उस
अलीकका कोई ऐसा स्वरूप नहीं है, जो प्रत्यक्षद्वारा प्रतीयमान न होता
हुआ भी वास्तविक हो तथा जिसे अनुमानसे सिद्ध किया जा सके ।
यह बात पहले कही जा चुकी है ।
एवं गोत्वादि के भावाभावसाधारण होनेका क्या अभिप्राय है ?
भाव - अभाव उभयस्वरूप होना अभिप्राय नहीं हो सकता है । क्योंकि
भाव-अभावके परस्परविरोधी होनेके कारण कोई वस्तु उभयरूप
नहीं हो सकती है । भाव-अभावका धर्म है गोत्वादि, यह अभिप्राय
नहीं हो सकता । क्योंकि गोत्व भावका धर्म होनेपर भी अभावका
धर्म नहीं माना जाता है । भाव-अभावका धर्मी होना भी अभिप्राय
नहीं हो सकता । क्योंकि आपका अनुमान व्यभिचारी हो जायगा ।
कारण, व्यक्ति भी भाव अभावका धर्मी है फिर भी वह आपके मतमें
भी केवल निषेध (अन्यव्यावृत्ति) रूप नहीं है। इस प्रकार हेतुके
रहनेपर भी साध्य नहीं होनेसे व्यभिचार हो गया ।
गोत्वका भावाभावके सदृश होना भी भावाभावस धारण नहीं है,
१ सादृश्य = सादृश्यस्वरूपत्वम् । असंभवात् = अभावावृत्तित्वेन समात्व'-
संभवात्, उभयवृत्तेरेव धर्मस्य सादृश्यत्वात् इति रघुनाथः ।

१२० आत्मतत्त्वविवेके
नाप्यस्तिनास्तिसामानाधिकरण्यं, विरोधात् अन्यथा-
क्योंकि भाव और अभाव दोनोंका सादृश्य गोत्वमे असम्भव है । यदि
अतद्व्यावृत्तिरूप होनेसे गोत्वमे अभावका भी सादृश्य सम्भव ही है तो
फिर साध्य और हेतुमें कोई विशेषता नहीं होनेसे अनुमान ही नहीं हो
सकता है ! अर्थात् गोत्वको अतद्व्यावृत्तिस्वरूप सिद्ध करनेके लिये
दिया गया जो भावाभावसादृश्यरूप हेतु है, उसमे अतद्व्यावृत्ति गर्भित
है । ऐसी स्थितिमे अतद्व्यावृत्ति सिद्ध करनेके लिये अतद्व्यावृत्ति
ही हेतु कैसे बन सकती है ?
अथवा यहाँके पूर्वपक्ष और उत्तरपक्षका यह अभिप्राय है—"भाव-
अभाव उभयका सादृश्य" रूप होना ही गोत्वमे भावाभावसाधारण्य है"
यह नहीं कह सकते । क्योंकि सादृश्य उभयगत धर्म होता है । जैसे
चन्द्र और मुखका सादृश्य चन्द्ररूप प्रतियोगी और मुखरूप अनुयोगी
दोनों हीमे रहता है । गोत्व भाव और अभाव दोनोंका सादृश्यरूप तब
होता, यदि वह भावरूप प्रतियोगी और अभावरूप अनुयोगी दोनों ही मे
रहता । गोत्व तो भावमात्रमें ही रहता है, इसलिये उभयनिष्ठ नहीं होने
से वह उभयसादृश्यरूप नहीं हो सकता है ।
यदि कहा कि—गोत्वका उभयसादृश्यस्वरूप होना असम्भव तब होता
यदि वह भावपदार्थ होता । किन्तु ऐसी बात नहीं है । वह तो गौसे
अन्य जो महिषादि उसकी व्यावृत्तिस्वरूप है । और यह महिषादि
व्यावृत्ति जैसे गवादिस्वरूपमें है, वैसे ही स्वरूपहीन अभावमे भी है।
ॅके अभाव महिष थोडे ही है ? इस प्रकार गोत्वको भावाभाव
ॅ माननेमें कोई असम्भावनादोष नहीं है—तो—ऐसा
ॅान पर हेतु और साध्यमे कोई विशेषता नहीं रह जाती है ।• क्योंकि
अतद्व्यावृत्तिस्वरूप होनेसे गोत्व भाव अभाव उभयसादृश्यरूप होकर
भावाभाव उभयका साधारण धर्म बनेगा और तब उसे (गोत्व का)
अतद्व्यावृत्तिस्वरूप सिद्ध किया जा सकेगा । ऐसी स्थितिमे साधन
(हेतु) का साध्यसे कोई अन्तर नहीं रहनेसे उक्त अनुमान नहीं
हो सकेगा ।
यह भी नहीं कह सकते कि—गोत्वका 'अस्तिनास्ति' प्रतीतिका

क्षणभङ्गवाद । १९२१
सिद्धेश्च । न हि यदस्ति तदेव नास्तीति प्रत्ययगोचरः स्यात् ।
प्रकारान्तरमाश्रित्य स्यादेवेति चेत्, एवं तर्हि तमेव प्रकारभेद-
मुपादाय विधिव्यवस्थायां को विरोधो येन प्रतिबन्धः सिध्येत् ।
तस्य विधिरूपतायामस्ति नाम¹ किमधिकमुपनेयमिति
चेत्, निषेधरूपत्वेऽपि नास्ति नाम² किमधिकमुपनेयमिति
विषय होना ही भाव अभाव उभयसाधारण होना है—क्योंकि विरोध
होगा और अन्यथासिद्धि भी। विरोध इसलिये कि जो वस्तु "अस्ति"
प्रतीतिका विषय होगी, वही "नास्ति" प्रतीतिका विषय नहीं हो सकेगी।
अन्यथासिद्धि इसलिये कि यदि प्रकारान्तरका आश्रयण कर वही वस्तु
"अस्ति नास्ति" उभयप्रतीतिका विषय हो सकती है। अर्थात् गौरूप
आश्रयका नाश होनेपर गोत्व "नास्ति" प्रतीतिका विषय हो सकता है
और उस आश्रयकी अनाशावस्था मे "गोत्व" अस्ति प्रतीतिका विषय हो
सकता है—तो इस प्रकारसे गोत्वको विधिरूप माननेमे ही क्या विरोध
है, कि आपकी उक्त व्याप्ति सिद्ध हो और तदनुसार गोत्व अगोपोह
(अगोव्यावृत्ति या अगोनिषेध) रूप माना जाय।
यदि कहो कि—गोत्व यदि विधिरूप हो तो "गोत्वम् अस्ति" यहाँ
विधिवाचक अस्तिशब्दके उच्चारणमे पुनरुक्तिदोष हो जायगा तथा
गोत्वके साथ नास्तिशब्दके उच्चारणमे विधि निषेधका परस्पर विरोध
भी हो जायगा—तो मैं भी कह सकता हूँ कि गोत्व यदि अन्यका निषेध
रूप हो तो "गोत्व नास्ति" यहाँ नास्तिशब्दके उच्चारणमे भी पुनरुक्ति
दोष हो जायगा और निषेधस्वरूपके साथ अस्ति शब्दके उच्चारणमे
निषेध और विधिका परस्पर विरोध भी हो जायगा।
यदि कहो कि—विधि या निषेध किसी एक स्वरूप माननेमें ही उक्त
विरोध और पुनरुक्ति दोष होते हैं, इसलिये तो गोत्वादिधर्म को
उभयसाधारण मानना चाहिये—तथापि उभयसाधारणका अर्थ यदि
उभयस्वरूप रखो तो भी असम्भव है। क्योंकि कोई भी पदार्थ परस्पर
१ अस्तिना किमिति रघुनाथशिरोमणिसम्मतं पाठ ।
२ नास्तिना किमिति रघुनाथशिरोमणिसम्मत पाठ ।

२२२ आत्मतत्त्वविवेके
समानम् । अतएव साधारण्यमिति चेन् , तथापि किं तदुभया-
त्मकत्वमुभयपरीहारो वेत्यशक्यमेतत् ।
तस्मादस्तिनास्तिभ्यामुपाध्यन्तरो१पसम्प्राप्तिः प्राप्तोपा-
धिनियमो वेति सार्थक्त्वं तयोः । तदेतद् विधावपि तुल्यम् ।
शान्ताशेषविशेषत्वादलीकपक्षे क्वोपाध्यन्तरविधिरतन्नियमो२
वेति विशेषदोषः ।
ततो गोशब्दो गोत्वविशिष्टव्यक्तिमात्राभिधायी पर्यव-
सितः । तास्तु विप्रकीर्णदेशकालतया नार्थक्रियार्थिप्रार्थना-
मनुभवितुमीशत इति प्रतिपत्ता विशेषाकाङ्क्षः । सा च
विरोधीस्वरूप नहीं हो सकता । उभयसाधारणसे यदि उभयका परिहार
(निषेध) अर्थ लो तो भी वही असंभव दोष है । क्योंकि भावके
निषेधमें अभावरूपता और अभावके निषेधमें भावरूपता आ
जानेसे फिर वही विरोधी स्वरूपता प्राप्त हो जाती है, जो असंभव है ।
इसलिये "अस्ति" पद देशविशेषमें वर्तमानत्वको उपस्थित करता
हुआ और "नास्ति" पद देशविशेषमें वर्तमानत्वका निषेध बोधित
कराता हुआ सार्थक होता है । यह बात गोत्वको विधिरूप माननेमें भी
हो जायगी । बल्कि तुम्हारे अलीकपक्षमें ही, जहाँकि सम्पूर्ण विशेषों
(देशविशेष और कालविशेष) का आत्यन्तिक अभाव है, अस्तिपदके
योगसे किस देशविशेषमें वर्तमानत्व सूचित होगा और नास्तिपदके
योगसे किस देशविशेषमें वर्तमानत्वका निषेध बोधित होगा ? यह
विशेष दोष हो जाता है ।
इसलिये गोशब्द गोत्वविशिष्ट सम्पूर्ण गोव्यक्तियोंका अभिधान करता
है । और वे गोव्यक्तियां विभन्न देश और कालमें बिखरी हुई होनेसे
दोहन आदि प्रयोजन चाहनेवाले व्यक्तिकी प्रवृत्तिका विषय नहीं बन
१ उपाध्यन्तरम् = देशकालदशावस्थारूपम्" तस्याप्राप्तौ प्रापणं प्राप्तौ तु
नियमनमिति रघुनाथ ।
२ स्तन्निरोध इति क्वचित् पाठ•

तस्याकाङ्क्षाऽस्ति गोष्ठे कालाक्षी धेनुर्घटोध्नी महाघण्टा
नन्दिनी' त्यादिभिर्नियामकैर्विधायकैर्वा निवार्यत' इति विधौ
न कश्चिद् दोषः।
गोत्वविशिष्टसदसद्व्यक्तिमात्रप्रतीतेस्तदेवास्त्यादिपदप्र-
योगवैफल्यमिति चेत्, तावन्मात्रप्रतिपत्त्यर्थमेव तत्। अनेक-
प्रतिपत्त्यर्थन्तु तदुपयोगः, तस्य प्रागप्रतीतेरित्युक्तम्।
यस्तु निपुणम्मन्यो विकल्पमेव पक्षयति स्म—यज्ज्ञानं
यद्भावाभावसाधारणप्रतिभासं, न तेन तस्य विषयत्वम्,
सकती। अत वह व्यक्ति दोहनादि प्रयोजनके निमित्त विशेष गौकी
आकाङ्क्षा करता है। और उसकी वह आकाङ्क्षा “गोठे (गोशाला)
में काली आसवाली, घटके समान थनवाली तथा बड़ा घण्टावाली
नन्दिनी नामकी धेनु है” इन नियामक या विधायक विशेषणोंसे निवृत्त
होती है। इस प्रकार विधिपक्षमे कोई दोष नहीं है।
यदि कहो कि—गोशब्द ही गोत्वसे युक्त सत् या असत् गोव्यक्ति-
मात्रकी प्रतीति कराता है। इसलिये फिर वही अस्ति-नास्तिपदोंके
प्रयोगकी निष्फलता आ जाती है—तो यह कहा जा चुका है कि अभिन्न
रूपसे सम्पूर्ण गोव्यक्तिको बतलानेवाला गोशब्द है और भिन्न भिन्न
रूपमे गोव्यक्तियोंको बतलानेके लिये अस्ति आदि विशेषणपदोंका
उपयोग है। क्योंकि विशेषणपदोंके प्रयोगके पूर्व गोव्यक्तियोंकी
विभिन्नताकी प्रतीति नहीं होती।
ज्ञानश्रीसम्मत विकल्पपक्षक अनुमानका खंडन
(पूर्वपक्ष) जो तो अपनेको निपुण मानता हुआ सविकल्पक ज्ञानको ही
पक्ष बनाता है। क्योंकि गोत्वको पक्ष बनाकर उसमें अन्यव्यावृत्तिरूपता
सिद्ध करनेपर बाध या आश्रयासिद्धि दोष हो जाता है। कारण, विधि-
रूपसे प्रतीयमान गोत्व पक्ष बने तो बाध होगा, क्योंकि उसमें अन्यव्या-
वृत्तिरूपता बाधित है। यदि अतद्व्यावृत्तिरूपगोत्व पक्ष बने तो नैयायिक
१ निवर्त्यत इति शङ्करमिश्रसम्मत पाठः।

०१७४। आत्मतत्त्वविवेके
यथा गोज्ञानस्याश्वेनेत्यादि । तद्यदि गोविकल्पस्याश्वाविष-
यत्वमेव तद्भावाभावसाधारण्यं गव्यपि बाह्ये तथा, ततः
साध्यविशिष्टत्वम् ।
अथास्त्यादिविशेषाकाङ्क्षा, तदाऽसाधारण्यम् । न ह्युदा-
हृतो गोविकल्पोऽनास्त्यादिविशेषमाकाङ्क्षति । नियम-
की दृष्टिसे आश्रयासिद्धिदोष होगा, क्योंकि नैयायिक गोत्वको अतद्-
व्यावृत्तिरूप नहीं मानता है । इन्हीं दोषोंसे बचनेके लिये जो-कोई
(ज्ञानश्री प्रभृति) गोत्वको पक्ष न बनाकर सविकल्पक ज्ञानको ही
पक्ष बनाता है ।
जैसे—जो ज्ञान, जिस वस्तुके भाव और अभाव दोनों ही दशाओंमें
होता हुआ भासित होता है, उस ज्ञानका वह वस्तु विषय नहीं बनती
है । जैसे, गोज्ञान अश्वके होने या न होने दोनों ही अवस्थाओंमें होता
है तथा अश्व उसका विषय नहीं बनता । वैसे ही, गोज्ञान गोव्यक्तिके
भी भाव और अभाव उभय दशामें होता हुआ अनुभवमें आता है,
इसलिये गोज्ञानका बाह्य गो भी विषय नहीं बनती है ।
(उत्तरपक्ष) तो यहाँ दृष्टान्तभूत गोज्ञानके अश्वभावाभावसाधारण्य
का अभिप्राय यदि गोज्ञानका अश्वको अपना विषय न बनाना ही हो तो
दाष्टान्तपक्षमें भी गोज्ञानमें बाह्यपदार्थ गौके भावाभावसाधारण्यका भी
यही अभिप्राय होगा कि बाह्य गौ गोज्ञानका विषय नहीं बनती है । ऐसी
स्थितिमें साध्य और साधन एक ही हो जाता है । अतः सविकल्पक
ज्ञानको पक्ष बनाकर किया हुआ अनुमान भी नहीं हो सकता है ।
अर्थात्—गोज्ञान बाह्यगोविषयक नहीं है, क्योंकि यह बाह्यगोभावाभाव-
साधारण है, [अर्थात् बाह्यगोविषयक नहीं] है यहाँ जो ही साध्य है,
वही साधन (हेतु) रूपमें उपस्थित किया गया है । इस प्रकार साध्य
समदोष होनेसे उक्त अनुमान नहीं हो सकता है ।
यदि कहो कि—विकल्पके भावाभावसाधारण होनेका अर्थ है, उस
वस्तुमें अस्तित्व नास्तित्व, आदि विशेष प्रकारकी आकाङ्क्षा उठाना ।
अर्थात् "जिस ज्ञानके होनेपर जिस वस्तुमें-है, या-नहीं है, इस प्रकार
की विशेष आकाङ्क्षा उठती है, वह वस्तु उस ज्ञानका विषय नहीं होती

क्षणभङ्गवाद १२५

विधौ तु विरोध एव। न ह्यतद्विषयस्य तद्विशेषनियम-
काङ्क्षा नाम, गोज्ञानस्यापि विशेषनियमाकाङ्क्षाप्रसङ्गात्।
तदीयसदसत्त्वानुपदर्शनं चेत्, तत् यदि स्वरूपमेव, ततोऽ-
है" इस प्रकारकी व्याप्ति यहां विवक्षित है। इस व्याप्तिके अनुसार प्रकृत
प्रसङ्गमें अनुमानका आकार यह होगा—जैसे, गोज्ञान होनेपर अश्वके
विषयमें अस्तित्व-नास्तित्वकी आकाङ्क्षा (जिज्ञासा) उठती है, इसलिये
उस ज्ञानका विषय अश्व नहीं होता है। वैसे ही गोज्ञान होनेपर गौमे
भी अस्ति नास्तिकी आकाङ्क्षा उठती है, इसलिये गौ भी गोज्ञानका
विषय नहीं है—तो आपका यह अनुमान असाधारणनामक हेत्वाभाससे
ग्रस्त है। क्योंकि गोज्ञानसे अश्वमें अस्ति नास्तिकी आकाङ्क्षा ही
नहीं उठती है। इसलिये दृष्टान्तहीन होनेसे उक्त अनुमान असाधारण-
दोषसे ग्रस्त है। साथ ही यहाँ भागासिद्धिदोष भी होगा, क्योंकि
सभी गोविकल्प (गोज्ञान) अस्तिआदिकी आकाङ्क्षाके उत्थापक नहीं
होते हैं। इसके अतिरिक्त विरोध दोष भी होगा, क्योंकि जो जिस
ज्ञानका विषय ही नहीं होगा, उसमे वह ज्ञान अस्तिआदिकी आकाङ्क्षाका
उत्थापक कदापि नहीं होता है।
यदि कहो कि—सामान्यत अस्तित्वादिकी आकाङ्क्षाका उत्थापन यहाँ
अभिप्रेत नहीं है, किन्तु देश कालादिविशेषसे नियत अस्तित्वादि
आकाङ्क्षाका उत्थापन ही हेतु है। अर्थात् गोज्ञानका विषय गौ नहीं
होती है, क्योंकि गोज्ञान देशकालादिविशेषसे नियत अस्तित्व आदि
आकाङ्क्षाका उत्थापक होता है—तो इस अनुमानमे विरोधदोष है।
क्योंकि जो वस्तु उस ज्ञानका विषय ही नहीं होगी, उस वस्तुमें 'बाहर
है या भीतर है' इत्यादि विशेष नियमकी आकाङ्क्षा उस ज्ञानसे हो नहीं
सकती। अन्यथा गोज्ञान होनेपर अश्वमे भी "आज, कल, बाहर या
भीतर है" इत्यादि देशकालविशेषसे नियत अस्तित्वादिकी आकाङ्क्षा
होने लगेगी।
यदि कहो कि—जो ज्ञान जिस वस्तुके सत्त्व या असत्त्वको नहीं
बताता है, उस ज्ञानका वह वस्तु विषय नहीं होती है—तो बताओ
कि सत्त्व या असत्त्व वस्तु (धर्मी) स्वरूप है? या उस वस्तुसे

१२६ आत्मतत्त्वविवेके
सिद्धिदोषः। न हि गोविकल्पो गोस्वरूपं¹ नोपदर्शयतीति
मम कदापि सिद्धम् । तव चाद्यापि । उपाध्यन्तरं³ चेदने-
कान्तः। न हि यो यस्योपाध्यन्तरं नोपदर्शयेत्, नासौ
तदपीति⁴ नियमः ।
ननु नियम एव । तथाहि—यन्न यत्समवेतधर्मबोधन-
तन्न तत्स्वरूपबोधनम्, यथा गोविकल्पशब्दौ तुरगे, तथा च
तौ गव्यपि नीलत्वाद्यपेक्षयेति व्यापकानुपलब्धिः । धर्मिबोधे
भिन्न उसकी उपाधि (धर्म) स्वरूप है ? यदि वस्तुस्वरूप मानो तो
उक्त हेतु स्वरूपासिद्ध है। क्योंकि मैं यह कभी नहीं मानता कि गोज्ञान
गोस्वरूपको नहीं बताता है। और तुम भी इसे अबतक भी नहीं
सिद्ध कर सके हो। यदि सत्त्वासत्त्वको वस्तुका एक भिन्न धर्मस्वरूप
मानो—तो उक्त नियम व्यभिचारी है। क्योंकि यह नियम नहीं है
कि जो ज्ञान जिस वस्तुके धर्मको न बतावे, वह उस वस्तुको भी नहीं
बताता है। क्योंकि धर्मज्ञानकी सामग्री भिन्न होती है, और धर्मिज्ञान-
की सामग्री भिन्न।
(पूर्वपक्ष) इस प्रकारका तो नियम अवश्य है कि जो जिस वस्तुके
समवायसम्बन्धसे सम्बद्ध धर्मको नहीं बताता, वह उस वस्तुके स्वरूप-
को भी नहीं बताता है। जैसे, गोज्ञान और गोशब्द अश्वसमवेत धर्म-
को नहीं बताते हैं, इसलिये अश्वस्वरूपको भी नहीं बताते । वैसे ही
गोज्ञान और गोशब्द गौमें भी नीलत्वादिधर्मकी प्रतीति नहीं कराते हैं,
इसलिये गोस्वरूपको भी नहीं बता सकते हैं। क्योंकि व्यापकधर्म-
की अप्रतीति होनेसे व्याप्यकी भी अप्रतीति स्वतः सिद्ध है।
धर्मीका बोध होनेपर भी धर्मोंमें किसीका बोध होना और किसीका
नहीं होना, यह नियम उपकारभेदसे सम्भव होता। और उपकारभेद
१ स्वरूपमेव इति १ पु० पा०
२ चाद्यापि इति १ पु० पा०
३ चेत्तदा इति १ पु० पा०
४ तमपीति इति १ पु० पा०

ऽपि हि धर्माणां कस्यचिद् बोधः कस्यचिदबोधश्चे¹त्युपकार-
भेदान्नियमः स्यात्, उपकारभेदश्च शक्तिभेदाद् भवेत्, न चैवं
प्रकृते, अनवस्थाप्रसङ्गात् । ततः² शक्तेरभेदादुपकाराभेदे
सर्वोपाधिसहितबोधोऽबोधो वेति द्वयी गतिरिति प्रतिबन्ध-
सिद्धिः ।
दुष्प्रयुक्तमेतत्—उपाधितद्वतां भेदे प्रतिनियतसामग्री-
बोध्यत्वादेव तद्यौगपद्ये बोधाबोधोपपत्तेः । प्रतिनियतसामग्री-
बोध्यत्वस्यापि स्वभाववैचित्र्यनिबन्धनत्वात् । तस्यापि स्व-
कारणाधीनत्वात् । तस्याप्यन्वयव्यतिरेकसिद्धत्वात् । तस्यापि
कार्योन्नेयत्वादिति ।
यत्तु शक्तेरभेदादित्यादि, तत्तदा शोभेत यदि धर्मिमात्रा-
भी ग्राहकसामग्रीगत शक्तिके भेदसे संभव होता । किन्तु ऐसा नहीं हो
सकता है । क्योंकि शक्तिभेदका भी कारण यदि दूसरा दूसरा शक्तिभेद
हो तो अनवस्थादोष हो जायगा । इसलिये यहां शक्तिभेद नहीं होनेसे
धर्मीमे किसी प्रकारका उपकारभेद भी नहीं हो सकता है । अत या तो
सम्पूर्ण धर्मोंके साथ धर्मीका बोध होगा या धर्मीका बोध ही न होगा,
यह दो ही गति है । इस प्रकार उक्त नियमकी सिद्धि हो जाती है ।
( उत्तर पक्ष ) आपद्वारा प्रयुक्त उक्त नियम ठीक नहीं है । क्योंकि
उपाधियों और उपाधिमान् ( धर्मी ) का परस्परमे भेद होनेके और
सभीके अपनी अपनी नियत सामग्रीसे बोध्य होनेके कारण सबका
एक साथ बोध न होकर किसी धर्मका बोध होगा और किसीका
नहीं होगा । अपनी अपनी नियत सामग्रीसे बोध होनेमें भी स्वभाव-
की विचित्रता ही हेतु है । और स्वभाव विचित्रता अपने अपने कारण-
के अधीन है । अपने अपने कारणका निर्धारण अन्वय और व्यतिरेकसे
होता है तथा अन्वयका ज्ञान भी कार्य देखकर किया जाता है ।
१ दबोध इत्यु० इति १ पु० पा०
२ तन्न इति २ पु० पा०

१२८ आत्मतत्त्वविवेकः
धीनस्तद्बोधमात्राधीनो¹ वा तन्मात्रबोधसामग्र्यधीनो वा
यावदुपाधिभेद² बोधः स्यात्, न चैवम्।

  • एतेन भेदाद् धर्मिणः प्रतीतावपि शब्दलिङ्गद्वारा धर्माणां
    चेदप्रतीतिः, इन्द्रियद्वाराऽपि मा भूदित्यादिकं तु कर्णस्पर्शे
    कटिचलनमपास्तम्। तत्तदुपाध्युपलम्भसामग्रीविरहकाले
    प्रसञ्जितस्येष्टत्वात्। विचित्रशक्तित्वाच्च प्रमाणानाम्। लिङ्गस्य
  • जो तो यह कहा कि—शक्तिभेद नहीं होनेसे उपकारभेद भी
    नहीं हो सकेगा, इसलिये या तो सभी धर्मोंके साथ धर्मीका बोध होगा
    या सभी धर्मोंको छोड़कर अकेले धर्मीका बोध होगा—वह तो तब
    शोभा देता, जब कि केवल धर्मीके अधीन या केवल धर्मिज्ञानके अधीन
    अथवा धर्मिमात्रका ज्ञान करानेवाली सामग्रीके अधीन समस्त धर्मोंका
    बोध हुआ करता। किन्तु ऐसी बात नहीं, बल्कि धर्मोंका बोध अपनी
    सामग्रीके अधीन होता है।
    इससे यह कहना कि—यदि भिन्न होनेके कारण धर्मीकी प्रतीति
    होनेपर भी शब्द और लिङ्गद्वारा धर्मिगत धर्मोंकी प्रतीति न हो तो
    इन्द्रियद्वारा भी होनेवाली धर्मीकी प्रतीतिके साथ धर्मोंकी प्रतीति नहीं
    होनी चाहिये। अर्थात् जैसे शब्द और अनुमानद्वारा केवल वस्तुका
    ज्ञान होता है, न कि उसके नीलापन आदिका, वैसे ही चक्षुद्वारा भी
    केवल वस्तुका ही प्रत्यक्ष होना चाहिये, उसके नीलापन उजलापनका
    प्रत्यक्ष नहीं होना चाहिये—कान छूनेपर कटि चालनके समान है और
    वह भी खण्डित हो जाता है। क्योंकि प्रत्यक्षस्थलमें उन उन धर्मोंकी
    उपलब्धि करानेवाली सामग्रीके अभावकालमें यदि उक्त प्रसङ्ग देते
    हो तो वह इष्ट ही है। क्योंकि प्रमाणोंकी अपनी-अपनी विचित्र शक्ति
    है। जैसे, अनुमानप्रमाण, साध्य और हेतुकी प्रसिद्ध जो परस्पर
    व्याप्ति, उसकी स्मृतिरूप शक्तिवाला होता है। अर्थात् पूर्वमें ज्ञात व्याप्ति-
    की स्मृति ही अनुमानप्रमाणकी शक्ति है। शब्दप्रमाणकी शक्ति
    उसका अर्थके साथ सङ्केतका ग्रह है। अर्थात् सङ्केतग्रहके अभावमें
    १ धीनस्ताव० इति १ पु० पा०
    २ उपाधिबोधः इति १ पु०पा०
    हा

[Header] क्षणभङ्गवाद १२९

प्रसिद्धप्रतिबन्धप्रतिसन्धानशक्तिकत्वात्, शब्दस्य समयसीम-
नतिक्रमात्, इन्द्रियस्य त्वर्थशक्तेरप्यपेक्षणात् । न तु सम्बद्धो-
ऽर्थ इत्येव प्रमाणै प्रमाप्यते१ अतिप्रसङ्गात् ।
यस्य तूपाधेरुपलम्भ एव येन प्रमाणेन धर्म्युपलभ्यते,
तस्यानुपलम्भे स तेन नोपलभ्यत इति परं युज्यते, सर्वोपा-
ध्यनुपलम्भे वा, तथा च सिद्धसाधनमिति संक्षेपः ।
स्यादेतत्, यदीन्द्रियेण समानविषयावेव लिङ्गशब्दौ,
तत प्रतिभासभेदोऽनुपपन्नः । एकविषयत्वं हि प्रतिभासाभेदेन
व्याप्त सव्येतरनयनदृष्टवत् दृष्टम् ।

शब्दसे कोई ज्ञान नहीं हो सकता है । और प्रत्यक्षप्रमाणभूत इन्द्रियोंके
लिये तो वस्तुगत शक्ति (योग्यता) की भी अपेक्षा होती है। ऐसी बात
नहीं है कि वस्तु इन्द्रियोंसे सम्बद्ध हुई, इतने मात्रसे इन्द्रियप्रमाणद्वारा
उसका ज्ञान हो जायगा । क्योंकि वैसा होनेपर वस्तुके रूपज्ञानके
साथ साथ उसके रसका भी ज्ञान नेत्रसे हो जाना चाहिये ।
“जिस उपाधिकी तो उपलब्धि होनेपर ही जिस प्रमाणसे धर्मीकी
उपलब्धि होती है, उस उपाधि (धर्म) की उपलब्धि नहीं होनेपर उस
प्रमाणसे उस धर्मीकी भी उपलब्धि नहीं होती है यह बात ठीक है ।
और यह भी ठीक है कि किसी धर्मीके सभी धर्मोंकी अनुपलब्धिकी
दशामे भी उस धर्मीकी उपलब्धि नहीं होती' । यदि आपका भी यही
सिद्ध करना अभिप्राय हो तो सिद्धसाधनदोष आ जाता है । क्योंकि
आप जो सिद्ध करना चाहते हैं, वह मेरे मतमे भी ठीक ही है । इस
लिये सिद्धको ही सिद्ध करना दोष है । यही सारांश हुआ ।
(पूर्वपक्ष) अस्तु यदि इन्द्रियके समान ही अनुमान और शब्द
भी वस्तुके स्वरूपको बतावे तो प्रत्यक्षज्ञानसे अनुमितिज्ञान और शाब्द
ज्ञानमें भिन्नता नहीं होनी चाहिये । जहा जहा एकविषयता रहती है,
वहा वहा ज्ञानमे भी भेद नहीं रहता है । जैसे, एक ही विषयको बायीं

१ प्रत्याय्यते इति १ पु० पा०

१२० आत्मतत्त्वविवेके

न चेह तथा । यथा हि प्रत्यक्षे चेतसि देशकालावस्था-
नियतानि परिस्फुटरूपाणि स्वलक्षणानि प्रतिभान्ति, न तथा
शब्दे ( शाब्दे ) लैङ्गिकविकल्पेऽपि । तत्र हि विजातीयव्या-
वृत्तमिव परस्पराकारसङ्कीर्णमिवास्फुटमिव प्रत्यक्षापरिचितं
किञ्चिद्रूपमाभासमानमनुभवविषयः ।
न चोपायभेदमात्रेण प्रतिभासभेद उपपद्यते । न हि
प्रतिपत्त्युपायाः प्रतिपत्त्याकारं परिवर्तयितुमीशते । न चैकं
वस्तु द्वयाकारमिति प्रतिबन्धसिद्धिः । अस्य प्रयोगः-योऽयं

और दायीं आँखोंसे देखनेपर बायीं आँखसे हुआ ज्ञान दायीं आँखसे
हुए ज्ञानसे भिन्न नहीं होता ।
किन्तु, यहाँ ऐसी बात नहीं है । क्योंकि, जैसे प्रत्यक्षदशामें किसी
खास देशकाल और अवस्थाके साथ एवं काला उजला आदि अपने स्पष्ट
रूपके साथ वस्तुओंकी प्रतीति होती है, वैसे शब्द या अनुमानद्वारा
हुए ज्ञानमें नहीं होती । वहाँ ( शब्द और अनुमान स्थलमें ) तो अपने
विजातीयोंसे स्पष्टरूपमे भिन्नताका अनुभव न होनेके कारण भिन्न जैसा,
तथा अपने अन्य सजातीयोंके साथ भेदकी प्रतीति न होनेसे सजातीयोंके
आकारमे मिला जुला जैसा, एव अपने विशेषधर्मकी प्रतीति न होनेके
कारण अस्पष्ट जैसा, प्रत्यक्षसे अपरिचित कोई पदार्थ भासित होता हुआ
अनुभवका विषय होता है ।
जबतक वस्तु भिन्न भिन्न न हो तब तक केवल इन्द्रिय, अनुमान
या शब्दरूप उपायोंके भेदसे ज्ञान भिन्न हो जाय ऐसी बात नहीं हो
सकती । क्योंकि ज्ञानके उपाय ज्ञानके आकारको नहीं बदल सकते
हैं । और यह भी नहीं हो सकता कि एक ही वस्तु दो आकारकी
हो । अर्थात् प्रत्यक्षज्ञान वस्तुकी सत्तामे ही होता है, किन्तु अनुमिति
और शाब्दज्ञान प्रत्यक्षके समान नहीं है, इसलिये वे ( अनुमिति
और शाब्दज्ञान ) वस्तुके रहने या न रहने दोनों दशाओंमें होते
हैं । अतः हमारी पूर्वोक्त व्याप्ति ( नियम ) सिद्ध है कि 'जो ज्ञान
जिस वस्तुके रहने या न रहने दोनों दशाओंमे हो, वह उससे अन्यकी
व्यावृत्ति ( अन्यापोह ) बोधित कराता है" । यहाँ हमारे अनुमानका

क्षणभङ्गवादः १३१
क्वचिद्वस्तुनि प्रत्यक्षप्रतिभासाद् विपरीत: भासो, नासौ तेनै-
कविषयो, यथा घटग्रहात् पटप्रतिभासः । तथा च गवि प्रत्यक्ष-
प्रतिभासाद् विपरीत: प्रतिभासो विकल्पकाल इति ।
इदमप्यवद्यम्, चित्राचित्रप्रतिभासाभ्यां मिथो विरुद्धा-
भ्यामेकनीलविषयाभ्यामनैकान्तात् । न हि चित्राध्यक्षे यन्नीलं
चकास्ति, तदेव पश्चान्न केवलम्, तदेव वा पुरुषान्तरस्य ।
येनाकारेणैकविषयत्वं तयोर्न तेनैव विरोधो, येन च विरोधो
न तेनैकविषयत्वम् ।
धर्मान्तराकारेण विरोधो नीलमात्राकारेण चैकविषय-
तेति चेत्, नन्विहापि धर्मान्तराकारेण विरोधो गोत्ववत्पिण्ड-
ऐसा आकार बनता है—जो ज्ञान किसी वस्तुके प्रत्यक्षज्ञानसे विपरीत
आकारका होता है, वह उसके समान विषयवाला नहीं होता, जैसे—
घटज्ञानसे विपरीत पटज्ञान घटविषयक नहीं होता । वैसे ही, गौके
सम्बन्धमें जो प्रत्यक्षज्ञान होता है, उससे विपरीत आकारका ज्ञान गो-
विषयक शाब्दबोध कालमे होता है। इसलिये शब्दद्वारा प्रत्यक्षके
समान गोस्वरूपका भान नहीं होगा किन्तु अगोव्यावृत्तिका ही
भान होगा ।
(उत्तरपक्ष) आपका यह कथन भी सदोष है। क्योंकि चित्ररूपका
ज्ञान और अचित्ररूप (नीलमात्र) का ज्ञान परस्परमें विरुद्ध होते
हुए भी दोनों ही एक नीलरूपको विषय बनाते हैं। इसलिये आपका
उपर्युक्त नियम कि “परस्पर विपरीत ज्ञान समानविषयक नहीं होते”
व्यभिचारी हो जाता है। ऐसी बात नहीं है कि चित्रके प्रत्यक्षमें जो
नील भासित होता है, वही पीछे अकेला न भासित होता हो, अथवा
उसी समयमें अन्य व्यक्तिको वही नील अकेला न भासित
होता हो ।
यदि कहें कि—जिस आकारसे दोनों ज्ञानोंमें एकविषयता है, उसी
आकारसे उनमें विरोध नहीं है, और जिस आकारसे विरोध है, उससे

१३२ आत्मतत्त्वविवेके
मात्राकारेण चैकविषयतेति तावन्मात्रनिराकरणेऽसिद्धो हेतुः।
पूर्वत्र सिद्धसाधनम्। न हि शाब्दलैङ्गिकविकल्पकाले देश-
कालनियमादयोऽपि सर्वे एव धर्मविशेषा विषयभावमासाद-
यन्तीत्यभ्युपगच्छामः।
ननु धर्मिण्येव स्फुटास्फुटप्रतिभासभेदः कथम् ? न कथ-
ञ्चित्। यथा यथा हि धर्माः प्रतिभान्ति तथा तथा स्फुटेति
एकविषयता नहीं है। क्योंकि चित्राकार और अचित्राकारसे विरोध
है और केवल नीलाकारसे एकविषयता है—तो निश्चित ही प्रत्यक्ष और
शाब्दबोधादि स्थलमे भी नील, श्वेत, कपिल आदि धर्मोंके आकार-
से विरोध है और गोत्वधर्मवाले पिण्डके आकारसे एकविषयता है।
अर्थात् प्रत्यक्षमे नीलापन उजलापनके साथ साथ गोत्वधर्मवाला पिण्ड
भासित होता है और शाब्दबोधादि स्थलमें केवल गोत्वधर्मयुक्त पिण्ड
का भान होता है। इस प्रकार नीलादि अंशमें ही विरोध है न कि
पिण्डांशमे भी।
इसलिये शब्द और अनुमानद्वारा होनेवाले गोत्वयुक्त पिण्डके भान
का यदि खण्डन करना चाहते हो तो इसके लिये आपका दिया पूर्वोक्त
(प्रतिभासभेद) हेतु स्वरूपासिद्ध है। क्योंकि पिण्ड (वस्तु) के
सम्बन्धमे प्रत्यक्ष शाब्दबोध और अनुमिति सभी ज्ञान समान है।
और यदि नियत देश, काल, अवस्था तथा वस्तुके उजलापन नीलापन
आदि विशेषधर्मोंको लेकर प्रत्यक्ष और शाब्दादि प्रतिभासोंके भिन्न
भिन्न होनेसे उन्हें भिन्नविषयक सिद्ध करना चाहते हो तो सिद्धसाधन
दोष हो जायगा। क्योंकि यह हम भी नहीं मानते कि शाब्द या
अनुमितिज्ञानकालमे नियतदेश काल, अवस्था, नीलत्व, श्वेतत्व आदि
वस्तुके सभी धर्म भासित होते हैं। अर्थात् उस रूपसे शाब्द आदि
ज्ञानको प्रत्यक्षज्ञानसे भिन्नविषयक हम भी मानते ही हैं।
(शङ्का) जो धर्मी (वस्तु) प्रत्यक्षसे भासित होता है, वही यदि
शब्द और अनुमानसे भी भासित होता है तो प्रत्यक्षज्ञान स्फुट और
शाब्दबोध तथा अनुमिति अस्फुट, ऐसा प्रतीतिभेद कैसे होता है ?

क्षणभङ्गवादः १३३
प्रतिभानव्यवहारः । यथा यथा च धर्माणामप्रतिपत्तिस्तथा
तथा प्रतिभानस्य मान्द्यव्यवहारो दूरान्तिकादौ प्रत्यक्षेऽपि
लोकानाम्, न तु सर्वथैवाप्रतिपत्तौ ।
विदूरादिप्रत्ययोऽपि पक्ष एवेति चेत्, अस्तु, न तु ताव-
ताऽपि धर्मधर्मिभेदसिद्धौ प्रत्यक्षबाधस्य, तत्सन्देहेऽपि सन्दि-
(उत्तर) मैं कहूँगा कि प्रतिभास स्फुट ही होता है, अतः उसमें
स्फुटत्व और अस्फुटत्वका भेद कथमपि नहीं होता है । क्योंकि जैसे
जैसे वस्तुके धर्म भासित होते जाते हैं, वैसे "स्फुट प्रतीति है" ऐसा
व्यवहार होता है और जैसे जैसे वस्तुगत धर्मोंकी अप्रतीति होती जाती
है, वैसे वैसे "मन्द प्रतीति है" ऐसा व्यवहार लोगोंको दूरस्थ और
समीपस्थ वस्तुओंके प्रत्यक्षमें भी होता है। यह बात नहीं है कि वस्तु
की सर्वथा अप्रतीतिमें ही अस्फुटत्व (मन्दत्व) का व्यवहार होता हो ।
इसलिये शब्द और अनुमानमे यदि वस्तुका सर्वथा भान न हो तो
वहाँ अस्फुटत्व भी नहीं कहा जा सकता है ।
यदि कहो कि— विदूरादिप्रतीति भी पक्षके अन्तर्गत ही है। अर्थात्
जैसे शाब्द और अनुमितिप्रतीतियोंको वस्तु (धर्मी) विषयक नहीं
मानते, वैसे ही विदूरादिप्रतीतिमे भी धर्मीका भान नहीं मानते हैं।
इसलिये उसे दृष्टान्तके रूपमें नहीं उपस्थित किया जा सकता है—तो
कहूँगा कि वह भी भले ही पक्षकोटिमे रहे, फिर भी धर्म और धर्मीका
पारस्परिक भेद सिद्ध है। अतः दूरस्थ वस्तुके कुछ धर्मोंका भान न
होनेपर भी उस धर्मीका तो भान होता ही है। इसप्रकार आपका यह
अनुमान करना कि विदूरप्रतीतिमे भी धर्मीका भान नहीं होता है,
प्रत्यक्षप्रमाणसे बाधित है ।
बाधमें कथञ्चित् सन्देह होनेपर भी सन्दिग्धानैकान्तिक दोषका
परिहार नहीं हो सकता है । क्योंकि प्रतिभासभेद (विदूरप्रतीतिका
अस्फुट होने) क कारण ही आप उसे धर्मिविषयक नहीं मानते हैं, किन्तु
उसके धर्मिविषयक होनेपर भी कुछ धर्मोंका भान न होनेमात्रसे भी उस
प्रतीतिका अस्फुट होना संभव है । इसप्रकार आपके अनुमानमें

१३४ आत्मतत्त्वविवेके
ग्धानेकान्तिकस्य वा परिहारः, तावतापि प्रतिभासभेदस्यो-
पपत्तेः ।
यदि च नैवम्, दूरतमादिप्रत्ययेषु कः समाश्वासविषयः ?
यस्यार्थो लभ्यत इति चेत्, ननु लाभोऽपि पूर्वपूर्वोप्लब्धानुप-
मर्दनेनैव । न हि सत्त्वद्रव्यत्वपार्थिवत्ववृक्षत्वादिकं परिभूय
शिंशपा लभ्यते ।
यत्रार्थक्रियासिद्धिरिति चेत्, सर्वेषामनुवृत्तेः कस्यार्थ-
क्रियेति कि निश्चायकम् ? न किञ्चित्, किन्तु संकीर्णार्थ-
व्यभिचारका सन्देह तो अवश्य है और व्यभिचारका सन्देह भी अनु-
मितिको रोक देता है ।
यदि ऐसी बात न हो तो दूरतम ( सर्वाधिक दूर ) आदि प्रतीतियोंमे
कौन सी प्रतीति विश्वसनीय होगी । अर्थात् दूरतमप्रतीतिमें “कोई द्रव्य
है” ऐसा भासित होता है । दूरतरप्रतीतिमें “वह पार्थिव द्रव्य है”
ऐसा भान होता है । और निकटप्रतीतिमे “वह सीसमका वृक्ष है”
ऐसा स्पष्ट ज्ञान हो जाता है । यहाँ एक ही वस्तु अस्पष्टतम, अस्पष्टतर,
अस्पष्ट और स्पष्टरूपमे मेरे मतानुसार भासित होती है । किन्तु आपके
मतमे किस वस्तुके सम्बन्धमें विश्वास किया जाय कि अमुक वस्तुवाली
प्रतीति प्रमा है ।
यदि कहो कि—जिस प्रतीतिकी वस्तु प्राप्त हो जाती है, वही प्रतीति
विश्वसनीय है—तो निश्चित ही वह प्राप्ति भी पूर्व पूर्वमें प्राप्त वस्तुको
अतिरस्कृत कर ही होती है । क्योंकि निकटसे शिंशपाका ज्ञान अतिदूर
आदिसे जाने गये उसके सत्त्व, द्रव्यत्व पार्थिवत्व और वृक्षत्व आदि
भावोंको तिरोहित करके नहीं होता ।
यदि कहो कि—जिसमें पत्र काण्डादिस्वरूप अर्थक्रिया देखी जाती
है, उसीकी प्रतीति प्रमा है और शेषकी अप्रमा—तो शिंशपाप्रतीतिदशा-
में सत्त्व, द्रव्यत्व, पार्थिवत्व और वृक्षत्वकी भी अनुवृत्ति रहती ही है,
उनका उपमर्द होता नहीं । अत इनमे किसमे अर्थक्रिया होती है,
इसका क्या निश्चायक है ?

क्षणभङ्गवादः १३५
क्रियाविरहादेकमेव तत्र वस्तु, न चैकस्मिन् प्रतिभासभेद
इत्येक एव प्रत्ययस्तत्र सालम्बन इति ब्रूम इति चेत्, तथापि
कतम इत्यनिश्चये स एवानाश्वासः ।
असंकीर्णाऽपि चार्थक्रिया न व्यक्तिः, सामग्रीतः सर्व-
संभवात् । अत एव न सन्तानतः । न ह्येकसन्ताननियता
काचिदर्थक्रिया नाम । काञ्चिदर्थक्रियां प्रति प्रत्यक्षानुपलम्भ-
गोचर एव तथा व्यवस्थाप्यत इति चेत्, तर्हि दूरतमाद्युपलब्धा
यदि कहो कि—यद्यपि कोई निश्चायक नहीं है, फिर भी वहाँ अर्थ-
क्रियाके सङ्कीर्ण नहीं होनेसे एक ही वस्तु है, और एक वस्तुमें भिन्न
प्रतीति नहीं हो सकती, अतः एक ही प्रतीति वहाँ सविषयक है और शेष
प्रतीतियाँ निरालम्बन हैं—तो सत्त्वसे लेकर शिशपात्वप्रतीति तक कौन
सी प्रतीति ऐसी है, इसका निश्चय नहीं होनेसे किसी खास प्रतीतिकी
प्रामाणिकताके सम्बन्धमें वही अविश्वास कायम रहा।
यदि कहो कि—शिशपामे विशेष प्रकारकी पत्रकाण्ड आदि अर्थ-
क्रिया उसके सत्, द्रव्य, पृथिवी या वृक्षमात्र होनेसे होती तो कटहलके
भी सत्, द्रव्य, पृथिवी या वृक्ष होनेसे उसमें भी शिशपा जैसे ही पत्र
काण्डादि होते । अतः उस विशेष अर्थक्रियाके कारण शिशपाप्रतीति ही
प्रामाणिक निश्चित होती है—तो फिर भी यह असङ्कीर्ण अर्थक्रिया एक
व्यक्तिमात्रसे नहीं होती किन्तु सामग्रीसे होती है। इसीलिये व्यक्तिकी
अविच्छिन्न सन्ततिसे भी नहीं हो सकती । क्योंकि कोई भी अर्थक्रिया
(जैसे, अंकुरादि) एकमात्र बीजसन्ततिसे नहीं होती है किन्तु उसमें भी
मिट्टी पानी आदिकी सन्ततिकी भी अपेक्षा पहले बतायी जा चुकी है।
यदि कहो कि—किसी अर्थक्रियाके प्रति कारणरूपसे वही व्यवस्थित
किया जा सकता है, जिसका उस कार्यके प्रति अन्वय व्यतिरेक सहचार
हो। अर्थात् जिसके रहनेपर ही यह कार्य उत्पन्न हो और नहीं रहने-
पर न हो, वही उस कार्यका कारण है—तो दूरतम, दूरतर, दूर और
निकटसे द्रव्य, पृथिवी, वृक्ष और शिशपाके रूपमें उपलब्ध पदार्थके
सम्बन्धमें भी वही व्यवस्था होनी चाहिये। क्योंकि वे सभी उस अर्थ-