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सर्वकोश
आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

आत्मतत्त्वविवेक / बौद्धधिक्कार (उदयनाचार्य - महामहोपाध्याय पं. केदारनाथ त्रिपाठी सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Atmatattvaviveka of Udayanacharya

आचार्य उदयन (व्याख्याकार: पं. केदारनाथ त्रिपाठी) द्वारा

DevanagariHindipublished530 पृष्ठ

पृष्ठ 177, कुल 530 में से

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पृष्ठ 177

१२८ आत्मतत्त्वविवेकः
धीनस्तद्बोधमात्राधीनो¹ वा तन्मात्रबोधसामग्र्यधीनो वा
यावदुपाधिभेद² बोधः स्यात्, न चैवम्।

  • एतेन भेदाद् धर्मिणः प्रतीतावपि शब्दलिङ्गद्वारा धर्माणां
    चेदप्रतीतिः, इन्द्रियद्वाराऽपि मा भूदित्यादिकं तु कर्णस्पर्शे
    कटिचलनमपास्तम्। तत्तदुपाध्युपलम्भसामग्रीविरहकाले
    प्रसञ्जितस्येष्टत्वात्। विचित्रशक्तित्वाच्च प्रमाणानाम्। लिङ्गस्य
  • जो तो यह कहा कि—शक्तिभेद नहीं होनेसे उपकारभेद भी
    नहीं हो सकेगा, इसलिये या तो सभी धर्मोंके साथ धर्मीका बोध होगा
    या सभी धर्मोंको छोड़कर अकेले धर्मीका बोध होगा—वह तो तब
    शोभा देता, जब कि केवल धर्मीके अधीन या केवल धर्मिज्ञानके अधीन
    अथवा धर्मिमात्रका ज्ञान करानेवाली सामग्रीके अधीन समस्त धर्मोंका
    बोध हुआ करता। किन्तु ऐसी बात नहीं, बल्कि धर्मोंका बोध अपनी
    सामग्रीके अधीन होता है।
    इससे यह कहना कि—यदि भिन्न होनेके कारण धर्मीकी प्रतीति
    होनेपर भी शब्द और लिङ्गद्वारा धर्मिगत धर्मोंकी प्रतीति न हो तो
    इन्द्रियद्वारा भी होनेवाली धर्मीकी प्रतीतिके साथ धर्मोंकी प्रतीति नहीं
    होनी चाहिये। अर्थात् जैसे शब्द और अनुमानद्वारा केवल वस्तुका
    ज्ञान होता है, न कि उसके नीलापन आदिका, वैसे ही चक्षुद्वारा भी
    केवल वस्तुका ही प्रत्यक्ष होना चाहिये, उसके नीलापन उजलापनका
    प्रत्यक्ष नहीं होना चाहिये—कान छूनेपर कटि चालनके समान है और
    वह भी खण्डित हो जाता है। क्योंकि प्रत्यक्षस्थलमें उन उन धर्मोंकी
    उपलब्धि करानेवाली सामग्रीके अभावकालमें यदि उक्त प्रसङ्ग देते
    हो तो वह इष्ट ही है। क्योंकि प्रमाणोंकी अपनी-अपनी विचित्र शक्ति
    है। जैसे, अनुमानप्रमाण, साध्य और हेतुकी प्रसिद्ध जो परस्पर
    व्याप्ति, उसकी स्मृतिरूप शक्तिवाला होता है। अर्थात् पूर्वमें ज्ञात व्याप्ति-
    की स्मृति ही अनुमानप्रमाणकी शक्ति है। शब्दप्रमाणकी शक्ति
    उसका अर्थके साथ सङ्केतका ग्रह है। अर्थात् सङ्केतग्रहके अभावमें
    १ धीनस्ताव० इति १ पु० पा०
    २ उपाधिबोधः इति १ पु०पा०
    हा